उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

मातृ देवो भव ! पितृ देवो भव !!


एक अद्भुत अनुभूति उज्जैन में एक अत्यंत उच्च शिक्षा विभूषित गृहस्थ के घर पर हुई। जिनके घर हम प्रातराश के लिए गए थे वे स्वयं वेद, वेदांग, ज्योतिष के बहुत बड़े विद्वान पंडित हैं तथा एक विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष हैं। उनके स्वयं के अनेक शिष्य PhD,  बड़े-बड़े विद्वान, पंडित, कर्मकांडी हैं। इनके स्वयं के भी ज्योतिष आदि के प्रयोगों में भी अनेकों को लाभ मिला है। इनके पिताजी भी बहुत बड़े महामहोपाध्याय काशी से विभूषित संस्कृत के विद्वान पद्मश्री से सम्मानित हैं। पिता  की आयु 95 वर्ष, माता की 93 वर्ष, इनके घर जब हम 7-8 कार्यकर्ता कालभैरव आदि के दर्शन करके लगभग 10 बजे पहुँचे, तो पंडित जी ने स्वयं अपने हाथ से परोस कर सबको प्रातराश करवाया। अत्यंत आदर और प्रेम से, अतिथि देवो भव की भारत की संकल्पना को साक्षात् साकार किया। यह अत्यंत आनंददायी अनुभव था।

सबसे बड़ी बात थी अपने वयोवृद्ध माता-पिता के प्रति उनकी श्रद्धा और सम्मान। आज वर्तमान में फिल्मों, नाटकों में दिखाते है कि बड़े-बड़े उच्च पदों पर बैठे पुत्र अपने माता-पिता को अपने घर में इसलिए नहीं रखते हैं कि उनके व्यवहार से वे लज्जास्पद अनुभव करते हैं। माता-पिता घर में आने वाले बड़े अतिथियों के सामने कुछ भी बोल देंगे, कैसे भी आचरण करेंगे, कुछ भी व्यवहार करेंगे, इस कारण उन्हें घर में नहीं रखते हैं। रखते भी हैं तो उनका परिचय देने में कठिनाई अनुभव होती है। ऐसे समय जब केवल नकारात्मक समाचार ही प्रसारित किये जाते है, तब  यह अत्यंत सुखद अनुभूति जिसमें भारतीयता का एक अद्भुत उदाहरण हमें साक्षात् देखने को मिला, को समाज में फैलाना आनंद का विषय है।

स्वयं महापंडित अपने माता-पिता से अत्यंत विनम्रता से बातचीत कर रहे थे। पिताजी को सुनाई नहीं देता है तो वे पास जाकर उनके कान में परिचय दे रहे थे। उनके किसी भी बात को बार-बार पूछने पर बिलकुल बिना झल्लाए, विना कोई चिड़चिड़ाहट दिखाए, अत्यंत संयम के साथ, धैर्य से, प्रेम, स्नेह और आ

दर के साथ अपने माता-पिता के हर प्रश्न का उत्तर उन्होंने दिया। माता जी को सुनाई भी देता है और बोलती भी बहुत अच्छा है, गाती भी अच्छा है। माता जी हम सबसे परिचय ले रही थी, हम सब से बात भी कर रही थी। कुछ हिन्दीभाषी थे, उनसे भी त्रुटिवश वह कभी-कभी मराठी में बात कर रही थी। लेकिन पंडित जी ने कभी भी माँ को नहीं टोका कि अरे उन्हें मराठी नहीं आती। उन्होंने माँ को कुछ नहीं कहा। माँ जो मराठी में बोलती थी, वे हिन्दी में अनुवाद कर बताते थे।

मैंने बिना यह सोचे कि इस आयु में उन्हें सुपाच्य होगा के नहीं, चलेगा की नहीं, माँ से पूछ लिया, “आप लेंगी पोहा?”
माँ ने कहा, “हाँ ले लूँगी।”
पर बाद में जब थाली आयी, पंडित जी ने रोक दिया कि अभी-अभी उनका प्रातराश हो चुका है, यह जानकर ही उन्होंने माँ को नहीं दिया था।
माँ ने पुत्र को 4 बार टोका, “अरे मुझे भी तो दे!”
पुत्र ने कहा, “माँ, आपको अभी नहीं देना है, बाद में दूँगा। आवश्यकता नहीं है अभी।”
मॉं ने कहा भी, “देखो अब तो इ

सके ऊपर ही निर्भर है, ये नहीं देगा तो मैं कैसे खाऊँगी!”

फिर थोड़ी देर बाद माँ ने और ज़ोर देकर कहा, “चलो मुझे भी नहीं दे रहे हो, पिताजी को भी नहीं दे रहे हो, तो तुम ही खा लो सबके साथ!”
7-8 लोग घर में आए हुए हैं, पंडित जी परोस रहे थे इस कारण वे हमारे साथ नहीं ले सकते थे । पर उन्होंने माँ को एक बार भी मना नहीं किया।

माँ ने फिर दो बार, तीन बार कहा तो माँ को कहते, “हाँ माँ, बस अभी लेता हूँ।”, “मैं बाद में इनके जाने के बाद लूंगा।”, “मुझे बहुत ज़्यादा खाना है, आप तो जानती ही हो, मेरी डाइट बहुत ज़्यादा है, ज़्यादा खाता हूँ। इसलिए इनके सामने नहीं खा रहा हूँ।” आदि आदि।
एक बार भी माँ को नहीं कहा, “क्यों आप बार-बार कह रही हो?” झल्लाए नहीं, कुछ नहीं। बहुत प्रेम से, स्नेह से माँ की बातों का उत्तर दिया। माँ का इस आयु में यह बाल हठ – एक श्लोक सुनाऊँ? तुम्हें एक संस्कृत का गीत सुनाऊँ? स्रोत्र सुनाऊँ?
तो पुत्र ने यह नहीं कहा

कि अरे रहने दो माँ, बल्कि पुत्र ने कहा, “हाँ हाँ माँ सुनाओ, वह वाला सुनाओ।

कैसा अद्भुत दृश्य था वह!!
मेरी आँखों में अश्रु आ गए। मुझे स्वयं का अनुभव स्मरण हुआ, मैंने कैसे अपनी माँ से व्यवहार किया। वैसे तो प्रचारक होने के नाते 30 वर्ष से घर में हूँ नहीं। किन्तु जब घर आता-जाता हूँ (नागपुर केंद्र हो जाने से घर में माता-पिता का हालचाल जानने हेतु आना-जाना थोड़ा बढ़ भी गया है), भले ही रात को ना रुकूँ लेकिन आना-जाना तो होता ही है। तो मेरा माँ पर छोटी-छोटी बात पर झल्लाना, अपने मन में तसल्ली देना कि मैं उनके स्वास्थ्य के लिए, उनके भले के लिए ही कह रहा हूँ। लेकिन ज़ोर से बोल देना, अधिकार से बोलना, वह सब वहाँ बैठे-बैठे स्मरण हो रहा था। मैं मन ही मन सोच रहा था की यह आदर्श है, प्रयत्न करना होगा ऐसे बनाने का।

मैंने पूछा, “माँ की आयु क्या है?”
उन्होंने बताया, “93”
माँ ने सुना तो टोक दिया, “नहीं नहीं, अभी अभी 90 पूरा हुआ है, 91 शुरू हुआ है।”
पुत्र ने मॉं को नहीं कहा कि अरे माँ आपको याद नहीं है, पुत्र ने मुस्कुराकर “हाँ हाँ, ठीक है” ऐसा बोलकर, मुस्कुराकर बात को टाल दिया।
जब हम में से एक कार्यकर्ता ने कहा, “अरे आप तो लगती नहीं 90 की भी, आप तो 70-75 की लगती हैं!”
मॉं इस आयु में भी एकदम ऐसी प्रसन्न हुई कि उनका आनंद देखते ही बनता था। ऐसी स्त्री-सुलभ प्रसन्नता हुई उन्हें आयु कम बताने से कि बस पूछो नहीं!
बेटे को कहती, “राजू देख देख, क्या कह रहा है, तू तो बुड्ढी कहता है।”

सारा प्रसंग इतना अद्भुत था, प्रेम में, आदर में, सम्मान में, भारतीय संस्कृति का साक्षात अनुभव किया। मुझे लगता है आज भी सभी घरों में ऐसे ही माता-पिता हैं, सभी घरों में ऐसा ही पुत्र है और ऐसे ही संस्कार हैं। केवल प्रेम से आदर व्यक्त करने की पद्धति सबकी पद्धति कुछ कुछ निराली है। कोई थोड़ा कम झल्लाता है, कोई थोड़ा ज़्यादा झल्लाता है। मैं डॉ. राजराजेश्वर शास्त्री मूसलगांवकर को दंडवत प्रणाम करता हूँ कि वे धैर्य की साक्षात् प्रतिमूर्ति थे, पूरे समय वे एक बार भी नहीं झल्लाए। वैसे उनके सभी शिष्य और साथी जानते हैं कि उनका स्वभाव इतना धैर्यवान नहीं है। उनके रुद्र रूप को बहुत लोगों ने देखा है और ऐसा नहीं है कि वे क्रोधित नहीं होते।

माता-पिता तथा गुरु दोनों हमें मूल्य प्रदान करते हैं, उनका न तो मूल्यांकन किया जाता है, न ही उनके प्रति कोई भी मन में निर्णायक विचार लाया जाता है और न ही उन पर कभी क्रोधित हुआ जाता है अथवा झल्लाया जाता है। यह जो भारतीय संस्कृति की सीख है, यह साक्षात् आचरण में देखने को मिली और मन बड़ा प्रसन्न हुआ, आश्वस्त हुआ कि सनातन संस्कृति शाश्वत है, सनातन है। नित्य नूतन, चिर पुरातन है।

दिसम्बर 5, 2019 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

अंतरतम के प्रह्लाद की खोज का पर्व: होली


hiranyakahipuसमाज हिरण्यकश्यपुओं से भर गया है। हिरण्य के दो अर्थ है – एक है स्वर्ण और दूसरा है चमकनेवाला। धन और दिखावे के प्रति आकर्षण बढ़ता ही जा रहा है। जो इनके प्रति आकर्षित हो उसे हिरण्यकश्यपु कहते है। आज समाज में इन्हीं का बोलबाला हो चला है। जीवन में सफलता के मापदण्ड धन और उसका भोण्डा प्रदर्शन ही हो गये है। येन केन प्रकारेण धन कमाना ही हमारे समय की समस्त समस्याओं की जड़ है। होली के अवसर पर जब हम प्रह्लाद के दहन की कथा का स्मरण करते है। तो आज के समाज की ओर देखना आवश्यक हो जाता है। आज हिन्दुओं के धार्मिक सामाजिक उत्सवों पर आक्षेप लेने का शोभाचार (Fashion) सा हो गया है। हर बात के लिये हिन्दू संस्कृति को दोष देने की होड़ सी लग गई है। नेहरू द्वारा अपनाये समाजवादी आर्थिक प्रादर्श (Model) के कारण भारत में जब आर्थिक प्रगति अवरूद्ध थी तब उसे ‘हिन्दू विकास दर’ के नाम से कोसा जाता था। जबकि उस पूरी व्यवस्था में हिन्दुत्व दूर दूर तक नहीं था।

भारतीय संस्कृति में धन कमाने को मनाई नहीं है। उलटा अधिक से अधिक उत्पादन के लिये प्रेरित किया है। चित्रवाहिनियों के विचित्र चित्रण के कारण हम सोचते है कि हमारे ऋषि सन्यासी थे, भिक्षा पर निर्भर रहते थे। यह दोनों बाते भ्रममूलक है। भिक्षा तो अहंकार विसर्जन की साधना थी और अधिकतर ऋषि गृहस्थ थे। अपने पारिवारिक कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए समाज के लिये, ज्ञान के लिये समर्पित थे। आश्रमव्यवस्था के अनुसार गृहस्थजीवन का कर्तव्य पूरा करने के बाद वानप्रस्थ और फिर सन्यास लेते थे। किन्तु जब गुरूकुलों का संचालन करते थे तब तो वे गृहस्थ ही हुआ करते थे। अतः हिन्दू जीवनपद्धति का आदर्श ऋषि थे इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि हम निर्धनता की पूजा करते थे।याज्ञवल्क्य ऋषि वानप्रस्थ में जाते समय अपनी सम्पत्ती का दोनों पत्नियों के मध्य बटवारा करते है। तब वर्णन आता है कि स्वर्णाभूषणों से मंड़ित लाखों गायें उनकी सम्पत्ती में है। 40 गाँवों का लगान अधिकार उन्हें प्राप्त था। वास्तव में हमने अर्थार्जन के सर्वोच्च आदर्श प्रस्थापित किये। लक्ष्मी की सफलतम उपासना भारत में ही हुई। यह धर्माधरित अर्जन का ही परिणाम है।

जहाँ धन के लिये धर्म को छोड़ अति की वहीं पाशविकता आ जाती है। फिर ब्राह्मण कुल में जन्मा रावण भी राक्षस कहलाता है। दिखावा तथा अधर्म से धनप्राप्ति यह राक्षसी आचरण है। यही हिरध्यकश्यपु का इतिहास है। आज रावण और हिरण्यकश्यपु युवाओं के आदर्श बनते जा रहे है। छोटे रास्तों से अत्यधिक पैसा कमाने की होड़ सी लगी है। बिना श्रम के तिकड़म से कमाई करते समय धर्म अधर्म का विचार कौन करें? कोई धर्म, श्रम, ईमान की बात भी करता है तो उसे केवल अव्यावहारिक ही नहीं मूर्ख समझा जाता है। चारों ओर अतृप्त भोग की आग लगी है।

holikaऐसे में होली का पर्व प्रह्लाद व विभिषण की खोज का पर्व है। प्रत्येक के मन में हिरण्यकश्यपु और रावण के साथ ही प्रह्लाद और विभिषण भी निवास करते है। होलिका का दहन तो सदा ही चल रहा है। आज के युग में उसे टेंशन, तणाव, विषाद ऐसे नाम दिये जाते है। हर किसी के दिल में जलन मची है। किसी कवि ने कहा ही है ना – सीने में जलन आँखों में तुफान सा क्यूँ है? इस शहर में हर शक्स परेशान सा क्यूँ है? होलिका की तपन में भी प्रह्लाद सदा भक्ति की शीतलता से संरक्षित ही रहता है। अपने मन के प्रह्लाद को जगाने का यह पर्व है।

bibhishanप्रह्लाद हो या विभिषण ईश्वर का प्रत्यक्ष आश्रय पाकर ही व्यवस्था में स्थापित हुए। दोनों ने ही धर्मराज्य की स्थापना की।nrusimha उनके जीवन के तत्वों को समझने से ही हम आज भी पुनः धर्माधारित व्यवस्था की पुनस्र्थापना कर सकेंगे। अवचल भक्ति दोनों का प्रथम गुण है। भक्ति का अर्थ है एकात्म दृष्टि। जो सबमें विद्यमान एकत्व को देखता है वही भक्त। जो भक्त नहीं है वह विभक्त है। बिखरा हुआ है। आज हमने बाँटनेवाली व्यवस्था बना रखी है इसलिये व्यक्ति तक बिखर रहा है। अतः प्रह्लाद को बचाने के लिये यह एकात्मता भरी व्यवस्था को बनाना पड़ेगा। भक्ति के दम पर दोनों ही हरिभक्तों ने विषम से विषम परिस्थितियों का सामना किया। यह बचे रहने का बल बड़ा महत्वपूर्ण है। जब हमारे चारों ओर भ्रष्ट आचरण की आग लगी हो तब अपने ईमान को बचाने के लिये भी सतत ध्येयस्मरण का आश्रय लेना पड़ता है। किन्तु ईश्वर का प्रत्यक्ष अवतरण तब हुआ जब राक्षसों को सम्मूख चुनौति देने का साहस भक्तों ने किया। प्रह्लाद ने ईश्वर के सर्वत्र होने की चुनौति को स्वीकार किया ओर स्तम्भ से नृसिंह प्रगट हुए। विभिषण बड़े भाई को भरी सभा में धर्म की शिक्षा देने का साहस दिखाया और उनको राम के पास जाने का अवसर मिला। सबसे कठीन पीरक्षा यही है। अपने मन को पक्का बनाना और विपरित स्थिति में बचे रहना तो अपने तक ही सीमित है। हिरण्यकश्यपु ओर रावण का प्रगट सामना करना सबसे कठीन है। अपने ही सम्बधियों के सम्मूख धर्म पर दृढ़ रहने से ही ईश्वर प्रगट होंगे।

आईये! आज प्रह्लाद खोजे! सबको संगठित करें और चारो ओर फैले हिरण्यकश्यपुओं का सामना करें ताकि पुनः नरसिंह प्रगट हो और धर्मराज्य की स्थापना हो।

मार्च 27, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , | 5 टिप्पणियाँ

गण संस्कृति यज्ञ संस्कृति


‘‘हम भारतवासी, पूरी गंभीरता से भारत को एक सार्वभौम, लोकतान्त्रिक गणराज्य के रुप में संगठित करने का संकल्प करते है।’’ भारत के संविधान की मूल प्रस्तावना की यह प्रारम्भिक पंक्तियाँ  हैं। 1975 में पूरे देश में आपात्काल थोपकर संविधान की हत्या करनेवाले 42 वे संविधान संशोधन में इसमें सार्वभौम के बाद पंथनिरपेक्ष तथा समाजवादी ये दो विशेषण और जोड़े गये। संविधान की मूल प्रकृति तथा प्रावधान में किसी भी प्रकार के संशोधन के बिना ही उसके उद्देश्य में दो अनावश्यक संकल्पनाओं की पूछ जोड़ दी गई। चुनावी मजबुरियों के नाम पर इन को पुनः संशोधित करने का साहस कोई भी राजनैतिक दल आजतक नही दिखा पा रहा है। आपात्काल के बाद स्थापित जनता सरकार ने 44 वें संविधान संशोधन से 42 वें संशोधन द्वारा जनता मौलिक अधिकारों को स्थगित करनेवाले सभी प्रावधानों को तो निरस्त कर पूर्ववत् कर दिया किन्तु प्रस्तावना में की गई छेड़छाड़ को वैसे ही रखा। इन विशेषणों के जुड़ने के कारण ही आज हम राजनैतिक दलों को तुष्टिकरण की नित नई सीमाओं को लांघते हुए देखते है। सहिष्णुता का दायरा सीमटता जा रहा है और कट्टरता बढ़ती ही जा रही है।

इन विषयों पर चिंतन करना इसलिये आवश्यक है क्योंकि इन बातों से गणतन्त्र की नीव पर ही आघात हो रहे है। गणराज्य का आधार हे गण। गण अर्थात एकमन से कार्य करने वाला समूह। प्रबन्धन के क्षेत्र में आजकल अत्यधिक प्रचलित अंगरेजी शब्द है टीम। इसकी परिभाषा की जाती है, ‘‘एक कार्य के लिये गठित, एकलक्ष्यगामी दल’’। यह तात्कालिक होता है कार्य की अवधि तक के लिये कार्य की पूर्णता का लक्ष्य लेकर यह कार्य करता है। ‘गण’ की संकल्पना अधिक गहरी है। अंगरेजी में उपयुक्त Republic शब्द से भी बहुत गहरी। गण एक पारम्पारिक पारिभाषिक शब्द है। इसके राजनीति शास्त्र के उपयोग से भी पूर्व इसका आध्यात्मिक प्रयोग है। हमारी परम्परा में पूजा का पहला अधिकार गणेश जी का हैं जो गणों के ईश, गणनायक हैं। केवल शिवजी के गणों का नायक होने के कारण ही वे गण पति नहीं है। मानव का मानव से सम्बन्ध स्थापित करने की वैज्ञानिक आध्यात्मिक प्रक्रिया ‘गण’ के वे अधिपति है। मै से हम की ओर जाने की प्रक्रिया है गण।  और इस प्रक्रिया के लिए लिए आवश्यक साधना के अधिपति गणपति|
भारतीय आध्यात्म विद्या में आगम व निगम की दोनों विधियो की मान्यता है। निगम विधि में जहाँ  स्वयं को नकारकर शुन्य बना दिया जाता है|  नेति नेति की विधि से अहंकार को शुन्य कर शिवत्व से एकत्व की प्रक्रिया बतायी गई है। वही आगम विधि में अपने क्षुद्र अहं को विस्तारित कर सर्वव्यापि करने की प्रक्रिया द्वारा विराट से एकाकार होने की प्रक्रिया भी आध्यात्मिक साधना है। इस विधि में अपने व्यक्तिगत मै को सामूहिक मै के साथ क्रमशः एकाकार करते हुए स्वयं के स्वत्वबोध का विकास किया जाता है। यही अखण्डमण्डल की साधना है जो चराचर में व्याप्त ईश्वर का साक्षत्कार करवाती है। यह गण साधना है। मै को समूह में विसर्जित करने की साधना। गण के अंग का कोई व्यक्तिगत अस्तीत्व ही नहीं रह जाता है वह अपने गण परिचय से एकाकार हो बड़ी इकाई के रक्षार्थ अपने आप को समर्पित कर देता है।

‘गण’ गठन की प्रक्रिया व्यक्ति की साधना के साथ ही समूह की भी साधना है। भारत में सामूहिक साधना का ही विशेष महत्व रहा है। हमारे सारे वेद मन्त्र बहुवचन में प्रार्थना करते है। अहं का नहीं वयं का प्रयोग किया जाता है। मन, वचन, कर्म में सामूहिकता की प्रार्थना बार बार की गई है। हम एक मन से एक संकल्प के साथ एक दिशा में अग्रेसर होते हुये साथसाथ उत्कर्ष व कल्याण को प्राप्त करें। यह हिन्दूओं की सनातन वैश्विक प्रार्थना है। इस बात को हमने केवल दर्शन के सिद्धान्तों तक ही सीमित नहीं रखा अपितु कर्म, अथवा आचार की परम्परा में ढ़ालकर उसे जीवन का नियमित अंग बना दिया। यह भारतीय जीवन दर्शन की विशेषता है। प्रत्येक तत्व का कर्मकाण्ड के रुप में सघनीकृत संस्थापन (Concrete  Institutionalization ) किया गया। यही अनेक आक्रमणों के बाद भी हमारे जीवित रहने का महत्वपूर्ण रहस्य है। जीवन के प्रत्येक अंग में इस ‘गण’ संकल्पना को साकार किया गया। परिवार, वर्ण, ग्राम, नगर, जनपद तथा राष्ट्र इन सभी स्तरोंपर गणों के गठन की विधि को हमने सदियों से विकसित किया है। धार्मिक, औपासनिक परम्पराओं के साथ ही सामाजिक, आर्थिक व राजनयिक व्यवस्थाओं में गणों का विकास हिन्दूओं ने प्राचीनतम काल से किया है।

यह देश का दुभाग्य ही है कि स्वतन्त्रता के बाद हमारे इन प्रचण्ड ऐतिहासिक अनुभूतियों को पूर्णतः दुर्लक्षित कर हमने विदेशी विचारों पर आधरित व्यवस्था को अपनाया। इतना ही नहीं सेक्यूलर के नाम पर अपनी सभी प्राचीन परम्पराओं को प्रभावी रुप से नकारने का काम किया। परिणामतः परिभाषा में गणराज्य होते हुए भी सामूहिक चेतना के विकास के स्थान पर हमने विखण्डित गुटों की राजनैतिक चेतना का विकास किया। पंथ, प्रांत, भाषा तथा जाति जैसी सामूहिक चेतना व्यक्ति के विस्तार का माध्यम बनने के स्थान पर हमारी प्रचलित राजनैतिक व्यवस्था में यह सभी परिचय विघटन का कारण बनते जा रहे है। समाज में धार्मिक स्तर पर आज भी जीवित ‘गण’ संकल्पना को ठीक से समझकर उसे व्यवस्थागत रुप प्रदान करना वर्तमान भारत की सबसे बड़ी चुनोति है।

गण के गठन के शास्त्र को हम समझने का प्रयत्न करते है तो हम पाते है कि इसका भावात्मक आधार ‘त्याग’ में है। त्याग से ही व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज व समाज से राष्ट्र के स्तर पर स्वत्वबोध का विस्तार सम्भव है। त्याग का संस्थागत स्वरुप हे यज्ञ। यज्ञ के द्वारा हम सहजता से त्याग को परम्परा के रुप में ढ़ाल पाये है। आज भी हमारे घरों में गाय के लिये गोग्रास, तुलसी को पानी देने जैसी परम्पराओं का प्रयत्नपूर्वक पालन किया जाता है। अतिथि भोजन जैसे भूतयज्ञ द्वारा समाज को आपस में बांध रखा था। अतः यज्ञ को समझने से ही गण के गठन का कार्य किया जा सकता है।

गीता में भगवान कृष्ण कहते है कि यज्ञ के द्वारा ही प्रजा का सृजन कर प्रजापति ने लोगों को कहा कि यह यज्ञ ही आपकी कामधेनु है जिसके द्वारा आप अपनी सभी ईच्छाओं की पूर्ति कर सकते हो। सहयज्ञाः प्रजा सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वम् एष्वोSस्विष्टकामधुक्।।गी 3.10।। अगले दो श्लोंकों में यज्ञ के द्वारा त्याग से कैसे परस्पर सामंजस्य बनाकर समुत्कर्ष की प्राप्ति हो सकती है इसका वर्णन है। देवान्भवयतानेन ते देवा भवयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्सथ।। गी 3.11।। यह भी कहा है कि बिना यज्ञ में हवि दिये अर्थात समाज, सृष्टि में अपने योगदान की श्रद्धापूर्वक आहुति दिये बिना जो भोग करता है वह तो चोर है। इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभावितः। तैर्दत्तान प्रदायेभ्यो यो भुन्क्ते स्तेन एव सः।। गी 3.12।। आजके समस्त भ्रष्टाचारी इसी श्रेणी में आते है। यह श्लोक तो इन पापियों के लिये और भी कठोर शब्दावली का प्रयोग करता है। यज्ञ के प्रसाद के रुप में भोग करनेवाले लोग सर्व पापों से मुक्त हो जाते है वहीँ जो केवल अपने स्वार्थ के लिये ही भोग करते है वे तो पाप को ही खा रहे होते है।

यज्ञ अपने निर्माण में सबके योगदान को अधोरेखित कर अपने कर्म में उसके प्रति कृतज्ञता का व्यवहार लाने का संस्कार देता है। अतः यज्ञ के द्वारा ही गण का गठन सम्भव है। आज हमें पुनः यज्ञ संस्कारों के जागरण के द्वारा गण संस्कृति की पुनस्थार्पना करने की आवश्यकता है। इसीसे वास्तव में हमारे संविधान का ध्येय गणतन्त्र साकार हो सकेगा। संविधान में मौलिक अधिकारों के साथ मौलिक कर्तव्यों की भी बात की है| भारतीय संस्कृति में सदा कर्त्तव्य को ही महत्त्व दिया गया है| अधिकार को उसके अप्रिनाम के रूप में ही देखा गया| यज्ञ का व्यवहारिक रूप कर्त्तव्य में ही प्रगट होता है| स्वाहः का मंत्र अपने कर्तव्यों की आहुति का परिचायक है| किन्तु भारतीय संस्कृति के स्थान पर विदेशी राज के प्रभाव में बने होने के कारण हमारे संविधान में मौलिक अधिकार तो न्यायलय में कार्यान्वित किये गए है किन्तु मौलिक कर्तव्यों का स्वरुप मात्र सुझावात्मक रखा गया है| इनकी अवहेलना को किसी न्यायलय में चुनौती नहीं दी जा सकती| यह हमारी विडम्बना है|

गण संकल्पना पर आधारित व्यवस्थाओ के निर्माण के लिये यज्ञ को और अधिक विस्तार से समझने की आवश्यकता है। इस गणतन्त्र दिवस के अवसर पर हम गणत्व को जीवन में उतारने के लिये यज्ञ को समझाने व जीवन में उतारने का संकल्प ग्रहण करें।

जनवरी 26, 2012 Posted by | योग, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

   

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