उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

धर्मानुसारी शिक्षा की स्थापना में शिक्षकों की भूमिका


Ruprekhaमानव की पहचान संबंधों से है | बिना संबंधों के मनुष्य का कोई परिचय ही नहीं है | समस्त सृष्टि के अन्तर्निहित एकत्व का सुप्त ज्ञान मानव मन को अनंत विस्तार हेतु प्रेरित करता है | प्रकटतः भले ही हम स्वयं को सबसे अलग मानते है फिर भी अंतर्मन में इस बात का भान सदैव रहता है कि हम उस एक ईश्वरीय चेतना के अंग है | इस अनुभूति के कारण ही मनुष्य सदैव अपनी चेतना का विस्तार करने का प्रयत्न करता है | इसीलिए मानव को सामाजिक प्राणी भी कहते है | यह सामाजिकता मनुष्यता का महत्वपूर्ण अंग है किंतु सृष्टि के सम्बन्ध केवल मानव समाज तक ही सीमित नहीं है | इसके तंतु सर्वव्यापी है | मानव का मानव से, मानव का समाज से, मानव का अन्य प्राणियों से, सृष्टि से, समूचे ब्रम्हांड से तथा अंततोगत्वा परमात्मा से जो सम्बन्ध है, उन संबंधों के निर्वहन को धर्म कहते है | इस पूरे अस्तित्व को जिन अन्तर्निहित नियमों द्वारा धारण किया गया है उसी को धर्म कहते है | यही धर्म व्यवहार में भी अपेक्षित है | धर्मानुसारी शिक्षा का अर्थ है प्रत्येक को इस धर्म की अनुभूती कराना तथा उसपर आधारित व्यवहार का प्रशिक्षण प्रदान करना |

वर्तमान समय में धर्मसंकल्पना का अर्थ स्पष्ट न होने के कारण पूरी शिक्षा ही धर्मविहीन हो गयी है| उपासना के रूप में धर्म का सीमित अर्थ प्रचलित होने के कारण उसे भेद का मूल मान लिया | परिणामतः धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धर्म के समग्र रूप को ही व्यवहार से बाहर कर दिया | धर्मानुसारी शिक्षा तो क्या, शिक्षा में धर्म के अंतर्भाव की भी कल्पना वर्तमान वातावरण में नहीं कर सकते | ऐसी स्थिति में से धर्मानुसारी शिक्षा के आदर्श तक पहुँचने हेतु जिन महत्प्रयासों की आवश्यकता है उनमें शिक्षकों की भूमिका सर्वोपरि है | शिक्षक ही शिक्षा की धुरी है | चाहे जैसी भी व्यवस्था हो, शिक्षक के बिना शिक्षा की कल्पना ही नहीं कर सकते | व्यवस्था चाहे जितने भी निर्बंध लगा ले, कक्षाकक्ष में पढ़ाते समय विधि एवं व्यवहार की स्वतंत्रता को कोई छीन नहीं सकता | शिक्षक यदि अपने इस स्वातंत्र्य का समुचित उपयोग करे तो शिक्षा व्यवस्था के पुनरुत्थान में चमत्कार संभव है | वैसे भी धर्म आचरण से ही संभव है और आचरण का प्रशिक्षण किसी पाठ्यक्रम की अपेक्षा व्यावहारिकता से अधिक दिया जा सकता है | अतः यदि शिक्षक अपनी भूमिका का धर्म के अनुसार निर्वहन करने लगे तो वर्तमान व्यवस्था में भी धर्मानुसारी शिक्षा प्रदान करना संभव है | २ से ३ प्रतिशत शिक्षकों के दृष्टिकोण में सम्यक परिवर्तन आ जाये तो व्यवस्था परिवर्तन भी प्रारंभ हो जायेगा | व्यवस्था परिवर्तन के २ मार्ग है | क्रान्ति के मार्ग से व्यवस्था को एक झटके में बदला जाता है | किंतु इस पद्धति में परिवर्तन का आधार राजतंत्र होता है जोकि अपनेआप में धर्मानुसारी शिक्षा के सिद्धांतों के विपरीत है | क्रान्ति में परिवर्तन ऊपर से नीचे की ओर होता है | परिवर्तन का दूसरा मार्ग सहज, स्वाभाविक, क्रमशः होनेवाला परिवर्तन है | परिवर्तन संसार का स्थायी स्वभाव है | संसरति इति संसारः | अतः समाज में स्वतः होनेवाले परिवर्तनों के साथ शिक्षा में भी क्रमशः परिवर्तन होता है | इसे उत्क्रांति मार्ग कहते है | वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अनियंत्रित परिवर्तन पतन की ओर ही जाता है | भौतिक शास्त्र में इसे Entropy (परिक्षय) का सिद्धांत कहते है | क्रांति में प्रस्थापित व्यवस्था का ध्वंस निहित है | १८३५ में मैकोले ने यही किया था | सकारात्मक शिक्षा की प्रस्थापना हेतु क्रांतिकारी परिवर्तन कितना भी आकर्षक लगे, अत्यंत कठिन है | एक तो ऐसे परिवर्तन हेतु आवश्यक सम्पूर्ण सैद्धांतिक स्पष्टता तथा उसे व्यवहार में उतारनेवाले प्रशिक्षित आचार्य एक साथ एक समय इतनी बड़ी संख्या में तैयार करना तथा इस व्यवस्था को स्थापित करने हेतु अनुकूल राजतंत्र का उपलब्ध होना, दोनों ही बातें दुष्प्राप्य है | यदि महत्प्रयास से धर्मसत्ता आदर्श आचार्यों को तथा राजसत्ता राजनैतिक इच्छाशक्ति को प्राप्त भी कर ले तब भी अचानक व्यवस्था परिवर्तन समाज में सांस्कृतिक क्षोभ (cultural shock) उत्पन्न करेगा | दूरस्थ वनवासी क्षेत्रों में अचानक आधुनिक शिक्षा को प्रस्थापित करने से ऐसा विक्षोभ देखने में आता है | ऐसे सामूहिक विक्षोभ की स्थिति में अधिकतर समय समाज अच्छी बातों को भी नकार देता है |

उत्क्रांति का पथ सहज, स्वाभाविक व नैसर्गिक है | किंतु फिर भी उसमें विकास के स्थान पर पतन की ही अधिक संभावना है | प्रयत्नपूर्वक धर्मानुसारी शिक्षा की chanakyaस्थापना हेतु आवश्यक परिवर्तन करना यह मार्ग ना तो अचानक झटके से की हुई क्रान्ति हो सकता है और ना ही अत्यंत धीमी गति से होनेवाली उत्क्रांति | जिस मार्ग का अवलंबन धर्मसंस्थापना के लिए किया जाना अपेक्षित है उसे सम्यक क्रान्ति कहा जा सकता है | संस्कृत में इसे यदि एक शब्द में कहना हो तो कहेंगे ‘संक्रांति’ | संक्रांति में परिवर्तन क्रमशः व नैसर्गिक है किंतु परिवर्तन की गति व दिशा सुनियोजित होगी | क्रमशः उत्थान करते हुए अंतिम आदर्श को प्राप्त किया जायेगा | यही भारतीय पद्धति है | संक्रांति में क्रान्ति की तरह विस्फोट नहीं है और ना ही उत्क्रांति की तरह पतन | जो-जो जिस-जिस स्तर पर है वही से क्रमशः उत्थान की ओर अग्रसर हो यही संक्रांति का मार्ग है | धर्मसंस्थापना की यही शाश्वत विधि है |

शिक्षा में संक्रांति की आधारशिला शिक्षक ही होंगे | संक्रांति में चूंकि परिवर्तन बाहर से थोपा नहीं जाता अपितु अन्दर से ही किया जाता है | अतः यह हमेशा मानव-केन्द्रित होगा, व्यवस्थानुगत नहीं हो सकता | शिक्षक धर्मानुसारी शिक्षा की संकल्पना को अर्थात धर्म की सुस्पष्ट संकल्पना को हृदयंगम करे | इसीसे शिक्षा में संक्रान्ति प्रारम्भ होगी | इस धर्म को अपने व्यक्तिगत जीवन में आचरण से प्रारम्भ करना होगा | धीरे-धीरे अध्ययन, अध्यापन व शिष्यों के साथ व्यवहार में धर्म का प्रभाव प्रारम्भ होगा | शिक्षक के कक्षा में धर्माचरण प्रारम्भ करने से सकारात्मक परिवर्तन दृष्टिगोचर होंगे | किसी भी शैक्षिक संस्थान में यदि १० प्रतिशत शिक्षक धर्माचरण करनेवाले हो जाये तो प्रयत्नपूर्वक उस शिक्षा संस्थान को धर्मानुसारी शिक्षा के आदर्श के रूप में प्रस्थापित किया जा सकता है | जब इन शिक्षा संस्थानों से समाज के सभी क्षेत्रों में सर्वोत्तम व्यक्तित्व प्रदान किये जायेंगे तब सारा समाज इन शिक्षा संस्थानों का अनुसरण करने लगेगा | परिवर्तन का धर्मानुसारी मार्ग यही है |

संक्रांति का प्रारम्भ शिक्षकों के सुगठन हेतु आयोजन करने से होगा | आचार्य निर्माण की यह प्रक्रिया बाहरी प्रशिक्षण से नहीं अपितु अंदरूनी स्वाध्याय से ही संभव है | धर्मसंस्थापना की प्रेरणा से उद्दीपित आचार्य एकत्रित आकर धर्म को समझने हेतु अध्ययन, विमर्श, मनन, चिंतन करेंगे तब उसे स्वाध्याय कहा जायेगा | इस स्वाध्याय का मूल आधार तो शास्त्र ग्रन्थ ही हो सकते है | किंतु साथ ही शास्त्रीय सिद्धांतों की युगानुकुल अभिव्यक्ति को भी स्वाध्याय का आधार बनाना होगा | धर्म के तत्व को हृदयंगम करना स्वाध्याय का प्रथम चरण है | इसका अगला चरण धर्मावलंबन के व्यावहारिक आयामों का सृजन है | कुछ दो, चार, दस या पचास लोग भी कुछ विधियों की सूचि बनाकर सारे अध्यापकों को दे देंगे तो काम नहीं चलेगा | धर्मावलंबन की विधियों का सृजन प्रत्येक को अपनी प्रतिभा का समुचित उपयोग करते हुए करना होगा | यह सृजन प्रक्रिया प्रत्येक के लिए स्वतंत्र होते हुए भी व्यक्तिगत नहीं हो सकती | धर्म का मर्म सामूहिक क्रिया में है | अतः स्वाध्याय भी सामूहिक ही करना पड़ेगा | चिंतन मनन द्वारा समझे हुए तत्व को व्यवहार में उतारने का नाम है निदिध्यासन | इसी से स्वाध्याय परिपूर्ण होगा | स्वाध्यायी आचार्यों के नियमित मंडल सर्वत्र प्रारम्भ करने होंगे | प्रयत्नपूर्वक पूरे समाज में इस योजना को क्रियान्वित करना होगा |

स्वाध्याय से प्राप्त विधियों को अपने-अपने अध्यापन में प्रयोग कर परिष्कृत किया जायेगा | ऐसे कुछ शिक्षक साथ मिलकर या तो पूर्व से चल रहे शिक्षा संस्थान को आदर्श बनायेंगे अथवा नूतन पूर्णतः धर्मानुसारी शिक्षा संस्थानों का निर्माण करेंगे | इनके प्रभाव से नीतियों में भी परिवर्तन होगा | प्रारम्भ में केवल इतना भी हो जाये कि राजसत्ता ऐसे पूर्णतः निःस्वार्थ भाव से चलनेवाले गैर-वाणिज्यिक धार्मिक शिक्षा संस्थानों को स्वतंत्रता से कार्य करने दे, किसी भी प्रकार का नीतिगत हस्तक्षेप ना करने दे तो भी पर्याप्त है | ऐसे समाजपोषित शिक्षा संस्थान क्रमशः प्रमुखता प्राप्त करते जायेंगे व शासनमुक्त शिक्षा व्यवस्था का विकास करेंगे |

Saraswati-Statue-to-Washingtonइस पूरी प्रक्रिया में शैक्षिक संगठनों की भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है | इस हेतु शैक्षिक संगठनों के कार्यकर्ताओं का मानस धर्मसंकल्पना के प्रति दृढ़ करना होगा | वर्तमान में देश में भारतीय दृष्टी को ध्यान में रखकर काम करनेवाले तीन प्रकार के शैक्षिक संगठन कार्यरत हैं | कुछ संगठन शिक्षा संस्थानों का संचालन करते हैं | निःस्वार्थ सेवा भाव से राष्ट्रनिर्माण हेतु चरित्र निर्माण करनेवाली संस्कारवान शिक्षा प्रदान करनेवाले कई शैक्षिक संगठन हैं | संख्या की दृष्टी से विद्याभारती इनमें अग्रणी है | रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन, भारत सेवक समाज, सर्वोदयी विचारधारा से चलनेवाले संगठन आदि अनेक संगठन इस श्रेणी में आते हैं | यद्यपि इन शिक्षा संगठनों द्वारा चलाये जानेवाले शिक्षा संस्थान आधुनिक व्यवस्था का अंग होने के कारण पूर्णतः भारतीय नहीं है | फिर भी इन संगठनों का संचालन करनेवाले कार्यकर्ताओं की मंशा धर्माधिष्ठित भारतीय पद्धति को स्थापित करने के लिए अनुकूल है | धर्मदृष्टि को समझने से इन शिक्षा संस्थानों के शिक्षकों द्वारा संक्रांति होना तुलनात्मक रूप से अधिक सुकर होगा |

दूसरे प्रकार के संगठन शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न घटकों के हितों की रक्षा हेतु काम करते हैं | विद्यार्थियों के हितों के लिए विद्यार्थी संगठन जैसे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षकों के हितों के लिए विभिन्न राज्यों में गठित शिक्षक संघ तथा कई राज्यों में निजी संस्थाचालकों के संगठन भी हैं | इस प्रकार के शैक्षिक संगठन प्रमुखतः अपने सदस्यों के अधिकारों, आर्थिक हितों तथा समस्याओं के समाधान हेतु आन्दोलन शासन से चर्चा अथवा न्यायालयीन दावों के माध्यम से कार्य करते हैं | इन संगठनों का मूल स्वभाव सदस्यों की स्वार्थपूर्ति होने के कारण इनमें जुडनेवालों के मन में भी निजी हितों की वरीयता अधिक होती हैं | इसका सकारात्मक परिणाम यह है कि इन संगठनों की सदस्य संख्या बहुत अधिक होती है | यह संख्याबल इनकी प्राथमिक शक्ति है | धर्मानुसारी शिक्षा के तत्वों का प्रचार कर अनुकूल वातावरण निर्मिती में ये संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं | इनके माध्यम से शिक्षा में जुड़े हुए एक बड़े वर्ग तक वैचारिक सन्देश पहुंचाना संभव हो सकता है | यद्यपि इसका सैद्धांतिक गुणांकन नहीं होगा फिर भी धर्माचरण में रत शिक्षकों को नैतिक समर्थन देनेवाले अनुकूल मन के समर्थकों का वर्ग तैयार किया जा सकता है | ये लोग स्वाध्याय और संक्रांति के क्रियान्वयन में पूरी तरह से सहभागी भले ही न हो उसके लिए पोषक उर्वराभूमि का निर्माण निश्चित रूप से कर सकते हैं | संक्रांति के द्वितीय चरण धर्माधिष्ठित शिक्षा के सर्वव्यापीकरण में लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत संख्या का भी बड़ा महत्त्व है | इस चरण में इन शैक्षिक संगठनों की भूमिका सबसे प्रभावी होगी | इन संगठनों में धर्मानुसारी शिक्षा के विचार का बीजारोपण करने हेतु कुछ वैचारिक कार्यक्रमों की योजना करना आवश्यक होगा | ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से कार्यकर्ताओं को धर्मसंकल्पना का परिचय दिया जा सकेगा | संख्या बड़ी होने के कारण पूर्ण वैचारिक स्पष्टता की अपेक्षा तो नहीं कर सकते, केवल अधिकारों के साथ कर्तव्यों का विचार करने का संस्कार भी प्रेरित किया जा सके तो प्रारंभ के लिए पर्याप्त होगा | अधिकारों के लिए लड़ने के साथ ही कर्तव्यपालन में ही हमारा अधिक स्थायी हित है यह बात समझना धर्मविचार का शुभारम्भ है |

तीसरे प्रकार के शैक्षिक संगठन वैचारिक कार्य करनेवाले संगठन हैं | इनका मूल काम ही शिक्षा के भारतीय प्रतिमान पर अनुसंधान कर उसे युगानुकूल रूप में प्रस्थापित करने का नियोजन करना है | पुनरुत्थान विद्यापीठ, भारतीय शिक्षण मंडल, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास आदि संगठन इस श्रेणी में आते हैं | धर्माधिष्ठित शिक्षा को ही विभिन्न नामाभिधानों से प्रकट करते हुए उसकी संस्थापना हेतु ये वैचारिक संगठन कार्य कर रहे हैं | शिक्षा व्यवस्था में धर्मसंस्थापना हेतु संक्रांति करने में इन संगठनों की योजक भूमिका अपेक्षित है | संक्रांति के लिए आवश्यक विभिन्न घटकों को एक सूत्र में गूंथने का परोक्ष कार्य इन संगठनों को करना होगा | संक्रांति के तात्विक अधिष्ठान की सुस्पष्टता की जिम्मेवारी भी इन्ही संगठनों की बनती है | अनादि काल से भारत में जीवंत धर्मसंकल्पना को मूल रूप में समझकर उसका युगानुकुल स्पष्टिकरण समाज में प्रदान करना धर्मानुसारी शिक्षा के लिए प्रथम आवश्यकता है | धर्म तो साक्षात्कार का विषय है | अतः इन संगठनों के कार्यकर्ताओं को साधक बनना होगा | उपरी प्रवचन, उद्घोषणाएं, प्रस्ताव आदि तो संगठनात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप चलते रहेंगे किंतु इन संगठनों का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि गहन गंभीर साधना को तत्पर कितने कार्यकर्ताओं का निर्माण इन संगठनों की प्रेरणा से हुआ | संक्रांति के अन्य सभी चरणों की शुद्धि, पावित्र्य, प्रभाव, साफल्य तथा सार्थकता इस साधना पर निर्भर करती है | अतः इन संगठनों से जुड़े सभी कार्यकर्ताओं का शास्त्राध्ययन तथा स्वाध्याय कठोर नियमितता के साथ होना अपेक्षित है | समय-समय पर सामूहिक विमर्श, प्रत्यक्ष प्रयोग, उन प्रयोगों से प्राप्त अनुभवों पर पुनः सर्वांगीण संविमर्श तथा आपसी समन्वय यह इस साधना की कार्यपद्धति बनती है | इस चर्चा स्वाध्याय के साथ ही इन विचारों का युगानुकुल शब्दावलि में संहिता लेखन भी अनिवार्य है | तैतरीय उपनिषद् के शिक्षावल्ली अनुवाक् में गुरु अपने दीक्षांत आदेश में स्पष्ट निर्देश दे रहा है – स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां मा प्रमदितव्यं – स्वाध्याय और प्रवचन में कभी आलस न करना | यहाँ वर्तमान युग के अनुरूप प्रवचन के अर्थ को विस्तारित करके समझना होगा | वैसे भी प्रवचन का अर्थ है पूर्ण गंभीरता से प्रकट करना – प्रकर्षेण वाच्यति इति प्रवचनं | वर्तमान स्थिति में वैखरी वाणी का अक्षररूप अर्थात लिखित साहित्य अधिक प्रामाणिक माना जाता है | अतः प्रवचन के अर्थ में गंभीर लेखन को सम्मिलित करना पड़ेगा | वैचारिक संगठनों के कार्यकर्ताओं को प्रयत्नपूर्वक नित्यलेखन का अभ्यास करना होगा | प्रतिदिन नियमपूर्वक कुछ पृष्ठ लिखने की आदत बन जाये तो शनैः शनैः लेखनी में स्पष्टता व लेखन में गांभीर्य आ जायेगा |

धर्म के सुस्पष्ट साक्षात्कार के साथ ही वैचारिक संगठनों के कार्यकर्ताओं का यह भी दायित्व बनता है कि उसका युगानुकुल प्रयोग करे | अतः शिक्षकों व पहले दो प्रकार के संगठनों के साथ मिलकर शिक्षा में धर्मप्राण नवोन्मेष करने का शुभ व्रत भी इन संगठनों का है | ऐसे प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्षों को संहिताबद्ध कर अनेक स्थानों पर दोहराने योग्य प्रतिमान का निर्माण करना होगा | यह प्रतिमान सभी स्तरों पर स्वाध्याय, प्रयोग व धर्माचरण का आधार बनेगा | इसी प्रतिमान से धर्मानुसारी शिक्षा को स्थापित करने, धर्मप्राण, स्वाध्यायी आचार्यों की संक्रांति संभव होगी |

अप्रैल 4, 2016 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , | 11 टिप्पणियाँ

बहुआयामी धर्म की एकात्म संकल्पना


BG2किसी भी राष्ट्र में सामाजिक, राजनैतिक समस्याओके मूल में वैचारिक अस्पष्टता की बहुत बडी भूमिका रहती है। भारत में ब्रिटिष राज के अवषेष आज भी वैचारिक विभ्रम के रूप में बने हुए है। सदियों से ऐतिहासिक सांस्कृतिक अनुभूति के आधार पर जिन संकल्पनाओं का विकास हुआ उनकी अवधारणाओं एंव मर्म को अनुवाद की अपर्याप्तता के कारण भ्रमित कर दिया गया है। समाज एवं लोक जीवन में प्रचंड विविधता के बाद भी अनेक संकल्पनायें देश के सभी भाग में समान रूप से समझी जाती है। आपको उस प्रांत की प्रादेशिक भाषा का ज्ञान हो न हो अनेक आध्यात्मिक गूढ संकल्पनाओं को भी आप सहजता से समझ सकते है। कैलास से लेकर कन्याकुमारी व द्वारका से लेकर परषुराम कुंड तक कही पर भी आप जाइए-माया, लीला, श्रद्धा आदि अत्यंत गंभीर आध्यात्मिक संकल्पनाओं को सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी सहजता से समझता है। अतिविषिष्ट भाषाई विविधता के होते हुए भी इन संकल्पनाओं का एक समान अर्थ पूरे देश में प्रचलित है। लीला को समझाने के लिए महर्षि वेदव्यास को भागवत महापुराण की रचना करनी पडी, जयदेव को गीत गोविंद लिखना पडा और तुलसी को मानस। संभवतः इन्ही सबके सदियो तक किए हुए अनुष्ठान का ही परिणाम है कि आज हमारा पूरा समाज इन गूढ मान्यताओं को सामान्य बोलचाल की भाषा मे अचूक प्रयोग करता है । ऐसे अनेक पद ऐतिहासिक अनुभूतियों से विकसित होते हैं । वे केवल इस भाषा के शब्द नही होते अपितु एक जीवंत व्यावहारिक संकल्पना होते हैं । इन शब्दों का न तो किसी भाषा मे अनुवाद किया जा सकता है और न ही ऐसा प्रयास करने की कोई आवश्यकता है । जैसे लड्डू को विश्व की सभी भाषाओं मे लड्डू ही कहना चाहिए और पिझ्झा को पिझ्झा ही । वैसे ही इन संकल्पनाओं को अनुवाद के बिना जस का तस व्यक्त किया जाना वैचारिक प्रामाणिकता के लिए अनिवार्य है । ब्रिटिश राज के काल में विद्वानो द्वारा इस महत्वपूर्ण तथ्य की अनदेखी की गई । जिस कारण संकल्पनाओं का विकृत, संकुचित और सीमित अर्थ समाज मे प्रचलित हुआ । जिसके फलस्वरूप सामूहिक संभ्रम की स्थिति देश की मेधा में छा गई । राज प्रतिष्ठित विद्वानों द्वारा इन भ्रमित संकल्पनाओं पर आधारित नीतियों पर आधारित कार्य्रक्रमों का चलन हुआ । देश में व्याप्त मानसिक गुलामी का यह सबसे बडा कारण हैं । जिस एक संकल्पना के संकीर्ण व भ्रमित होने के कारण स्वतंत्र भारत मे सर्वाधिक परिणाम हुए हैं, वह है ‘धर्म’ की अवधारणा । धर्म को रिलीजन के पर्यायवाची मान लिए जाने के कारण, सर्वपंथ समभाव को पंथ निरपेक्षता के रूप मे परिभाषित किया जाना, और इस विकृत शब्दरचना के कारण राजकीय व्यवस्थाओं तथा सभी सामुदायिक गतिविधियों से धर्म को प्रयत्नपूर्वक अलग कर दिया गया । शिक्षा में से भी धर्म को अलग करने के प्रयास में सभी संस्कार, सदाचार, नैतिकता आदि अनिवार्य बातें भी हटा दी गई । अब इन सब बातों को लागू करने के लिए मूल्य शिक्षा जैसे अधूरे प्रयास किए जा रहे है । आवश्यकता तो यह है कि धर्म की सही अवधारणा को पुनःप्रस्थापित कर धर्मानुसारी शिक्षा की पुनर्रचना की जाए ।

भारत में धर्म यह एक बहुआयामी संकल्पना है । वास्तव में यह एक जीवन जीने का मार्ग है । पाशविक वासनाओं से उपर उठकर मानवीय संवेदनाओं के अनुरूप जीवन जीना तथा क्रमश: विकसित होते हुए महामानव, देवमानव, दिव्यमानव व अंततः प्रत्यक्ष दिव्यता की अनुभूति यह विकास का मार्ग धर्म है । धर्म केवल व्यक्तिगत आत्मोन्akmनति ही नही अपितु पूरे समाज के ही दिव्यत्व की ओर गति करने का माध्यम बनता है । धर्माधिष्ठित समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपने -अपने स्वभाव के अनुसार जहाॅ हैं उस स्थिती से क्रमशः इस प्रगति की ओर अग्रेसर होता है । समाज जीवन मे धर्म प्रतिष्ठित होने पर प्रत्येक में यह उच्च आकांक्षा स्वतः जन्म लेती है । साथ ही समाज में इस प्रकार के अवसर और मार्गदर्षक दोनो ही उपलब्ध होते हैं । समाज जीवन के सभी अंग धर्मप्राण होते हैं । अतः जो प्रजा को धारण करता है वह ‘धर्म’, ऐसी धर्म की व्याख्या की जाती है । स्वभाव को भी धर्म कहा है । अतः उस स्वभाव के अनुरूप ही मार्ग का चयन करना होता हैं । स्वभाव भी धर्म है और उन्नतिगामी समाज में आपसी संबंध व सामुदायिक जीवन की परंपरायें भी धर्म है । मानव का मानव से, परिवार से, समाज से, सृष्टी से तथा अंत मे परमेष्ठी मे एकात्म संबंध है । इस संबंध को समझकर उसका निर्वाह करना धर्म है । अतः भारत में सामान्य बोलचाल की भाषा मे पुत्रधर्म, पितृधर्म, पत्नीधर्म, पतिधर्म ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता हैं । आपसी संबंधो का निर्वहन कर्म के द्वारा किया जाता हैं । अतः क्या करणीय है ? और क्या अकरणीय है? यह जो बताया है, उसे भी धर्म कहते हैं । उस अर्थ मे धर्म कर्तव्य का परिचायक हैं । ‘राजधर्म’ आदि शब्दों मे ‘राजा के कर्तव्य’ यही भाव प्रकट होता हैं । स्वयं के व सृष्टी के प्रति मनुष्य के कर्तव्य का बोध होने पर धर्म संयम का रूप धारण करता हैं । अतः इसे मर्यादा भी कहा गया है । कर्तव्य, अकर्तव्य के साथ ही भोगने की मर्यादा भी धर्म निर्धारित करता हैं । इन्द्रियों के द्वारा कितना भोग करेंगे? क्या भोगें? व कैसे भोगे? यह बात जिस अलिखित नियम से, संस्कारो के रूप मे सामूहिक मन मेे सुप्रतिष्ठित की जाती हैं उस नियम को भी धर्म कहते हैं । समाज जीवन के नियम धर्माधारित होते हैं । अपेक्षा यह है कि राज सत्ता भी धर्म विधान से ही परिचालित हो । अतः भारत मे न्याय करने हेतु रचित विधिविधान के नियमों को भी धर्म कहा गया । जब इसमें किसी व्याख्या का निर्धारण करना हो तो ‘धर्मसभा’ का आयोजन किया जाता था । अब आधुनिक युग मे कानून, विधि विधान तथा नैतिक अपेक्षा व धर्म विहित कर्तव्य दोनो अलग-अलग हो गये हैं । वास्तव में राजव्यवस्था धर्माधिष्ठित हो तब इन दोनो का भी तादात्म्य ही होता हैं ।

चर अचर सभी वस्तुओं के स्वभाव को धर्म ही कहा जाता हैं । आधुनिक विज्ञान शिक्षा मे भी वस्तुओं के गुणधर्म सिखायें जाते हैं । किसी भी सजीव भूतमात्र अथवा निर्जीव वस्तु का स्वभाव ‘धर्म’ कहलाता है जैसे अग्नि का धर्म है दाहकता, जल का धर्म है प्रवाहित होना । कितने भी छोटे स्थान पर जल को बांध भी दे वह लहरों के रूप प्रवाहित होता हैं । प्रत्येक वस्तु अपने स्वभावधर्म को धारण किए हुए अस्तित्व मे रहती हैं । प्रत्येक मनुष्य भी अपने आप में विशिष्ट स्वभाव का होता है । वह स्वभाव ही उसका स्वधर्म हैं । उसी के अनुसार उसे स्वयं से व अन्यों से संबंधों का निर्वाह करना हैं । यह संबंध भी धर्म द्वारा परिभाषित हैं । सारी सृष्टि ही एक ईश्वर की एकात्म अभिव्यक्ति हैं । अतः उसके प्रत्येक अंग का विशिष्ट स्थान होने के साथ अन्य अंगो के साथ अंगांगी संबंध हैं| जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अंग परस्पर पूरकता के साथ स्वयं के कार्य को करते हुए औरों के सहयोगी बनते हैं उसी प्रकार मनुष्य को परिवार, समाज, सृष्टि व परमेष्टि के साथ समन्वयात्मक संबंध का निर्वाह करना होता है । सृष्टि के इन ईश्वरीय नियमों को ‘धर्म’ कहते हैं । मानव को अपने स्वधर्म का प्रगटीकरण कर्म रूप मे करना होता हैं । उद्देष्यपूर्ण कर्म स्वधर्म होता हैं । स्वधर्माधिष्टित कर्म मानव जीवन को परिपूर्ण बनाता हैं । धर्म केवल तत्व न हो करके प्रत्यक्ष व्यवहार में उतारना पडता है । अतः कहा गया है कि ‘आचार प्रभवो धर्म’ इन इतनी सारी विविध छॅटाओ का एक साथ धारण किए हुए धर्म की संकल्पना इस यज्ञ भूमि मे विकसित हुयी । समय-समय पर लोगों ने इसे अपने जीवन मे उतारकर आदर्श प्रस्तुत किए । विद्वानों ने इसके गुण तत्वों की मीमांसा की । जीवन के विभिन्न आयामों मे धर्म को सुव्यवस्थित रूप से परिभाषित करने का काम शास्त्रों ने किया । सार्वकालिक, शाश्वत तत्वों के रूप मे मनुष्यों ने इसकी पहचान की । मनुमहाराज ने धर्म के दस लक्षण बताए हैं । एक दो भेंदो के साथ यही पंतजली के योगसूत्रों मे परिलक्षित हुए हैं । भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद गीता के सोलहवे अध्याय मे दैवी गुण सम्पद के सोलह गुणों के रूप मे धर्माचरण को स्पष्ट किया हैं ।

समाज जीवन में व्यक्ति को भिन्न-भिन्न भूमिकाओं का निर्वाह करना पडता है । अनेक बार इन विभिन्न भूमिकाओं मे आचरण किए जाने वाले धर्म का आपसी टकराव हो जाता है । ऐसे धर्म संकट में से बाहर निकलने का मार्ग भी शास्त्र बताते हैं । जहाॅ व्यष्टि धर्म समष्टि धर्म के साथ टकराता है, वहाॅ बडी इकाई को महत्व देना साधारण सा नियम है| जब व्यक्ति के ही दो व्यक्तिगत धर्मो के बीच टकराव हो तब शास्त्र कहते हैं कि समाज के अधिकतम हित का ध्यान रखते हुए ज्यादा से ज्यादा लोगों का जिसमे हित हो उस बात को वरीयता दी जाए । इसी प्रकार से एक और वर्गीकरण धर्मपालन की कठोर नियमितता को लेकर शास्त्रों में मिलता है। वह है सामान्य धर्म, विशेष धर्म व आपदधर्म । सामान्य जीवन यापन करते हुए नित्यनियम के रूप मे कुछ कर्तव्यो का समावेष होता है, उसे सामान्य धर्म कहते हैं । यात्रा, बीमारी आदि विशेष परिस्थितियों मे इन नियमों की कठोरता में कुछ मात्रा मे रियायत बरती जाती है उसे विषेष धर्म कहते है । जब प्राणों पर ही संकट आ पडें, उस समय सामान्य रूप से अकरणीय कार्य को करने की अनुमती होती है इसे आपदधर्म कहते है | धर्मपालन के लिए जब देह ही न बचे ऐसी आशंका की परिस्थिती में ही आपदधर्म का अवलंब किया जा सकता है अन्यथा नही ।
इस प्रकार धर्म का अत्यंत व्यावहारिक एवं सूक्ष्म विवेचन भारत मे शास्त्र ग्रंथो में और साथ ही लोक जीवन में भी दिखाई देता है । आज भी हिंदू समाज के अधिकतकम लोग सहज सुलभ परंपरा के रूप मे धर्म का अवलंबन करते हैं । धर्म पालन में त्रुटि के परिणाम स्वरूप जीवन में जो संकट आयेंगे उनका स्पष्ट भान सामान्य भारतीय को परंपरा से प्राप्त हुआ है । अतः धर्म भीरूता के चलते सामान्य व्यक्ति शुद्ध सात्विक एवं प्रामाणिक जीवनयापन करने का प्रयत्न करता है । विदेशी शासन के चले जाने के बाद भी विदेशी तंत्र को ही अपनाए रखने के कारण व्यवस्था में से धर्म लुप्त हो गया हैं । उस कारण चरित्र का संकट शासन तंत्र और उससे जुडी सामूहिक गतिविधियों में दिखाई दे रहा हैं । यह अत्यावश्यक है कि हम अपनी समस्त व्यवस्थाओं को शाश्वत, सनातन धर्मानुसार पुनर्गठित करें । चिरस्थायी सार्वजनिक सुख का यह एकमात्र मार्ग हैं । धर्मराज्य की स्थापना ही सर्वे भवन्तु सुखिनः की वैश्विक प्रार्थना को साकार कर सकती हैं ।

दिसम्बर 23, 2015 Posted by | आलेख | , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

Look beyond political controversy, Yoga is for all


Another Post as a precursor to IYD. This piece was written for bharatniti.in giving it here for the blog followers.

http://www.bharatniti.in/story/look-beyond-political-controversy-yoga-is-for-all/44

IYD

Yoga has been accepted universally as a discipline of moulding one’s own life to active overall well-being, accepting it as a way of life beyond faith, worship or religious dogmas. The same was evident when more than 170 countries across five continents unanimously supported the resolution for declaring June 21 as the International Day of Yoga at the General Assembly of the UNO.

IYD LogoMany of them proposed or seconded it without any voting or discussion. In fact, many of the Islamic countries too supported the resolution. Yoga is being practiced by people beyond the religious beliefs.

On this background of universal consensus, it is ironical that the decision of the central government to celebrate the International Day of Yoga all over the country is being opposed on religious grounds by some misguided elements. When the whole world is unanimous about the universal appeal of Yoga, it is a shame that this great science of living is being subjected to controversy in the land of its origin.

Social media is full of photographs of members of different communities performing Yogic exercises. The universal acceptance of Yoga is very much witnessed across different communities in India.

Controversy more of political concoction than popular

The present fabricated controversy over the celebration of the International Day of Yoga is the result of intolerant minds. Yoga is a science which demands experiments and experiences and does not ask one to believe or un-believe anything. The performance of Yoga does not affect any belief systems. If at all it will enhance ones capacity to have undeterred in one’s own beliefs. Yoga is necessarily an Bharatiya philosophy as it was first compiled in this holy land and has all the attributes of Sanatana Dharma because it was practiced, experimented and evolved into different systems by generations of Hindus. But it still is a universally applicable science of life and the art of living.

The practice of Yoga will not swerve the individual from his personal religious beliefs. It will also not make him antagonistic to his or any other religion but will, on the contrary, augment his affection for his personal deity. The practice of Yoga will not proselytize a Muslim or a Christian, but will on the contrary make him a better adherent of his faiths. Thus, no one should be afraid of Yoga as it includes all and excludes none.

So what is Yoga actually?

Yoga is beyond a mere physical exercise. In fact, Yoga is neither mere physical exercise nor is it just a therapy. As per the ancient traditions, it is a way of scientific living. A modern being may find it hard to comprehend but the mind is the prime factor of all our actions in life. And yoga is nothing but the training of the mind. Thus it (yoga) enables perfection in every action at all levels. The whole universe functions in disciplined manner. There are laws of existence which govern the natural phenomena irrespective of any subjective intervention. The only exception to this smooth governance of the universe are human beings.

The humans are endowed with the will to act and the power of imagination. The combination of these two have created all the scientific wonders. Like all kinds of powers, this also needs regulation. If uncontrolled, power becomes corrupt and boon is converted into a curse. This is true at individual as well as collective level.

Sage Patanjali, in his Yoga aphorisms, initiates with a simple statement – ath yoga anushasanam [Thus we begin the discipline of Yoga.] The aim of all the yogic practices right from Asanas, Suryanamaskara, Pranayamas up to Dhyana [meditation] and Samadhi is disciplining the mind. If the mind is concentrated, anything and everything can be accomplished.

Yoga is the way of orienting the mental powers to one’s aim. The conflicts and clashes in the world are a result of intolerance born out of lack of coordination among one’s own multiple roles. There are various schools of Yoga and they have different practices.

There are several variants of the same Yogic practice. Some well- meaning noble Acharyas even tried to standardize yogic practices. This futile effort has not succeeded as diversity is an inherent feature of existence. Everything that exists is unique in its form, function and role. Yoga not only takes into account this diverse uniqueness but also enriches the extraordinary individuality of the seeker, the performer. At the same time, yoga helps the sadhaka (practitioner, the doer) to realize the underlying oneness behind the apparent diversity.

So, whatever be the practice, if the mind is tuned properly with a synchronized awareness and relaxation, it integrates one with all. Essence is not in the action but in the intent. Yoga literally means union. Every practice that enables the mind to expand and unite the different levels of collectivity is Yoga. Yoga gives quietude, peace and harmony to the individual mind and if performed regularly by a sizable portion of the humanity, will spread this peace and harmony to the cosmic world.

One can say with full conviction that the mass performance of various Yoga practices on the historic occasion of the International Day of Yoga on June 21 will definitely lead to conflict free and harmonious world.

जून 18, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

I am neither a politician nor a social reformer!


CHICAGO_1893_20x30_21_RGB_FINAL_00What was the purpose of Swami Vivekananda’s life? Though it may be deemed arrogant to ask such a question, for those who want to follow his path it is very important to address this basic query in right spirit. The purpose of life is what makes the personality what it is.

Swamiji as an Avatar?

Some devotees like to believe Swamiji to be an avatar and they would simply say the purpose of avatar is to establish Dharma and that’s what Swamiji did. But the founder of Vivekananda Kendra, Ma EknathjiRanade would consider calling Swamiji an avatar as an escapists’argument. By calling him avatar we are shunning our responsibility to follow his path. On the other hand it is belittling his achievements also. ”If he was a divine incarnation, I feel, what he did was not very much. But on the other hand if I think he was as human as any one of us then I feel that he has achieved a great height. At the same time, I get the inspiration to keep a noble goal before myself and to emulate his path to greatness.” Eknathji would argue.

What were Swamiji’s thoughts on the matter? He has uttered many a things about himself. He has also written about his life’s mission in some of his letters. But never has he called himself an avatar. That should be the ultimate test. Notwithstanding the vision of ShriRamakrishnaParamahamsa reported by some devotees to back their avatar claim; we will be more honest if we use Swamiji’s method to decide the issue. Narendra was also faced with the samedilemma about his Guru. Many devotees called ShriRamakrishna an avatar. Narendra himself had many miraculous experiences with the great master. He attained NirvikalpaSamadhi, had Shaktipat(Transfer of Spiritual power by touch) and also the SakaraDarshan(Vision in Form) of Mother Kali by the grace of the great Guru. Still he could not come to a definite conclusion as to Shri Ramakrishna being a divine incarnation till the very last days of Thakur. To resolve the dilemma he decides in his mind, ”I will accept him as a divine incarnation, an avatar, only if he himself directly tells me so.” It is documented that he got the answer then and there. As if the Guru was reading the mind of the disciple, Thakur, taking Narendra’s hand proclaimed very clearly, ”One who was Rama, who was Krishna, has now born as Ramakrishna”; leaving no ambiguity whatsoever.

Hence we must apply the same test for deciding whether Swamiji was an Avatar or not. According to the documented and available information he never claimed to be one. He was not shy of speaking about himself. As early as in1891 he is known to have said, ”I will burst upon the Indian society like a bomb”. He fulfilled this self prophecy. Talking to his disciple he extolled, ”I may leave this mortal body, but I will continue to work for next 1500 years.” So he does. But there is no mention of his calling himself an Avatar. Thus till any such new discoveries are found we are bound to take Swamiji’ word for his purpose of life as a human being rather than an Avatar.

References to his mission:

He has distinctly made a few comments on his mission which was dawned upon him in the intense meditation at the ShreepadShila in Kanyakumari. He had written in one of his letters to ShashiMaharaj, Swami Ramakarishnanda, ”Sitting on the last bit of Mother Bharat, I hit upon a plan”. He has explained his plan of campaign in a lecture in Madras after his triumphant return from the west. But we are after the purpose of his life. The mission and plans are to fulfill the purpose. What was the purpose of Swamiji’slife? He himself had struggled hard within and without to find this. He was convinced that there was a noble purpose but most of the time it was elusive. On Hatharas station he told the station master SaratChandraChakroborty, who later became his first sanyasi disciple, Swami Sadananda, ”I see my purpose of life like the hill covered by the morning mist. My destiny beckons me. I have to move on.”

What others say:

Many people have given him many lofty attributes and rightly so. Some called him the patriot monk, warrior monk, the savior of Hinduism, the second Shankarcharya, a social reformer. Bhagini Nivedita says about his address in the Chicago, “Of the Swami’s address before the Parliament of Religions, it may be said that when he began to speak it was of ‘the religious ideas of the Hindus’, but when he ended, Hinduism had been created.” Thus almost announcing him the father of neo-Hinduism. He has been creditedas one of the greatest pioneers of Indian renaissance in the 19th century. His own brother BhupendranathDutt talks about his (failed) plans of organizing political revolution to free India from foreign rule. Likes of Bipin Chandra Pal and Brajendranath Seal would agree to call him a political activist. This may not be authenticated by available documents but there is no doubt that his life and message inspired generations of freedom fighters both of armed and nonviolent type.

“He was so great, so profound, so complex. A Yogi of the highest spiritual level in direct communion with the truth who had for the time being consecrated his whole life to the moral and spiritual uplift of his nation and of humanity, that is how I would describe him. If he had been alive, I would have been at his feet” Said Subhash Chandra Bose many a times. On the other hand Rajaji, Sri Chakravarthi Rajagopalachari calls him a savior of Hinduism, “Swami Vivekananda saved Hinduism and saved India. But for him, we would have lost our religion and would not have gained our freedom. We therefore owe everything to Swami Vivekananda.”BalGangadharTilak who had hosted Swamiji in Pune during his wanderings equates him with AdiShankaracharya, “It is an undisputed fact that it was Swami Vivekananda who first held aloft the banner of Hinduism as a challenge against the material science of the West. It was Swami Vivekananda who first took on his shoulders this stupendous task of establishing the glory of Hinduism in different countries across the borders. And he, with his erudition, oratorical power, enthusiasm, and inner force, laid that work upon a solid foundation. Twelve centuries ago Shankara was the only great personality who not only spoke of the purity of our religion… but also brought all this into action. Swami Vivekananda is a person of that stature.” Rabindranath Tagore when asked by the french Historian Roman Rolland, how can he understand the spirit of India? Said, “If you want to know India, study Vivekananda.”

Father of Hindu Nationalism:

The accolades he received during his lifetime and thereafter are countless and the list still continues to grow longer and longer. Even the critics of Hinduism in the modern times in search of the roots of Hindu upsurge during the Ramjanmbhumiagitation reach back to Swamiji for so called ideological foundations. They try to put the blame on Swamiji among others for the revival of Hindu Nationalistic spirit. He is considered to be father of Hindu Nationalism by those in favor as well as those against the idea.

Preacher of Vedanta:

There are many others who are fascinated by his depth of spiritual knowledge. The scientific way in which he articulated the mysteries of highest spiritual knowledge is unparallel. Hence he was called the foremost preacher of Vedanta in the west. It is also claimed by some that he conquered the west and converted many to Vedanta.

Swamiji’s personality and his message was multifaceted hence there are many ways of understanding Swami Vivekananda. Each one does it from one’s own respective point of view. This has made Swamiji the most acceptable, non controversial ideal of the modern times. People from opposing camps use his quotations to prove their side of argument and blame the other of misrepresenting him. The left ideologues who denigrate religion also accept Swamiji’s views on the regeneration of deprived masses. But in all this process, sometimes, there is a deliberate effort to dilute Swamiji’sNationalism, his in-depth understanding of the soul of Bharat. He was the first religious and spiritual leader to proclaim that the soul of Bharat was ‘Dharma’. He was the first proponent of the concept of Hindurashtra, the Hindu nation. This should not be forgotten and any effort to prove it otherwise is an attempt to twist his message to suit the present day vested political interest.

Self Prophesy:

In this cacophony of diverse and sometimes even contradictory claims about Swamiji how do we find the answer to our query? What was the purpose of Swamiji’slife? Here again we must rely on the original text rather than the interpretationswhich may be within or out of proper context. Is there any statement of the Swami about his own self? What was his view about himself and his work? There are loads of indirect references in his speeches in India. There are a few direct discussions recorded by his disciples which give us an insight in to his mind. But the most direct statement on the topic is,”I am not a politician, nor am I a social reformer. It is my job to fashion man…Man-making is my mission of life.”

To Fashion Man:

What a great statement? To Fashion man! What does it means when one uses the verb to fashion?  Rogers’s thesaurus gives us a lot of options – to design, to tailor, to style, to mould, to modify etc. When we apply it to humans what will be the most consistent meaning. To fashion man- is to transform. To use Swamiji’s own words, ‘to enable man to manifest the perfection already within.’ To fashion is to train to realize the potential divinity in practical life. To make one actualize the full potential.To make one realize the special purpose of his life and to progress on that path.

Swamiji did that all his life. He transformed the life of everyone he touched. The list is long and varied. Swamiji’s man making technology which Sister Nivedita later on qualified by adding its prime objective as ”Man Making for Nation Building” was unique for each of its beneficiary. To study this transformation brought about by Swamiji in hundreds of people is an interesting way to understand the science of human excellence and the various methods of unfolding it.

Self Transformation by Efforts:

The mission started early in his life. The first experiment of his self proclaimed job was on his own personality. It is an interesting saga of self transformation through intense enquiry, struggle within and without, experimentations and in short total and continuous efforts. The whole journey is in four distinct stages Biley to Narendra, Narendra to Sachchidananda/vividishananda (his sanyasi names during the initial wanderings), Kolkata to Kanyakumari -From Wanderer to a determined Vivekananda with a mission and finally the Missionary Vivekananda Chicago to Bellur. This is not the occasion to examine the whole journey but the methods of Fashioning involved. The prime urge was to realize, to experience. No pretence, no belief no acceptance without thorough logic and questioning. He not only questioned others, but his self questioning continued all through his life till the end. As confidant as he was of his mission and the success of it, still he kept on asking am I on the right path. His openness to discussions and acceptance to change at any stage is really inspiring. Though the process went on all his life the most important period of intense self-transformation is his encounters with Shri Ramakrishna. That fashioned the Vivekananda that we know. It was not an easy process. The struggle went on. Both of them suffered a lot. Each one sticking to ones own ways. Swamiji’s adamancy was to be tamed only by realization. He did many experiments under the guidance of his Guru. This acceptance of Thakur as Guru also came only after the mystic experience of the oneness through touch- Shaktipat. But the final surrender and giving up of the rigid ego was done by the greatest of the experiences – Vision of Kali as a Chinmayi (living, conscious mother). This was the turning point which made him realize that the divine was omnipotent, omniscient and can be realized in all forms. This made him internalize the revolutionary Gospel of ShriRamakrishna – Shiv BhaveJeevSeva. Serve the living being with the full understanding of its divinity. This becamehis life mantra, “Service to humanity as an offering to the divinity.”

The self acceptedvocation to Fashion man continued more vigorously after the Guru left the mortal form. The initial period of 3-4 years was very testing. The domestic situation was worsening. Thakur had given him the responsibility to keep the Sangh, the monastic order of young disciples together. The householder devotees had their own ideas. During this period Narendra kept all his brother disciples in constant contact and saw to it that they did not forget the call of the master as well as their inner fire of Vairagya was kept alive. It was a daunting task. The whole well meaningworld of relatives, families and even the householder followers of Thakur were against the idea. But Narendra kept it alive in the tough times and gave it a shape in VarahnagarMath.

This man-making mission continued throughout his life and even there after. We see great examples of total transformations in this journey. There are examples like Swami Ramtirh, a Professor of Mathematics in Lahore, who attended Swamiji’s lectures there on Common Bases of Hinduism and Vedanta and got so inspired that he renounced and became a great Sanyasi. But there are few example of Man-making that will give us the insight into the science of the art of Human Fashioning. We will try and study some of them in detail in the next part.

 

मई 5, 2014 Posted by | English Posts | , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

Call for Rebooting Education System


TNIEThe New Indian Express deserves congratulations for publishing the series ‘Think Edu Conclave’. The articles by Amita Sharma in the 4th March issue [page 9], and that of  Dr. S. Vaidhyasubramaniam  in the issue of 11th March [page 7] both are really commendable.

Amita Sharma has given very comprehensive overview of the work going on in various IIT’s in the field of research in ancient Bhartiya knowledge system. Her approach towards this subject is very logical and scientific. Without unduly glorifying the traditional achievements of Bharatiya scientists from time immemorial, she emphasises the need of indepth study of their works. Her concluding point appeals to the intellectual mind to come out of dogmatic thinking in terms of binaries such as traditional and modern,  eastern and western and to integrate whole knowledge system for the betterment of humanity.

It has been understood in Bharat that knowledge has no boundaries. “आ नो भद्र: क्रतवो यन्तु विश्वत:” Bharat has been traditionally an open society where knowldge and wisdom are welcomed from all the frontiers. The only purpose of knowledge as per Bharatiya tradition has been the search of inherent oneness- truth and it’s applications for the good of whole humanity. Hence, as beautifully elaborated by Dr. S. Vaidhyasubramaniam in his piece, the traditional knowledge system in Bharat had been widespread and well evolved even in the first decades of 19th century.  

dharmapalDr. S. Vaidhyasubramaniam has extensively quoted from the seminal work of Shri Dharmpal. The data given in Dharmpal’s ‘One Beautiful Tree’ from the primary sources of British surveys is an eyey opener for all of us. It is indeed tragic that this great knowledge has not been made part of formal curriculum even after being in public domain for more than five decades now. read dharmapal here – http://www.samanvaya.com/dharampal/

Both the accomplished authors lament the fact that Bharatiya traditional knowledge system has been neglected completely by the formal education system in independent India. It is indeed hightime that we in Bharat take the revolutionary step of integrating our own indegeneous knowledge system in the main stream education policy. Whole world is facing similar problems in the field of education. Right kind of methodolgy for elementary education is an area of concern for both developed and developing countries. We have the advantage of having a deep rooted cultural background in evolving decentralised, need based, socially self-sufficient education system. We have done so for centuries together. With this genetic advantage we can provide a panacea to the universal problems of complementry education system; with the use of modern technology blended with traditional methodology. This is the paradigm shift called for by both the learned authors.

There is a hope that the atmosphere for complete change in the country auguers well to this much needed systemic change in the field of education right from primary to higher education.

See the original article in TNIE here

http://www.newindianexpress.com/opinion/Designing-Integrated-Knowledge-Systems/2014/03/04/article2088788.ece

 

http://www.newindianexpress.com/nation/Reboot-Indian-Primary-Education/2014/03/11/article2101794.ece

Both of them were speaker at the event 

http://www.newindianexpress.com/nation/Indian-Educators-Ignorant-of-Countrys-Academic-Contributions-to-West/2014/01/30/article2028717.ece

मार्च 14, 2014 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , , , , , , , | टिप्पणी करे

चुनावी रणभूमी मे राष्ट्रवाद का शंखनाद


Republic day2चुनाव लोकतंत्र का महोत्सव है। वर्तमान में चुनाव आयोग द्वारा डाले गये कठोर निर्बंधों के कारण इस महोत्सव का उत्साह कुछ धीमा पड गया दिखता है। जमीनी गतिविधियों का स्थान अब प्रसार माध्यमों के अंदर होनेवाली प्रचार उथल-पुथल ने ले लिया है फिर भी चुनाव का समय सबके लिए ही अतिविशिष्ट सक्रियता का समय होता है। सभी प्रकार के कार्यकर्ता सक्रिय हो जाते हैं। सामाजिक कार्यों मे लगे, सामन्यतः गैर राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय कार्यकर्ताओं के लिए यह चिरंतन संभ्रम बना रहता है कि इस सक्रियता में योगदान करें अथवा नहीं और करें तो किस प्रकार से करें? भारत के वर्तमान परिदृश्य में सरकारी व्यवस्था से अछूता रहना लगभग असंभव है। जीवन के हर क्षेत्र में शासन का हस्तक्षेप है। माना कि ये स्थिति आदर्श नहीं है और विदेशी दासता के अवांछनीय अवशेष के रुप मे विद्यमान है किंतु यह भी नकारा नही जा सकता कि यह वास्तविकता है।

स्वतंत्रता पश्चात् हमने लोकतंत्र को राजनैतीक व्यवस्था के रुप मे स्वीकार किया। भारत के संविधान ने जनता को सर्वोपरि सार्वभौम सत्ता के केन्द्र के रुप के प्रतिष्ठित किया। अपेक्षा थी कि लोकतांत्रिक व्यवस्था इस धारणा को सृदृढ कर प्रत्यक्ष मे उतारती किन्तु प्रतिनिधिक लोकतंत्र के जिस स्वरुप को हमने भारत में अपनाया उसने समाज को जोडने के स्थान पर विघटित करने का ही काम किया। सर्वाधिक मत पाने वाले प्रत्याशी के विजय की व्यवस्था के कारण सबसे बडे गुट का प्रतिनिधि ही जनप्रतिनिधि कहलाया जाता है। बहुदलीय व्यवस्था के अंतर्गत चुनाव क्षेत्र मे अनेक प्रत्याशी होते हैं। जिसको सर्वाधिक मत प्राप्त होते हैं उसे विजयी घोषित कर दिया जाता है। इस व्यवस्था ने ऐसी हास्यास्पद विडम्बना की स्थिति उत्पन्न कर दी है कि कई स्थानो पर 15% से कम मत प्राप्त करने वाले प्रत्याशी भी जनप्रतिनिधि के रुप मे चुने जाते हैं। वास्तव मे देखा जाए तो डाले गए मतों मे से 85% से अधिक मतदाताओं ने इस नेता को प्रतिनिधि के रुप मे नकार दिया फिर भी सबसे बडे गुट का नेता होने के कारण वह उन 85% लोगो का भी प्रतिनिधि कहलाया जाता हैं। यह स्वाभाविक ही था कि राजनीतिक दलों ने अपने निहित स्वार्थ के लिए व्यवस्था की इस कमजोरी का उपयोग किया।

EVMजाति, वर्ग, भाषा आदि जो भी समाज को तोडने के माध्यम मिले उनके द्वारा अपने गुट को सबसे बडा सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाने लगा। क्षेत्रीय दलों के उभार ने रणनीति को और आगे बढ़ाकर अपने सीमित समर्थन को बड़ा बनाने के लिए बाकी बचे समाज को छोटे छोटे टुकड़ों में खंडित करने का काम किया। यदि किसी नेता या दल के पास जाति अथवा ऐसे ही किसी आधार पर 100 मे से 20 मतदाताओं का समर्थन है तो उसने भिन्न-भिन्न तरीकों से समाज के बाकी बचे 80 मतदाताओं को इतने टुकडों मे बाँटने का काम किया कि कोई गुट उसके गुट से बड़ा न हो जाए। विभाजनकारी राजनीति ने स्वतंत्रता के 66 वर्षों के पश्चात भी भारत की सुप्त क्षमता को प्रकट नहीं होने दिया है। आज विश्व मे चहुँ ओर सभी देश भारत के सामथ्र्य की सराहना करते हैं। जिनके मन मे मित्रता नही है वे भारत के उभरने की संभावना से आशंकित रहते हैं। किंतु इस राष्ट्र के सामथ्र्य-सूर्य को विघटनकारी राजनीति का ग्रहण लगा है। भारत में राष्ट्र पुनर्निर्माण के कार्य को यदि पूर्ण गति प्रदान करनी है व व्यवस्थागत प्रतिष्ठा दिलानी है तो उसके लिए राजनीति के विभाजक तंत्र को बदलना आवश्यक है। इसके बिना बाकी सारे प्रयास छलनी मे पानी भरने के समान निष्प्रभावी हो जाते हैं।

व्यवस्था  परिवर्तन इसका स्थायी समाधान है।First past the post ’सर्वाधिक मत पानेवाला विजयी’ इस व्यवस्था के स्थान पर प्रत्यक्ष एवं पूर्ण लोकतंत्रकारी ECव्यवस्था ‘बहुसंख्य का समर्थन’ ‘Mojority representation’ की व्यवस्था को लागू करना होगा। इसके अंतर्गत किसी भी चुनाव में जीतने के लिए डाले गए कुल मतों में से 50 प्रतिशत से कम से कम एक मत अधिक पानेवाला व्यक्ति ही विजयी घोषित होगा। ऐसी स्थिति में समर्थन करने वाले मतदाताओं की संख्या नकारने वाले मतदाताओं से निश्चित ही अधिक होगी। तब चुना हुआ नेता सच्चे अर्थ में क्षेत्र का प्रतिनिधि होगा। इस व्यवस्था को लागू करने मे अनेक आक्षेप व कठिनाइयाँ गिनाई जाती है किन्तु राजनीति को राष्ट्रीय एकात्मता के लिए बाध्य करने के लिए यही चिरस्थायी उपाय है। विश्व के अनेक देशों में इसी व्यवस्था के अंतर्गत चुनाव होते है। भारत से भी भौगोलिक रुप से विस्तृत व आबादी में भी लगभग बराबरी के रशिया में भी सभी आम चुनाव इसी विधि से होते हैं। यदि किसी चुनाव क्षेत्र में प्रथम चरण के मतदान में किसी को भी 50% से अधिक मत नही प्राप्त होते हैं तो प्रथम व द्वितीय स्थान पर रहने वाले प्रत्याशियों के मध्य दूसरे दिन पुनः मतदान कराया जाता है। अपने आप किसी न किसी को 50% से अधिक मत मिलेंगे ही। प्रायः ऐसा देखा गया है दूसरे चरण के मतदान की आवश्यकता ही नही पड़ती। इस व्यवस्था में स्वाभाविक रुप से ही प्रत्येक दल ऐसे प्रत्याशी का चयन करता है जिसे समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों का समर्थन मिल सके। गुटीय हितों के स्थान पर सामूहिक हित चुनावी मुद्दे बन जाते हैं। क्षेत्रीयता, साम्प्रदायिकता, जातीयता आदि चुनाव जिताने के लिए सक्षम नही होते। अतः राष्ट्रीयता, एकात्मता, एकता, समरसता यह विषय अधिक प्रभावी होते हैं।

मन में यह प्रश्न आना स्वाभाविक है कि जब तक यह व्यवस्था परिवर्तन नही हो जाता तब तक राष्ट्रवाद का चुनावी राजनीति में कोई स्थान ही नहीं? वास्तव में बात बिल्कुल इसके विपरीत है जब तक संपूर्ण एवं प्रभावी लोकतंत्र के रुप मे बहुसंख्या का प्रतिनिधित्व यह नियम लागू नही होता तब तक राजनीति के द्वारा समाज के विभाजन को रोकने का एकमात्र उपाय है ’राष्ट्रवादी राजनीति’। जातीयता, साम्प्रदायिक तुष्टीकरण, वर्गवाद, धनबल तथा बाहुबल आदि लोकतंत्र के असाध्य विकारों को ठीक करने का एकमात्र उपाय है – ’चुनावी रणभूमी मे राष्ट्रवाद का शंखनाद’। राष्ट्र का हित, राष्ट्र की संस्कृती, राष्ट्रीय परंपरायें, राष्ट्रीय जीवनध्येय इन पर आधारित नीतियों को महत्व देनेवाले दल एवं नेता का जब समाज स्वयंस्फूर्त समर्थन करने लगेगा तब अन्य सभी संकुचित स्वार्थों पर आधारित विघटनकारी मुद्दे गौण हो जायेंगे। समाज में काम कर रहे प्रत्येक सामाजिक कार्यकर्ता का यह कर्तव्य बन जाता है कि ऐसे राष्ट्रवादी वातावरण का जागरण करें।

bharatmataलोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ प्रसार माध्यमों का भी कर्तव्य बन जाता है कि विघटनकारी मुद्दों को महत्व देने के स्थान पर जोडनेवाले एकात्मता को बढावा देने वालें विषयों, नेताओं तथा दलों का अधिक प्रचार दें। धन के द्वारा क्रय की हुयी प्रसिद्धी के आधार पर समाज को तोडनेवाले नेताओं व दलों को सबक सिखाने का काम राष्ट्रकार्य के रुप में प्रसार माध्यमों को भी करना होगा। पेड न्यूज के द्वारा माध्यमों का धनबल के आगे समर्पण लोकतंत्र के विनाश का कारण बन रहा है। भारत एक निर्णायक दौर से गुजर रहा है। वैश्विक परिदृश्य में अवसर की जो एक छोटी सी खिडकी खुली है उसका यदि निर्णायक उपयोग करना है तो आज राष्ट्र को सुदृढ, सक्षम व निःस्वार्थ नेतृत्व की आवश्यकता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही ऐसे नेतृत्व को जन्म एवं पोषण दे सकता है। पश्चिम में राष्ट्रवाद की अवधारणा राजैनतिक व आर्थिक है। इस कारण से वह राष्ट्रों के मध्य प्रतिस्पर्धा को जन्म देती है। इस प्रतिस्पर्धा का रुपांतरण बाजारी शोषण, शस्त्र स्पर्धा व अंततः युद्धों में भी होता है। द्वितीय महायुद्ध में सारे विश्व पर युद्ध की विभीषिका थोपने वाल हिटलर ने भी जर्मन राष्ट्रवाद के नारे का ही तात्विक आधार लिया था। उसके बाद से अंतरराष्ट्रीय विमर्श में राष्ट्रवाद एक घृणित एवं निन्दनीय पद बन गया है। भारत में भी साम्यवादी व समाजवादी विचार को पोषित करनेवाले विचारकों ने इसी पश्चिमी दृष्टि से प्रभावित होकर राष्ट्रवाद की घोर आलोचना की है। इसे संकुचित, तानाशाही व फासिस्ट जैसे संबोधनों से पुकारा है। इस कारण सामान्य बुद्धिजीवी भी राष्ट्रवाद के प्रति सकारात्मक विचार नही रखते किन्तु भारत में राष्ट्रवाद की संकल्पना कतई आर्थिक अथवा राजनैतिक नहीं है। भारत में यह मूलतः आध्यात्मिक व व्यवहार में सांस्कृतिक विचार है। आर्थिक व राजनैति राष्ट्रवाद जहाँ भौगोलिक सीमाओं और बाजारी प्रतिस्पर्धाओं के कारण विभाजनकारी बन जाता है वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद व्यक्ति से परिवार, समाज से आगे राष्ट्र तक मन के विस्तार का माध्यम होने के कारण एकात्मदृष्टि का विकास करता है। स्वाभाविक ही यह राष्ट्रवाद विस्तार की अगली सीढ़ी के रुप में मानवता को देखता हैं। अतः इस राष्ट्रवाद में राष्ट्रहित के साथ ही विश्वहित व उससे भी परे सृष्टि का हित भी निहित है। यह राष्ट्रवाद तोडता नही जोड़ता है।

जाति, पंथ, सम्प्रदाय, वर्ग, भाषा, क्षेत्र आदि के द्वारा विभिन्न वादों का निर्माण कर चल रहे समाज विघटन के तांडव को यदि रोकना है तो सभी को मिलकर एक ही उद्घोष करना होगा कि ‘राष्ट्र सर्वोपरि है’। मेरे व्यक्तिगत, पारिवारिक, क्षे़त्रीय, सामाजिक, पांथिक, साम्प्रदायिक अथवा प्रांतीय हितों से अधिक महत्वपूर्ण राष्ट्रहित हैं। इस विचार को अपने हर कार्य मे अभिव्यक्त करना होगा। चुनाव में आग्रह पूर्वक सहभागी होना, मतदाताओं का पंजीयन करना अधिक से अधिक लोगों को सकारात्मक मतदान के लिए प्रेरित करना, दलों व नेताओं को राष्ट्रहित के मुद्दों पर विचार एवं बात करने के लिए विवश करना यह हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है। आइए! लोकतंत्र के महोत्सव में राष्ट्रवाद के उजास को प्रकाशित करने का संकल्प लें।

नवम्बर 29, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

धर्म का मर्म राम


rama-hanumanराम अर्थात मूर्तिमान धर्म। वाल्मिकी रामायण में कहा है – रामो विग्रहवान धर्म! जीवन के प्रत्येक समय में श्रीराम ने धर्म का पालन किया। यह माता कौसल्या की शिक्षा का ही परिणाम था कि कठीन से कठिन परिस्थिति में में रामजी ने धर्ममार्ग को चुना। विश्वामित्र के मांगने पर असुर नाश के लिये वन में भेजने में पिता दशरथ को हिचकिचाहट थी। पर बाल राम कर्तव्यपालन के लिये तत्पर थे। पूरी सभा में वे ही ऐसे थे जो इस कार्य के लिये पूर्ण उत्सुक थे। आयु भी कम थी, प्रशिक्षण भी नहीं था, विश्वामित्र से भी प्रथम भेंट ही थी फिर भी राम ने एक क्षण भी विचलन नहीं दिखाया। अपने कर्तव्य पालन के लिये सदैव तत्पर रहना धर्म का प्रथम लक्षण है।
आवश्यकता पड़ने पर समाज की तात्कालीन मान्यताओं के विरूद्ध जाकर भी न्याय के पथ का अनुसरण राम ने किया। अहिल्या का उद्धार इसी का परिचायक है। समाजद्वारा पूर्णतः दुर्लक्षित शिला के समान जड़वत जीवन जीने को विवश अहिल्या को रामजी ने अपनाकर सामाजिक मान्यता प्रदान की। यही शिला को पुनः जीवन प्रदान करने के रूपक का वैज्ञानिक सन्दर्भ है। धर्म की सामाजिक धारणा समय समय पर विकृत हो सकती है किंतु रामजी धर्म के वैज्ञानिक स्वरूप को जानते है और समाज में उसे पुनस्र्थापित करने का साहस भी रखते है। आधुनिक युवा के मन में प्रश्न आना स्वाभाविक है कि जो राम गौतम द्वारा त्यागी अहिल्या का उद्धारक है वही राम सीता की अग्निपरिक्षा क्यों लेते हैं? यदि समाज के सम्मूख सीता के शील को प्रतिष्ठित करने का यह मार्ग है ऐसा मान भी लिया जाय तो प्रश्न उठता है कि अग्निपरिक्षा में पार पाने के उपरान्त भी एक धोबी के अनर्गल प्रलाप के कारण सीतामाता का त्याग कहाँ तक उचित है? ऐसे प्रश्नों पर विचार करते समय ध्यान आता है कि धर्म का रहस्य कितना गुढ़ है। हिन्दुओं में अवतार के आचरण का भी मुल्यांकन करने की छूट है। कोई यह नही कहेगा कि रामजी ने किया इसलिये वो ठीक ही है। किन्तु अपने जीवन में धर्म को उतारने के उद्देश्य से राम के जीवन को समझने का जब प्रयत्न करते है तब उनके स्वभाव व पूरे जीवन में किये आचरण के आधार पर ही विवेचन किया जाना चाहिये। वर्तमान सामाजिक मूल्यों के आधार पर विचार करने से अश्रद्धा ही होगी। और लाभ कुछ नहीं होगा।
रामजी के जीवन में धर्म पर आचरण का एक सबसे बड़ा मापदण्ड है अपने व्यक्तिगत लाभसे अधिक महत्व समष्टि के हित को देना। इसका वे चरम पराकाष्ठा तक पालन करते है। भरत के लिये राज्यत्याग के पीछे भी यही सोच है। यदि स्वयं को वनवास का कष्ट देने से पिता के वचनपूर्ति का धर्मपालन होता है तो वे इसके लिये सहर्ष तत्पर हैं। त्याग से ही धर्मपालन सम्भव है यह राम का आदर्श है। इसी कारण चित्रकुट पर भरत कैकेयी आदि सभी के कहने पर भी वे वनवास को नहीं छोड़ते। पूरी अयोध्या आग्रह कर रही है कि वे लौटे और राज्य ग्रहण करें। पूरे नगर का आग्रह उन्हें त्याग से परावृत्त नहीं कर सकता। समाज के कहने में वे नहीं आते है यह बात तो इससे सिद्ध होती है। फिर एक धोबी का कथन कैसे सीता त्याग का कारण बनता है? रामजी की दृष्टि में सीता का त्याग उनके स्वयं को कष्ट देने का पर्याय है। समाज में आदर्श प्रस्थापित करने के लिये अपने व्यक्तिगत सुख का त्याग करने को धर्म कहा ही जाता है। राजाराम के लिये गर्भवति सीता का त्याग इसी श्रेणी में आता है। सीता मात को वे अपने से अलग नहीं समझते है। अतः उनका त्याग स्वयं के किसी अंग के त्याग के समान है। कबुतर को बचाने के लिये अपना मांस देनेवाले शिबि के समान ही रामजी का सीता त्याग है। समाज के आग्रह के कारण नहीं स्वयं के आदर्श के कारण। सीतामाता का त्याग करके वे स्वयं सुखी नहीं है। माताओं, गुरूजनों, अमात्यो वा समाज के श्रेष्ठियों के बार बार कहने पर भी वे दूसरा विवाह नहीं करते है। सीता के प्रति उनका समर्पण उनके व्यक्तिगत धर्म का भाग है और समाजहित में उसका त्याग उनका सामाजिक धर्मपालन का परम आदर्श है। वर्तमान समय की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मान्यताओं से यह सीतामाता पर अन्याय लगता है। नितांत वैयक्तिक चिंतन पर ऐसा है भी किन्तु रामने कभी भी व्यक्तिगत चिंतन किया ही नहीं है। अतः वे स्वयं को कष्ट देकर समाज में शुचिता का आदर्श प्रस्थापित करना चाहते है। राजा के रूप में वे कोई भी विशेषाधिकार नहीं लेना चाहते। सीता के उदाहरण को अपवाद भी नहीं बनाना चाहते।
अतः धर्म को सीखते समय केवल अन्धानुकरण से काम नहीं चलेगा। उसके लिये धर्म के मर्म को समझना पड़ेगा। त्याग धर्म है किन्तु त्याग का कारण समष्टि का हित होना चाहिये किसी धोबी का अनर्गल प्रलाप नहीं। वर्तमान समय में कोई सीता यदि रावण से प्रताड़ित होती है तो उसपर आक्षेप लेने की किसी धोबी की हिम्मत ही ना हो और किसी राम को उसका त्याग ना करना पड़े। धोबी भले ही बकते रहे रामको अब नया आदर्श प्रस्थापित करना होगा। हर स्थिति में सीता को अपनाना होगा। यही युगधर्म है। यही सनातन धर्म की समयानुकूल प्रासंगिक व्याख्या है।
कर्तव्य का पालन, त्याग व समष्टि का हित ये धर्म के तीन सिद्धांत राम के जीवन से हम सीख सकत है। समष्टि के हित के लिये अपने प्रेम, प्रेमास्पद के साथ ही अपने व्यक्तिगत सुख, आदर्श व प्रतिष्ठा को भी वे त्याग करने को तत्पर है। वाली वध के समय उनके द्वारा अपनाया तरिका उनके व्यक्तिगत आदर्श व प्रतिष्ठा के विपरित है। किन्तु बड़े हित व समष्टि की आवश्यकता को जानकर वे उसे अपनाते है। शूर्पणखा के साथ किया कठोर व्यवहार भी इसी श्रेणी में आता है। सामान्यतः स्त्री के प्रति आदर का भाव रखनेवाले श्रीराम सीता के सम्मान के लिये शूर्पणखा की नाक कटवा देते है। संदेश स्पष्ट है कि राम स्वयं के लिये नहीं जीते समाजधर्म के लिये जीते है।
समरसता व संगठन ये दो धर्म व्यवहार भी रामचरित्र में स्पष्ट परिलक्षित होते है। गुहक, निषाद, शबरी अन्य वनवासी तथा वानरों को उन्होंने सहज अपनेपन सेbibhishan स्नेही बना लिया। कोई भेद है ही नहीं मन में। उनके लिये सब अपने है। समाज के वंचित, दुर्लक्षित वर्ग को वे केवल अपनाते ही नहीं संगठित भी करते है। संगठन के द्वारा आत्मबल प्रदान करते है। और प्रशिक्षण के द्वारा कौशल प्रदान कर एक शक्ति के रूप में विकसित करते है। उसी के माध्यम से आसुरी शक्ति का विनाश करते है और धर्मराज्य की स्थापना करते है।
रामनवमी को भारतीय शिक्षण मण्डल का स्थापना दिवस है। विक्रम संवत् 2026 युगाब्द 5067 में इसी दिन शिक्षा में भारतीय मूल्यों की संस्थापना का राष्ट्रीय अभियान प्रारम्भ हुआ। धर्म की संस्थापना के लिये कर्तव्य, त्याग, समष्टि का हित समरसता व संगठन के मूल्यों पर आधारित शिक्षा व्यवस्था पुनः प्रस्थापित करना मण्डल का कार्य है।
जब समाज में रावण, शुर्पणखा, मारीच और ताड़का के साथ ही मंथरा व धोबी के वंशज ही प्रतिष्ठा पा रहे तब आइये इस रामनवमी पर अपने जीवन में राम को जगाने का प्रण करें। वन में जाते समय माता कौसल्या ने रामजी को आशिर्वाद दिया कि आजतक तुने जो धर्मपालन किया है वही धर्म कवच बन तेरी रक्षा करें। धर्म की रक्षा करने पर धर्म सबकी रक्षा करता है। अतः धर्म की शिक्षा द्वारा का धर्मराज्य की स्थापना के लिये कार्य करने का संकल्प लें।

अप्रैल 19, 2013 Posted by | चरित्र, सामायिक टिपण्णी | , , , , | 4 टिप्पणियाँ

हिन्दू नववर्ष ही वास्तविक नववर्ष


kalchakraविश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक कालगणना का नववर्ष है वर्षप्रतिपदा। वर्षप्रतिपदा, गुढ़ीपाड़वा, नवसंवत्सर, संवत्सरी, चेट्रीचंद आदि नामों से मनाया जानेवाला यह वर्ष के स्वागत का पर्व काल के माहात्म्य का पर्व है। इसका एक नाम युगादी है जिसे उगादी भी कहा जाता है। युग का आदि अर्थात प्रारम्भ का दिन। इस दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की। सृजन के साथ ही समय का प्रारम्भ हुआ। वास्तव में यह अत्यन्त वैज्ञानिक संकल्पना है। कृष्णविवर (Black Hole) तथा भस्म तारका (Super Nova) के अध्ययन में आधुनिक खगोलशास्त्रियों ने पाया कि वहां समय रूक जाता है। समय का यह वैविध्यपूर्ण बर्ताव आधुनिक शास्त्रज्ञों के लिए पहेली बना हुआ है। आज जो तारे हम देखते हैं वे अनेक प्रकाशवर्ष हमसे दूर है अर्थात उनका जो प्रकाश हम अभी देख रहे हैं वह कई वर्ष पूर्व वहां से विकीर्ण हुआ था। इस ज्ञान से काल को समझना वैज्ञानिकों के लिए और अधिक कठिन हो गया। काल भूत से भविष्य की ओर एक दिशा में प्रवाहित होता है यह धारणा रखकर विचार करनेवाले काल के इस बहुआयामी रूप को समझ नहीं पाते हैं।

काल को समग्रता से हिन्दू ॠषियों ने ही समझा। इसके चक्रीय स्वरूप को समझकर उन्होंने चतुर्युगी के शास्त्रीय तत्व का विवेचन किया। आज आधुनिक भौतिक विज्ञान जिन बातों को प्रायोगिक रूप से समझने में उलझ रहा है उसे अत्यंत वैज्ञानिक विधि से भारत में साक्षात् किया गया। काल की इस अनादि अनन्त स्थिति को समझकर ही हमने अपने जीवन को काल के अनुरूप ढ़ाला। यही कारण है कि इतने आक्रमणों के बाद भी यह संस्कृति ना केवल जीवित है अपितु विश्वविजय के लिए सन्नध है। आज भी हमारे मंदिरों में प्रतिदिन 192 करोड़ वर्ष की कालगणना का स्मरण किया जाता है। सतयुग से कलियुग और फिर सतयुग के प्राकृतिक कालचक्र को ठीक से समझने के कारण हिन्दू जीवन को धर्म के आधार पर जीने की दिशा प्राप्त हुई। महाकाल के पूजन से ही यहां धर्मविज्ञान विकसित हुआ। इसी से समग्र और सर्वांगीण विकास का प्रादर्श (Model) भारत में विकसित हुआ।
काल के बारे में विचार का सीधा परिणाम हमारी जीवनशैली पर होता है। आज सारा विश्व पर्यावरण की त्रासदी से Gudi_Padwa_Gudiचिंतित है। हम यदि इस समस्या की जड़ में जाकर देखेंगे तो पायेंगे कि इसका मूल कारण काल की पश्चिमी धारणा में है। काल को एकरेखीय मानने के कारण जीवन केवल इसी समय तक सीमित माना जाता है और इस कारण जितना अधिक भोग कर सकें उतना करने की वृत्ति बनती है। इसी से सृष्टि का शोषण होता है। केवल सुयोग्य को ही जीवित रहने का अधिकार है। (Survival of the fittest)  यह सोच भी काल की अवैज्ञानिक धारणा के कारण ही बनी है। हम देखते हैं कि इसका प्रभाव जीवन के अर्थ में और परिणामत: उसको जीने के तरीके में हुआ। स्पद्र्धात्मक भोगवाद के कारण सारा विश्व विनाश की कगार पर आ खड़ा हुआ। केवल विज्ञान ही नहीं अर्थशास्त्र, राजनीति, उपासना, सामाजिक व्यवहार इन सभी में इस सोच का असर हुआ। मानव की मानवता नष्ट हो गई।
new year1नववर्ष मनाने की विधि में भी हम यह अंतर देखते हैं। पश्चिमी सभ्यता में नववर्ष को मनाने में अधिक से अधिक भोग का भाव रहता है। नशे को आनन्द का पर्याय समझा जाता है। इसलिए जश्न रात को मनाया जाता है। दूसरी ओर भारतीय नववर्ष को हम सुबह के पवित्र वातावरण में अत्यन्त शालीनता से मनाते हैं। यह सोच का अंतर है। धार्मिक अनुष्ठान, परस्पर स्नेहाभिव्यक्ति के लिए कलात्मक अनुरंजन, सृष्टि का स्वागत, स्वास्थ्यवद्र्धक खानपान ऐसे वैज्ञानिक परम्पराओं का निर्माण इस पर्व के लिए भारत में हुआ। ॠतु परिवर्तन को ध्यान में रखकर कर्मकांड विकसित हुए। भोग को नहीं त्याग को आनन्द का स्थायी माध्यम बनाया गया। यह काल की वैज्ञानिक समझ ही है कि जिससे हम वर्षप्रतिपदा को सालभर के साढ़े तीन मुहुर्तों में से एक मानते हैं। यह पूर्ण मुहुर्त है। इस दिन शुभकार्य के लिए अलग से मुहुर्त देखने की जरूरत नहीं है। सारी सृष्टि ही आपके शुभसंकल्प का साथ दे रही होती है। प्राण का प्रवाह ही ऐसा होता है कि जो मन में शिवसंकल्प लेंगे वह अवश्य पूर्ण होगा।
स्वदेशाभिमान की कमी के कारण ही हम इस पूर्णत: वैज्ञानिक कालगणना को छोड़ अपूर्ण, अशास्त्रीय व शोषणrashtriy panchang को प्रात्साहन देनेवाली व्यवस्था के अधीन हो गए हैं। हम भारतवासी यह भी नहीं जानते कि हमने संवैधानिक रूप से जो राष्ट्रीय पंचांग स्वीकार किया है वह भी यह हिन्दू कालगणना ही है। आइये! इस नववर्ष पर हम संकल्प लें कि अपने दैनिक व्यवहार में राष्ट्रीय पंचाग का प्रयोग करेंगे। विश्व मानवता को विनाश से बचाने के लिए भारतमाता को समर्थ बनाने का प्रारम्भ इस स्वाभिमान के साथ करें। सोच बदलेगी तब तो कृति में परिवर्तन आयेगा। भोग के स्थान पर त्याग के द्वारा सार्थक उपयोग, सृष्टि के शोषण के स्थान पर संवेदनशील दोहन और कुछ सुयोग्यों को जीने के अधिकार के स्थान पर ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ सबके सुखी होने की संकल्पना पर आधारित विश्वव्यवस्था का पुनर्निमाण भारत से ही होगा। इसका शुभारम्भ इस युगादि को करें। भगवान कृष्ण के शरीर छोड़ने से शुरू हुए कलियुग के 5115वें वर्ष में हम सतयुग की नवरचना का सूत्रपात करें। आज के दिन सबको शुभकामनाएं देते समय केवल नववर्ष ही कहें। 1 जनवरी का प्रयोग करना है तो विशेषण लगायें – जार्जियन नववर्ष। वर्षप्रतिपदा तो सारी सृष्टि का नववर्ष है। हिन्दू नववर्ष ही वास्तविक नववर्ष है। हमारा राष्ट्रीय नववर्ष अत: आज तो किसी विशेषण की आवश्यकता नहीं है।
नववर्ष पर नवसंकल्प की मंगलकामनाएं!

अप्रैल 10, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

अंतरतम के प्रह्लाद की खोज का पर्व: होली


hiranyakahipuसमाज हिरण्यकश्यपुओं से भर गया है। हिरण्य के दो अर्थ है – एक है स्वर्ण और दूसरा है चमकनेवाला। धन और दिखावे के प्रति आकर्षण बढ़ता ही जा रहा है। जो इनके प्रति आकर्षित हो उसे हिरण्यकश्यपु कहते है। आज समाज में इन्हीं का बोलबाला हो चला है। जीवन में सफलता के मापदण्ड धन और उसका भोण्डा प्रदर्शन ही हो गये है। येन केन प्रकारेण धन कमाना ही हमारे समय की समस्त समस्याओं की जड़ है। होली के अवसर पर जब हम प्रह्लाद के दहन की कथा का स्मरण करते है। तो आज के समाज की ओर देखना आवश्यक हो जाता है। आज हिन्दुओं के धार्मिक सामाजिक उत्सवों पर आक्षेप लेने का शोभाचार (Fashion) सा हो गया है। हर बात के लिये हिन्दू संस्कृति को दोष देने की होड़ सी लग गई है। नेहरू द्वारा अपनाये समाजवादी आर्थिक प्रादर्श (Model) के कारण भारत में जब आर्थिक प्रगति अवरूद्ध थी तब उसे ‘हिन्दू विकास दर’ के नाम से कोसा जाता था। जबकि उस पूरी व्यवस्था में हिन्दुत्व दूर दूर तक नहीं था।

भारतीय संस्कृति में धन कमाने को मनाई नहीं है। उलटा अधिक से अधिक उत्पादन के लिये प्रेरित किया है। चित्रवाहिनियों के विचित्र चित्रण के कारण हम सोचते है कि हमारे ऋषि सन्यासी थे, भिक्षा पर निर्भर रहते थे। यह दोनों बाते भ्रममूलक है। भिक्षा तो अहंकार विसर्जन की साधना थी और अधिकतर ऋषि गृहस्थ थे। अपने पारिवारिक कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए समाज के लिये, ज्ञान के लिये समर्पित थे। आश्रमव्यवस्था के अनुसार गृहस्थजीवन का कर्तव्य पूरा करने के बाद वानप्रस्थ और फिर सन्यास लेते थे। किन्तु जब गुरूकुलों का संचालन करते थे तब तो वे गृहस्थ ही हुआ करते थे। अतः हिन्दू जीवनपद्धति का आदर्श ऋषि थे इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि हम निर्धनता की पूजा करते थे।याज्ञवल्क्य ऋषि वानप्रस्थ में जाते समय अपनी सम्पत्ती का दोनों पत्नियों के मध्य बटवारा करते है। तब वर्णन आता है कि स्वर्णाभूषणों से मंड़ित लाखों गायें उनकी सम्पत्ती में है। 40 गाँवों का लगान अधिकार उन्हें प्राप्त था। वास्तव में हमने अर्थार्जन के सर्वोच्च आदर्श प्रस्थापित किये। लक्ष्मी की सफलतम उपासना भारत में ही हुई। यह धर्माधरित अर्जन का ही परिणाम है।

जहाँ धन के लिये धर्म को छोड़ अति की वहीं पाशविकता आ जाती है। फिर ब्राह्मण कुल में जन्मा रावण भी राक्षस कहलाता है। दिखावा तथा अधर्म से धनप्राप्ति यह राक्षसी आचरण है। यही हिरध्यकश्यपु का इतिहास है। आज रावण और हिरण्यकश्यपु युवाओं के आदर्श बनते जा रहे है। छोटे रास्तों से अत्यधिक पैसा कमाने की होड़ सी लगी है। बिना श्रम के तिकड़म से कमाई करते समय धर्म अधर्म का विचार कौन करें? कोई धर्म, श्रम, ईमान की बात भी करता है तो उसे केवल अव्यावहारिक ही नहीं मूर्ख समझा जाता है। चारों ओर अतृप्त भोग की आग लगी है।

holikaऐसे में होली का पर्व प्रह्लाद व विभिषण की खोज का पर्व है। प्रत्येक के मन में हिरण्यकश्यपु और रावण के साथ ही प्रह्लाद और विभिषण भी निवास करते है। होलिका का दहन तो सदा ही चल रहा है। आज के युग में उसे टेंशन, तणाव, विषाद ऐसे नाम दिये जाते है। हर किसी के दिल में जलन मची है। किसी कवि ने कहा ही है ना – सीने में जलन आँखों में तुफान सा क्यूँ है? इस शहर में हर शक्स परेशान सा क्यूँ है? होलिका की तपन में भी प्रह्लाद सदा भक्ति की शीतलता से संरक्षित ही रहता है। अपने मन के प्रह्लाद को जगाने का यह पर्व है।

bibhishanप्रह्लाद हो या विभिषण ईश्वर का प्रत्यक्ष आश्रय पाकर ही व्यवस्था में स्थापित हुए। दोनों ने ही धर्मराज्य की स्थापना की।nrusimha उनके जीवन के तत्वों को समझने से ही हम आज भी पुनः धर्माधारित व्यवस्था की पुनस्र्थापना कर सकेंगे। अवचल भक्ति दोनों का प्रथम गुण है। भक्ति का अर्थ है एकात्म दृष्टि। जो सबमें विद्यमान एकत्व को देखता है वही भक्त। जो भक्त नहीं है वह विभक्त है। बिखरा हुआ है। आज हमने बाँटनेवाली व्यवस्था बना रखी है इसलिये व्यक्ति तक बिखर रहा है। अतः प्रह्लाद को बचाने के लिये यह एकात्मता भरी व्यवस्था को बनाना पड़ेगा। भक्ति के दम पर दोनों ही हरिभक्तों ने विषम से विषम परिस्थितियों का सामना किया। यह बचे रहने का बल बड़ा महत्वपूर्ण है। जब हमारे चारों ओर भ्रष्ट आचरण की आग लगी हो तब अपने ईमान को बचाने के लिये भी सतत ध्येयस्मरण का आश्रय लेना पड़ता है। किन्तु ईश्वर का प्रत्यक्ष अवतरण तब हुआ जब राक्षसों को सम्मूख चुनौति देने का साहस भक्तों ने किया। प्रह्लाद ने ईश्वर के सर्वत्र होने की चुनौति को स्वीकार किया ओर स्तम्भ से नृसिंह प्रगट हुए। विभिषण बड़े भाई को भरी सभा में धर्म की शिक्षा देने का साहस दिखाया और उनको राम के पास जाने का अवसर मिला। सबसे कठीन पीरक्षा यही है। अपने मन को पक्का बनाना और विपरित स्थिति में बचे रहना तो अपने तक ही सीमित है। हिरण्यकश्यपु ओर रावण का प्रगट सामना करना सबसे कठीन है। अपने ही सम्बधियों के सम्मूख धर्म पर दृढ़ रहने से ही ईश्वर प्रगट होंगे।

आईये! आज प्रह्लाद खोजे! सबको संगठित करें और चारो ओर फैले हिरण्यकश्यपुओं का सामना करें ताकि पुनः नरसिंह प्रगट हो और धर्मराज्य की स्थापना हो।

मार्च 27, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , | 5 टिप्पणियाँ

समुत्कर्ष का साधन – धर्म


कर्मयोग 13:
जिस देश में प्रतिदिन पूजा के समय 192 करोड़ वर्ष की गणना के साथ संकल्प किया जाता हो, उसके लिये 2000 वर्ष कोई बहुत बड़ा काल नहीं है। पर जिनका इतिहास ही उनके ईश्वरदूत के जन्म से प्रारम्भ होता है उनके लिये ये बहुत ही बड़ी अवधि है। दूसरा उनकी कालगणना भी एकरेखीय होने के कारण उसमें परिवर्तन की एक ही दिशा देखी जा सकती है। हम हिन्दू अधिक वैज्ञानिक कालगणना के आदि है अतः हम कालचक्र की बात करते हैं और जानते हैं कि समय तो चक्रीय गति में चलता है अतः इसमें परिवर्तन भी किसी चक्र की भाँति होता है। सत्ययुग के बाद क्रमशः पतन होते हुए कलियुग आता है उसी प्रकार फिर उन्नति की सम्भावना भी बनी रहती है और पुनः सत्ययुग का आगमन निश्चित है। इसी अनादि अनन्त जीवन को जानकर हम अपने कर्म को धर्म के अनुसार करने का प्रयास करते है। सब परिस्थितियों में लागू करने योग्य शाश्वत अपरिवर्तनीय सिद्धान्तों पर आधारित सनातन धर्म को समझकर युग के अनुसार उसे लागू करने युगधर्म की व्याख्या भी समय समय पर होती रहती है। यही कारण है कि चिर पुरातन होते हुए भी यह संस्कृति नित्य नूतन भी है। सतत प्रवाहित नदी के समान ही इसमें मैल इकट्ठा नहीं होता और यह अपनी निर्मलता को पुनः स्थापित कर लेती है। गत कुछ शताब्दियों के संघर्ष काल के कारण यह युगानुकुल नवनिर्माण की प्रक्रिया कुछ शिथिल हो गयी है और हमारा कर्तव्य है कि सनातन धर्म को पुनः युगधर्म के रूप में व्यवस्था में स्थापित कर लें।

युनानी विद्वान मेगेस्थेनिस सम्राट चन्द्रगुप्त के समय भारत में आया था। निश्चित तो कहा नहीं जा सकता किन्तु ईसापूर्व 228 अर्थात लगभग 2200 वर्ष पूर्व का काल इतिहासकार बताते है। उसने अपने अनुभवों को शब्दबद्ध किया ‘इण्डिका’ नामक दैनन्दिनी में। वह भारत के वैभव, समाजरचना,  कृषि सभी से अभिभूत था। किसी परिकथा के समान भारत का वर्णन उसके शब्दों में मिलता है। सबसे आश्चर्य उसे यहाँ की शांति को देखकर हुआ। कहीं कोई झगड़ा टंटा नहीं। कानूनी विवाद भी यदा कदा ही होते थे। कोई आपसी विवाद हो भी गया तो सहजता से उसका निपटारा हो जाता था। वैभवशाली स्वर्णयुग की हम बात कर रहे है। सब सम्पन्न थे, प्रसन्न थे। उसे जो पहला वादविवाद मिला वो था दो किसानों के बीच, पाटलीपुत्र, आज के पटना के पास। गाँव के सब लोग जमा थे। एक किसान ने कुछ दिन पूर्व ही अपनी खेती दूसरे को बेची थी। क्रेता ने जब जुताई प्रारम्भ की तो उसे उस जमीन में एक सोने का बरतन मिला जिसमें सोने के गहने भरे थें। वह किसान विक्रेता के पास उस सोने को ले आया और कहने लगा कि ये आपके पूर्वजों की सम्पत्ति है आप ले ले। विक्रेता किसान उसे लेने को तैयार नहीं था। उसका तर्क था कि जब मैने भूमि का सौदा किया तो उसके साथ उसमें जो भी था वह भी क्रेता का हो गया। दोनों अपने अपने तर्कों के अनुसार उस सोने पर दूसरे का ही अधिकार बता रहे थे। विवाद सम्पत्ति को रखने का नहीं, ना रखने का था। दोनों धर्म का वास्ता दें रहे थे। धर्म के अनुसार उस सम्पत्ति पर अपना अधिकार ना होने के कारण उसे अपने घर में रखना विषवत् मान रहे थे। बात तो न्यायालय तक भी गयी। न्यायालय ने क्रेता का अधिकार बताया किन्तु फिर भी वह किसान तैयार नहीं था उस धन को स्वीकार करने के लिये। उसका कथन था कि उसके सौदे के समय यह नियम नही था अतः धर्म को पूर्ववर्ती समय से लागू नहीं किया जा सकता। धन को राजा को सौंप दिया गया इस चेतावनी के साथ कि केवल धर्मकार्य अर्थात जनता के कल्याण के कार्य में ही इसका प्रयोग हो। यदि राजा ने भी अपने नीजी अथवा राजकार्य में इस अनधिकार धन का प्रयोग किया तो राज्य का भी अहित होगा। ऐसी धर्म की व्यवस्था इस देश में थी।
धर्म का ये व्यवस्थागत अर्थ समझना सबसे अधिक आवश्यक है। धर्म केवल व्यक्तिगत जीवन को सुव्यवस्थित करने का ही उपाय नहीं है वास्तविकता में यह ऐसी सामाजिक व्यवस्था को स्थापित करने का नाम है जिसमे सबका हित हो। सबका साथ साथ विकास हो। विनोबा भावे ने इसे सर्वोदय का नाम दिया था। गांधी पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति के विकास को राज्य की व्यवस्था का लक्ष्य मानते थे। इसी को पंड़ित दीनदयाल उपाध्याय ने नाम दिया ‘अन्त्योदय’। धर्म केवल सबके विकास की बात नहीं करता, सर्वांगीण विकास की बात करता है। सबका सर्वांगीण विकास। धर्म के अनुसार मानव के एकात्मिक विकास के दो अंग है – अभ्युदय तथा निःश्रेयस। यह दोनों मिलकर धर्म को परिभाषित करते है- अभ्युदय निःश्रेयसानि धर्मः।

अभ्युदय का अर्थ है पूर्ण उदय। अभि उपसर्ग लगाने से उदय के बाहरी व सर्वतोमूखी होने का अर्थ निकलता है। अभि उदय, अभ्युदय अर्थात पूर्ण भौतिक विकास। पूर्ण में संवेदना भी आती है। अतः, यह बाहरी विकास भी जैसा कि आधुनिक जीवन में हम देखते है, केवल मानव का एकांगी विकास नहीं है। ना ही यह केवल आर्थिक विकास है। अभ्युदय में विज्ञान और तकनिक के साथ ही पर्यावरण का भी ध्यान रखा जायेगा। अतः अक्षय विकास को लक्ष्य करती तकनिक का ही विकास किया जायेगा। प्रकृति का दोहन होगा शोषण नहीं। दोहन दूध निकालने की प्रक्रिया को कहते है। भारतीय परम्परा में उतना ही दूध निकाला जाता है जितना आवश्यक है। बछड़े के लिये पर्याप्त मात्रा में दूध छोड़ दिया जाता है। क्योंकि संवेदना है। गाय केवल आर्थिक उत्पादन का साधन नहीं तो माँ के स्थान पर है। ऐसी प्रक्रिया से भी विश्व का सर्वाधिक दूध उत्पादन करनेवाला देश भारत सदैव रहा है। गोवंश की संख्या मानव जनसंख्या से कई गुना अधिक रही है। यह सम्पन्नता का मापदण्ड भी है।

आज हम अभ्युदय के सर्वांगीण अर्थ को भूल गये हैं इसी कारण केवल पैसे को ही सर्वस्व मानती इस व्यवस्था में गायों के साथ कृत्रिम गर्भाधान से लेकर अधिक दूध पाने के लिये हारमोन इन्जेक्शन जैसे अत्याचार किये जाते है। यह शोषण है, दोहन नहीं। साथ ही बूचड़खानों में गोवंश के कटने का अनुपात भी कई गुना होता जा रहा है। इस कारण गोवंश का मानव जनसंख्या की तुलना में कम होना पर्यावरण संतुलन के साथ ही अभ्युदय में भी गिरावट लाता है। ब्रिटेन में कुछ वर्ष पूर्व इस लोभ में गाय को मांस खिलाने का अघोरी उपाय किया गया। कहा गया कि इससे गोमांस अधिक वजनदार होता है और अधिक लाभ होगा। इस राक्षसी विचार का परिणाम यह हुआ कि विक्षिप्त गो विकार (Mad Cow Decease)  से हजारों लोगों की मृत्यु हुई। वर्तमान में फैल रही पक्षीजन्य ज्वर (Bird Flue) के पीछे भी ऐसी कोई आसुरी वासना काम कर रही है। यह केवल उपासना की बात नहीं है। गाय के साथ मानव के विकास का सीधा वैज्ञानिक सम्बन्ध है। इस बात को समझना धर्म है।

केवल अर्थोत्पादन को ही विकास मानने के कारण पर्यावरण का विनाश हर स्तर पर देखा जा रहा है। रासायनिक खाद, कीटनाशक तथा संकरित व अब तो जैव-विकृत (Genetically Modified) बीजों के कारण कृषि उत्पादन में भले ही वृद्धि दिखाई दे रही हो पर साथ में भूमि की उत्पादकता, खाद्यान्न की शुचिता व किसान के शुद्ध लाभ में दिनोंदिन हो रही गिरावट कुल मिलाकर गणित को नुकसान में ही ले जा रही है। इन सब अप्राकृतिक माध्यमों से आर्थिक लाभ को बढ़ाने के कृत्रिम प्रयासों ने विकास का बड़ा सा बुलबुला बना दिया है। किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं से यह स्पष्ट होता है। बात केवल इन प्राकृतिक संसाधनों तक ही सीमित नहीं है। मानव के लोभ ने प्रकृति, समाज तथा देशों तक का शोषण स्वयं के लाभ के लिये किया है। इस अंधादुंध स्पर्धा के बाद भी सारे तथाकथित विकसित देश आज खोखलापन उजागर होने से दिवालियापन के कगार पर है। इन देशों का ऋण इनकी सम्पदा के कई गुना हो गया है। यह आसुरी वृत्ति का परिणाम है। गीता के 16 वे अध्याय में इसका वर्णन हमें मिलता है। आशपाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः। ईहर्थेकामभोगार्थम् अन्यायेनार्थ संचयान्।। गी 16.12।। बिना धर्म के नियन्त्रण के अर्थ व काम पुरुषार्थ के पीछे पागल होनेवाले आसुरी वृत्ति के लोग सैंकड़ों ईच्छारुपी आशा के पाश में बन्धें काम और क्रोध में फँस जाते है। और लौकिक जीवन के भोगों की इच्छा से अन्याय पूर्वक अर्थात शोषण से अर्थ का संचय करते है। ऋण लेकर घी पीने की वकालत करने वाले चार्वाक की तरह ये आसुरी लोभी व्यवस्था धर्महीन अर्थ के दुश्चक्र में फँस जाती है। गतवर्ष जो वैश्विक वित्तीय संकट आया था उसके मूल में यही बिना उत्पादन के केवल मुद्रा के चलन के द्वारा लाभ का भ्रम पैदा करने की माया ही कारण थी। एक ही सम्पदा पर कई बार ऋण दिया गया और फिर जब उसके वापसी ना होने की स्थिति बनीं तो देशों ने झूठीं हुंण्डियों (Bonds) के सहारे विश्व में ही उथल पुथल मचा दी। यह अभ्युदय को ना समझने का परिणाम है, अधर्म है। गीता इस दुश्चक्र का स्पष्ट वर्णन करती है- इदम् अद्य मया लब्धं, इमं प्राप्स्ये मनोरथं। इदम् अस्ति इदम् अपि मे भविष्यति पुनर्धनं।। गी 16.13।।  यह अभी मुझे मिल गया पर जो नहीं मिला वो भी पाने की मन में इच्छा है बिना उसके लिये कष्ट किये। फिर ये मेरा है, ये और मेरा होगा ऐसे धन को फिर फिर कैसे बनाया जाय। ऋण पत्र (Credit Cards), वायदा कारोबार (Speculative Commodity Market) तथा पुंजी बाजार (Share Market) यह सब जुए के ही  वैधानिक रुप है।

अभ्युदय वास्तविक विकास का नाम है। दिखावे का नहीं। इसमें केवल आंकड़ेबाजी नहीं है। इसमें यर्थाथ में वीरता से पृथ्वि का दोहन कर धन, सम्पदा और इससे भी अधिक गहन ‘श्री’ का उत्पादन किया जाता है। केवल अपने लिये नहीं सब के लिये। सब में केवल मानव मात्र नहीं पूरी सृष्टि के संगोपन की बात है। अतः अभ्युदय के लिये निःश्रेयस का आधार अनिवार्य है। सामान्यतः निःश्रेयस को आध्यात्मिक विकास कह दिया जाता है। इससे बात स्पष्ट नहीं होती वास्तव में धुंधली होती है। यदि आध्यात्मिक विकास की ही बात करनी थी तो सीधे आत्मोदय ही कह देते। अभ्युदय और आत्मोदय। पर यहाँ पद है निःश्रेयस। अतः इस पद के प्रत्यय को, वैज्ञानिक अर्थ को समझना होगा। तभी धर्म को ठीक से समझ पायेंगे। आध्यात्मिक विकास यह अर्थ गलत नहीं है अपूर्ण है। निः श्रेयस्, हम सबको श्री की ओर ले जाने वाला। श्रेय को हमने पिछले प्रकरणों में विस्तार से समझा है। यहाँ व्यक्तिगत श्रेय की बात नहीं यह अंतिम कल्याण की बात है। इसीलिये इसको आध्यात्म से जोड़कर भी देख जाता है। किन्तु धर्म के अंग के रुप में इसको समझने में हमे ठीक से इसकी व्याख्या करनी होगी। श्रेयस् अर्थात श्री की ओर ले जाने वाला। पर इसका परिपूर्ण रुप, अंतिम स्वरुप निःश्रेयस इसको कैसे समझेंगे। यहाँ हमे अपने स्व की संकल्पना को ठीक से समझना होगा। स्व के सतत् विस्तारित होनवाले अखण्डमण्डल स्वरूप का साक्षत्कार ही निःश्रेयस है। यह अनुभूति हमें मानव के एकात्म स्वरुप का दर्शन कराती है। जिसे गीता में अविभक्त कहा है। सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते। अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्विकं।।गी 18.20।। जो कुछ भी अस्तीत्व में है, बना है उसे भूत कहते है। भू- भवति इस संस्कृत धातु का यह रुप है। इस सब में एक, अव्यय अर्थात अखण्ड, बिना किसी भी क्षति के एक भाव को ईक्षते- अर्थात देखना ही सच्चा, सात्विक ज्ञान है। बाहर से विभक्त अर्थात बिखरे, असम्बद्ध दिखाई देनेवाले जगत को अविभक्त अर्थात एक अखण्ड देखना ही ज्ञान है। इस ज्ञान की अनुभूति ही निःश्रेयस है। इस मानव के तथा जगत के एकात्म स्वरुप को देखे बिना अभ्युदय की परिकल्पना ही नहीं की जा सकती।

साथ में दिये चित्र में यह स्पष्ट होता है। मेरा ही विस्तारित रुप परिवार, समाज, राष्ट्र, सृष्टि व अन्ततः परमेष्टि है। यह समझने से सब का एकात्म विकास ही सच्चा विकास हो सकता हे यह भी समझ में आता है। एक के शोषण से दूसरे का किया विकास यथार्थ में विनाश को ही निमन्त्रण देता है। अपनी गहन अन्तर्दृष्टि से ऋषियों ने जिस सत्य को देख लिया था और उसपर आधारित आदर्श व्यवस्था धर्म का मार्ग भी समय समय पर प्रशस्त किया था। भारत में इसे धर्म कहा। अभ्युदय व निःश्रेयस का समन्वित, संतुलित तथा समुचित अनुपालन इसे एक शब्द में समुत्कर्ष कहा गया। सम्यक उत्कर्ष अर्थात भौतिक, आर्थिक, बाह्य विकास के साथ ही सबके कल्याण का भी उचित ध्यान यह धर्म की व्यवस्थागत परिभाषा है। जब धर्मराज्य की बात होती है तो धर्म के इस अर्थ की बात हो रही होती है। आज आधुनिक मानव विकास के नाम पर हर स्तर पर भयावह, विनाशकारी परिणामों के कारण इसकी आवश्यकता को अनुभव कर रहा है। फिर भी अभी भी वह इस समझ के निकट नहीं पहुँचा है। वर्तमान समय में अक्षय विकास (Sustainable Development), समग्र विकास (Holistic Development) तथा जैव विकास (Organic Development) जैसी शब्दावली का तो चलन हो गया है किन्तु इसके वास्तविक स्वरुप सनातन धर्म के वर्तमान में समुचित युगधर्म का विकास होना अभी बाकी है। यह भारत का वैश्विक कर्तव्य है – धर्माधारित व्यवस्था की स्थापना कर जगत का मार्गदर्शन करना।

किन्तु इसका प्रारम्भ अपने देश में ऐसी धर्माधारित व्यवस्था का निर्माण करने से ही होगा। अतः हमें अपने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक अनुभव पर आधारित राजनयिक, सामाजिक तथा आर्थिक व्यवस्था का निर्माण करना होगा। राष्ट्रकार्य के लिये बौद्धिक वीरों की आज अत्यधिक आवश्यकता है। ऋषियों की भूमि में गहन, मौलिक अनुसंधान का साहस आज युवाओं में कम ही देखने को मिल रहा है। आज पुनः यह वीरव्रत धारण करने की आवश्यकता है। अविश्वास व व्यक्तिगत अधिकार के स्थान पर विश्वास व कर्तव्य पर आधृत संविधान से प्रारम्भ कर सभी न्यायिक, प्रशासनिक व्यवस्थाओं में वर्तमान युगानुकूल धर्म को स्थापित करने हेतु सम्यक अनुसंधान करने आधुनिक ऋषि चाहिये। व्यक्तिगत लोभ, लाभ व प्रतिस्पर्द्धा के स्थान पर मौलिक, उत्पादक सच्ची ‘श्री’मन्त अर्थव्यवस्था का पुनर्गवेषण कौटिल्य सा अध्ययन मांगता है। आज माँ भारती पुनः न्याय, सांख्य तथा मिमांसा दर्शनों के दृष्टा गौतम, कपिल, जैमिनी, विश्व के प्रथम विधिदाता मनु, विदेह के मार्गदर्शक याज्ञवल्क्य, रामराज्य के रचनाकार व योगवाशिष्ठ के पुरोहित महर्षि वशिष्ठ, चणकपुत्र विष्णुगुप्त, विजयनगर के अधिष्ठाता विद्यारण्य स्वामी, शिवाजी के आज्ञापत्र के रचयिता रामचन्द्र अमात्य और भीमराव आम्बेड़कर के समान ही आधुनिक स्मृतिकर्ताओं की चमू की प्रतिक्षा कर रही है। ताकि पुनः गीताकार के कर्मयोग की विजय हो और कृष्णं वन्दं जगद्गुरुं को भारत फिर साक्षात् कर दिखायें।

फ़रवरी 29, 2012 Posted by | योग | , , , | 4 टिप्पणियाँ

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