उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

शिक्षा का अर्थायाम


प्रतिवर्ष शासन द्वारा अपने वार्षिक व्यय का अनुमान (Budget) प्रस्तुत करने पर शिक्षा पर किए जानेवाले व्यय की चर्चा होती है। केंद्र सरकार द्वारा शिक्षा पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद (G.D.P.) के लगभग 4% व्यय किया जाता है। विभिन्न आयोगों द्वारा समय-समय पर यह अनुशंसा की गयी है कि एक संवेदनशील राष्ट्र में शिक्षा व्यय सकल उत्पाद के कम से कम 6% होना चाहिए। भिन्न-भिन्न शैक्षिक संगठनों ने भी समय-समय पर यह मांग की है। भारतीय शिक्षण मंडल ने सकल राष्ट्रीय उत्पाद के अनुपात के स्थान पर शासकीय व्यय के 10% का प्रावधान शिक्षा क्षेत्र में करने की मांग रखी है। यह केंद्रीय व्यय का योगदान है। सभी राज्य शासन तो अपने व्यय का लगभग 20% शिक्षा पर लगाते ही है। दिल्ली, कर्नाटक, महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों का शिक्षा व्यय तो 23% से अधिक है। इस सबके बाद भी शिक्षा में मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ती भी अभी तक नहीं हो पा रही। 20-25 वर्ष पूर्व सरकार ने अपनी असमर्थता को स्वीकार कर नीजी क्षेत्र को शिक्षा में निवेश के लिए आमंत्रित किया। वैधानिक रूप से शिक्षा धर्मार्थ सेवा के रूप में ही दी जा सकती है। शैक्षिक संस्थान लाभकारी उपक्रम (Profit Making Enterprise) नहीं हो सकते। किंतु वास्तव में भारत जैसे देशों में शिक्षा एक आकर्षक उद्योग बनता जा रहा है। जमीन, वस्त्र आदि उद्योगों में चुनौतियाँ बढ़ने के बाद अनेक उद्योजकों ने अपने कारखानों तथा व्यापारी संस्थानों को अभियांत्रिकी महाविद्यालयों जैसे व्यावसायिक शिक्षा संस्थानों में परिवर्तित कर दिया। इसे शीघ्र लाभ का साधन माना जाने लगा। वैधानिक लाभप्राप्ति की व्यवस्था न होने के कारण शिक्षा के व्यापारीकरण हेतु अनेक अनैतिक कुरीतियों का जन्म हुआ।

शासन के शिक्षा व्यय का एक बहुत बड़ा हिस्सा, कुछ-कुछ राज्यों में तो 90% से अधिक हिस्सा शिक्षकों के वेतन पर लगाना पड़ता है। विभिन्न वेतन आयोगों ने सरकारी शिक्षकों की आमदनी में अच्छी वृद्धि की है। किंतु सरकारें इस बोझ के कारण शैक्षिक विकास की अन्य सभी गतिविधियों में कटौती करने पर विवश है। नए भवनों का निर्माण, ग्रंथालय, प्रयोगशाला, अत्याधुनिक शिक्षा साधन आदि के लिए अनुदान लगभग बंद हो गया है। सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत माध्यान्ह भोजन, गरीब छात्रों के लिए निःशुल्क गणवेश, पाठ्यसामग्री तथा बालिकाओं के लिए साइकिल आदि का प्रावधान किया गया। गत दो दशकों से हुए इन प्रयासों का सुखद परिणाम शालेय शिक्षा में पंजीयन बढ़ने में हुआ। सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्राथमिक शिक्षा का सकल प्रवेश अनुपात [Gross Enrollment Ratio (G.E.R.)] 95% हो गया है। कुछ राज्यों में तो यह 100% हो गया है। इसका अर्थ है कि भारत में जन्म लेनेवाले 6 वर्ष तक की आयु के 100 में से 95 बालक शाला में प्रवेश ले रहे हैं। सर्वशिक्षा अभियान की योजनाओं का 70% अनुदान केंद्र सरकार देती है। बाकि 30% की व्यवस्था राज्य शासन को करनी होती है। पूर्वोत्तर तथा जम्मू कश्मीर के अविकसित राज्यों हेतु 90% अनुदान केंद्र शासन का होता है। इन सब बातों से भी शिक्षा व्यय में वृद्धि हुई है। किंतु शिक्षा की गुणवत्ता पर इसका बहुत अधिक प्रभाव नहीं दिखाई देता है। उच्च शिक्षा में होनेवाला व्यय भी बढ़ाया गया है।

इस सबके बाद भी शालेय शिक्षा में नीजी संस्थाओं की भागीदारी बढ़ रही है। एक अनुमान के अनुसार 46% शालेय विद्यार्थी नीजी संस्थानों में अध्ययनरत है। उच्च शिक्षा में छात्र संख्या में नीजी संस्थाओं की भागीदारी 30% से कम है। किंतु महाविद्यालयों की संख्या में यह अनुपात 50% के लगभग हो गया है। नीतिनिर्धारकों एवं अधिकारियों में कुछ का मानना है कि नीजी क्षेत्र के बढ़ने से ही ‘सबको शिक्षा’ का लक्ष्य प्राप्त हो सकेगा। अतः योजनाओं में उसी प्रकार के प्रावधान गत दस वर्षों से किए जा रहे हैं। अनुभवी शिक्षाविदों एवं शिक्षा जगत में कार्यरत कार्यकर्ताओं का अनुभव है कि नीजी क्षेत्र के बढ़ने से व्यापारीकरण बढ़ेगा और समाज के बड़े वर्ग की पहुँच से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बाहर हो जाएगी।

शिक्षा के अर्थायाम पर विचार करते समय शैक्षिक दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। हम शिक्षा के उद्देश्य को किस दृष्टि से देखते हैं इस बात पर निर्भर करेगा कि शिक्षा का दायित्व किसपर है। शासकीय शिक्षा में शिक्षा के व्यय का भार शासन वहन करता है जबकि नीजी क्षेत्र में यह बोझ छात्रों अर्थात उनके अभिभावकों पर डाला जाता है। यदि शिक्षा को हम व्यक्ति के विकास के माध्यम से ही देखते हैं, और वह विकास भी केवल भौतिक स्तर पर ही समझा जाता है तब तो यह तर्क ठीक बैठता है कि सभी को अपनी-अपनी शिक्षा पर होने वाले व्यय का भार उठाना चाहिए। यदि अभिभावक सक्षम हो तो वे अपनी क्षमता के अनुसार महँगी से महँगी शिक्षा अपने बालकों को उपलब्ध कराएं। शिक्षा ऋण (Education loan) के पीछे भी यही दृष्टि है। जहाँ अभिभावक आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है वहां स्वयं छात्रों को शिक्षा ऋण उपलब्ध करा दिया जाएं ताकि वे अपने मन के अनुसार शिक्षा खरीद सकें। ऐसी शिक्षा प्राप्त कर रोजगार मिलने के बाद छात्र अपने ऋण का भुगतान करें। गत दो दशकों से यह विचार प्रभावी होता जा रहा है। विलासितापूर्ण नीजी शिक्षा संस्थानों में लाखों रुपये शुल्क का भुगतान करने के लिए तैयार अभिभावक बढ़ रहे हैं। दूसरी ओर शिक्षा ऋण की संख्या एवं राशि में भी प्रतिवर्ष कई गुना वृद्धि हो रही है। इन दोनों पद्धतियों में छात्र और अभिभावक ग्राहक अथवा उपभोगता की भूमिका में आ जाते हैं और शिक्षा संस्थान व्यापारी अथवा सेवा प्रदाता (Service Provider) बन जाते हैं। ऐसे विद्यालयों में अभिभावक शिक्षक बैठक (PTM) ग्राहक-नौकर संवाद में बदलती जा रही है। ‘जब हम इतना शुल्क दे रहे हैं तो क्या इतनी भी अपेक्षा नहीं कर सकते?’, ‘हम इतने सारे पैसे देकर बच्चों को स्कूल भेज रहे हैं, अब उन्हें पढ़ाना आपकी जिम्मेदारी है।’ जैसे वाक्य बच्चों की माताओं द्वारा शिक्षकों को कहा जाना सामान्य बात हो गयी है।

भारत में शिक्षा की यही दृष्टि नहीं है। केवल परंपरागत भारतीय शिक्षण की ही बात नहीं है अपितु भारत के संविधान में भी शिक्षा को व्यापार की वस्तु मानने का विरोध है। अनिवार्य तथा निःशुल्क मूलभूत (Elementary) शिक्षा को प्रारंभ में संविधान निर्माताओं ने राज्यों के निदेशक तत्वों में रखा और अपेक्षा की कि शीघ्रातिशीघ्र इसे वैधानिक रूप प्रदान किया जाएं। 86वे संविधान संशोधन इ. स. 2002 द्वारा शिक्षा को मौलिक अधिकार का स्थान दिया गया और तत्पश्चात इ. स. 2009 में ‘शिक्षा के अधिकार अधिनियम’ (RTE) द्वारा 6 से 14 वर्ष के प्रत्येक बालक की मूलभूत शिक्षा (8वी तक) अनिवार्य कर दी गयी। अब ये माता-पिता का विकल्प नहीं रहा कि वे बच्चों को पढ़ाएं या न पढ़ाएं। अनिवार्यता के साथ निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान भी आवश्यक था। यदि शिक्षा व्यापारिक सेवा मानी जाये तो उसे अनिवार्य नहीं किया जा सकता। यदि शिक्षा का उद्देश व्यक्तिगत विकास एवं रोजगार तक सीमित हो और इस कारण उसे व्यक्ति अथवा परिवार की जिम्मेवारी माना जाएं तो फिर शिक्षा ग्रहण न करने का विकल्प भी खुला रखना पड़ेगा। मूलभूत शिक्षा की अनिवार्यता यह सिद्ध करती है कि भारत का संविधान शिक्षा को व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक दायित्व मानता है। विधान की विवशता है कि वह समाज को अपने दायित्व के लिए बाध्य नहीं कर सकता। अतः निःशुल्क शिक्षा का भार राज्य पर डाला गया है। भारत के संविधान में मौलिक अधिकार तो विधि द्वारा संरक्षित है। अतः राज्य का दायित्व बनता है कि इनकी रक्षा का उचित प्रबंध करें। किंतु दूसरी ओर संविधान में सूचीबद्ध किये गए मौलिक कर्तव्य निदेशक तत्वों (directive principles) के रूप में है, अतः बाध्यकारी नहीं हैं। शिक्षा के अधिकार अधिनियम ने मूलभूत शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाकर अभिभावकों को बाध्य कर दिया है और आर्थिक क्षमता के प्रश्न को निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए राज्य को बाध्य कर सुलझाया गया है।

परंपरागत रूप से भारत में शिक्षा को व्यक्तिगत अधिकार, आवश्यकता अथवा विकास का साधन नहीं माना गया। अपनी अगली पीढ़ी को स्वयं से सवाई (125% विकसित) बनाने हेतु समाज के सामूहिक दायित्व के रूप में शिक्षा को देखा गया है। समाज की आवश्यकता है कि उसका प्रत्येक घटक केवल सुशिक्षित ही नहीं अपितु सुसंस्कारित बनें। अतः यह समाज का कर्तव्य बनता है कि वह इसकी समुचित व्यवस्था करें। ज्ञात प्राचीनतम इतिहास से ही भारत में शिक्षा निःशुल्क रही है। शिक्षा को न तो व्यापार बनाया गया और न ही सरकार के अनुदान पर आश्रित रखा गया। भारत में शिक्षा सच्चे अर्थों में स्वायत्त एवं समाजपोषित रही है। आर्थिक स्वावलंबन के बिना शैक्षिक व प्रशासकीय स्वायत्तता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। अतः भारत में शिक्षा की समाजपोषित व्यवस्था प्रयत्नपूर्वक विकसित की गयी। सब कालखंडों में सर्वत्र एक सी व्यवस्था नहीं थी किंतु जो भी विविध प्रकार की व्यवस्था विकसित की गयी उसमें स्वावलंबन समाज का आधार तथा शासन एवं समाज निरपेक्षता को ध्यान में रखा गया। वैसे ही गुरुकुल शिक्षा में आवश्यकताएं कम करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। अतः गुरुकुल की अपनी आवश्यकताएं भी न्यूनतम हुआ करती थी।

साधारणतः तीन प्रकार के शिक्षा संस्थान भारत में कार्यरत रहे हैं। आवासीय गुरुकुल नगर, गांव से दूर वन में हुआ करते थे। इनमें बड़ी संख्या में छात्रों एवं आचार्यों के निवास, अन्य शैक्षिक गतिविधियों के लिए अध्ययनशाला, गोशाला, यज्ञशाला, पाकशाला, प्रयोगशालाएं भी हुआ करती थी। छात्रों के अनुपात में इन सभी छात्रावासों एवं शालाओं की भी आवश्यकता पड़ती थी। इस सबके साथ ही कृषि भूमि भी गुरुकुलों से जुड़ी हुई थी। छात्र एवं आचार्य कृषि और गोपालन का कार्य साथ मिलकर करते थे। अतः भोजनादि की व्यवस्था इन्हीं में से हो जाती थी। वस्त्र निर्माण का कार्य भी अध्ययन का अंग होता था। अतः छात्रों की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ती व्यावहारिक अध्ययन के लिए किए गए कार्यों से हो जाती थी। भूमि एवं गायें समाज से दान में प्राप्त होती थी। अधिकतर निर्माण सामग्री प्राकृतिक ही होने के कारण वन से ही उनकी आपूर्ति हो जाती थी। मध्यकाल में बड़े-बड़े भवनों का निर्माण नालंदा, तक्षशिला आदि गुरुकुलों में हुआ था। उसमें समाज के धनिक वर्ग का दान लगा हुआ होगा। राजा भी इन बड़े गुरुकुलों के निर्माण में योगदान करते थे। किंतु वह दान दक्षिणा के रूप में होता था। राज्य द्वारा थोपी गयी विविध बाध्यताओं से बंधा अनुदान गुरुकुल स्वीकार नहीं करते थे। देश के कुछ भागों में बड़े-बड़े गुरुकुलों के संचालन हेतु राजाओं द्वारा गुरुकुलों को कुछ ग्रामों के अभिलेख (पट्टे) प्रदान किए जाने के प्रमाण उपलब्ध हैं। इन गांवों से प्राप्त कर राजा के पास नहीं, गुरुकुलों के पास जमा होता था। इस व्यवस्था में भी राजा का हस्तक्षेप नहीं होता था। एक बार अभिलेख प्रदान हो जाने के बाद गांवों की पंचायत व्यवस्था का दायित्व होता था कि सुव्यवस्थित कर-संग्रहण कर गुरुकुलों को उपलब्ध कराया जाएं। इस प्रकार स्वायत्तता से गुरुकुलों की आर्थिक व्यवस्था हो जाती थी। अध्ययनकाल के कुछ निश्चित समय में भिक्षा-भोजन अथवा माधुकरी अनिवार्य थी। पाँच घरों में भिक्षा मांगने से न केवल छात्रों के अहंकार का विसर्जन होकर उनके व्यक्तित्व का विकास होता था अपितु साथ ही सारे गुरुकुल का भोजन भी समाज के आधार पर हो जाता था।

भारतीय शिक्षा व्यवस्था की आर्थिक स्वायत्तता का सबसे बड़ा माध्यम गुरुदक्षिणा थी, जो छात्र अपने गुरुओं के प्रति स्वेच्छा से अर्पण करते थे। हम पुराणों में और अन्य इतिहास ग्रंथों में विलक्षण गुरुदक्षिणा के अनेक प्रसंग पाते हैं। किंतु, यह तो अपवादात्मक घटनाएं हैं। सब गुरूदक्षिणा इस प्रकार की नहीं थी।

गुरु पूर्णिमा के दिन प्रवेश करते समय छात्र अपने हाथ में केवल समिधा लेकर – समित्पाणि हो गुरु को स्वयं अर्पित हो जाता था। हाथ में धारण की गई समिधा उसके मन का प्रतीक थी कि ‘जिस प्रकार यह समिधा यज्ञ में अर्पित होकर स्वाहा हो जाएगी, उसी प्रकार मैं आपके चरणों में न-मन करते हुए अपने मन को आप को सौंप रहा हूं। अब आप इसे जीवन योग्य बनाइए।’ न्यूनतम 12 वर्ष की शिक्षा के बाद छात्र स्नातक होता था। यह समय सबके लिए निर्धारित नहीं था किंतु सामान्यतः इतना समय लगता था। कोई अलौकिक छात्र हो तो कम समय में भी योग्य हो जाता था। जैसा कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने मात्र 2 वर्ष गुरु सांदीपनि के आश्रम में रहकर 64 कलाओं और 14 विद्याओं का अध्ययन कर लिया। दूसरी ओर उत्तंक का उदाहरण है जिन्हें आयु के 40 वर्ष तक यानी लगभग 30-32 वर्ष गुरुकुल में रहना पड़ा। यह अपवाद हैं। सामान्यतः 12 वर्ष में शिक्षा पूर्ण हो जाती थी।

इसके पश्चात छात्र समाज में अपना योगदान करने के लिए तैयार होता था और गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता था। गुरु को दी जाने वाली दक्षिणा जीवनपर्यंत देनी है क्योंकि गुरु ने जीवन की शिक्षा दी है। अतः अपनी कमाई में से दशांश गुरु को भेजने की परंपरा भारत में थी। सभी छात्र इस परंपरा का कर्तव्य मानकर पालन करते थे। चाहे राजा का पुत्र हो अथवा कोई गरीब किसान, अपनी आजीविका चलाने के लिए कष्ट से प्राप्त किए धन में से दसवां हिस्सा अपने गुरुकुल, पाठशाला अथवा गुरु को भेजता था। सभी शिष्यों से प्राप्त यह राशि गुरुकुल संचालन हेतु पर्याप्त होती थी। अतः किसी भी नए गुरुकुल को प्रथम 12 वर्ष ही अपने आर्थिक भार हेतु व्यवस्था करनी पड़ती थी। समाज में दान भिक्षा मांगनी पड़ती थी। 12 वर्ष बाद तो पूर्व छात्र ही गुरुकुल को संभाल लेते थे। यह अत्यंत स्वावलंबी व्यवस्था थी। इसके कारण आक्रमण काल में सत्ता विदेशी विधर्मियों के हाथ में चले जाने के बावजूद भारत में गुरुकुल जीवंत रहे।

आज जब हम गुरुकुल शिक्षा की पुनःप्रतिष्ठा की बात करते हैं तो केवल फिर एक बार अधिकाधिक गुरुकुलों से भारत में सभी को शिक्षा प्रदान करना इतना ही उसका अर्थ नहीं है। साथ ही वर्तमान व्यवस्था में भी गुरुकुल के कुछ तत्वों का समावेश अत्यावश्यक है। इन तत्वों में से गुरुकुल का अर्थायाम सबसे पहले लागू किया जा सकता है। यदि हमारी शिक्षा व्यवस्था से निकले हुए छात्र अपना कर्तव्य समझकर अपनी आय का कुछ निश्चित हिस्सा अपने शिक्षा संस्थानों को भेजना प्रारंभ कर दें तो सारे विद्यालय, महाविद्यालय यहां तक कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान IIT जैसे बड़े-बड़े शैक्षिक संस्थान भी स्वावलंबी बन सकते हैं। पूरी तरह से इस व्यवस्था का अभी परीक्षण किया जाना बाकी है किंतु कुछ अंशों में इसका प्रयोग सेवाभावी संस्थाओं में हो रहा है। अभी यह स्वैच्छिक है। विद्या भारती, रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन जैसे संगठनों में पढ़े हुए छात्र अपनी श्रद्धा से अपने पूर्व विद्यालय को दान देते रहते हैं। राजस्थान में भामाशाह योजना के अंतर्गत शासकीय विद्यालयों में भी समाज के योगदान को प्रारंभ किया गया। इसके चमत्कारिक परिणाम सामने आए। पाली जिले में विद्यालयों, महाविद्यालयों के भवन तक समाज ने निर्माण किए।

यदि इसे परंपरा का रूप दे दिया जाए और सभी पूर्व छात्र एक निश्चित राशि प्रतिमाह भेजने लगे तो और किसी संसाधन की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। सारी शिक्षा निःशुल्क दी जा सकेगी। जो छात्र निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करेगा वह इस कर्तव्य का पालन और अधिक श्रद्धा से करेगा। वर्तमान में चल रहे व्यापारिक शिक्षा संस्थानों से निकले हुए छात्रों में यह श्रद्धा नहीं दिखाई देती क्योंकि उनके मन में ग्राहक बोध है। उन्हें लगता है कि हमारी शिक्षा का पूरा व्यय हमारे माता-पिता ने ही वहन किया। अब हमें इसे वापस कमाना है। इस भाव के कारण वह अपने व्यवसाय में भी येन केन प्रकारेण कमाने में ही विश्वास रखता है। यदि सभी प्रकार की शिक्षा निःशुल्क हो जाए तो अपने विद्यालय, महाविद्यालय के प्रति ऋण से उऋण होने का भाव छात्रों में रहेगा। पूर्व छात्र श्रद्धा से अपने शिक्षा संस्थानों का योगक्षेम वहन करेंगे। केवल इतना ही नहीं, सेवाभाव से प्राप्त शिक्षा के कारण उनके व्यावसायिक जीवन में भी वही सेवाभाव प्रधान होगा। कहते हैं ना, जो बीज बोएंगे फसल उसी की काटी जाएगी। शिक्षा में यदि हम व्यापार का बीज बोएंगे तो हमारे छात्र बड़े होकर उसी प्रकार की व्यावसायिकता का आचरण करेंगे। यदि शिक्षा सेवाभाव से प्रदान की जाएगी तो उससे तैयार छात्र भी अपने जीवन के प्रत्येक कार्य को सेवाभाव से ही करेंगे। अतः शिक्षा का अर्थायाम केवल आर्थिक विषय ना होकर शिक्षा में नैतिकता का भी विषय बन जाता है। सरकार-निरपेक्ष और व्यापार-निरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था ही वास्तविकता में स्वावलंबी, नैतिक, धर्मानुसारी शिक्षा है।

भारत माता को पुनः एक बार विश्वगुरु के पद पर आसीन करने के लिए आइए हम इस अर्थायाम को स्वयं से प्रारंभ करें। हम चाहे जिस शिक्षा संस्थान में पढ़े हो सरकारी, निजी अथवा सेवाभावी, अपने जीवन में कमाई का निश्चित अंश देना प्रारंभ करें। यह निश्चित है कि आज की व्यवस्था में तुरंत दशांश प्रदान करना प्रारंभ नहीं होगा। किंतु 2% से प्रारंभ किया जा सकता है। धीरे धीरे बढ़ते हुए 5% तक भी ले गए तो शासन को किसी प्रकार की आर्थिक व्यवस्था नहीं करनी पड़ेगी और ना ही शिक्षा संस्थानों को व्यापार करना पड़ेगा।

‘जीवन में हमने जो पाया है उससे अधिक हम प्रदान कर सकें’ यही मनुष्य होने का लक्षण है। अतः, बिना किसी तर्क-कुतर्क हम अपने विद्यालय को, जिसके कारण आज हम बने हैं, उसे आंशिक गुरु दक्षिणा देना प्रारंभ करें। यही गुरुकुल की पुनः स्थापना का स्थायी मार्ग है।

दिसम्बर 8, 2018 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

धर्मानुसारी शिक्षा की स्थापना में शिक्षकों की भूमिका


Ruprekhaमानव की पहचान संबंधों से है | बिना संबंधों के मनुष्य का कोई परिचय ही नहीं है | समस्त सृष्टि के अन्तर्निहित एकत्व का सुप्त ज्ञान मानव मन को अनंत विस्तार हेतु प्रेरित करता है | प्रकटतः भले ही हम स्वयं को सबसे अलग मानते है फिर भी अंतर्मन में इस बात का भान सदैव रहता है कि हम उस एक ईश्वरीय चेतना के अंग है | इस अनुभूति के कारण ही मनुष्य सदैव अपनी चेतना का विस्तार करने का प्रयत्न करता है | इसीलिए मानव को सामाजिक प्राणी भी कहते है | यह सामाजिकता मनुष्यता का महत्वपूर्ण अंग है किंतु सृष्टि के सम्बन्ध केवल मानव समाज तक ही सीमित नहीं है | इसके तंतु सर्वव्यापी है | मानव का मानव से, मानव का समाज से, मानव का अन्य प्राणियों से, सृष्टि से, समूचे ब्रम्हांड से तथा अंततोगत्वा परमात्मा से जो सम्बन्ध है, उन संबंधों के निर्वहन को धर्म कहते है | इस पूरे अस्तित्व को जिन अन्तर्निहित नियमों द्वारा धारण किया गया है उसी को धर्म कहते है | यही धर्म व्यवहार में भी अपेक्षित है | धर्मानुसारी शिक्षा का अर्थ है प्रत्येक को इस धर्म की अनुभूती कराना तथा उसपर आधारित व्यवहार का प्रशिक्षण प्रदान करना |

वर्तमान समय में धर्मसंकल्पना का अर्थ स्पष्ट न होने के कारण पूरी शिक्षा ही धर्मविहीन हो गयी है| उपासना के रूप में धर्म का सीमित अर्थ प्रचलित होने के कारण उसे भेद का मूल मान लिया | परिणामतः धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धर्म के समग्र रूप को ही व्यवहार से बाहर कर दिया | धर्मानुसारी शिक्षा तो क्या, शिक्षा में धर्म के अंतर्भाव की भी कल्पना वर्तमान वातावरण में नहीं कर सकते | ऐसी स्थिति में से धर्मानुसारी शिक्षा के आदर्श तक पहुँचने हेतु जिन महत्प्रयासों की आवश्यकता है उनमें शिक्षकों की भूमिका सर्वोपरि है | शिक्षक ही शिक्षा की धुरी है | चाहे जैसी भी व्यवस्था हो, शिक्षक के बिना शिक्षा की कल्पना ही नहीं कर सकते | व्यवस्था चाहे जितने भी निर्बंध लगा ले, कक्षाकक्ष में पढ़ाते समय विधि एवं व्यवहार की स्वतंत्रता को कोई छीन नहीं सकता | शिक्षक यदि अपने इस स्वातंत्र्य का समुचित उपयोग करे तो शिक्षा व्यवस्था के पुनरुत्थान में चमत्कार संभव है | वैसे भी धर्म आचरण से ही संभव है और आचरण का प्रशिक्षण किसी पाठ्यक्रम की अपेक्षा व्यावहारिकता से अधिक दिया जा सकता है | अतः यदि शिक्षक अपनी भूमिका का धर्म के अनुसार निर्वहन करने लगे तो वर्तमान व्यवस्था में भी धर्मानुसारी शिक्षा प्रदान करना संभव है | २ से ३ प्रतिशत शिक्षकों के दृष्टिकोण में सम्यक परिवर्तन आ जाये तो व्यवस्था परिवर्तन भी प्रारंभ हो जायेगा | व्यवस्था परिवर्तन के २ मार्ग है | क्रान्ति के मार्ग से व्यवस्था को एक झटके में बदला जाता है | किंतु इस पद्धति में परिवर्तन का आधार राजतंत्र होता है जोकि अपनेआप में धर्मानुसारी शिक्षा के सिद्धांतों के विपरीत है | क्रान्ति में परिवर्तन ऊपर से नीचे की ओर होता है | परिवर्तन का दूसरा मार्ग सहज, स्वाभाविक, क्रमशः होनेवाला परिवर्तन है | परिवर्तन संसार का स्थायी स्वभाव है | संसरति इति संसारः | अतः समाज में स्वतः होनेवाले परिवर्तनों के साथ शिक्षा में भी क्रमशः परिवर्तन होता है | इसे उत्क्रांति मार्ग कहते है | वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अनियंत्रित परिवर्तन पतन की ओर ही जाता है | भौतिक शास्त्र में इसे Entropy (परिक्षय) का सिद्धांत कहते है | क्रांति में प्रस्थापित व्यवस्था का ध्वंस निहित है | १८३५ में मैकोले ने यही किया था | सकारात्मक शिक्षा की प्रस्थापना हेतु क्रांतिकारी परिवर्तन कितना भी आकर्षक लगे, अत्यंत कठिन है | एक तो ऐसे परिवर्तन हेतु आवश्यक सम्पूर्ण सैद्धांतिक स्पष्टता तथा उसे व्यवहार में उतारनेवाले प्रशिक्षित आचार्य एक साथ एक समय इतनी बड़ी संख्या में तैयार करना तथा इस व्यवस्था को स्थापित करने हेतु अनुकूल राजतंत्र का उपलब्ध होना, दोनों ही बातें दुष्प्राप्य है | यदि महत्प्रयास से धर्मसत्ता आदर्श आचार्यों को तथा राजसत्ता राजनैतिक इच्छाशक्ति को प्राप्त भी कर ले तब भी अचानक व्यवस्था परिवर्तन समाज में सांस्कृतिक क्षोभ (cultural shock) उत्पन्न करेगा | दूरस्थ वनवासी क्षेत्रों में अचानक आधुनिक शिक्षा को प्रस्थापित करने से ऐसा विक्षोभ देखने में आता है | ऐसे सामूहिक विक्षोभ की स्थिति में अधिकतर समय समाज अच्छी बातों को भी नकार देता है |

उत्क्रांति का पथ सहज, स्वाभाविक व नैसर्गिक है | किंतु फिर भी उसमें विकास के स्थान पर पतन की ही अधिक संभावना है | प्रयत्नपूर्वक धर्मानुसारी शिक्षा की chanakyaस्थापना हेतु आवश्यक परिवर्तन करना यह मार्ग ना तो अचानक झटके से की हुई क्रान्ति हो सकता है और ना ही अत्यंत धीमी गति से होनेवाली उत्क्रांति | जिस मार्ग का अवलंबन धर्मसंस्थापना के लिए किया जाना अपेक्षित है उसे सम्यक क्रान्ति कहा जा सकता है | संस्कृत में इसे यदि एक शब्द में कहना हो तो कहेंगे ‘संक्रांति’ | संक्रांति में परिवर्तन क्रमशः व नैसर्गिक है किंतु परिवर्तन की गति व दिशा सुनियोजित होगी | क्रमशः उत्थान करते हुए अंतिम आदर्श को प्राप्त किया जायेगा | यही भारतीय पद्धति है | संक्रांति में क्रान्ति की तरह विस्फोट नहीं है और ना ही उत्क्रांति की तरह पतन | जो-जो जिस-जिस स्तर पर है वही से क्रमशः उत्थान की ओर अग्रसर हो यही संक्रांति का मार्ग है | धर्मसंस्थापना की यही शाश्वत विधि है |

शिक्षा में संक्रांति की आधारशिला शिक्षक ही होंगे | संक्रांति में चूंकि परिवर्तन बाहर से थोपा नहीं जाता अपितु अन्दर से ही किया जाता है | अतः यह हमेशा मानव-केन्द्रित होगा, व्यवस्थानुगत नहीं हो सकता | शिक्षक धर्मानुसारी शिक्षा की संकल्पना को अर्थात धर्म की सुस्पष्ट संकल्पना को हृदयंगम करे | इसीसे शिक्षा में संक्रान्ति प्रारम्भ होगी | इस धर्म को अपने व्यक्तिगत जीवन में आचरण से प्रारम्भ करना होगा | धीरे-धीरे अध्ययन, अध्यापन व शिष्यों के साथ व्यवहार में धर्म का प्रभाव प्रारम्भ होगा | शिक्षक के कक्षा में धर्माचरण प्रारम्भ करने से सकारात्मक परिवर्तन दृष्टिगोचर होंगे | किसी भी शैक्षिक संस्थान में यदि १० प्रतिशत शिक्षक धर्माचरण करनेवाले हो जाये तो प्रयत्नपूर्वक उस शिक्षा संस्थान को धर्मानुसारी शिक्षा के आदर्श के रूप में प्रस्थापित किया जा सकता है | जब इन शिक्षा संस्थानों से समाज के सभी क्षेत्रों में सर्वोत्तम व्यक्तित्व प्रदान किये जायेंगे तब सारा समाज इन शिक्षा संस्थानों का अनुसरण करने लगेगा | परिवर्तन का धर्मानुसारी मार्ग यही है |

संक्रांति का प्रारम्भ शिक्षकों के सुगठन हेतु आयोजन करने से होगा | आचार्य निर्माण की यह प्रक्रिया बाहरी प्रशिक्षण से नहीं अपितु अंदरूनी स्वाध्याय से ही संभव है | धर्मसंस्थापना की प्रेरणा से उद्दीपित आचार्य एकत्रित आकर धर्म को समझने हेतु अध्ययन, विमर्श, मनन, चिंतन करेंगे तब उसे स्वाध्याय कहा जायेगा | इस स्वाध्याय का मूल आधार तो शास्त्र ग्रन्थ ही हो सकते है | किंतु साथ ही शास्त्रीय सिद्धांतों की युगानुकुल अभिव्यक्ति को भी स्वाध्याय का आधार बनाना होगा | धर्म के तत्व को हृदयंगम करना स्वाध्याय का प्रथम चरण है | इसका अगला चरण धर्मावलंबन के व्यावहारिक आयामों का सृजन है | कुछ दो, चार, दस या पचास लोग भी कुछ विधियों की सूचि बनाकर सारे अध्यापकों को दे देंगे तो काम नहीं चलेगा | धर्मावलंबन की विधियों का सृजन प्रत्येक को अपनी प्रतिभा का समुचित उपयोग करते हुए करना होगा | यह सृजन प्रक्रिया प्रत्येक के लिए स्वतंत्र होते हुए भी व्यक्तिगत नहीं हो सकती | धर्म का मर्म सामूहिक क्रिया में है | अतः स्वाध्याय भी सामूहिक ही करना पड़ेगा | चिंतन मनन द्वारा समझे हुए तत्व को व्यवहार में उतारने का नाम है निदिध्यासन | इसी से स्वाध्याय परिपूर्ण होगा | स्वाध्यायी आचार्यों के नियमित मंडल सर्वत्र प्रारम्भ करने होंगे | प्रयत्नपूर्वक पूरे समाज में इस योजना को क्रियान्वित करना होगा |

स्वाध्याय से प्राप्त विधियों को अपने-अपने अध्यापन में प्रयोग कर परिष्कृत किया जायेगा | ऐसे कुछ शिक्षक साथ मिलकर या तो पूर्व से चल रहे शिक्षा संस्थान को आदर्श बनायेंगे अथवा नूतन पूर्णतः धर्मानुसारी शिक्षा संस्थानों का निर्माण करेंगे | इनके प्रभाव से नीतियों में भी परिवर्तन होगा | प्रारम्भ में केवल इतना भी हो जाये कि राजसत्ता ऐसे पूर्णतः निःस्वार्थ भाव से चलनेवाले गैर-वाणिज्यिक धार्मिक शिक्षा संस्थानों को स्वतंत्रता से कार्य करने दे, किसी भी प्रकार का नीतिगत हस्तक्षेप ना करने दे तो भी पर्याप्त है | ऐसे समाजपोषित शिक्षा संस्थान क्रमशः प्रमुखता प्राप्त करते जायेंगे व शासनमुक्त शिक्षा व्यवस्था का विकास करेंगे |

Saraswati-Statue-to-Washingtonइस पूरी प्रक्रिया में शैक्षिक संगठनों की भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है | इस हेतु शैक्षिक संगठनों के कार्यकर्ताओं का मानस धर्मसंकल्पना के प्रति दृढ़ करना होगा | वर्तमान में देश में भारतीय दृष्टी को ध्यान में रखकर काम करनेवाले तीन प्रकार के शैक्षिक संगठन कार्यरत हैं | कुछ संगठन शिक्षा संस्थानों का संचालन करते हैं | निःस्वार्थ सेवा भाव से राष्ट्रनिर्माण हेतु चरित्र निर्माण करनेवाली संस्कारवान शिक्षा प्रदान करनेवाले कई शैक्षिक संगठन हैं | संख्या की दृष्टी से विद्याभारती इनमें अग्रणी है | रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन, भारत सेवक समाज, सर्वोदयी विचारधारा से चलनेवाले संगठन आदि अनेक संगठन इस श्रेणी में आते हैं | यद्यपि इन शिक्षा संगठनों द्वारा चलाये जानेवाले शिक्षा संस्थान आधुनिक व्यवस्था का अंग होने के कारण पूर्णतः भारतीय नहीं है | फिर भी इन संगठनों का संचालन करनेवाले कार्यकर्ताओं की मंशा धर्माधिष्ठित भारतीय पद्धति को स्थापित करने के लिए अनुकूल है | धर्मदृष्टि को समझने से इन शिक्षा संस्थानों के शिक्षकों द्वारा संक्रांति होना तुलनात्मक रूप से अधिक सुकर होगा |

दूसरे प्रकार के संगठन शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न घटकों के हितों की रक्षा हेतु काम करते हैं | विद्यार्थियों के हितों के लिए विद्यार्थी संगठन जैसे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षकों के हितों के लिए विभिन्न राज्यों में गठित शिक्षक संघ तथा कई राज्यों में निजी संस्थाचालकों के संगठन भी हैं | इस प्रकार के शैक्षिक संगठन प्रमुखतः अपने सदस्यों के अधिकारों, आर्थिक हितों तथा समस्याओं के समाधान हेतु आन्दोलन शासन से चर्चा अथवा न्यायालयीन दावों के माध्यम से कार्य करते हैं | इन संगठनों का मूल स्वभाव सदस्यों की स्वार्थपूर्ति होने के कारण इनमें जुडनेवालों के मन में भी निजी हितों की वरीयता अधिक होती हैं | इसका सकारात्मक परिणाम यह है कि इन संगठनों की सदस्य संख्या बहुत अधिक होती है | यह संख्याबल इनकी प्राथमिक शक्ति है | धर्मानुसारी शिक्षा के तत्वों का प्रचार कर अनुकूल वातावरण निर्मिती में ये संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं | इनके माध्यम से शिक्षा में जुड़े हुए एक बड़े वर्ग तक वैचारिक सन्देश पहुंचाना संभव हो सकता है | यद्यपि इसका सैद्धांतिक गुणांकन नहीं होगा फिर भी धर्माचरण में रत शिक्षकों को नैतिक समर्थन देनेवाले अनुकूल मन के समर्थकों का वर्ग तैयार किया जा सकता है | ये लोग स्वाध्याय और संक्रांति के क्रियान्वयन में पूरी तरह से सहभागी भले ही न हो उसके लिए पोषक उर्वराभूमि का निर्माण निश्चित रूप से कर सकते हैं | संक्रांति के द्वितीय चरण धर्माधिष्ठित शिक्षा के सर्वव्यापीकरण में लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत संख्या का भी बड़ा महत्त्व है | इस चरण में इन शैक्षिक संगठनों की भूमिका सबसे प्रभावी होगी | इन संगठनों में धर्मानुसारी शिक्षा के विचार का बीजारोपण करने हेतु कुछ वैचारिक कार्यक्रमों की योजना करना आवश्यक होगा | ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से कार्यकर्ताओं को धर्मसंकल्पना का परिचय दिया जा सकेगा | संख्या बड़ी होने के कारण पूर्ण वैचारिक स्पष्टता की अपेक्षा तो नहीं कर सकते, केवल अधिकारों के साथ कर्तव्यों का विचार करने का संस्कार भी प्रेरित किया जा सके तो प्रारंभ के लिए पर्याप्त होगा | अधिकारों के लिए लड़ने के साथ ही कर्तव्यपालन में ही हमारा अधिक स्थायी हित है यह बात समझना धर्मविचार का शुभारम्भ है |

तीसरे प्रकार के शैक्षिक संगठन वैचारिक कार्य करनेवाले संगठन हैं | इनका मूल काम ही शिक्षा के भारतीय प्रतिमान पर अनुसंधान कर उसे युगानुकूल रूप में प्रस्थापित करने का नियोजन करना है | पुनरुत्थान विद्यापीठ, भारतीय शिक्षण मंडल, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास आदि संगठन इस श्रेणी में आते हैं | धर्माधिष्ठित शिक्षा को ही विभिन्न नामाभिधानों से प्रकट करते हुए उसकी संस्थापना हेतु ये वैचारिक संगठन कार्य कर रहे हैं | शिक्षा व्यवस्था में धर्मसंस्थापना हेतु संक्रांति करने में इन संगठनों की योजक भूमिका अपेक्षित है | संक्रांति के लिए आवश्यक विभिन्न घटकों को एक सूत्र में गूंथने का परोक्ष कार्य इन संगठनों को करना होगा | संक्रांति के तात्विक अधिष्ठान की सुस्पष्टता की जिम्मेवारी भी इन्ही संगठनों की बनती है | अनादि काल से भारत में जीवंत धर्मसंकल्पना को मूल रूप में समझकर उसका युगानुकुल स्पष्टिकरण समाज में प्रदान करना धर्मानुसारी शिक्षा के लिए प्रथम आवश्यकता है | धर्म तो साक्षात्कार का विषय है | अतः इन संगठनों के कार्यकर्ताओं को साधक बनना होगा | उपरी प्रवचन, उद्घोषणाएं, प्रस्ताव आदि तो संगठनात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप चलते रहेंगे किंतु इन संगठनों का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि गहन गंभीर साधना को तत्पर कितने कार्यकर्ताओं का निर्माण इन संगठनों की प्रेरणा से हुआ | संक्रांति के अन्य सभी चरणों की शुद्धि, पावित्र्य, प्रभाव, साफल्य तथा सार्थकता इस साधना पर निर्भर करती है | अतः इन संगठनों से जुड़े सभी कार्यकर्ताओं का शास्त्राध्ययन तथा स्वाध्याय कठोर नियमितता के साथ होना अपेक्षित है | समय-समय पर सामूहिक विमर्श, प्रत्यक्ष प्रयोग, उन प्रयोगों से प्राप्त अनुभवों पर पुनः सर्वांगीण संविमर्श तथा आपसी समन्वय यह इस साधना की कार्यपद्धति बनती है | इस चर्चा स्वाध्याय के साथ ही इन विचारों का युगानुकुल शब्दावलि में संहिता लेखन भी अनिवार्य है | तैतरीय उपनिषद् के शिक्षावल्ली अनुवाक् में गुरु अपने दीक्षांत आदेश में स्पष्ट निर्देश दे रहा है – स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां मा प्रमदितव्यं – स्वाध्याय और प्रवचन में कभी आलस न करना | यहाँ वर्तमान युग के अनुरूप प्रवचन के अर्थ को विस्तारित करके समझना होगा | वैसे भी प्रवचन का अर्थ है पूर्ण गंभीरता से प्रकट करना – प्रकर्षेण वाच्यति इति प्रवचनं | वर्तमान स्थिति में वैखरी वाणी का अक्षररूप अर्थात लिखित साहित्य अधिक प्रामाणिक माना जाता है | अतः प्रवचन के अर्थ में गंभीर लेखन को सम्मिलित करना पड़ेगा | वैचारिक संगठनों के कार्यकर्ताओं को प्रयत्नपूर्वक नित्यलेखन का अभ्यास करना होगा | प्रतिदिन नियमपूर्वक कुछ पृष्ठ लिखने की आदत बन जाये तो शनैः शनैः लेखनी में स्पष्टता व लेखन में गांभीर्य आ जायेगा |

धर्म के सुस्पष्ट साक्षात्कार के साथ ही वैचारिक संगठनों के कार्यकर्ताओं का यह भी दायित्व बनता है कि उसका युगानुकुल प्रयोग करे | अतः शिक्षकों व पहले दो प्रकार के संगठनों के साथ मिलकर शिक्षा में धर्मप्राण नवोन्मेष करने का शुभ व्रत भी इन संगठनों का है | ऐसे प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्षों को संहिताबद्ध कर अनेक स्थानों पर दोहराने योग्य प्रतिमान का निर्माण करना होगा | यह प्रतिमान सभी स्तरों पर स्वाध्याय, प्रयोग व धर्माचरण का आधार बनेगा | इसी प्रतिमान से धर्मानुसारी शिक्षा को स्थापित करने, धर्मप्राण, स्वाध्यायी आचार्यों की संक्रांति संभव होगी |

अप्रैल 4, 2016 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , | 11 टिप्पणियाँ

   

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