उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

बहुआयामी धर्म की एकात्म संकल्पना


BG2किसी भी राष्ट्र में सामाजिक, राजनैतिक समस्याओके मूल में वैचारिक अस्पष्टता की बहुत बडी भूमिका रहती है। भारत में ब्रिटिष राज के अवषेष आज भी वैचारिक विभ्रम के रूप में बने हुए है। सदियों से ऐतिहासिक सांस्कृतिक अनुभूति के आधार पर जिन संकल्पनाओं का विकास हुआ उनकी अवधारणाओं एंव मर्म को अनुवाद की अपर्याप्तता के कारण भ्रमित कर दिया गया है। समाज एवं लोक जीवन में प्रचंड विविधता के बाद भी अनेक संकल्पनायें देश के सभी भाग में समान रूप से समझी जाती है। आपको उस प्रांत की प्रादेशिक भाषा का ज्ञान हो न हो अनेक आध्यात्मिक गूढ संकल्पनाओं को भी आप सहजता से समझ सकते है। कैलास से लेकर कन्याकुमारी व द्वारका से लेकर परषुराम कुंड तक कही पर भी आप जाइए-माया, लीला, श्रद्धा आदि अत्यंत गंभीर आध्यात्मिक संकल्पनाओं को सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी सहजता से समझता है। अतिविषिष्ट भाषाई विविधता के होते हुए भी इन संकल्पनाओं का एक समान अर्थ पूरे देश में प्रचलित है। लीला को समझाने के लिए महर्षि वेदव्यास को भागवत महापुराण की रचना करनी पडी, जयदेव को गीत गोविंद लिखना पडा और तुलसी को मानस। संभवतः इन्ही सबके सदियो तक किए हुए अनुष्ठान का ही परिणाम है कि आज हमारा पूरा समाज इन गूढ मान्यताओं को सामान्य बोलचाल की भाषा मे अचूक प्रयोग करता है । ऐसे अनेक पद ऐतिहासिक अनुभूतियों से विकसित होते हैं । वे केवल इस भाषा के शब्द नही होते अपितु एक जीवंत व्यावहारिक संकल्पना होते हैं । इन शब्दों का न तो किसी भाषा मे अनुवाद किया जा सकता है और न ही ऐसा प्रयास करने की कोई आवश्यकता है । जैसे लड्डू को विश्व की सभी भाषाओं मे लड्डू ही कहना चाहिए और पिझ्झा को पिझ्झा ही । वैसे ही इन संकल्पनाओं को अनुवाद के बिना जस का तस व्यक्त किया जाना वैचारिक प्रामाणिकता के लिए अनिवार्य है । ब्रिटिश राज के काल में विद्वानो द्वारा इस महत्वपूर्ण तथ्य की अनदेखी की गई । जिस कारण संकल्पनाओं का विकृत, संकुचित और सीमित अर्थ समाज मे प्रचलित हुआ । जिसके फलस्वरूप सामूहिक संभ्रम की स्थिति देश की मेधा में छा गई । राज प्रतिष्ठित विद्वानों द्वारा इन भ्रमित संकल्पनाओं पर आधारित नीतियों पर आधारित कार्य्रक्रमों का चलन हुआ । देश में व्याप्त मानसिक गुलामी का यह सबसे बडा कारण हैं । जिस एक संकल्पना के संकीर्ण व भ्रमित होने के कारण स्वतंत्र भारत मे सर्वाधिक परिणाम हुए हैं, वह है ‘धर्म’ की अवधारणा । धर्म को रिलीजन के पर्यायवाची मान लिए जाने के कारण, सर्वपंथ समभाव को पंथ निरपेक्षता के रूप मे परिभाषित किया जाना, और इस विकृत शब्दरचना के कारण राजकीय व्यवस्थाओं तथा सभी सामुदायिक गतिविधियों से धर्म को प्रयत्नपूर्वक अलग कर दिया गया । शिक्षा में से भी धर्म को अलग करने के प्रयास में सभी संस्कार, सदाचार, नैतिकता आदि अनिवार्य बातें भी हटा दी गई । अब इन सब बातों को लागू करने के लिए मूल्य शिक्षा जैसे अधूरे प्रयास किए जा रहे है । आवश्यकता तो यह है कि धर्म की सही अवधारणा को पुनःप्रस्थापित कर धर्मानुसारी शिक्षा की पुनर्रचना की जाए ।

भारत में धर्म यह एक बहुआयामी संकल्पना है । वास्तव में यह एक जीवन जीने का मार्ग है । पाशविक वासनाओं से उपर उठकर मानवीय संवेदनाओं के अनुरूप जीवन जीना तथा क्रमश: विकसित होते हुए महामानव, देवमानव, दिव्यमानव व अंततः प्रत्यक्ष दिव्यता की अनुभूति यह विकास का मार्ग धर्म है । धर्म केवल व्यक्तिगत आत्मोन्akmनति ही नही अपितु पूरे समाज के ही दिव्यत्व की ओर गति करने का माध्यम बनता है । धर्माधिष्ठित समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपने -अपने स्वभाव के अनुसार जहाॅ हैं उस स्थिती से क्रमशः इस प्रगति की ओर अग्रेसर होता है । समाज जीवन मे धर्म प्रतिष्ठित होने पर प्रत्येक में यह उच्च आकांक्षा स्वतः जन्म लेती है । साथ ही समाज में इस प्रकार के अवसर और मार्गदर्षक दोनो ही उपलब्ध होते हैं । समाज जीवन के सभी अंग धर्मप्राण होते हैं । अतः जो प्रजा को धारण करता है वह ‘धर्म’, ऐसी धर्म की व्याख्या की जाती है । स्वभाव को भी धर्म कहा है । अतः उस स्वभाव के अनुरूप ही मार्ग का चयन करना होता हैं । स्वभाव भी धर्म है और उन्नतिगामी समाज में आपसी संबंध व सामुदायिक जीवन की परंपरायें भी धर्म है । मानव का मानव से, परिवार से, समाज से, सृष्टी से तथा अंत मे परमेष्ठी मे एकात्म संबंध है । इस संबंध को समझकर उसका निर्वाह करना धर्म है । अतः भारत में सामान्य बोलचाल की भाषा मे पुत्रधर्म, पितृधर्म, पत्नीधर्म, पतिधर्म ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता हैं । आपसी संबंधो का निर्वहन कर्म के द्वारा किया जाता हैं । अतः क्या करणीय है ? और क्या अकरणीय है? यह जो बताया है, उसे भी धर्म कहते हैं । उस अर्थ मे धर्म कर्तव्य का परिचायक हैं । ‘राजधर्म’ आदि शब्दों मे ‘राजा के कर्तव्य’ यही भाव प्रकट होता हैं । स्वयं के व सृष्टी के प्रति मनुष्य के कर्तव्य का बोध होने पर धर्म संयम का रूप धारण करता हैं । अतः इसे मर्यादा भी कहा गया है । कर्तव्य, अकर्तव्य के साथ ही भोगने की मर्यादा भी धर्म निर्धारित करता हैं । इन्द्रियों के द्वारा कितना भोग करेंगे? क्या भोगें? व कैसे भोगे? यह बात जिस अलिखित नियम से, संस्कारो के रूप मे सामूहिक मन मेे सुप्रतिष्ठित की जाती हैं उस नियम को भी धर्म कहते हैं । समाज जीवन के नियम धर्माधारित होते हैं । अपेक्षा यह है कि राज सत्ता भी धर्म विधान से ही परिचालित हो । अतः भारत मे न्याय करने हेतु रचित विधिविधान के नियमों को भी धर्म कहा गया । जब इसमें किसी व्याख्या का निर्धारण करना हो तो ‘धर्मसभा’ का आयोजन किया जाता था । अब आधुनिक युग मे कानून, विधि विधान तथा नैतिक अपेक्षा व धर्म विहित कर्तव्य दोनो अलग-अलग हो गये हैं । वास्तव में राजव्यवस्था धर्माधिष्ठित हो तब इन दोनो का भी तादात्म्य ही होता हैं ।

चर अचर सभी वस्तुओं के स्वभाव को धर्म ही कहा जाता हैं । आधुनिक विज्ञान शिक्षा मे भी वस्तुओं के गुणधर्म सिखायें जाते हैं । किसी भी सजीव भूतमात्र अथवा निर्जीव वस्तु का स्वभाव ‘धर्म’ कहलाता है जैसे अग्नि का धर्म है दाहकता, जल का धर्म है प्रवाहित होना । कितने भी छोटे स्थान पर जल को बांध भी दे वह लहरों के रूप प्रवाहित होता हैं । प्रत्येक वस्तु अपने स्वभावधर्म को धारण किए हुए अस्तित्व मे रहती हैं । प्रत्येक मनुष्य भी अपने आप में विशिष्ट स्वभाव का होता है । वह स्वभाव ही उसका स्वधर्म हैं । उसी के अनुसार उसे स्वयं से व अन्यों से संबंधों का निर्वाह करना हैं । यह संबंध भी धर्म द्वारा परिभाषित हैं । सारी सृष्टि ही एक ईश्वर की एकात्म अभिव्यक्ति हैं । अतः उसके प्रत्येक अंग का विशिष्ट स्थान होने के साथ अन्य अंगो के साथ अंगांगी संबंध हैं| जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अंग परस्पर पूरकता के साथ स्वयं के कार्य को करते हुए औरों के सहयोगी बनते हैं उसी प्रकार मनुष्य को परिवार, समाज, सृष्टि व परमेष्टि के साथ समन्वयात्मक संबंध का निर्वाह करना होता है । सृष्टि के इन ईश्वरीय नियमों को ‘धर्म’ कहते हैं । मानव को अपने स्वधर्म का प्रगटीकरण कर्म रूप मे करना होता हैं । उद्देष्यपूर्ण कर्म स्वधर्म होता हैं । स्वधर्माधिष्टित कर्म मानव जीवन को परिपूर्ण बनाता हैं । धर्म केवल तत्व न हो करके प्रत्यक्ष व्यवहार में उतारना पडता है । अतः कहा गया है कि ‘आचार प्रभवो धर्म’ इन इतनी सारी विविध छॅटाओ का एक साथ धारण किए हुए धर्म की संकल्पना इस यज्ञ भूमि मे विकसित हुयी । समय-समय पर लोगों ने इसे अपने जीवन मे उतारकर आदर्श प्रस्तुत किए । विद्वानों ने इसके गुण तत्वों की मीमांसा की । जीवन के विभिन्न आयामों मे धर्म को सुव्यवस्थित रूप से परिभाषित करने का काम शास्त्रों ने किया । सार्वकालिक, शाश्वत तत्वों के रूप मे मनुष्यों ने इसकी पहचान की । मनुमहाराज ने धर्म के दस लक्षण बताए हैं । एक दो भेंदो के साथ यही पंतजली के योगसूत्रों मे परिलक्षित हुए हैं । भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद गीता के सोलहवे अध्याय मे दैवी गुण सम्पद के सोलह गुणों के रूप मे धर्माचरण को स्पष्ट किया हैं ।

समाज जीवन में व्यक्ति को भिन्न-भिन्न भूमिकाओं का निर्वाह करना पडता है । अनेक बार इन विभिन्न भूमिकाओं मे आचरण किए जाने वाले धर्म का आपसी टकराव हो जाता है । ऐसे धर्म संकट में से बाहर निकलने का मार्ग भी शास्त्र बताते हैं । जहाॅ व्यष्टि धर्म समष्टि धर्म के साथ टकराता है, वहाॅ बडी इकाई को महत्व देना साधारण सा नियम है| जब व्यक्ति के ही दो व्यक्तिगत धर्मो के बीच टकराव हो तब शास्त्र कहते हैं कि समाज के अधिकतम हित का ध्यान रखते हुए ज्यादा से ज्यादा लोगों का जिसमे हित हो उस बात को वरीयता दी जाए । इसी प्रकार से एक और वर्गीकरण धर्मपालन की कठोर नियमितता को लेकर शास्त्रों में मिलता है। वह है सामान्य धर्म, विशेष धर्म व आपदधर्म । सामान्य जीवन यापन करते हुए नित्यनियम के रूप मे कुछ कर्तव्यो का समावेष होता है, उसे सामान्य धर्म कहते हैं । यात्रा, बीमारी आदि विशेष परिस्थितियों मे इन नियमों की कठोरता में कुछ मात्रा मे रियायत बरती जाती है उसे विषेष धर्म कहते है । जब प्राणों पर ही संकट आ पडें, उस समय सामान्य रूप से अकरणीय कार्य को करने की अनुमती होती है इसे आपदधर्म कहते है | धर्मपालन के लिए जब देह ही न बचे ऐसी आशंका की परिस्थिती में ही आपदधर्म का अवलंब किया जा सकता है अन्यथा नही ।
इस प्रकार धर्म का अत्यंत व्यावहारिक एवं सूक्ष्म विवेचन भारत मे शास्त्र ग्रंथो में और साथ ही लोक जीवन में भी दिखाई देता है । आज भी हिंदू समाज के अधिकतकम लोग सहज सुलभ परंपरा के रूप मे धर्म का अवलंबन करते हैं । धर्म पालन में त्रुटि के परिणाम स्वरूप जीवन में जो संकट आयेंगे उनका स्पष्ट भान सामान्य भारतीय को परंपरा से प्राप्त हुआ है । अतः धर्म भीरूता के चलते सामान्य व्यक्ति शुद्ध सात्विक एवं प्रामाणिक जीवनयापन करने का प्रयत्न करता है । विदेशी शासन के चले जाने के बाद भी विदेशी तंत्र को ही अपनाए रखने के कारण व्यवस्था में से धर्म लुप्त हो गया हैं । उस कारण चरित्र का संकट शासन तंत्र और उससे जुडी सामूहिक गतिविधियों में दिखाई दे रहा हैं । यह अत्यावश्यक है कि हम अपनी समस्त व्यवस्थाओं को शाश्वत, सनातन धर्मानुसार पुनर्गठित करें । चिरस्थायी सार्वजनिक सुख का यह एकमात्र मार्ग हैं । धर्मराज्य की स्थापना ही सर्वे भवन्तु सुखिनः की वैश्विक प्रार्थना को साकार कर सकती हैं ।

दिसम्बर 23, 2015 Posted by | आलेख | , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

   

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