उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

शिक्षा का अर्थायाम


प्रतिवर्ष शासन द्वारा अपने वार्षिक व्यय का अनुमान (Budget) प्रस्तुत करने पर शिक्षा पर किए जानेवाले व्यय की चर्चा होती है। केंद्र सरकार द्वारा शिक्षा पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद (G.D.P.) के लगभग 4% व्यय किया जाता है। विभिन्न आयोगों द्वारा समय-समय पर यह अनुशंसा की गयी है कि एक संवेदनशील राष्ट्र में शिक्षा व्यय सकल उत्पाद के कम से कम 6% होना चाहिए। भिन्न-भिन्न शैक्षिक संगठनों ने भी समय-समय पर यह मांग की है। भारतीय शिक्षण मंडल ने सकल राष्ट्रीय उत्पाद के अनुपात के स्थान पर शासकीय व्यय के 10% का प्रावधान शिक्षा क्षेत्र में करने की मांग रखी है। यह केंद्रीय व्यय का योगदान है। सभी राज्य शासन तो अपने व्यय का लगभग 20% शिक्षा पर लगाते ही है। दिल्ली, कर्नाटक, महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों का शिक्षा व्यय तो 23% से अधिक है। इस सबके बाद भी शिक्षा में मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ती भी अभी तक नहीं हो पा रही। 20-25 वर्ष पूर्व सरकार ने अपनी असमर्थता को स्वीकार कर नीजी क्षेत्र को शिक्षा में निवेश के लिए आमंत्रित किया। वैधानिक रूप से शिक्षा धर्मार्थ सेवा के रूप में ही दी जा सकती है। शैक्षिक संस्थान लाभकारी उपक्रम (Profit Making Enterprise) नहीं हो सकते। किंतु वास्तव में भारत जैसे देशों में शिक्षा एक आकर्षक उद्योग बनता जा रहा है। जमीन, वस्त्र आदि उद्योगों में चुनौतियाँ बढ़ने के बाद अनेक उद्योजकों ने अपने कारखानों तथा व्यापारी संस्थानों को अभियांत्रिकी महाविद्यालयों जैसे व्यावसायिक शिक्षा संस्थानों में परिवर्तित कर दिया। इसे शीघ्र लाभ का साधन माना जाने लगा। वैधानिक लाभप्राप्ति की व्यवस्था न होने के कारण शिक्षा के व्यापारीकरण हेतु अनेक अनैतिक कुरीतियों का जन्म हुआ।

शासन के शिक्षा व्यय का एक बहुत बड़ा हिस्सा, कुछ-कुछ राज्यों में तो 90% से अधिक हिस्सा शिक्षकों के वेतन पर लगाना पड़ता है। विभिन्न वेतन आयोगों ने सरकारी शिक्षकों की आमदनी में अच्छी वृद्धि की है। किंतु सरकारें इस बोझ के कारण शैक्षिक विकास की अन्य सभी गतिविधियों में कटौती करने पर विवश है। नए भवनों का निर्माण, ग्रंथालय, प्रयोगशाला, अत्याधुनिक शिक्षा साधन आदि के लिए अनुदान लगभग बंद हो गया है। सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत माध्यान्ह भोजन, गरीब छात्रों के लिए निःशुल्क गणवेश, पाठ्यसामग्री तथा बालिकाओं के लिए साइकिल आदि का प्रावधान किया गया। गत दो दशकों से हुए इन प्रयासों का सुखद परिणाम शालेय शिक्षा में पंजीयन बढ़ने में हुआ। सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्राथमिक शिक्षा का सकल प्रवेश अनुपात [Gross Enrollment Ratio (G.E.R.)] 95% हो गया है। कुछ राज्यों में तो यह 100% हो गया है। इसका अर्थ है कि भारत में जन्म लेनेवाले 6 वर्ष तक की आयु के 100 में से 95 बालक शाला में प्रवेश ले रहे हैं। सर्वशिक्षा अभियान की योजनाओं का 70% अनुदान केंद्र सरकार देती है। बाकि 30% की व्यवस्था राज्य शासन को करनी होती है। पूर्वोत्तर तथा जम्मू कश्मीर के अविकसित राज्यों हेतु 90% अनुदान केंद्र शासन का होता है। इन सब बातों से भी शिक्षा व्यय में वृद्धि हुई है। किंतु शिक्षा की गुणवत्ता पर इसका बहुत अधिक प्रभाव नहीं दिखाई देता है। उच्च शिक्षा में होनेवाला व्यय भी बढ़ाया गया है।

इस सबके बाद भी शालेय शिक्षा में नीजी संस्थाओं की भागीदारी बढ़ रही है। एक अनुमान के अनुसार 46% शालेय विद्यार्थी नीजी संस्थानों में अध्ययनरत है। उच्च शिक्षा में छात्र संख्या में नीजी संस्थाओं की भागीदारी 30% से कम है। किंतु महाविद्यालयों की संख्या में यह अनुपात 50% के लगभग हो गया है। नीतिनिर्धारकों एवं अधिकारियों में कुछ का मानना है कि नीजी क्षेत्र के बढ़ने से ही ‘सबको शिक्षा’ का लक्ष्य प्राप्त हो सकेगा। अतः योजनाओं में उसी प्रकार के प्रावधान गत दस वर्षों से किए जा रहे हैं। अनुभवी शिक्षाविदों एवं शिक्षा जगत में कार्यरत कार्यकर्ताओं का अनुभव है कि नीजी क्षेत्र के बढ़ने से व्यापारीकरण बढ़ेगा और समाज के बड़े वर्ग की पहुँच से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बाहर हो जाएगी।

शिक्षा के अर्थायाम पर विचार करते समय शैक्षिक दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। हम शिक्षा के उद्देश्य को किस दृष्टि से देखते हैं इस बात पर निर्भर करेगा कि शिक्षा का दायित्व किसपर है। शासकीय शिक्षा में शिक्षा के व्यय का भार शासन वहन करता है जबकि नीजी क्षेत्र में यह बोझ छात्रों अर्थात उनके अभिभावकों पर डाला जाता है। यदि शिक्षा को हम व्यक्ति के विकास के माध्यम से ही देखते हैं, और वह विकास भी केवल भौतिक स्तर पर ही समझा जाता है तब तो यह तर्क ठीक बैठता है कि सभी को अपनी-अपनी शिक्षा पर होने वाले व्यय का भार उठाना चाहिए। यदि अभिभावक सक्षम हो तो वे अपनी क्षमता के अनुसार महँगी से महँगी शिक्षा अपने बालकों को उपलब्ध कराएं। शिक्षा ऋण (Education loan) के पीछे भी यही दृष्टि है। जहाँ अभिभावक आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है वहां स्वयं छात्रों को शिक्षा ऋण उपलब्ध करा दिया जाएं ताकि वे अपने मन के अनुसार शिक्षा खरीद सकें। ऐसी शिक्षा प्राप्त कर रोजगार मिलने के बाद छात्र अपने ऋण का भुगतान करें। गत दो दशकों से यह विचार प्रभावी होता जा रहा है। विलासितापूर्ण नीजी शिक्षा संस्थानों में लाखों रुपये शुल्क का भुगतान करने के लिए तैयार अभिभावक बढ़ रहे हैं। दूसरी ओर शिक्षा ऋण की संख्या एवं राशि में भी प्रतिवर्ष कई गुना वृद्धि हो रही है। इन दोनों पद्धतियों में छात्र और अभिभावक ग्राहक अथवा उपभोगता की भूमिका में आ जाते हैं और शिक्षा संस्थान व्यापारी अथवा सेवा प्रदाता (Service Provider) बन जाते हैं। ऐसे विद्यालयों में अभिभावक शिक्षक बैठक (PTM) ग्राहक-नौकर संवाद में बदलती जा रही है। ‘जब हम इतना शुल्क दे रहे हैं तो क्या इतनी भी अपेक्षा नहीं कर सकते?’, ‘हम इतने सारे पैसे देकर बच्चों को स्कूल भेज रहे हैं, अब उन्हें पढ़ाना आपकी जिम्मेदारी है।’ जैसे वाक्य बच्चों की माताओं द्वारा शिक्षकों को कहा जाना सामान्य बात हो गयी है।

भारत में शिक्षा की यही दृष्टि नहीं है। केवल परंपरागत भारतीय शिक्षण की ही बात नहीं है अपितु भारत के संविधान में भी शिक्षा को व्यापार की वस्तु मानने का विरोध है। अनिवार्य तथा निःशुल्क मूलभूत (Elementary) शिक्षा को प्रारंभ में संविधान निर्माताओं ने राज्यों के निदेशक तत्वों में रखा और अपेक्षा की कि शीघ्रातिशीघ्र इसे वैधानिक रूप प्रदान किया जाएं। 86वे संविधान संशोधन इ. स. 2002 द्वारा शिक्षा को मौलिक अधिकार का स्थान दिया गया और तत्पश्चात इ. स. 2009 में ‘शिक्षा के अधिकार अधिनियम’ (RTE) द्वारा 6 से 14 वर्ष के प्रत्येक बालक की मूलभूत शिक्षा (8वी तक) अनिवार्य कर दी गयी। अब ये माता-पिता का विकल्प नहीं रहा कि वे बच्चों को पढ़ाएं या न पढ़ाएं। अनिवार्यता के साथ निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान भी आवश्यक था। यदि शिक्षा व्यापारिक सेवा मानी जाये तो उसे अनिवार्य नहीं किया जा सकता। यदि शिक्षा का उद्देश व्यक्तिगत विकास एवं रोजगार तक सीमित हो और इस कारण उसे व्यक्ति अथवा परिवार की जिम्मेवारी माना जाएं तो फिर शिक्षा ग्रहण न करने का विकल्प भी खुला रखना पड़ेगा। मूलभूत शिक्षा की अनिवार्यता यह सिद्ध करती है कि भारत का संविधान शिक्षा को व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक दायित्व मानता है। विधान की विवशता है कि वह समाज को अपने दायित्व के लिए बाध्य नहीं कर सकता। अतः निःशुल्क शिक्षा का भार राज्य पर डाला गया है। भारत के संविधान में मौलिक अधिकार तो विधि द्वारा संरक्षित है। अतः राज्य का दायित्व बनता है कि इनकी रक्षा का उचित प्रबंध करें। किंतु दूसरी ओर संविधान में सूचीबद्ध किये गए मौलिक कर्तव्य निदेशक तत्वों (directive principles) के रूप में है, अतः बाध्यकारी नहीं हैं। शिक्षा के अधिकार अधिनियम ने मूलभूत शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाकर अभिभावकों को बाध्य कर दिया है और आर्थिक क्षमता के प्रश्न को निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए राज्य को बाध्य कर सुलझाया गया है।

परंपरागत रूप से भारत में शिक्षा को व्यक्तिगत अधिकार, आवश्यकता अथवा विकास का साधन नहीं माना गया। अपनी अगली पीढ़ी को स्वयं से सवाई (125% विकसित) बनाने हेतु समाज के सामूहिक दायित्व के रूप में शिक्षा को देखा गया है। समाज की आवश्यकता है कि उसका प्रत्येक घटक केवल सुशिक्षित ही नहीं अपितु सुसंस्कारित बनें। अतः यह समाज का कर्तव्य बनता है कि वह इसकी समुचित व्यवस्था करें। ज्ञात प्राचीनतम इतिहास से ही भारत में शिक्षा निःशुल्क रही है। शिक्षा को न तो व्यापार बनाया गया और न ही सरकार के अनुदान पर आश्रित रखा गया। भारत में शिक्षा सच्चे अर्थों में स्वायत्त एवं समाजपोषित रही है। आर्थिक स्वावलंबन के बिना शैक्षिक व प्रशासकीय स्वायत्तता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। अतः भारत में शिक्षा की समाजपोषित व्यवस्था प्रयत्नपूर्वक विकसित की गयी। सब कालखंडों में सर्वत्र एक सी व्यवस्था नहीं थी किंतु जो भी विविध प्रकार की व्यवस्था विकसित की गयी उसमें स्वावलंबन समाज का आधार तथा शासन एवं समाज निरपेक्षता को ध्यान में रखा गया। वैसे ही गुरुकुल शिक्षा में आवश्यकताएं कम करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। अतः गुरुकुल की अपनी आवश्यकताएं भी न्यूनतम हुआ करती थी।

साधारणतः तीन प्रकार के शिक्षा संस्थान भारत में कार्यरत रहे हैं। आवासीय गुरुकुल नगर, गांव से दूर वन में हुआ करते थे। इनमें बड़ी संख्या में छात्रों एवं आचार्यों के निवास, अन्य शैक्षिक गतिविधियों के लिए अध्ययनशाला, गोशाला, यज्ञशाला, पाकशाला, प्रयोगशालाएं भी हुआ करती थी। छात्रों के अनुपात में इन सभी छात्रावासों एवं शालाओं की भी आवश्यकता पड़ती थी। इस सबके साथ ही कृषि भूमि भी गुरुकुलों से जुड़ी हुई थी। छात्र एवं आचार्य कृषि और गोपालन का कार्य साथ मिलकर करते थे। अतः भोजनादि की व्यवस्था इन्हीं में से हो जाती थी। वस्त्र निर्माण का कार्य भी अध्ययन का अंग होता था। अतः छात्रों की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ती व्यावहारिक अध्ययन के लिए किए गए कार्यों से हो जाती थी। भूमि एवं गायें समाज से दान में प्राप्त होती थी। अधिकतर निर्माण सामग्री प्राकृतिक ही होने के कारण वन से ही उनकी आपूर्ति हो जाती थी। मध्यकाल में बड़े-बड़े भवनों का निर्माण नालंदा, तक्षशिला आदि गुरुकुलों में हुआ था। उसमें समाज के धनिक वर्ग का दान लगा हुआ होगा। राजा भी इन बड़े गुरुकुलों के निर्माण में योगदान करते थे। किंतु वह दान दक्षिणा के रूप में होता था। राज्य द्वारा थोपी गयी विविध बाध्यताओं से बंधा अनुदान गुरुकुल स्वीकार नहीं करते थे। देश के कुछ भागों में बड़े-बड़े गुरुकुलों के संचालन हेतु राजाओं द्वारा गुरुकुलों को कुछ ग्रामों के अभिलेख (पट्टे) प्रदान किए जाने के प्रमाण उपलब्ध हैं। इन गांवों से प्राप्त कर राजा के पास नहीं, गुरुकुलों के पास जमा होता था। इस व्यवस्था में भी राजा का हस्तक्षेप नहीं होता था। एक बार अभिलेख प्रदान हो जाने के बाद गांवों की पंचायत व्यवस्था का दायित्व होता था कि सुव्यवस्थित कर-संग्रहण कर गुरुकुलों को उपलब्ध कराया जाएं। इस प्रकार स्वायत्तता से गुरुकुलों की आर्थिक व्यवस्था हो जाती थी। अध्ययनकाल के कुछ निश्चित समय में भिक्षा-भोजन अथवा माधुकरी अनिवार्य थी। पाँच घरों में भिक्षा मांगने से न केवल छात्रों के अहंकार का विसर्जन होकर उनके व्यक्तित्व का विकास होता था अपितु साथ ही सारे गुरुकुल का भोजन भी समाज के आधार पर हो जाता था।

भारतीय शिक्षा व्यवस्था की आर्थिक स्वायत्तता का सबसे बड़ा माध्यम गुरुदक्षिणा थी, जो छात्र अपने गुरुओं के प्रति स्वेच्छा से अर्पण करते थे। हम पुराणों में और अन्य इतिहास ग्रंथों में विलक्षण गुरुदक्षिणा के अनेक प्रसंग पाते हैं। किंतु, यह तो अपवादात्मक घटनाएं हैं। सब गुरूदक्षिणा इस प्रकार की नहीं थी।

गुरु पूर्णिमा के दिन प्रवेश करते समय छात्र अपने हाथ में केवल समिधा लेकर – समित्पाणि हो गुरु को स्वयं अर्पित हो जाता था। हाथ में धारण की गई समिधा उसके मन का प्रतीक थी कि ‘जिस प्रकार यह समिधा यज्ञ में अर्पित होकर स्वाहा हो जाएगी, उसी प्रकार मैं आपके चरणों में न-मन करते हुए अपने मन को आप को सौंप रहा हूं। अब आप इसे जीवन योग्य बनाइए।’ न्यूनतम 12 वर्ष की शिक्षा के बाद छात्र स्नातक होता था। यह समय सबके लिए निर्धारित नहीं था किंतु सामान्यतः इतना समय लगता था। कोई अलौकिक छात्र हो तो कम समय में भी योग्य हो जाता था। जैसा कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने मात्र 2 वर्ष गुरु सांदीपनि के आश्रम में रहकर 64 कलाओं और 14 विद्याओं का अध्ययन कर लिया। दूसरी ओर उत्तंक का उदाहरण है जिन्हें आयु के 40 वर्ष तक यानी लगभग 30-32 वर्ष गुरुकुल में रहना पड़ा। यह अपवाद हैं। सामान्यतः 12 वर्ष में शिक्षा पूर्ण हो जाती थी।

इसके पश्चात छात्र समाज में अपना योगदान करने के लिए तैयार होता था और गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता था। गुरु को दी जाने वाली दक्षिणा जीवनपर्यंत देनी है क्योंकि गुरु ने जीवन की शिक्षा दी है। अतः अपनी कमाई में से दशांश गुरु को भेजने की परंपरा भारत में थी। सभी छात्र इस परंपरा का कर्तव्य मानकर पालन करते थे। चाहे राजा का पुत्र हो अथवा कोई गरीब किसान, अपनी आजीविका चलाने के लिए कष्ट से प्राप्त किए धन में से दसवां हिस्सा अपने गुरुकुल, पाठशाला अथवा गुरु को भेजता था। सभी शिष्यों से प्राप्त यह राशि गुरुकुल संचालन हेतु पर्याप्त होती थी। अतः किसी भी नए गुरुकुल को प्रथम 12 वर्ष ही अपने आर्थिक भार हेतु व्यवस्था करनी पड़ती थी। समाज में दान भिक्षा मांगनी पड़ती थी। 12 वर्ष बाद तो पूर्व छात्र ही गुरुकुल को संभाल लेते थे। यह अत्यंत स्वावलंबी व्यवस्था थी। इसके कारण आक्रमण काल में सत्ता विदेशी विधर्मियों के हाथ में चले जाने के बावजूद भारत में गुरुकुल जीवंत रहे।

आज जब हम गुरुकुल शिक्षा की पुनःप्रतिष्ठा की बात करते हैं तो केवल फिर एक बार अधिकाधिक गुरुकुलों से भारत में सभी को शिक्षा प्रदान करना इतना ही उसका अर्थ नहीं है। साथ ही वर्तमान व्यवस्था में भी गुरुकुल के कुछ तत्वों का समावेश अत्यावश्यक है। इन तत्वों में से गुरुकुल का अर्थायाम सबसे पहले लागू किया जा सकता है। यदि हमारी शिक्षा व्यवस्था से निकले हुए छात्र अपना कर्तव्य समझकर अपनी आय का कुछ निश्चित हिस्सा अपने शिक्षा संस्थानों को भेजना प्रारंभ कर दें तो सारे विद्यालय, महाविद्यालय यहां तक कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान IIT जैसे बड़े-बड़े शैक्षिक संस्थान भी स्वावलंबी बन सकते हैं। पूरी तरह से इस व्यवस्था का अभी परीक्षण किया जाना बाकी है किंतु कुछ अंशों में इसका प्रयोग सेवाभावी संस्थाओं में हो रहा है। अभी यह स्वैच्छिक है। विद्या भारती, रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन जैसे संगठनों में पढ़े हुए छात्र अपनी श्रद्धा से अपने पूर्व विद्यालय को दान देते रहते हैं। राजस्थान में भामाशाह योजना के अंतर्गत शासकीय विद्यालयों में भी समाज के योगदान को प्रारंभ किया गया। इसके चमत्कारिक परिणाम सामने आए। पाली जिले में विद्यालयों, महाविद्यालयों के भवन तक समाज ने निर्माण किए।

यदि इसे परंपरा का रूप दे दिया जाए और सभी पूर्व छात्र एक निश्चित राशि प्रतिमाह भेजने लगे तो और किसी संसाधन की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। सारी शिक्षा निःशुल्क दी जा सकेगी। जो छात्र निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करेगा वह इस कर्तव्य का पालन और अधिक श्रद्धा से करेगा। वर्तमान में चल रहे व्यापारिक शिक्षा संस्थानों से निकले हुए छात्रों में यह श्रद्धा नहीं दिखाई देती क्योंकि उनके मन में ग्राहक बोध है। उन्हें लगता है कि हमारी शिक्षा का पूरा व्यय हमारे माता-पिता ने ही वहन किया। अब हमें इसे वापस कमाना है। इस भाव के कारण वह अपने व्यवसाय में भी येन केन प्रकारेण कमाने में ही विश्वास रखता है। यदि सभी प्रकार की शिक्षा निःशुल्क हो जाए तो अपने विद्यालय, महाविद्यालय के प्रति ऋण से उऋण होने का भाव छात्रों में रहेगा। पूर्व छात्र श्रद्धा से अपने शिक्षा संस्थानों का योगक्षेम वहन करेंगे। केवल इतना ही नहीं, सेवाभाव से प्राप्त शिक्षा के कारण उनके व्यावसायिक जीवन में भी वही सेवाभाव प्रधान होगा। कहते हैं ना, जो बीज बोएंगे फसल उसी की काटी जाएगी। शिक्षा में यदि हम व्यापार का बीज बोएंगे तो हमारे छात्र बड़े होकर उसी प्रकार की व्यावसायिकता का आचरण करेंगे। यदि शिक्षा सेवाभाव से प्रदान की जाएगी तो उससे तैयार छात्र भी अपने जीवन के प्रत्येक कार्य को सेवाभाव से ही करेंगे। अतः शिक्षा का अर्थायाम केवल आर्थिक विषय ना होकर शिक्षा में नैतिकता का भी विषय बन जाता है। सरकार-निरपेक्ष और व्यापार-निरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था ही वास्तविकता में स्वावलंबी, नैतिक, धर्मानुसारी शिक्षा है।

भारत माता को पुनः एक बार विश्वगुरु के पद पर आसीन करने के लिए आइए हम इस अर्थायाम को स्वयं से प्रारंभ करें। हम चाहे जिस शिक्षा संस्थान में पढ़े हो सरकारी, निजी अथवा सेवाभावी, अपने जीवन में कमाई का निश्चित अंश देना प्रारंभ करें। यह निश्चित है कि आज की व्यवस्था में तुरंत दशांश प्रदान करना प्रारंभ नहीं होगा। किंतु 2% से प्रारंभ किया जा सकता है। धीरे धीरे बढ़ते हुए 5% तक भी ले गए तो शासन को किसी प्रकार की आर्थिक व्यवस्था नहीं करनी पड़ेगी और ना ही शिक्षा संस्थानों को व्यापार करना पड़ेगा।

‘जीवन में हमने जो पाया है उससे अधिक हम प्रदान कर सकें’ यही मनुष्य होने का लक्षण है। अतः, बिना किसी तर्क-कुतर्क हम अपने विद्यालय को, जिसके कारण आज हम बने हैं, उसे आंशिक गुरु दक्षिणा देना प्रारंभ करें। यही गुरुकुल की पुनः स्थापना का स्थायी मार्ग है।

दिसम्बर 8, 2018 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

धर्मानुसारी शिक्षा की स्थापना में शिक्षकों की भूमिका


Ruprekhaमानव की पहचान संबंधों से है | बिना संबंधों के मनुष्य का कोई परिचय ही नहीं है | समस्त सृष्टि के अन्तर्निहित एकत्व का सुप्त ज्ञान मानव मन को अनंत विस्तार हेतु प्रेरित करता है | प्रकटतः भले ही हम स्वयं को सबसे अलग मानते है फिर भी अंतर्मन में इस बात का भान सदैव रहता है कि हम उस एक ईश्वरीय चेतना के अंग है | इस अनुभूति के कारण ही मनुष्य सदैव अपनी चेतना का विस्तार करने का प्रयत्न करता है | इसीलिए मानव को सामाजिक प्राणी भी कहते है | यह सामाजिकता मनुष्यता का महत्वपूर्ण अंग है किंतु सृष्टि के सम्बन्ध केवल मानव समाज तक ही सीमित नहीं है | इसके तंतु सर्वव्यापी है | मानव का मानव से, मानव का समाज से, मानव का अन्य प्राणियों से, सृष्टि से, समूचे ब्रम्हांड से तथा अंततोगत्वा परमात्मा से जो सम्बन्ध है, उन संबंधों के निर्वहन को धर्म कहते है | इस पूरे अस्तित्व को जिन अन्तर्निहित नियमों द्वारा धारण किया गया है उसी को धर्म कहते है | यही धर्म व्यवहार में भी अपेक्षित है | धर्मानुसारी शिक्षा का अर्थ है प्रत्येक को इस धर्म की अनुभूती कराना तथा उसपर आधारित व्यवहार का प्रशिक्षण प्रदान करना |

वर्तमान समय में धर्मसंकल्पना का अर्थ स्पष्ट न होने के कारण पूरी शिक्षा ही धर्मविहीन हो गयी है| उपासना के रूप में धर्म का सीमित अर्थ प्रचलित होने के कारण उसे भेद का मूल मान लिया | परिणामतः धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धर्म के समग्र रूप को ही व्यवहार से बाहर कर दिया | धर्मानुसारी शिक्षा तो क्या, शिक्षा में धर्म के अंतर्भाव की भी कल्पना वर्तमान वातावरण में नहीं कर सकते | ऐसी स्थिति में से धर्मानुसारी शिक्षा के आदर्श तक पहुँचने हेतु जिन महत्प्रयासों की आवश्यकता है उनमें शिक्षकों की भूमिका सर्वोपरि है | शिक्षक ही शिक्षा की धुरी है | चाहे जैसी भी व्यवस्था हो, शिक्षक के बिना शिक्षा की कल्पना ही नहीं कर सकते | व्यवस्था चाहे जितने भी निर्बंध लगा ले, कक्षाकक्ष में पढ़ाते समय विधि एवं व्यवहार की स्वतंत्रता को कोई छीन नहीं सकता | शिक्षक यदि अपने इस स्वातंत्र्य का समुचित उपयोग करे तो शिक्षा व्यवस्था के पुनरुत्थान में चमत्कार संभव है | वैसे भी धर्म आचरण से ही संभव है और आचरण का प्रशिक्षण किसी पाठ्यक्रम की अपेक्षा व्यावहारिकता से अधिक दिया जा सकता है | अतः यदि शिक्षक अपनी भूमिका का धर्म के अनुसार निर्वहन करने लगे तो वर्तमान व्यवस्था में भी धर्मानुसारी शिक्षा प्रदान करना संभव है | २ से ३ प्रतिशत शिक्षकों के दृष्टिकोण में सम्यक परिवर्तन आ जाये तो व्यवस्था परिवर्तन भी प्रारंभ हो जायेगा | व्यवस्था परिवर्तन के २ मार्ग है | क्रान्ति के मार्ग से व्यवस्था को एक झटके में बदला जाता है | किंतु इस पद्धति में परिवर्तन का आधार राजतंत्र होता है जोकि अपनेआप में धर्मानुसारी शिक्षा के सिद्धांतों के विपरीत है | क्रान्ति में परिवर्तन ऊपर से नीचे की ओर होता है | परिवर्तन का दूसरा मार्ग सहज, स्वाभाविक, क्रमशः होनेवाला परिवर्तन है | परिवर्तन संसार का स्थायी स्वभाव है | संसरति इति संसारः | अतः समाज में स्वतः होनेवाले परिवर्तनों के साथ शिक्षा में भी क्रमशः परिवर्तन होता है | इसे उत्क्रांति मार्ग कहते है | वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अनियंत्रित परिवर्तन पतन की ओर ही जाता है | भौतिक शास्त्र में इसे Entropy (परिक्षय) का सिद्धांत कहते है | क्रांति में प्रस्थापित व्यवस्था का ध्वंस निहित है | १८३५ में मैकोले ने यही किया था | सकारात्मक शिक्षा की प्रस्थापना हेतु क्रांतिकारी परिवर्तन कितना भी आकर्षक लगे, अत्यंत कठिन है | एक तो ऐसे परिवर्तन हेतु आवश्यक सम्पूर्ण सैद्धांतिक स्पष्टता तथा उसे व्यवहार में उतारनेवाले प्रशिक्षित आचार्य एक साथ एक समय इतनी बड़ी संख्या में तैयार करना तथा इस व्यवस्था को स्थापित करने हेतु अनुकूल राजतंत्र का उपलब्ध होना, दोनों ही बातें दुष्प्राप्य है | यदि महत्प्रयास से धर्मसत्ता आदर्श आचार्यों को तथा राजसत्ता राजनैतिक इच्छाशक्ति को प्राप्त भी कर ले तब भी अचानक व्यवस्था परिवर्तन समाज में सांस्कृतिक क्षोभ (cultural shock) उत्पन्न करेगा | दूरस्थ वनवासी क्षेत्रों में अचानक आधुनिक शिक्षा को प्रस्थापित करने से ऐसा विक्षोभ देखने में आता है | ऐसे सामूहिक विक्षोभ की स्थिति में अधिकतर समय समाज अच्छी बातों को भी नकार देता है |

उत्क्रांति का पथ सहज, स्वाभाविक व नैसर्गिक है | किंतु फिर भी उसमें विकास के स्थान पर पतन की ही अधिक संभावना है | प्रयत्नपूर्वक धर्मानुसारी शिक्षा की chanakyaस्थापना हेतु आवश्यक परिवर्तन करना यह मार्ग ना तो अचानक झटके से की हुई क्रान्ति हो सकता है और ना ही अत्यंत धीमी गति से होनेवाली उत्क्रांति | जिस मार्ग का अवलंबन धर्मसंस्थापना के लिए किया जाना अपेक्षित है उसे सम्यक क्रान्ति कहा जा सकता है | संस्कृत में इसे यदि एक शब्द में कहना हो तो कहेंगे ‘संक्रांति’ | संक्रांति में परिवर्तन क्रमशः व नैसर्गिक है किंतु परिवर्तन की गति व दिशा सुनियोजित होगी | क्रमशः उत्थान करते हुए अंतिम आदर्श को प्राप्त किया जायेगा | यही भारतीय पद्धति है | संक्रांति में क्रान्ति की तरह विस्फोट नहीं है और ना ही उत्क्रांति की तरह पतन | जो-जो जिस-जिस स्तर पर है वही से क्रमशः उत्थान की ओर अग्रसर हो यही संक्रांति का मार्ग है | धर्मसंस्थापना की यही शाश्वत विधि है |

शिक्षा में संक्रांति की आधारशिला शिक्षक ही होंगे | संक्रांति में चूंकि परिवर्तन बाहर से थोपा नहीं जाता अपितु अन्दर से ही किया जाता है | अतः यह हमेशा मानव-केन्द्रित होगा, व्यवस्थानुगत नहीं हो सकता | शिक्षक धर्मानुसारी शिक्षा की संकल्पना को अर्थात धर्म की सुस्पष्ट संकल्पना को हृदयंगम करे | इसीसे शिक्षा में संक्रान्ति प्रारम्भ होगी | इस धर्म को अपने व्यक्तिगत जीवन में आचरण से प्रारम्भ करना होगा | धीरे-धीरे अध्ययन, अध्यापन व शिष्यों के साथ व्यवहार में धर्म का प्रभाव प्रारम्भ होगा | शिक्षक के कक्षा में धर्माचरण प्रारम्भ करने से सकारात्मक परिवर्तन दृष्टिगोचर होंगे | किसी भी शैक्षिक संस्थान में यदि १० प्रतिशत शिक्षक धर्माचरण करनेवाले हो जाये तो प्रयत्नपूर्वक उस शिक्षा संस्थान को धर्मानुसारी शिक्षा के आदर्श के रूप में प्रस्थापित किया जा सकता है | जब इन शिक्षा संस्थानों से समाज के सभी क्षेत्रों में सर्वोत्तम व्यक्तित्व प्रदान किये जायेंगे तब सारा समाज इन शिक्षा संस्थानों का अनुसरण करने लगेगा | परिवर्तन का धर्मानुसारी मार्ग यही है |

संक्रांति का प्रारम्भ शिक्षकों के सुगठन हेतु आयोजन करने से होगा | आचार्य निर्माण की यह प्रक्रिया बाहरी प्रशिक्षण से नहीं अपितु अंदरूनी स्वाध्याय से ही संभव है | धर्मसंस्थापना की प्रेरणा से उद्दीपित आचार्य एकत्रित आकर धर्म को समझने हेतु अध्ययन, विमर्श, मनन, चिंतन करेंगे तब उसे स्वाध्याय कहा जायेगा | इस स्वाध्याय का मूल आधार तो शास्त्र ग्रन्थ ही हो सकते है | किंतु साथ ही शास्त्रीय सिद्धांतों की युगानुकुल अभिव्यक्ति को भी स्वाध्याय का आधार बनाना होगा | धर्म के तत्व को हृदयंगम करना स्वाध्याय का प्रथम चरण है | इसका अगला चरण धर्मावलंबन के व्यावहारिक आयामों का सृजन है | कुछ दो, चार, दस या पचास लोग भी कुछ विधियों की सूचि बनाकर सारे अध्यापकों को दे देंगे तो काम नहीं चलेगा | धर्मावलंबन की विधियों का सृजन प्रत्येक को अपनी प्रतिभा का समुचित उपयोग करते हुए करना होगा | यह सृजन प्रक्रिया प्रत्येक के लिए स्वतंत्र होते हुए भी व्यक्तिगत नहीं हो सकती | धर्म का मर्म सामूहिक क्रिया में है | अतः स्वाध्याय भी सामूहिक ही करना पड़ेगा | चिंतन मनन द्वारा समझे हुए तत्व को व्यवहार में उतारने का नाम है निदिध्यासन | इसी से स्वाध्याय परिपूर्ण होगा | स्वाध्यायी आचार्यों के नियमित मंडल सर्वत्र प्रारम्भ करने होंगे | प्रयत्नपूर्वक पूरे समाज में इस योजना को क्रियान्वित करना होगा |

स्वाध्याय से प्राप्त विधियों को अपने-अपने अध्यापन में प्रयोग कर परिष्कृत किया जायेगा | ऐसे कुछ शिक्षक साथ मिलकर या तो पूर्व से चल रहे शिक्षा संस्थान को आदर्श बनायेंगे अथवा नूतन पूर्णतः धर्मानुसारी शिक्षा संस्थानों का निर्माण करेंगे | इनके प्रभाव से नीतियों में भी परिवर्तन होगा | प्रारम्भ में केवल इतना भी हो जाये कि राजसत्ता ऐसे पूर्णतः निःस्वार्थ भाव से चलनेवाले गैर-वाणिज्यिक धार्मिक शिक्षा संस्थानों को स्वतंत्रता से कार्य करने दे, किसी भी प्रकार का नीतिगत हस्तक्षेप ना करने दे तो भी पर्याप्त है | ऐसे समाजपोषित शिक्षा संस्थान क्रमशः प्रमुखता प्राप्त करते जायेंगे व शासनमुक्त शिक्षा व्यवस्था का विकास करेंगे |

Saraswati-Statue-to-Washingtonइस पूरी प्रक्रिया में शैक्षिक संगठनों की भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है | इस हेतु शैक्षिक संगठनों के कार्यकर्ताओं का मानस धर्मसंकल्पना के प्रति दृढ़ करना होगा | वर्तमान में देश में भारतीय दृष्टी को ध्यान में रखकर काम करनेवाले तीन प्रकार के शैक्षिक संगठन कार्यरत हैं | कुछ संगठन शिक्षा संस्थानों का संचालन करते हैं | निःस्वार्थ सेवा भाव से राष्ट्रनिर्माण हेतु चरित्र निर्माण करनेवाली संस्कारवान शिक्षा प्रदान करनेवाले कई शैक्षिक संगठन हैं | संख्या की दृष्टी से विद्याभारती इनमें अग्रणी है | रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन, भारत सेवक समाज, सर्वोदयी विचारधारा से चलनेवाले संगठन आदि अनेक संगठन इस श्रेणी में आते हैं | यद्यपि इन शिक्षा संगठनों द्वारा चलाये जानेवाले शिक्षा संस्थान आधुनिक व्यवस्था का अंग होने के कारण पूर्णतः भारतीय नहीं है | फिर भी इन संगठनों का संचालन करनेवाले कार्यकर्ताओं की मंशा धर्माधिष्ठित भारतीय पद्धति को स्थापित करने के लिए अनुकूल है | धर्मदृष्टि को समझने से इन शिक्षा संस्थानों के शिक्षकों द्वारा संक्रांति होना तुलनात्मक रूप से अधिक सुकर होगा |

दूसरे प्रकार के संगठन शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न घटकों के हितों की रक्षा हेतु काम करते हैं | विद्यार्थियों के हितों के लिए विद्यार्थी संगठन जैसे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षकों के हितों के लिए विभिन्न राज्यों में गठित शिक्षक संघ तथा कई राज्यों में निजी संस्थाचालकों के संगठन भी हैं | इस प्रकार के शैक्षिक संगठन प्रमुखतः अपने सदस्यों के अधिकारों, आर्थिक हितों तथा समस्याओं के समाधान हेतु आन्दोलन शासन से चर्चा अथवा न्यायालयीन दावों के माध्यम से कार्य करते हैं | इन संगठनों का मूल स्वभाव सदस्यों की स्वार्थपूर्ति होने के कारण इनमें जुडनेवालों के मन में भी निजी हितों की वरीयता अधिक होती हैं | इसका सकारात्मक परिणाम यह है कि इन संगठनों की सदस्य संख्या बहुत अधिक होती है | यह संख्याबल इनकी प्राथमिक शक्ति है | धर्मानुसारी शिक्षा के तत्वों का प्रचार कर अनुकूल वातावरण निर्मिती में ये संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं | इनके माध्यम से शिक्षा में जुड़े हुए एक बड़े वर्ग तक वैचारिक सन्देश पहुंचाना संभव हो सकता है | यद्यपि इसका सैद्धांतिक गुणांकन नहीं होगा फिर भी धर्माचरण में रत शिक्षकों को नैतिक समर्थन देनेवाले अनुकूल मन के समर्थकों का वर्ग तैयार किया जा सकता है | ये लोग स्वाध्याय और संक्रांति के क्रियान्वयन में पूरी तरह से सहभागी भले ही न हो उसके लिए पोषक उर्वराभूमि का निर्माण निश्चित रूप से कर सकते हैं | संक्रांति के द्वितीय चरण धर्माधिष्ठित शिक्षा के सर्वव्यापीकरण में लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत संख्या का भी बड़ा महत्त्व है | इस चरण में इन शैक्षिक संगठनों की भूमिका सबसे प्रभावी होगी | इन संगठनों में धर्मानुसारी शिक्षा के विचार का बीजारोपण करने हेतु कुछ वैचारिक कार्यक्रमों की योजना करना आवश्यक होगा | ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से कार्यकर्ताओं को धर्मसंकल्पना का परिचय दिया जा सकेगा | संख्या बड़ी होने के कारण पूर्ण वैचारिक स्पष्टता की अपेक्षा तो नहीं कर सकते, केवल अधिकारों के साथ कर्तव्यों का विचार करने का संस्कार भी प्रेरित किया जा सके तो प्रारंभ के लिए पर्याप्त होगा | अधिकारों के लिए लड़ने के साथ ही कर्तव्यपालन में ही हमारा अधिक स्थायी हित है यह बात समझना धर्मविचार का शुभारम्भ है |

तीसरे प्रकार के शैक्षिक संगठन वैचारिक कार्य करनेवाले संगठन हैं | इनका मूल काम ही शिक्षा के भारतीय प्रतिमान पर अनुसंधान कर उसे युगानुकूल रूप में प्रस्थापित करने का नियोजन करना है | पुनरुत्थान विद्यापीठ, भारतीय शिक्षण मंडल, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास आदि संगठन इस श्रेणी में आते हैं | धर्माधिष्ठित शिक्षा को ही विभिन्न नामाभिधानों से प्रकट करते हुए उसकी संस्थापना हेतु ये वैचारिक संगठन कार्य कर रहे हैं | शिक्षा व्यवस्था में धर्मसंस्थापना हेतु संक्रांति करने में इन संगठनों की योजक भूमिका अपेक्षित है | संक्रांति के लिए आवश्यक विभिन्न घटकों को एक सूत्र में गूंथने का परोक्ष कार्य इन संगठनों को करना होगा | संक्रांति के तात्विक अधिष्ठान की सुस्पष्टता की जिम्मेवारी भी इन्ही संगठनों की बनती है | अनादि काल से भारत में जीवंत धर्मसंकल्पना को मूल रूप में समझकर उसका युगानुकुल स्पष्टिकरण समाज में प्रदान करना धर्मानुसारी शिक्षा के लिए प्रथम आवश्यकता है | धर्म तो साक्षात्कार का विषय है | अतः इन संगठनों के कार्यकर्ताओं को साधक बनना होगा | उपरी प्रवचन, उद्घोषणाएं, प्रस्ताव आदि तो संगठनात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप चलते रहेंगे किंतु इन संगठनों का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि गहन गंभीर साधना को तत्पर कितने कार्यकर्ताओं का निर्माण इन संगठनों की प्रेरणा से हुआ | संक्रांति के अन्य सभी चरणों की शुद्धि, पावित्र्य, प्रभाव, साफल्य तथा सार्थकता इस साधना पर निर्भर करती है | अतः इन संगठनों से जुड़े सभी कार्यकर्ताओं का शास्त्राध्ययन तथा स्वाध्याय कठोर नियमितता के साथ होना अपेक्षित है | समय-समय पर सामूहिक विमर्श, प्रत्यक्ष प्रयोग, उन प्रयोगों से प्राप्त अनुभवों पर पुनः सर्वांगीण संविमर्श तथा आपसी समन्वय यह इस साधना की कार्यपद्धति बनती है | इस चर्चा स्वाध्याय के साथ ही इन विचारों का युगानुकुल शब्दावलि में संहिता लेखन भी अनिवार्य है | तैतरीय उपनिषद् के शिक्षावल्ली अनुवाक् में गुरु अपने दीक्षांत आदेश में स्पष्ट निर्देश दे रहा है – स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां मा प्रमदितव्यं – स्वाध्याय और प्रवचन में कभी आलस न करना | यहाँ वर्तमान युग के अनुरूप प्रवचन के अर्थ को विस्तारित करके समझना होगा | वैसे भी प्रवचन का अर्थ है पूर्ण गंभीरता से प्रकट करना – प्रकर्षेण वाच्यति इति प्रवचनं | वर्तमान स्थिति में वैखरी वाणी का अक्षररूप अर्थात लिखित साहित्य अधिक प्रामाणिक माना जाता है | अतः प्रवचन के अर्थ में गंभीर लेखन को सम्मिलित करना पड़ेगा | वैचारिक संगठनों के कार्यकर्ताओं को प्रयत्नपूर्वक नित्यलेखन का अभ्यास करना होगा | प्रतिदिन नियमपूर्वक कुछ पृष्ठ लिखने की आदत बन जाये तो शनैः शनैः लेखनी में स्पष्टता व लेखन में गांभीर्य आ जायेगा |

धर्म के सुस्पष्ट साक्षात्कार के साथ ही वैचारिक संगठनों के कार्यकर्ताओं का यह भी दायित्व बनता है कि उसका युगानुकुल प्रयोग करे | अतः शिक्षकों व पहले दो प्रकार के संगठनों के साथ मिलकर शिक्षा में धर्मप्राण नवोन्मेष करने का शुभ व्रत भी इन संगठनों का है | ऐसे प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्षों को संहिताबद्ध कर अनेक स्थानों पर दोहराने योग्य प्रतिमान का निर्माण करना होगा | यह प्रतिमान सभी स्तरों पर स्वाध्याय, प्रयोग व धर्माचरण का आधार बनेगा | इसी प्रतिमान से धर्मानुसारी शिक्षा को स्थापित करने, धर्मप्राण, स्वाध्यायी आचार्यों की संक्रांति संभव होगी |

अप्रैल 4, 2016 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , | 11 टिप्पणियाँ

बहुआयामी धर्म की एकात्म संकल्पना


BG2किसी भी राष्ट्र में सामाजिक, राजनैतिक समस्याओके मूल में वैचारिक अस्पष्टता की बहुत बडी भूमिका रहती है। भारत में ब्रिटिष राज के अवषेष आज भी वैचारिक विभ्रम के रूप में बने हुए है। सदियों से ऐतिहासिक सांस्कृतिक अनुभूति के आधार पर जिन संकल्पनाओं का विकास हुआ उनकी अवधारणाओं एंव मर्म को अनुवाद की अपर्याप्तता के कारण भ्रमित कर दिया गया है। समाज एवं लोक जीवन में प्रचंड विविधता के बाद भी अनेक संकल्पनायें देश के सभी भाग में समान रूप से समझी जाती है। आपको उस प्रांत की प्रादेशिक भाषा का ज्ञान हो न हो अनेक आध्यात्मिक गूढ संकल्पनाओं को भी आप सहजता से समझ सकते है। कैलास से लेकर कन्याकुमारी व द्वारका से लेकर परषुराम कुंड तक कही पर भी आप जाइए-माया, लीला, श्रद्धा आदि अत्यंत गंभीर आध्यात्मिक संकल्पनाओं को सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी सहजता से समझता है। अतिविषिष्ट भाषाई विविधता के होते हुए भी इन संकल्पनाओं का एक समान अर्थ पूरे देश में प्रचलित है। लीला को समझाने के लिए महर्षि वेदव्यास को भागवत महापुराण की रचना करनी पडी, जयदेव को गीत गोविंद लिखना पडा और तुलसी को मानस। संभवतः इन्ही सबके सदियो तक किए हुए अनुष्ठान का ही परिणाम है कि आज हमारा पूरा समाज इन गूढ मान्यताओं को सामान्य बोलचाल की भाषा मे अचूक प्रयोग करता है । ऐसे अनेक पद ऐतिहासिक अनुभूतियों से विकसित होते हैं । वे केवल इस भाषा के शब्द नही होते अपितु एक जीवंत व्यावहारिक संकल्पना होते हैं । इन शब्दों का न तो किसी भाषा मे अनुवाद किया जा सकता है और न ही ऐसा प्रयास करने की कोई आवश्यकता है । जैसे लड्डू को विश्व की सभी भाषाओं मे लड्डू ही कहना चाहिए और पिझ्झा को पिझ्झा ही । वैसे ही इन संकल्पनाओं को अनुवाद के बिना जस का तस व्यक्त किया जाना वैचारिक प्रामाणिकता के लिए अनिवार्य है । ब्रिटिश राज के काल में विद्वानो द्वारा इस महत्वपूर्ण तथ्य की अनदेखी की गई । जिस कारण संकल्पनाओं का विकृत, संकुचित और सीमित अर्थ समाज मे प्रचलित हुआ । जिसके फलस्वरूप सामूहिक संभ्रम की स्थिति देश की मेधा में छा गई । राज प्रतिष्ठित विद्वानों द्वारा इन भ्रमित संकल्पनाओं पर आधारित नीतियों पर आधारित कार्य्रक्रमों का चलन हुआ । देश में व्याप्त मानसिक गुलामी का यह सबसे बडा कारण हैं । जिस एक संकल्पना के संकीर्ण व भ्रमित होने के कारण स्वतंत्र भारत मे सर्वाधिक परिणाम हुए हैं, वह है ‘धर्म’ की अवधारणा । धर्म को रिलीजन के पर्यायवाची मान लिए जाने के कारण, सर्वपंथ समभाव को पंथ निरपेक्षता के रूप मे परिभाषित किया जाना, और इस विकृत शब्दरचना के कारण राजकीय व्यवस्थाओं तथा सभी सामुदायिक गतिविधियों से धर्म को प्रयत्नपूर्वक अलग कर दिया गया । शिक्षा में से भी धर्म को अलग करने के प्रयास में सभी संस्कार, सदाचार, नैतिकता आदि अनिवार्य बातें भी हटा दी गई । अब इन सब बातों को लागू करने के लिए मूल्य शिक्षा जैसे अधूरे प्रयास किए जा रहे है । आवश्यकता तो यह है कि धर्म की सही अवधारणा को पुनःप्रस्थापित कर धर्मानुसारी शिक्षा की पुनर्रचना की जाए ।

भारत में धर्म यह एक बहुआयामी संकल्पना है । वास्तव में यह एक जीवन जीने का मार्ग है । पाशविक वासनाओं से उपर उठकर मानवीय संवेदनाओं के अनुरूप जीवन जीना तथा क्रमश: विकसित होते हुए महामानव, देवमानव, दिव्यमानव व अंततः प्रत्यक्ष दिव्यता की अनुभूति यह विकास का मार्ग धर्म है । धर्म केवल व्यक्तिगत आत्मोन्akmनति ही नही अपितु पूरे समाज के ही दिव्यत्व की ओर गति करने का माध्यम बनता है । धर्माधिष्ठित समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपने -अपने स्वभाव के अनुसार जहाॅ हैं उस स्थिती से क्रमशः इस प्रगति की ओर अग्रेसर होता है । समाज जीवन मे धर्म प्रतिष्ठित होने पर प्रत्येक में यह उच्च आकांक्षा स्वतः जन्म लेती है । साथ ही समाज में इस प्रकार के अवसर और मार्गदर्षक दोनो ही उपलब्ध होते हैं । समाज जीवन के सभी अंग धर्मप्राण होते हैं । अतः जो प्रजा को धारण करता है वह ‘धर्म’, ऐसी धर्म की व्याख्या की जाती है । स्वभाव को भी धर्म कहा है । अतः उस स्वभाव के अनुरूप ही मार्ग का चयन करना होता हैं । स्वभाव भी धर्म है और उन्नतिगामी समाज में आपसी संबंध व सामुदायिक जीवन की परंपरायें भी धर्म है । मानव का मानव से, परिवार से, समाज से, सृष्टी से तथा अंत मे परमेष्ठी मे एकात्म संबंध है । इस संबंध को समझकर उसका निर्वाह करना धर्म है । अतः भारत में सामान्य बोलचाल की भाषा मे पुत्रधर्म, पितृधर्म, पत्नीधर्म, पतिधर्म ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता हैं । आपसी संबंधो का निर्वहन कर्म के द्वारा किया जाता हैं । अतः क्या करणीय है ? और क्या अकरणीय है? यह जो बताया है, उसे भी धर्म कहते हैं । उस अर्थ मे धर्म कर्तव्य का परिचायक हैं । ‘राजधर्म’ आदि शब्दों मे ‘राजा के कर्तव्य’ यही भाव प्रकट होता हैं । स्वयं के व सृष्टी के प्रति मनुष्य के कर्तव्य का बोध होने पर धर्म संयम का रूप धारण करता हैं । अतः इसे मर्यादा भी कहा गया है । कर्तव्य, अकर्तव्य के साथ ही भोगने की मर्यादा भी धर्म निर्धारित करता हैं । इन्द्रियों के द्वारा कितना भोग करेंगे? क्या भोगें? व कैसे भोगे? यह बात जिस अलिखित नियम से, संस्कारो के रूप मे सामूहिक मन मेे सुप्रतिष्ठित की जाती हैं उस नियम को भी धर्म कहते हैं । समाज जीवन के नियम धर्माधारित होते हैं । अपेक्षा यह है कि राज सत्ता भी धर्म विधान से ही परिचालित हो । अतः भारत मे न्याय करने हेतु रचित विधिविधान के नियमों को भी धर्म कहा गया । जब इसमें किसी व्याख्या का निर्धारण करना हो तो ‘धर्मसभा’ का आयोजन किया जाता था । अब आधुनिक युग मे कानून, विधि विधान तथा नैतिक अपेक्षा व धर्म विहित कर्तव्य दोनो अलग-अलग हो गये हैं । वास्तव में राजव्यवस्था धर्माधिष्ठित हो तब इन दोनो का भी तादात्म्य ही होता हैं ।

चर अचर सभी वस्तुओं के स्वभाव को धर्म ही कहा जाता हैं । आधुनिक विज्ञान शिक्षा मे भी वस्तुओं के गुणधर्म सिखायें जाते हैं । किसी भी सजीव भूतमात्र अथवा निर्जीव वस्तु का स्वभाव ‘धर्म’ कहलाता है जैसे अग्नि का धर्म है दाहकता, जल का धर्म है प्रवाहित होना । कितने भी छोटे स्थान पर जल को बांध भी दे वह लहरों के रूप प्रवाहित होता हैं । प्रत्येक वस्तु अपने स्वभावधर्म को धारण किए हुए अस्तित्व मे रहती हैं । प्रत्येक मनुष्य भी अपने आप में विशिष्ट स्वभाव का होता है । वह स्वभाव ही उसका स्वधर्म हैं । उसी के अनुसार उसे स्वयं से व अन्यों से संबंधों का निर्वाह करना हैं । यह संबंध भी धर्म द्वारा परिभाषित हैं । सारी सृष्टि ही एक ईश्वर की एकात्म अभिव्यक्ति हैं । अतः उसके प्रत्येक अंग का विशिष्ट स्थान होने के साथ अन्य अंगो के साथ अंगांगी संबंध हैं| जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अंग परस्पर पूरकता के साथ स्वयं के कार्य को करते हुए औरों के सहयोगी बनते हैं उसी प्रकार मनुष्य को परिवार, समाज, सृष्टि व परमेष्टि के साथ समन्वयात्मक संबंध का निर्वाह करना होता है । सृष्टि के इन ईश्वरीय नियमों को ‘धर्म’ कहते हैं । मानव को अपने स्वधर्म का प्रगटीकरण कर्म रूप मे करना होता हैं । उद्देष्यपूर्ण कर्म स्वधर्म होता हैं । स्वधर्माधिष्टित कर्म मानव जीवन को परिपूर्ण बनाता हैं । धर्म केवल तत्व न हो करके प्रत्यक्ष व्यवहार में उतारना पडता है । अतः कहा गया है कि ‘आचार प्रभवो धर्म’ इन इतनी सारी विविध छॅटाओ का एक साथ धारण किए हुए धर्म की संकल्पना इस यज्ञ भूमि मे विकसित हुयी । समय-समय पर लोगों ने इसे अपने जीवन मे उतारकर आदर्श प्रस्तुत किए । विद्वानों ने इसके गुण तत्वों की मीमांसा की । जीवन के विभिन्न आयामों मे धर्म को सुव्यवस्थित रूप से परिभाषित करने का काम शास्त्रों ने किया । सार्वकालिक, शाश्वत तत्वों के रूप मे मनुष्यों ने इसकी पहचान की । मनुमहाराज ने धर्म के दस लक्षण बताए हैं । एक दो भेंदो के साथ यही पंतजली के योगसूत्रों मे परिलक्षित हुए हैं । भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद गीता के सोलहवे अध्याय मे दैवी गुण सम्पद के सोलह गुणों के रूप मे धर्माचरण को स्पष्ट किया हैं ।

समाज जीवन में व्यक्ति को भिन्न-भिन्न भूमिकाओं का निर्वाह करना पडता है । अनेक बार इन विभिन्न भूमिकाओं मे आचरण किए जाने वाले धर्म का आपसी टकराव हो जाता है । ऐसे धर्म संकट में से बाहर निकलने का मार्ग भी शास्त्र बताते हैं । जहाॅ व्यष्टि धर्म समष्टि धर्म के साथ टकराता है, वहाॅ बडी इकाई को महत्व देना साधारण सा नियम है| जब व्यक्ति के ही दो व्यक्तिगत धर्मो के बीच टकराव हो तब शास्त्र कहते हैं कि समाज के अधिकतम हित का ध्यान रखते हुए ज्यादा से ज्यादा लोगों का जिसमे हित हो उस बात को वरीयता दी जाए । इसी प्रकार से एक और वर्गीकरण धर्मपालन की कठोर नियमितता को लेकर शास्त्रों में मिलता है। वह है सामान्य धर्म, विशेष धर्म व आपदधर्म । सामान्य जीवन यापन करते हुए नित्यनियम के रूप मे कुछ कर्तव्यो का समावेष होता है, उसे सामान्य धर्म कहते हैं । यात्रा, बीमारी आदि विशेष परिस्थितियों मे इन नियमों की कठोरता में कुछ मात्रा मे रियायत बरती जाती है उसे विषेष धर्म कहते है । जब प्राणों पर ही संकट आ पडें, उस समय सामान्य रूप से अकरणीय कार्य को करने की अनुमती होती है इसे आपदधर्म कहते है | धर्मपालन के लिए जब देह ही न बचे ऐसी आशंका की परिस्थिती में ही आपदधर्म का अवलंब किया जा सकता है अन्यथा नही ।
इस प्रकार धर्म का अत्यंत व्यावहारिक एवं सूक्ष्म विवेचन भारत मे शास्त्र ग्रंथो में और साथ ही लोक जीवन में भी दिखाई देता है । आज भी हिंदू समाज के अधिकतकम लोग सहज सुलभ परंपरा के रूप मे धर्म का अवलंबन करते हैं । धर्म पालन में त्रुटि के परिणाम स्वरूप जीवन में जो संकट आयेंगे उनका स्पष्ट भान सामान्य भारतीय को परंपरा से प्राप्त हुआ है । अतः धर्म भीरूता के चलते सामान्य व्यक्ति शुद्ध सात्विक एवं प्रामाणिक जीवनयापन करने का प्रयत्न करता है । विदेशी शासन के चले जाने के बाद भी विदेशी तंत्र को ही अपनाए रखने के कारण व्यवस्था में से धर्म लुप्त हो गया हैं । उस कारण चरित्र का संकट शासन तंत्र और उससे जुडी सामूहिक गतिविधियों में दिखाई दे रहा हैं । यह अत्यावश्यक है कि हम अपनी समस्त व्यवस्थाओं को शाश्वत, सनातन धर्मानुसार पुनर्गठित करें । चिरस्थायी सार्वजनिक सुख का यह एकमात्र मार्ग हैं । धर्मराज्य की स्थापना ही सर्वे भवन्तु सुखिनः की वैश्विक प्रार्थना को साकार कर सकती हैं ।

दिसम्बर 23, 2015 Posted by | आलेख | , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

एकात्म स्वावलंबी ग्राम विकास


sgv1अनेक विद्यालयों के द्वार पर लिखा होता है ‘ज्ञानार्थ प्रवेश-सेवार्थ प्रस्थान’ | यह शिक्षा के समग्र उद्दिष्ट का नित्य स्मरण है | केवल ज्ञानप्राप्ति अथवा व्यक्तिगत कौशल का विकास शिक्षा का पूर्ण उद्देश नहीं प्रकट करता | यह ज्ञानप्राप्ति अथवा कौशल विकास किस उद्देश से है यह भी स्पष्ट होना आवश्यक है | विद्यालय से निकला बालक परिवार, समाज, राष्ट्र व विश्व में योगदान करने के लिए सुयोग्य बने ऐसी अपेक्षा है | यह योगदान कितना भी अर्थकारक हो किंतु उसके पीछे का भाव सेवा का ही रहे ऐसा संस्कार विद्यालयों में नई पीढ़ी को प्राप्त हो यह शिक्षा के परिपूर्ण उद्देश की व्याख्या है | अतः शिक्षा के विषय में चिंतन करते समय व्यक्तित्व विकास के साथ ही सामाजिक विकास के विभिन्न आयामों पर चिंतन करना भी आवश्यक है | जब तक समाज की भिन्न-भिन्न इकाइयाँ यथा परिवार, ग्राम, संगठन, नगर आदि के विकास की सम्यक अवधारणा सुस्पष्ट न हो तब तक शिक्षित पीढ़ी के सम्यक उपाययोजन की योजना शिक्षाविद नहीं बना सकते | समग्र ग्राम विकास, नगर विकास, संगठनशास्त्र, व्यापार प्रबंधन आदि पर स्पष्ट प्रारूप तयार करना भी शिक्षा के भारतीय स्वरुप के विकास हेतु आवश्यक है |

आजकल स्मार्ट सिटी, स्मार्ट विलेज आदि की चर्चा चलती है | स्मार्ट विलेज की बात करते हीsgv2 योजनाकारों के मन में आधुनिक शहरी सुविधाओं से संपन्न, संचार के सभी साधनों से परिपूर्ण गांव का ही विचार मन में आता है | चिकनी-चुपड़ी पक्की सड़कें हो, बिजली की अखंड आपूर्ति, मोबाइल इंटरनेट आदि सभी संचार के साधन हर गांव में उपलब्ध करा दिए जाएँ | सरकार ने इस दिशा में कार्य प्रारंभ भी कर दिया है | पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम से ग्रामीण फीडरों को अलग करने की देशव्यापी महत्त्वाकांक्षी योजना केन्द्र सरकार ने सितंबर 2015 में प्रारंभ की | इसके माध्यम से गांव-गांव में 24 घंटे बिजली की आपूर्ति होगी | सिंचाई के लिए आवश्यक 3 चरण (three phase) विद्युत आपूर्ति भले ही कुछ समय के लिए प्राप्त हो किंतु घरेलू एवं अन्य व्यापारी उपयोग के लिए आवश्यक एकल चरण (single phase) बिजली 24 घंटे गांव-गांव में उपलब्ध होगी | इस आधार पर इंटरनेट आदि संचार के साधन गांव में पूरे समय उपलब्ध रह सकेंगे | सभी गांवों को पक्की सड़क से जोड़ने की योजना भी इसी दिशा में एक प्रयास है कि गांवों का यातायात तथा मालवाहक संपर्क द्रुत गति से हो सके | किंतु प्रश्न यह है कि क्या इस सबसे गांव का समग्र विकास हो पायेगा? केवल व्यापार और संचार के अवसर उपलब्ध हो जाने से नई पीढ़ी का नगरों की ओर पलायन रुक जायेगा?

शहरों की ओर स्थानांतरण के अन्य दो महत्वपूर्ण कारक योजनाकारों ने खोजे है – स्वाथ्य एवं शिक्षा | प्राथमिक एवं माध्यमिक के आगे की शिक्षा तथा इस स्तर पर भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा गांवों में उपलब्ध न होने के कारण जिन्हें भी संभव है वो अपने बच्चों को शिक्षा हेतु शहर में भेजना पसंद करते है | एकबार पढ़ाई के लिए शहर गया बालक पढ़-लिख कर जवान होने पर गांव क्यों लौटेंगे ? अतः गांव के गांव ही युवाओं से रिक्त होते जा रहे है | अनेक राज्यों में आने वाले दिनों में यह एक बहुत बड़ी चुनौती होगी | नई पीढ़ी जब गांव में रहेगी ही नहीं तो ये संचार साधन, ये बिजली किस काम आयेगी ?

ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए स्थिति बड़ी विकट है | अनेक स्थानों पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध ही नहीं है | जहाँ भवन उपलब्ध है वहां भी चिकित्सकों का अभाव है | कोई चिकित्सक गांव जाना ही नहीं चाहता है | सरकार ने अनेक प्रयास कर लिए, कुछ वर्षों की अनिवार्यता कर दी, अतिरिक्त भत्ता देना प्रारंभ कर दिया फिर भी चिकित्सक शहर छोड़ना नहीं चाहता है | निजी व्यवसाय में इतनी अधिक कमाई है कि महाराष्ट्र जैसे राज्यों के शहरों के सरकारी अस्पतालों में भी चिकित्सक नहीं जाना चाहते है | अतः स्वास्थ्य सुविधाओं का गांवों में उन्नयन असंभव के बराबर है | इस हेतु नए सिरे से सोचना होगा |

शहरीकरण की नकल के रूप में ग्रामविकास का विचार किया जा रहा है | इस सोच में ही मूलभूत परिवर्तन आवश्यक हैsgv | वर्तमान में विकास के वैश्विक परिमाणों में शहरीकरण एक प्रमुख मापदंड है | जिस देश में जितना अधिक शहरीकरण होगा उसे उतना ही अधिक विकसित माना जाता है | समूची जनसंख्या के कितने प्रतिशत जनसंख्या शहरी है यह विकास का मापदंड है | इसी जीवनदृष्टि के कारण गांवों का शहरीकरण ही गांव का विकास माना जा रहा है | ग्राम विकास के नाम पर सारा सरकारी चिंतन व योजनायें इसी दिशा में है | यह पूर्णतया अभारतीय विचार है | भारत में गांव एक परिपूर्ण जैविक इकाई है | पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ग्रामोदय के एकात्मिक प्रारूप में इस बात का विचार किया है | सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्तर पर पूर्णतः स्वावलंबी ग्रामों अथवा ग्रामसमूहों का विकास किया जाना भारत में ग्रामविकास का माध्यम हो सकता है | गांवों की जीवनशैली में कृषि व गोरक्ष यह केवल आर्थिक उत्पादन के साधन न होकर उनका सांस्कृतिक व सामाजिक मूल्य भी है | जब तक हम इन दोनों को लाभ का व्यवसाय नहीं बनाते तब तक ग्रामोदय के सारे प्रयास अधूरे ही होंगे | वर्तमान समय के अनुरूप कृषि एवं गोरक्षा के साथ-साथ ग्रामीण उद्योग और कृषि उत्पादों के व्यापार को भी जोड़ा जा सकता है | इन सबके आधार पर संपूर्णरूपेण स्वावलंबी ग्रामों का विकास किया जा सकता है |

इस विकास की प्रक्रिया का भी जैविक होना आवश्यक है | स्वावलंबी समाज निर्माण सरकारी बैसाखियों से नहीं हो सकता | सरकारी योजनाओं के माध्यम से सरकारी पैसा सरकारी अधिकारियों द्वारा ही खर्च किया जाता रहा तो सारे विश्व की पूंजी एक गाँव में लगाने पर भी ग्रामविकास कतई संभव नहीं है | योजना के स्तर से ही ग्रामीणों का न केवल सहभाग अपितु नेतृत्व सच्चे ग्रामविकास में अनिवार्य है | सारा गांव पूर्ण जागरूकता के साथ संगठित होकर एक मन से विकास का संकल्प ले तब वह ग्रामविकास का प्रथम चरण होगा | भौगोलिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक आधार पर कुछ गांवों के समूह बनाये जा सकते है | समूह में कितने और कौनसे गांव हो इसका निर्णय भी ग्रामवासी ही आपस में मिल कर करें | नैसर्गिक संसाधन, मानव बल, आर्थिक उपलब्धता तथा भौगोलिक दूरी के आधार पर पूर्ण स्वावलंबी ग्रामसमूह विकसित करने हेतु आवश्यक गांवों की संख्या ग्रामवासी निर्धारित करेंगे | यह एकत्रिकरण बहुत अधिक कठोर नहीं होना चाहिए | और अधिक ग्रामों को जोड़ने अथवा कुछ गांवों को समूह बदलने की लचीली सुविधा इस व्यवस्था में उपलब्ध हो | कुछ गांव धीरे-धीरे अपनेआप में ही स्वावलंबी बनने का प्रयत्न कर सकते है | इस स्थिति में उन्हें किसी समूह का हिस्सा बने रहने की आवश्यकता नहीं रहेगी |

यह ग्रामसमूह अपने स्तर पर नियोजन करे कि किस प्रकार वे पाँच-सात वर्षों की अवधि में पूर्णतः आत्मनिर्भर हो सकते है | शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, गौरक्षा, व्यापार के साथ ही ऊर्जा के उत्पादन आदि में भी यह ग्रामसमूह पूर्णरूपेण आत्मनिर्भर बने | इस हेतु ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का उपयोग करना आवश्यक होगा | तेलंगाना के लगभग 40 गांव जैव-इंधन (bio-diesel) के माध्यम से बिजली के उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गए है | ऐसे ही सौर, पवन, छोटे नालों पर बने चक बाँध आदि को मिलाकर विकेन्द्रित विद्युत् आत्मनिर्भरता को प्राप्त किया जा सकता है | सिंचाई एवं पेयजल हेतु भी इसी प्रकार का चिंतन एवं नियोजन किया जाये कि कुछ अवधि में यह ग्रामसमूह उस मामले में भी आत्मनिर्भर बन सके | कृषि का नियोजन भी ‘स्वपोषण’ व ‘व्यापार’ इन दो रूपों में किया जाये | गांवों की अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ ही गांव शहरों के भी अन्नदाता है | आसपास की नगरीय आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए कृषि का व्यापारिक नियोजन किया जाये | फल, सब्जी और अनाज की आपूर्ति के अलावा अनेक ऐसे कृषिउत्पाद है जिनकी औद्योगिक उपयोगिता है | इन सभी का अपनी स्थानीय विशेषताओं के अनुरूप नियोजन किया जाये तो कृषि न केवल भरण-पोषण का अपितु अच्छे लाभ का माध्यम भी बन सकती है | किंतु यह एकल चिंतन अथवा प्रयोग से संभव नहीं है | सामूहिक चिंतन, संगठित प्रयास इस हेतु अनिवार्य है | कुछ कृषिउत्पाद सीधे बाजार में बेचने के स्थान पर थोड़ी सी प्रक्रिया करने से उनमें बहुत बड़ी मूल्य वृद्धि हो सकती है | अतः ऐसे कृषि के सहयोगी ग्रामोद्योगों की योजना भी ग्राम्य विकास का महत्वपूर्ण अंग है |

इस sgv3सब हेतु, शिक्षा में भी स्वावलंबी विचार इन ग्रामसमूहों को करना होगा | अपने नए पीढ़ी की शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति अपने ही ग्रामसमूह में हो सके ऐसी आत्मनिर्भरता को लक्ष्य किया जाये | हर बालक को 8वी तक जीवनोपयोगी सामान्य शिक्षा सहज, सुलभ, जहा तक हो सके निःशुल्क प्राप्त हो | उसके आगे की शिक्षा का नियोजन बालकों के स्वभाव एवं रूचि के अनुरूप तथा ग्रामसमूह की आवश्यकता के अनुसार किया जाये | इस हेतु विशेष रूप से ग्रामीण शिक्षा संस्थानों का निर्माण करना पड़ेगा जिसमें कृषि एवं कृषि सहायक उद्योगों में कार्य करने का प्रशिक्षण ग्रामीणों को दिया जाये | सामान्य उच्च विद्यालयीन शिक्षा (9वी से 12वी) तथा स्नातक तक महाविद्यालयीन शिक्षा ग्रामसमूह में उपलब्ध हो | केवल परास्नातक अथवा व्यावसायिक शिक्षा हेतु छात्रों को किसी अन्य ग्रामसमूह अथवा शहर में जाने की आवश्यकता रहे | इस प्रकार ग्रामसमूह शैक्षिक आवश्यकताओं हेतु पूर्णतः आत्मनिर्भर बन सकेंगे | स्वास्थ्य सुविधाओं में भी इसी प्रकार की आत्मनिर्भरता पाई जा सकती है | प्रत्येक गांव के एक या दो युवा-युवती को परा-चिकित्सकीय (para-medical) प्रशिक्षण दिलाकर आरोग्य मित्र के रूप में तैयार किया जाये | सामान्य छोटे-मोटे हादसों से होनेवाली छोटी-मोटी चोटें, सामान्य संक्रमण, बुखार, जुकाम, पेट की बिमारियाँ आदि के उपचार का ज्ञान व दवाई आरोग्य मित्र के माध्यम से हर गांव में उपलब्ध हो | थोड़े प्रगत उपचार तथा कुछ दिन के निवासी उपचार हेतु प्राथमिक स्वाथ्य केंद्र हर ग्रामसमूह में हो | ग्रामीणों के हाथ इस सबका प्रबंधन/संचालन दिया जाये ताकि चिकित्सकों की साप्ताहिक उपस्थिति व परिचारक कर्मचारियों (nursing staff) की नित्य उपलब्धता सुनिश्चित हो |

इस प्रकार का स्वावलंबी ग्रामविकास तभी संभव है जब शिक्षित, समरस, संगठित, शोषणमुक्त समाज स्थापित किया जाये | यह काम धार्मिक आयोजनों के माध्यम से सदियों से होता रहा है | यज्ञ, कथा, कीर्तन, जत्रा, उत्सव आदि के पारंपारिक आयोजन समाज को सुसंगठित करने के माध्यम रहे हैं | स्वावलंबी ग्रामविकास में इनकी महती भूमिका है | मठों, मंदिरों, धर्माचार्यों तथा सामाजिक संगठनों ने एकात्म स्वावलंबी ग्रामविकास के इस व्रत को अपनाया तो यह स्वप्न साकार होने में बहुत अधिक समय नहीं लगेगा | सरकार की भूमिका केवल उत्प्रेरक (catalyst) की रह जाएगी | रास्तें, भवन, तालाब, कैनाल, उर्जा संयंत्र, शिक्षा जैसी आवश्यक अधोसंरचनाओं (infrastructures) का निर्माण ग्रामीणों के माध्यम से सरकारी अनुदान के उपयोग से हो | बाकि आवश्यक संसाधन समाज के संबल से ही खडे किये जाये |

स्वावलंबी ग्रामविकास की प्रक्रिया भी शासनमुक्त, समाज पोषित व ग्रामीणों पर पूर्ण विश्वास रखनेवाली होगी तभी उचित परिणाम भी प्राप्त होंगे |

अक्टूबर 24, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

Look beyond political controversy, Yoga is for all


Another Post as a precursor to IYD. This piece was written for bharatniti.in giving it here for the blog followers.

http://www.bharatniti.in/story/look-beyond-political-controversy-yoga-is-for-all/44

IYD

Yoga has been accepted universally as a discipline of moulding one’s own life to active overall well-being, accepting it as a way of life beyond faith, worship or religious dogmas. The same was evident when more than 170 countries across five continents unanimously supported the resolution for declaring June 21 as the International Day of Yoga at the General Assembly of the UNO.

IYD LogoMany of them proposed or seconded it without any voting or discussion. In fact, many of the Islamic countries too supported the resolution. Yoga is being practiced by people beyond the religious beliefs.

On this background of universal consensus, it is ironical that the decision of the central government to celebrate the International Day of Yoga all over the country is being opposed on religious grounds by some misguided elements. When the whole world is unanimous about the universal appeal of Yoga, it is a shame that this great science of living is being subjected to controversy in the land of its origin.

Social media is full of photographs of members of different communities performing Yogic exercises. The universal acceptance of Yoga is very much witnessed across different communities in India.

Controversy more of political concoction than popular

The present fabricated controversy over the celebration of the International Day of Yoga is the result of intolerant minds. Yoga is a science which demands experiments and experiences and does not ask one to believe or un-believe anything. The performance of Yoga does not affect any belief systems. If at all it will enhance ones capacity to have undeterred in one’s own beliefs. Yoga is necessarily an Bharatiya philosophy as it was first compiled in this holy land and has all the attributes of Sanatana Dharma because it was practiced, experimented and evolved into different systems by generations of Hindus. But it still is a universally applicable science of life and the art of living.

The practice of Yoga will not swerve the individual from his personal religious beliefs. It will also not make him antagonistic to his or any other religion but will, on the contrary, augment his affection for his personal deity. The practice of Yoga will not proselytize a Muslim or a Christian, but will on the contrary make him a better adherent of his faiths. Thus, no one should be afraid of Yoga as it includes all and excludes none.

So what is Yoga actually?

Yoga is beyond a mere physical exercise. In fact, Yoga is neither mere physical exercise nor is it just a therapy. As per the ancient traditions, it is a way of scientific living. A modern being may find it hard to comprehend but the mind is the prime factor of all our actions in life. And yoga is nothing but the training of the mind. Thus it (yoga) enables perfection in every action at all levels. The whole universe functions in disciplined manner. There are laws of existence which govern the natural phenomena irrespective of any subjective intervention. The only exception to this smooth governance of the universe are human beings.

The humans are endowed with the will to act and the power of imagination. The combination of these two have created all the scientific wonders. Like all kinds of powers, this also needs regulation. If uncontrolled, power becomes corrupt and boon is converted into a curse. This is true at individual as well as collective level.

Sage Patanjali, in his Yoga aphorisms, initiates with a simple statement – ath yoga anushasanam [Thus we begin the discipline of Yoga.] The aim of all the yogic practices right from Asanas, Suryanamaskara, Pranayamas up to Dhyana [meditation] and Samadhi is disciplining the mind. If the mind is concentrated, anything and everything can be accomplished.

Yoga is the way of orienting the mental powers to one’s aim. The conflicts and clashes in the world are a result of intolerance born out of lack of coordination among one’s own multiple roles. There are various schools of Yoga and they have different practices.

There are several variants of the same Yogic practice. Some well- meaning noble Acharyas even tried to standardize yogic practices. This futile effort has not succeeded as diversity is an inherent feature of existence. Everything that exists is unique in its form, function and role. Yoga not only takes into account this diverse uniqueness but also enriches the extraordinary individuality of the seeker, the performer. At the same time, yoga helps the sadhaka (practitioner, the doer) to realize the underlying oneness behind the apparent diversity.

So, whatever be the practice, if the mind is tuned properly with a synchronized awareness and relaxation, it integrates one with all. Essence is not in the action but in the intent. Yoga literally means union. Every practice that enables the mind to expand and unite the different levels of collectivity is Yoga. Yoga gives quietude, peace and harmony to the individual mind and if performed regularly by a sizable portion of the humanity, will spread this peace and harmony to the cosmic world.

One can say with full conviction that the mass performance of various Yoga practices on the historic occasion of the International Day of Yoga on June 21 will definitely lead to conflict free and harmonious world.

जून 18, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

एस्पायर सार्वजनिक विद्यालय की अभिनव शिक्षण पद्धति


न्यूयॉर्क टाइम्स में लेख का सारांश

vikalpअमेरिका स्तिथित एस्पायर सार्वजनिक विद्यालय अध्यापक प्रशिक्षण कार्यक्रम पारम्परिक शिक्षण व्यवस्था से बहुत अलग है | यहाँ पर सिद्धांतो से अधिक महत्त्व व्यवहार को दिया जाता है |

जो स्नातक के विद्यार्थी, शिक्षक बनना चाहते है उन्हें यहाँ  निवासी प्रशिक्षणार्थी  बनकर  अनुभवी मार्गदर्शक की उपस्थिति में पढ़ाने का अवसर मिलता है | जैसे चिकित्सक विद्यार्थी अनुभवी डॉक्टर की उपस्थिति में शल्य क्रिया करते हैं, उसी प्रकार यह प्रशिक्षण ग्रहण करने वाले  शिक्षक अनुभवी मार्गदर्शकों से पढ़ाने की कला सीखते हैं | शुरू में इन्हें कक्षा में विद्यार्थोयों को नियंत्रित करना का कठिन कार्य सिखाया जाता है | यह कला पूरी तरह से सीखने के बाद,वे पढ़ाने पर ध्यान केन्द्रित कर देते हैं | इन प्रशिक्षणार्थी शिक्षको को अत्यल्प छात्रवृत्ति दी जाती  है | उन्हें अक्सर उन विद्यालयों  में भेजा जाता है जहाँ निम्न आय श्रेणी के विद्यार्थी पढ़ते हैं |

अमेरिका की पारम्परिक शिक्षा की व्यवस्था में शिक्षको के प्रशिक्षण को कम महत्त्व दिया गया और विद्यार्थियों के परीक्षा में प्रदर्शन के आधार पर उन शिक्षकों की क्षमता का मूल्यांकन किया जाता था और यह प्रणाली पूरी तरह से विफल रही है  |

एस्पायर model में पांच दिनों के बाद उन प्रशिक्षणार्थी शिक्षको को अकेले कक्षा में भेजा जाता है | वहां पर  नयी नयी विधियों  से पढ़ाया जाता है | जैसे कि जब प्रशिक्षणार्थी शिक्षक पढाते हैं, तब मार्गदर्शक जोर से गाना बजाकर उन्हें विचलित करने का प्रयत्न करते हैं और प्रशिक्षणार्थी शिक्षक तथा विद्यार्थियों के व्यवहार को विडियो कैमरे  द्वारा फिलमाँकन  किया जाता है |शिक्षक पढ़ाते समय विद्यार्थियों का निरिक्षण करते हैं और उनके व्यवहार का धीमी आवाज में वर्णन करते हैं | उससे विद्यार्थियों में अनुशासन बनाये रखने में सहायता मिलती है |

अक्सर यू ट्यूब  के वीडियोस के उपयोग द्वारा दृव्ष श्राव्य http://visual माध्यम से  शिक्षा प्रदान की जाती है | कक्षा में पढ़ाने से पूर्व प्रशिक्षणार्थी शिक्षक और परामर्शदाता शिक्षा प्रदान करने के कार्य का पूर्वाभ्यास करते हैं | प्रशिक्षणार्थी शिक्षक और मार्गदर्शक दोनों मिलकर  शिक्षक और विद्यार्थी की भूमिका निभाकर पढ़ाने का अभ्यास करते हैं |

प्रशिक्षणार्थी शिक्षक अक्सर वह विषय पढ़ाते है जिसका उन्हें स्वयं औपचारिक ज्ञान नहीं होता है और जैसा अपेक्षित होता है, उन्हें पढ़ाने में बहुत कठिनाई अनुभव होती है | जब वे कक्षा में पढ़ाते है, विडियो कैमरा द्वारा उनकी फिल्म ली जाती है और बाद में वह फिल्म  उन्हें दिखाई जाती है ताकि उन्हें अपनी गलती पता चले |

प्रशिक्षणार्थी शिक्षकों को विद्यार्थियों के साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार करने को प्रोत्साहित किया जाता है | जैसे एक शिक्षिका बच्चों को चिडीयाघर ले जाती है और वहां दीवारों पर जो आकृतियाँ हैं उनका क्षेत्रफल निकालने को कहती हैं | प्रारंभ में उन्हें कठिन लगने वाले विषय पढ़ाने को दिए जाते हैं, इसमें उन्हें निश्चित ही कठिनाई होती है | किन्तु कुछ महीनों के इस संघर्ष के बाद उनको उनके स्वभाव के अनुसार विषय और कक्षा का स्तर दिया जाता है |

कई आलोचकों के अनुसार प्रशिक्षण की यह विधि अत्यंत यांत्रिक है | उनके अनुसार मार्गदर्शकों का केवल अनुभव उत्तम शिक्षा हेतु पर्याप्त नहीं है |परन्तु यह model इतना प्रभावी है कि बहुत कम प्रशिक्षणार्थी शिक्षक अधूरे में प्रशिक्षण छोड़ते है और स्नातक बनने के बाद भी किसी और नौकरी में नहीं जाते है , शिक्षक ही बनते हैं |

फ़रवरी 8, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

let us untie the knots


Krishna - New forever 02There are three basic principles of pedagogy or Educational Methodology- Near to Far, Known to unknown and subtle to gross. The student should be provided education about what is close to him, before imparting the education about matters related to the distant. The range has to be gradually increased in this order and finally we can reach the level of the entire creation and the universe. Second principle is that the spectrum of the knowledge from the unknown to the known should be used as a basis for the gradual acquisition of the knowledge. The third principle of education is to proceed from the subtle to the gross. These basic principles are not being followed in the present system of education. This is the cause of the education becoming dry, weary and complicated. We can not develop sukshm pragya [subtle insight] by teaching the laws of the gross, materialistic world. It will become easy for us to understand the characteristics of the gross after assimilating the subtle thoughts and their subsequent reflections and discussions.

Bhagwan Sri Krishna elucidates this method in the Bhagwad-Geeta. He challenges the Kshatriya Dharma of Arjuna, for impugning the grieved state of Arjuna. He touches the topic which is closest to the heart of Arjuna and advises him, not to succumb to the state of unmanliness as it does not befit you. Sri Krishna refers to topics like Swarga [heaven] and Kirti [reputation] and admonishes Arjuna for his unheavenly and disgraceful behaviour. It meant that the action of Arjuna would keep him away from heaven as well bring ignominy to him. Due to the onslaught on his grief struck mind, Arjuna recognizes the cowardice brewing in his mind. As a result of the parochial nature of his mental state, he could detect the sorrow and cowardice overwhelming his mind. Earlier in the first chapter Arjuna not only supports his escapism but also ennobles it. He justifies it being in accordance with Dharma. The intellectual hypocrisy of  Arjuna crumbles after the assailing treatment by Sri Krishna and his mind craves for the acceptance of the truth. The first step in the direction of disciplehood is the readiness of the mind to accept the truth. “कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः ||” The mind which has become afflicted with the guilt consciousness of cowardice gets deluded about what is Dharma and what is adharma. I cannot understand the difference between the two and so I am asking you’.

The voice which always points out our flaws, is eternally alive within us. It always points out all our weaknesses. However we ignore it as we are overwhelmed with our conceit. The mind gradually gets into the habit of justifying all our inanities and ennobling our habits. It develops into a psychological complex and gradually evolves as our ‘alter ego’. If any friend or well wisher brings that to our attention, we feel insulted. The mind cannot accept any exhortation as long as that knot is not untied. We have to untie our knots in the presence of the Guru. The Guru introduces us to our knots. But we only have to loosen and untie them. An experiment in the form of a game played by children in the camps, makes this matter clear. A child is told to close his fist, while another is told to open it. In spite of trying very hard, the child can not open the fists of the other person. Then the instructor says that he would utter a mantra and the fist would get opened. The teacher says something in the ear of the student and his fist gets opened in the very next attempt. Everyone gets surprised as to what mantra it is. The mantra given by the teacher is simply that ‘ When he tries to open your fist, you open it’.

The lesson conveyed through the game is that as long we do not desire, no other person can open our fist. The knotsBG vishvrup of the mind are like that. They cannot be opened by the efforts of some other person. They have to be opened very gently by us. After Arjuna becomes the disciple of Lord Krishna, he is blessed with the vision of his Universal form, which is the subtlest knowledge in the world. The message of the Geeta starts with the immortality of the Self while its final objective was to inspire Arjuna for performing his Karma and duties. Sri Krishna commences his elucidation about the immortal, eternal self so that Arjuna acquires the knowledge of the most gross duty related to the battlefield.  This is the best method of teaching. Nowadays we have regarded the subtlest knowledge as belonging to the domain of spiritualism and are distancing education from it. The syllabi have become completely mundane, in the name of practicality. But efficient behaviour is possible only after understanding the subtlest knowledge.

Arjuna was not ready to proceed on the path of his duty even after listening to the logical exhortations about Gyan [knowledge], Bhakti [devotion], Karma [action] and the highly sublime Raja Yoga. He asks numerous questions which are beautifully answered by Lord Krishna but finds himself incapable of forsaking his attachment. Then Lord Krishna blesses him with a vision of his cosmic form. Only the vision of his cosmic form will dispel all the doubts. This is the final knowledge. The Geeta gives the true message of the dedication to the Virata [cosmic form]. Arjuna gets not only confounded but also terrified by this cosmic vision. Arjuna, with folded hands tells Sri Krishna, ”I used to regard you as my friend and due to the lack of knowledge, did not behave properly with you”. This friendly affinity was in fact the foundation of Arjuna’s disciplehood. Krishna is our friend also. When we recognize him as our friend, he blesses us with a vision of his cosmic form. We shall be able to discern the sacredness present in each particle and the immanent divinity in every creature. This will enable us to march fearlessly on the path of our duty.

Come, let us untie the knots of our mind and become the disciple as well as the friend of Lord Krishna.

दिसम्बर 11, 2014 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

शासन-निरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था ही समस्त समस्याओं का स्थायी उपाय!


schoolभारतीय शिक्षा की परम्परा अतिप्राचीन व अत्यन्त गौरवपूर्ण है। अनादिकाल से ही भारत ने सारे विश्व को मानवता की शिक्षा दी है। केवल आध्यात्मिक शिक्षा ही नहीं, हर प्रकार की लौकिक शिक्षा भी भारत ने ही विश्व को दी। विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के हर क्षेत्र में भारत न केवल प्रगत था ही तो उनके शिक्षा की प्रगत विधि भी भारत में विकसित की गई थी। इसी कारण सारे जगत से यहाँँँ छात्र शिक्षा ग्रहण करने आते रहे है। हजारों की संख्या में आनेवाले छात्रों के लिये अनेक गुरूकुल भारत में चलते थे। इसी व्यवस्था के चलते भारत को जगतगुरू कहा जाता रहा है। 11-12 वी शताब्दी में मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों को जला दिया उसके फलस्वरूप सैंकड़ो विश्वविद्यालय बंद कर उनकी ग्रंथसंपदा को सुरक्षित रखा गया। ज्ञान की सुरक्षा भारत के लिये सबसे महत्वपूर्ण थी। इसके बाद के संघर्षकाल में भी भारत में शिक्षा का वटवृक्ष फैला हुआ था। ग्राम ग्राम में उच्च शिक्षा तक की व्यवस्था भारत में थी। मुस्लिम आक्रांताओं ने मंदिरों को तोड़कर उनके स्थान पर मस्जिदें बनवाने पर ही ध्यान दिया। देश के कोने कोने में चल रहे शिक्षा संस्थानों के भारतीय संस्कृति में योगदान के महत्व को सम्भवतः वे लोग समझ नहीं पाये।

इसी के चलते 1823 में अंग्रजों द्वारा किये गये देश के शैक्षिक सर्वेक्षण में पाया गया कि पूरे भारत में लाखों की संख्या में शिक्षा संस्थान थे। प्राथमिक शिक्षा तो लगभग सभी जनसंख्या को उपलब्ध थी। समाज के 76 प्रतिशत लोग उच्च शिक्षा विभूषित थे। प्रख्यात स्वदेशी चिंतक धर्मपाल ने 1966 में लंडन के अभिलेखों किये अनुसंधान पर आधारित पुस्तक ‘‘रमणीय ज्ञानवृक्ष’’ में इस सर्वेक्षण को समग्रता से प्रस्तुत किया है। देश का दुर्भाग्य ही है कि 40 वर्ष हो जाने के बाद भी यह क्रांतिकारी पुस्तक हमारे किसी भी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं है। सर्वेक्षण में भारतीय शिक्षा व्यवस्था के बारे में अनेक तथ्य उजागर हुए है। सभी वर्णो के बालक-बालिकाओं को विद्यालयों में प्रवेश था। पढ़ाने वालों में भी शुद्रों सहित सभी वर्णों के शिक्षक हुआ करते थे। एक और महत्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है कि प्राचीन समय के जैसे ही 19 शताब्दि तक भारतीय शिक्षा व्यवस्था पूर्णतः स्वायत्त थी। शासन का कोई भी हस्तक्षेप शिक्षा में नहीं था। आर्थिक रूप से भी शिक्षा पूर्णतः स्वयंपूर्ण थी। 1823 के शैक्षिक सर्वेक्षण की पृष्ठभूमि इस बात को स्पष्ट करती है।

1813 में कंपनी सरकार ने भूमिसुधार अधिनियम के द्वारा सभी प्रकार की सार्वजनिक भूमि को शासकीय घोषित कर दिया। इसके द्वारा मंदिर से जुड़ी जमीन, गाँव में सामूहिक स्वामीत्व की जमीन आदि के साथ ही शिक्षा संस्थानों की जमीन को भी शासन ने अपने स्वामीत्व में ले लिया। इससे शिक्षा संस्थानों को चलाना कठीन व धीरे-धीरे असंभव हो गया। अनेक विद्यालय-महाविद्यालय बंद पड़ने लगे। तब कुछ प्रतिष्ठित भारतियों ने ब्रिटिश सरकार से हस्तक्षेप के लिये आवेदन आदि किये। शासन के दबाव में इस्ट इंडिया कंपनी ने घोषणा की कि भारतीय शिक्षा संस्थानों को प्रतिवर्ष 1 लाख रूपयों का अनुदान दिया जायेगा। भारतीय इतिहास में यह पहला सरकारी शिक्षा अनुदान है। इससे पूर्व शिक्षा के सरकारीकरण का पाप द्रोणाचार्य को राज्यसेवा में रखने से हुआ था। उस महापाप का क्षालन महाभारत के नरसंहार से हुआ। गत 180 वर्ष के पाप का क्षालन ना जाने कितने रक्तप्रवाह से होगा।

इस अनुदान को बाँटने पर विधिक सलाह देने के लिये मैकाॅले नामक वकील को बुलाया गया। कितने शिक्षा संस्थान है जिन्हें अनुदान दिया जाय यह जानने के लिये पूरे भारत में शैक्षिक सर्वेक्षण किया गया था। वकील मैकाॅले ने अपनी कुटील बुद्धि से भारत की सर्वव्यापी, स्वायत्त, समाजाधारित, समृद्ध शिक्षा व्यवस्था को नष्ट कर दिया। 1835 में उसने शिक्षा का पूर्णतः सरकारीकरण कर दिया। भारतीयों को शिक्षा देने से कानुनन वंचित कर दिया। केवल कंपनी व इसाई मिशनरियों को विद्यालय चलाने की अनुमति दी गई। मैकाॅले की शिक्षा नीति ने प्रथम बार शिक्षा में जाति के आधार पर प्रतिबंध लगाये। ब्राह्मणों के सिवा सभी जातियों को शिक्षा से वंचित कर दिया। बाद में क्षत्रिय तथा वैश्यों के आवेदन करने पर इन्हें तो प्रवेश मिल गया पर असंगठित होने के कारण शुद्र शिक्षा से वंचित रह गये। कुछ ही दशकों में भारत का बहुजन समाज अशिक्षित हो गया। 1823 में जहाँ 76 प्रतिशत जनसंख्या सुशिक्षित थी आज स्वतंत्रता के 67 वर्षों के बाद भी अपना नाम लिख पाने वाले को भी साक्षर समझ लेने के बाद भी केवल 74 प्रतिशत ही साक्षरता हो पायी है। यह अंतर है शासन निरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था व सरकारी व्यवस्था का।

स्वतंत्रता के बाद यह अपेक्षा थी कि अंग्रजों की व्यवस्था को बदल कर सही अर्थ में स्व के तन्त्र को लागू किया जायेगा। पर जिन लोगों के हाथ में शासन की बागड़ौर थी वे थे तो भारतीय पर मैकाॅले की व्यवस्था में शिक्षित -‘‘दिखने में तो भारतीय पर अंदर से पूर्णतः अंगे्रज भक्त’’। इन मैकाॅले पुत्रों ने अपने कतृृत्व से अपने आप को मैकाॅले का बाप ही सिद्ध किया है। 1991 के बाद सब ओर जब नीजीकरण का बोलबाला हुआ तब शिक्षा क्षेत्र में भी नीजीकरण हुआ। किंतु यह केवल व्यापारीकरण था। सरकारी नियन्त्रण तो बढ़ता ही रहा है। स्वतंत्रता केवल लूटने की है। छात्र व शिक्षक का शोषण नीजीकरण से बढ़ा। इसके उपाय के रूप में शासन का नियन्त्रण और बढ़ाया गया। अनेक नियामक संस्थाओं का निर्माण हुआ। इनसे शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ने के स्थान पर केवल भ्रष्टाचार ही बढ़ा। शिक्षा क्षेत्र के भ्रष्टाचार ने आज सभी सीमायें लांघ दी है। सभी स्तरों पर गुणवत्ता का प्रचंड ह्रास हुआ है। यदि शीघ्र उपाय नहीं किया गया तो 10 वर्ष बाद हम पढ़े-लिखे मूर्खों का देश हो जायेंगे।

शासन निरपेक्ष शिक्षा ही वास्तव में गुणवत्तापूर्ण, सर्वव्यापी तथा शुचितापूर्ण हो सकती है। शासन निरपेक्ष का अर्थ नीजीकरण नहीं है। नीजी व्यापारियों के हाथ में शिक्षा सौंपना उपाय नहीं हो सकता। गत 25 वर्षों का अनुभव बताता हैं कि इस प्रकार के व्यापारिक नीजीकरण से लाभ से अधिक नुकसान ही होता है। दूसरी ओर शासकीय संस्थानों में कर्मसंस्कृति का पूर्ण अभाव पाया जाता है। काम करने के स्थान पर टालने के उपाय ही किये जाते है। आज हर स्तर पर पाठ्यक्रम पर पूरी तरह शासकीय नियन्त्रण हो गया है। अनेक अनुमतियों, सम्बद्धताओं और उनके वार्षिक नवीनीकरण के नाम पर भ्रष्टाचार के साथ ही प्रशासनीक नियन्त्रण बढ़ गया है। आज अनेक शिक्षाविद् कुलपति जैसे पदों पर आरूढ़ होते हुए भी शासन के शिक्षा विभाग के अधिकारियों के ही नहीं बाबुओं के सामने भी लाचार दिखाई देते है। अतार्किक नीतियों के कारण धन के होते हुए भी आवश्यक कार्यों पर उसका उपयोग नहीं हो पा रहा है। परिणामतः देश में अनुसंधान व नवोन्मेष के क्षेत्र में पूर्ण शिथिलता आ गई है। इस घोर तमस से शिक्षा व्यवस्था को उभारने के लिये केवल सरकार को ही नहीं पूरे देश को भी शिक्षा को प्रथम वरीयता की आवश्यकता मानकर उपाय करना होगा।

वास्तव में अपनी नई पीढ़ि को समय की आवश्यताओं के अनुसार जीवनोपयोगी शिक्षा देने का दायित्व समाज का है सरकार का नहीं। आज भी अनेक सामाजिक संस्थाओं द्वारा आदर्श शिक्षा संस्थाओं का संचालन किया जा रहा है। वैसे तो आर्थिक संसाधन भी समाज ही जुटा सकता है किन्तु जिस प्रकार आज शासन सर्वव्यापी हो गया है उसके चलते कम से कम कुछ दशकों तक तो आर्थिक भार शासन को ही वहन करना होगा। किन्तु नियन्त्रण, नियमन तथा संचालन में स्वायत्तता की ओर गति किये बिना कोई भी उपाय प्रभावी व परिणामकारी नहीं हो सकेंगे। स्वायत्तता का निर्णय शासन को ही करना है। शासन को ही अपने अधिकार कम करने का निर्णय लेना है अतः इसमें राजनयिक ईच्छाशक्ति की प्रचण्ड आवश्यकता होगी। ऐसी ईच्छाशक्ति या तो स्पष्ट वैचारिक प्रतिबद्धता से आती है अथवा लोकतन्त्र में जनमत के दबाव में। दोनों स्तरों पर प्रयास करने होगे।

वर्तमान परिस्थिति में शिक्षा व्यवस्था में शासन की भूमिका पर विचार करते समय शासन-निरपेक्ष शिक्षा के आदर्श को सामने रखकर उसे क्रमशः कैसे प्राप्त किया जाय इस पर विचार करना होगा। सबसे पहला कदम तो राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा को समग्रता से संचालित करने के लिये पूर्णतः स्वायत्त शिक्षा आयोग स्थापित किया जाना होगा। वर्तमान में प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च व उच्चतर ऐसे भिन्न-भिन्न स्तरों पर शिक्षा का संचालन किया जा रहा है। इसी के साथ अभियांत्रिकी, चिकित्सा, कृषि व शारीरिक शिक्षा आदि विषयों के अनुसार भी विविध नियामक है। इन सबके स्थन पर शिक्षा आयोग को पूरी शिक्षा को समग्रता से देखने का दायित्व दिया जाय। इससे समग्र व एकात्म शिक्षा नीति का विकास सम्भव होगा। इसी प्रकार के पूर्ण स्वायत्त शिक्षा आयोग राज्य तथा आगे जिला स्तर तक भी स्थापित करने होंगे। सच्चे अर्थों में स्वायत्त होने के लिये शिक्षा आयोग की संरचना पूर्णतः गैर राजनैतिक व गैर प्रशासनिक होनी होगी। शिक्षा विभाग के प्रशासनिक अधिकारी यहाँ तक की मंत्री भी इस आयोग के अधीन होने होंगे। समाज के सभी क्षेत्रों के सुयोग्य, प्रतिष्ठित व प्रामाणिक प्रतिनिधियों को ही आयोग में स्थान मिले। शिक्षा के संचालन, प्रायोजन, नियमन तथा नियन्त्रण का पूर्ण उत्तरदायित्व इस आयोग का हो।

आयोग का कार्य हो कि शिक्षा की स्वायत्तता को नीचले स्तर तक लागू किया जाय। क्रमशः पाठ्यक्रम निर्धारण, नियुक्तियाँ तथा व्यय जैसे सभी कार्यों को जितना विकेन्द्रित रूप में कर सकेंगे उतना ही समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था का विकास हो सकेगा। विभिन्न स्थानों की स्थिति के अनुसार प्रारम्भिक अथवा व्यावसायिक अथवा सामान्य शिक्षा को वरीयता दी जा सकेगी। जहाँ जैसी प्ररिस्थिति, आवश्यकता व विशेषता हो उसके अनुरूप शिक्षा का प्रावधान सम्भव होगा। नीति-निर्धारण के सभी स्तरों पर शिक्षक, अभिभावक एवं समाज के सभी क्षेत्रों का सहभाग सुनिश्चित किया जाय ताकि शिक्षा केवल सैद्धांतिक ना रहकर व्यावहारिक भी हो सकें। शासन की भुमिका प्रारम्भ में प्रेरक व पोषक की होगी। सकल उत्पाद के 10 प्रतिशत को शिक्षा हेतु आवंटित किया जाय तथा स्वायत्त शिक्षा आयोग के माध्यम से इसके सुनियोजित सम्पूर्ण उपयोग को सुनिश्चित किया जाय। शनैः शनैः समाज का आर्थिक योगदान बढ़ाया जाय व इस स्तर पर भी शिक्षा को शासन निरपेक्ष बनाया जाय। वर्तमान में सभी व्यापारिक प्रतिष्ठानों को विधिक दायित्व के रूप में अपने विशुद्ध लाभ का 2 प्रतिशत सामाजिक दायित्व (CSR) के प्रति व्यय करना होता है। इसका आधा हिस्सा शिक्षा आयोग को मिले ऐसा वैधानिक प्रावधान किया जा सकता है। अन्य कार्यों में भी समाज की भागीदारी ली जा सकती है। राजस्थान में भामाशाह योजना के माध्याम से शासकीय शालाओं में संरचना विकास में समाज की भागीदारी बड़े प्रमाण में होती रही है। पाली जिले के सभी विद्यालयों के भवन, फर्निचर व अन्य शिक्षा सामग्री इस योजना से जुटाई गई। शिक्षकों व इतर कर्मचारियों का वेतन ही केवल शासन को देना पड़ता था। यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि पूर्णतः शासन निरपेक्ष शिक्षा केवल आदर्श स्वप्न नहीं अपितु व्यावहारिक रूप से पूर्ण सम्भव है।

समाजोपयोगी, परिणामकारी, समग्र, व्यावहारिक, गुणवत्तायुक्त, सस्ती, सुलभ शिक्षा व्यवस्था के लिये शिक्षा को पूर्णतः शासन निरपेक्ष बनाना होगा। प्रारम्भ में नीति निर्धारण, पाठ्य रचना व शिक्षा पद्धति का निधारण सरकार के स्थान पर स्वायत्त आयोग को सौपना होगा। अगले चरण में शिक्षा के संचालन व प्रशासन को शासन से मुक्त करना और अन्ततः आर्थिक रूप से भी शासन पर निर्भरता को समाप्त करना होगा। तभी सच्चे अर्थों में शासन निरपेक्ष समाजाधारित शिक्षा व्यवस्था को साकार किया जा सकता है। यदि आज प्रारम्भ किया जाय तो देश के प्रगत राज्यों में एक दशक में और पूरे देश में 25 वर्षों में सबके लिये इस प्रकार की आदर्श शिक्षा को सुनिश्चित किया जा सकेगा।

सितम्बर 8, 2014 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

राष्ट्रीय शिक्षा के प्रवर्तक विश्वात्मा विवेकानन्द


SVquote Bharat utho    स्वामी विवेकानन्द विश्वात्मा थे। उन्होंने सृष्टि की एकात्मता का अनुभव किया था। अमेरिका में सहस्त्रद्विपोद्यान (Thousand Island Park) में अपने अंतरंग शिष्यों कें प्रशिक्षण के मध्य एक दिन स्वामींजी अपने कक्ष मे एक कोने से दुसरे तक चक्कर लगा रहे थे। उनके शिष्यों ने लिखा है कि पिंजडे में बंद क्रुध्द सिंह के समान स्वामीजी की छटपटाहट थी। किसी की बीच में बोलने की हिम्मत नहीं थी। चलते चलते अचानक स्वामीजी रूके और अपने शिष्य कप्तान सेवियर के कंधे झकझोरते हुए बोले ‘‘ये विश्व समझता क्यों नहीं कि वह ईश्वर से व्याप्त है?’’ विश्व को उसके दिव्यत्व का परिचय कराना उनकी व्याकूलता का मर्म था। यही इनका जीवन ध्येय था।
भारत मे लौटने के बाद उन्होंने पूरे भारत के दिग्विजयी प्रवास में यही घोषणा की। विश्व मानवता को अपने दिव्यत्व का परिचय कराने के लिए इस राष्ट्र का तपःपूत अविष्कार हुआ है। जगत् का मार्गदर्शन ही भारत का जीवनोद्देश्य है। यही स्वामी विवेकानन्द की विश्वविजय की संकल्पना थी। उन्होंने कहा था, ‘उठो भारत! अपनी आध्यात्मिक शक्ति से विश्व पर विजय प्राप्त करो।’ भारत विश्व को राजनैतिक अथवा सामरिक दासता से जीतना नहीं चाहता। हमें विश्व का राज्य नही चाहिए। ना ही हम व्यापार से विश्व बाजार पर कब्जा करना चाहते है। भारत की आंतरिक अभिलाषा है जगद्गुरू बनना। यही हमारी राष्ट्रीय नियति है। स्वामीजी की भारतभक्ति मानवकल्याण का ही मार्ग थी।
इस राष्ट्रीय उद्देश्य के अनुरूप ही राष्ट्रीय शिक्षा का स्वरूप होना चाहिए। स्वामी विवेकानन्द ने ऐसे समर्थ, समृध्द व समरस भारत के निर्माण हेतु आवश्यक शिक्षा पध्दतिtatasv का प्रतिपादन किया। विज्ञान की शिक्षा को उन्होंने अत्यंत आवश्यक माना। शिकागो जाते समय मुम्बई से जापान तक जमशेदजी टाटा स्वामीजी के साथ थे। स्वामीजी ने टाटा को दो ऐतिहासिक प्रेरणायें दी। एक तो भारत में फौलाद उद्योग को पुनर्जीवित करना। 18 वी शताब्दी तक भारत की लौह भट्टियाँ विश्व का सर्वोत्तम फौलाद निर्माण करती थी। स्वामीजी ने स्वप्न देखा कि भारत पुनः लौह उद्योग का अग्रणी बन जाए। जमशेदजी टाटा को दूसरी प्रेरणा दी विज्ञान में अनुसंधान की। ‘टाटा भौतिक अनुसंधान संस्थान’ बंगलुरू की स्थापना के बाद टाटा ने स्वामीजी को पत्र लिखा जिसमें इस चर्चा का उल्लेख है। टाटा की इच्छा थी कि स्वामीजी इस संस्थान के निदेशक बने। आज भी संस्थान के स्वागत कक्ष में यह पत्र बडे अक्षरों में अंकित है।
बाद में रामकृष्ण मठ व मिशन की स्थापना के समय स्वामीजी ने सन्यासियो से कहा, ‘जाओं! गांवो को शिक्षित करों! इन्हें सच्चे धर्म की शिक्षा दो। पाखंड़ और आडम्बर से मुक्त करों। एक हाथ में पृथ्वी का गोल व दूसरे में टार्च लेकर इन्हें शिक्षा दो कि ग्रहण कैसे होता है।’
स्वामीजी चरित्र-निर्माण करनेवाली सर्वांगीण शिक्षा की बात करते थे। उनकी शिक्षा की परिभाषा थी, ‘मानव के अन्तर्निहित पूर्णत्व की अभिव्यक्ति’। बाहरी सूचनाओं को मस्तिष्क में ठूसने को वे शिक्षा नहीं मानते थे। अन्दर के ज्ञान को प्रस्फुटित करनेवाली अनुभूति मूलक प्रायोगिक शिक्षण पध्दति का उन्होंने प्रतिपादन किया। आज अनेक शैक्षिक प्रयोग इस विधि को आधुनिकतम मानकर अपना रहे है ।
स्वामीजीने शिक्षा के लोकव्यापीकरण की कल्पना की भी। उन्होंने भारत निर्माण के लिए जनसामान्य को शिक्षित करने पर बल दिया। सामान्य व्यक्ति की आर्थिक वास्तविकताओ का भान इस सन्यासी को था। दो समय की रोटी की चिंता करनेवाले श्रमिक, किसान के लिए विद्यालय तो अकल्पनीय अपव्यय था। इस बात को समझकर स्वामीजी ने कहा, ‘प्यासा कुए के पास न आ सके तो कुए को प्यासे के पास ले जाओ। शिक्षा को श्रमिक के कार्यस्थल किसान के खेत में ही उपलब्ध करा दो। गाँव की चैपाल को विद्यादान का केन्द्र बना दो।’
नारी शिक्षा की अनिवार्यता को स्वामीजी ने भलीभाँति जाना था। माँ के शिक्षित होने का अर्थ है परिवार का सुशिक्षित होना। मार्गारेट नोबल को उन्होंने भारत में स्त्रीशिक्षा की नीव रखने के लिए प्रेरित किया। पूर्ण प्रशिक्षण के बाद समर्पित शिष्या को नाम दिया भगिनी निवेदिता। भगिनी निवेदिता ने सारदा बालिका विद्यालय की स्थापना की। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा के आंदोलन का सूत्रपात किया। आगे चलकर महर्षि अरविन्द, टिळक, आगरकर व महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय शिक्षा को स्वतंत्रता आंदोलन का आधार बनाया।
स्वतंत्रता के बाद हमने शिक्षा के प्रसार पर विशेष ध्यान दिया। कुछ जनजातीय क्षेत्रों को छोड दिया जाए तो आज देश के कोने कोने में शिक्षा की व्यवस्था उपलब्ध है। पूर्ण सफलता में निश्चित ही अभी और परिश्रम आवश्यक है, किन्तु इससे अधिक अनविार्य है शिक्षा में भारतीयता की। भारत के राष्ट्रीय लक्ष्य के अनुरूप भारतहित की देशज शिक्षा पध्दति के निर्माण का चिंतन, प्रयोग व प्रसार करना स्वामी विवेकानन्द की 150 वी जयंतिपर उन्हें समुचित श्रध्दांजली होगी।

जनवरी 12, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

   

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