उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

हताश स्वार्थों का असफल बंद


जातियों के नाम पर आंदोलनों की बाढ़ आ गयी है। राजनीति में हारे हुए दलों की हताशा का यह परिणाम है कि समाज को तोड़ने के लिए विभिन्न बहानों का आधार लेकर जातीय अस्मिता का उपयोग करने का प्रयत्न किया जा रहा है। आरक्षण जैसे स्वार्थी मांगों के लिए पटेल, गुर्जर, जाट, मराठा आदि जातियों को भड़काने का प्रयत्न किया। प्रायोजित नेतृत्व के पीछे करोड़ों रूपया खर्च किया गया। इन आंदोलनों में समाज के कुछ लोग भ्रमित होकर सम्मिलित हो गए। किंतु शीघ्र ही सत्य सामने आ गया और समाज के बड़े वर्ग का इस प्रायोजित नेतृत्व से मोहभंग हो गया। जिन चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखकर ये सारे षडयंत्र किए गए वे भी असफल हो गए। महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात में देश के सबसे पुराने दल को इन समस्त हथकंडों के बाद भी करारी हार झेलनी पड़ी। इन सभी स्वार्थी तत्वों का अब लक्ष्य दलित वर्ग बना है। भीमा-कोरेगांव हो अथवा 2 अप्रैल इ.स. 2018 का भारतबंद, दोनों ही झूठी कहानियों पर दलितों को भड़काने का प्रयत्न था। दोनों प्रयत्न पूर्णतः असफल हुए। दलित समाज के बड़े वर्ग का समर्थन इन झूठे आंदोलनों को नहीं मिला।

बसें जलाना, गाड़ियों को तोड़ना और अन्य प्रकार की हिंसा में पुलिस को लक्ष्य करना आदि के द्वारा प्रसार माध्यमों में दर्शनीय प्रचार होने के कारण यह बात फैलाने का प्रयत्न हुआ कि आंदोलन सफल हुए। किंतु थोड़ा भी निष्पक्ष सूक्ष्मता से अवलोकन किया जाए तो दोनों ही घटनाओं में भाड़े के प्रदर्शनकारी ही प्रमुखता से दिखाई देंगे। दलित समाज इन राजनैतिक दलों के स्वार्थी सत्य को समझ गया है। अतः प्रायोजित नेताओं के पीछे अपनी आजीविका को छोड़कर समय नहीं व्यर्थ गंवाते। यदि भीमा-कोरेगांव में थोड़ा भी सत्य होता तो केवल 2-3 दिन में आंदोलन शांत होना संभव नहीं था। गांवों में सौहार्द बना रहा और मुंबई में किराये के गुंडों से उत्पात मचाया गया। जालीदार टोपी पहने ‘दलितों’ को अशोकचक्र सहित नीले झंडे लेकर तोड़फोड़ करता हुआ देखा गया। दलित अत्याचार अधिनियम के कथित परिवर्तन की झूठी कहानी को लेकर किए भारतबंद में भी यही दृश्य पुनः दिखाई दिया। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में हुए किसान आंदोलन भी इसी प्रकार के प्रायोजित राजनैतिक प्रयत्न थे। कर्नाटक और पंजाब जहां किसान सर्वाधिक पीड़ित हैं वहां कोई आंदोलन नहीं हुए। भारतबंद में भी 32% दलित जनसंख्या होते हुए भी पंजाब में कोई हिंसा की घटना नहीं हुई। संभवतः आंदोलन को प्रायोजित करने वाले दल ही सत्ताधारी होने के कारण ऐसा हुआ होगा।

सभी आंदोलनों में राज्य एवं केंद्र सरकार के धैर्य की सराहना करनी होगी। इस धैर्य के कारण ही पूरी तैयारी होने के बाद भी आंदोलनों को हिंसक स्वरुप नहीं दिया जा सकता। इस बात के लिए केवल प्रशासनिक सूझबूझ ही नहीं अपितु राजनैतिक दूरदृष्टि की भी आवश्यकता होती है। अस्थायी चुनावी हितों के लिए देश की सुरक्षा व समाज की एकात्मता को दांव पर लगानेवाली राजनीति का उत्तर अपनी ओर से उसी प्रकार के तुष्टिकरण से उत्तर देने के स्थान पर जाती, पंथ, लिंगभेद के परे जाकर सबको समर्थ बनाने का कार्यक्रम लागू करना वर्तमान केंद्र सरकार की सफलता का रहस्य है। जनसामान्य को सक्षम बनानेवाली योजना में अप्रत्याशित गति गत तीन वर्षों में आई है। अनेक योजनाएं तो पूर्व सरकार द्वारा प्रारंभ की गयी थी किंतु प्रशासनिक अक्षमता के कारण उनका कोई परिणाम जमीन पर नहीं दिखाई दे रहा था। मोदी सरकार ने पूरी शासकीय यंत्रणा को संकल्पबद्ध (mission-mode) गति प्रदान की। हजार दिनों में 5 करोड़ जनधन खाते खोलने का लक्ष्य सरकारी बैंकों को दिया गया। केवल 15 माह में लक्ष्य पूरा हुआ। हजार दिनों में तो दस करोड़ खाते खुल जाएंगे। इन खातों के माध्यम से सरकारी योजनाओं की सहायता सीधे हितकारी तक पहुंचाने का कार्य प्रारंभ हुआ जिससे बिचौलियों द्वारा भ्रष्टाचार को बड़ी मात्रा में कम किया।

पंजाब में कोई प्रदर्शन अथवा हिंसा भारत बंद के मध्य नहीं हुई। इन बातों से यह स्पष्ट है कि पूरा का पूरा आंदोलन किसी विशेष दल द्वारा चलाया गया है। भारत बंद की पूर्ण असफलता का कारण यह है कि समाज से जुड़ा हुआ यह विषय नहीं है। कोई बड़ा आक्रोश दलित समाज में इस विषय को लेकर नहीं हैं। राजनीतिक दलों द्वारा अपने स्वार्थ के लिए मुद्दों को उठाया गया है जिनका समाज से कोई संबंध नहीं है। हिंसा की घटनाएं, बसों का जलाना आदि माध्यमों में प्रमुखता से दिखाया गया। इस कारण यह भ्रम फैला कि जातिगत विषमता समाज में बढ़ी है। वास्तविकता इसके विपरीत दिखाई देती है। नई पीढ़ी पुराने दकियानूसी विचारों से मुक्त हुई है। समाज के सभी वर्गों के युवा देश को एक नई दिशा दिखाना चाहते हैं इसलिए जातिगत समीकरण अब और अधिक समय तक राजनीतिक लाभ नहीं देंगे। सारे दल इस बात को समझे तो समाज का भी भला होगा और उनका भी जिन दलों ने गत 5 वर्षों में भी अपने जातिगत विभाजनकारी विचार को नहीं बदला वे आज समाप्ति के कगार पर हैं। पूर्वोत्तर में इन दलों की सोच थी कि वनवासी और ईसाई बहुल राज्यों में केवल तुष्टीकरण से सत्ता बनाई जा सकती है। किंतु भारत की लोकतांत्रिक जनता ने ऐसे दलों को उनका स्थान दिखा दिया। आज देश की जनता सबके सर्वांगीण विकास का विचार करते हुए एक स्थिर सरकार बनाने के लिए मतदान करती है। सभी राज्यों में यही दृश्य दिखाई दिया कि जिस दल का पूर्ण बहुमत आने की संभावना है उसे जनता ने सभी मतभेदों से ऊपर उठकर आशिर्वाद प्रदान किया। अतः विभाजनकारी राजनीति के दिन अब लद चुके हैं। 2019 के चुनाव के लिए जो लोग विभाजन की रणनीति बना रहे हैं वे जनता के भाव से पूरी तरह कटे हुए हैं। वे नहीं जानते कि समाज किस प्रकार सोच रहा है।

जो लोग सामाजिक माध्यमों में भारत बंद का विरोध कर रहे थे वे भी परोक्ष रूप में इन्हीं विभाजनकारी शक्तियों का साथ दे रहे थे। प्रमुख माध्यमों ने भारतबंद की हिंसा को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया। उन्होंने यह नहीं दिखाया कि लगभग पूरे देश में सभी बाजार खुले हुए थे, संचार व्यवस्था सुचारू चल रही थी क्योंकि समाज का साथ भारतबंद करने वाले तथाकथित नेताओं को नहीं था। इस बात को समाज के सम्मुख रखने का दायित्व हम जैसे कार्यकर्ताओं का है। हम सकारात्मक पहलुओं को समाज के सम्मुख उजागर करें ताकि 2019 का चुनाव सच्चे अर्थ में भारतीय लोकतंत्र के प्रौढ़ होने का प्रमाण बनें। इस बात से अधिक अंतर नहीं पड़ता कि कौन चुनाव में विजयी होता है। राष्ट्र के लिए अधिक आवश्यक है कि किन मुद्दों पर चुनाव लड़ा जाता है। राजनीतिक दल किस विमर्श का प्रयोग करते हैं और उसकी दिशा तय करने के लिए सकारात्मक बातों को प्रचारित करना आवश्यक है।

अप्रैल 4, 2018 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

कैसे दूर हो संसद के प्रति समाज की अनास्था ?


संसद के ६० वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर विशेष सत्र का आयोजन कर उत्सव मनाया गया । पर क्या केवल उत्सव मनाना पर्याप्त है ? सैद्धांतिक रूप से जो सम्मान व महत्व संसद का है क्या वह गरिमा आज जनमानस में स्थापित है ? क्या देश की जनता संसद के हीरक महोत्सव के समारोह में मन से जुडी ? क्या उसे इसका कोई हर्ष हुआ ?

हमारे लोकतन्त्र की सबसे बडी पंचायत संसद के सत्रों को १३ मई २०१२ को ६० वर्ष पूरे हुए । संसद का महत्व इस कारण है क्योंकि स्वतन्त्र भारत के संविधान के अनुसार यह हमारी सर्वोच्च विधायिका है । देश में सुशासन के लिये समुचित कानून बनाने का कार्य संसद को करना है । जिस संविधान के द्वारा इसकी स्थापना हुई उसमें परिवर्तन का अधिकार भी संसद को ही है । सामूहिक निर्णय लोकतन्त्र में सुराज की आत्मा है । संसद चर्चा के द्वारा सामूहिक निर्णय का स्थान है । देश की नीतियों के निर्धारण का कार्य यद्यपि कार्यपालिका का है, किन्तु उनकी समीक्षा तथा दिशा निर्देशन का कार्य संसद में विभिन्न चर्चाओं के माध्यम से किया जाता है । भारतीय लोकतन्त्र में हमने जो व्यवस्था स्वीकार की है उसमें कार्यपालिका भी संसद का ही अंग होती है । मुख्य कार्यपालक प्रधानमंत्री का संसद सदस्य होना अनिवार्य है । यदि नियुक्ति के समय वह सांसद नहीं है तो ६ माह के भीतर सांसद बनना अनिवार्य है । इस प्रकार संसद भारतीय राजव्यवस्था में सर्वोच्च है । न्यायपालिका को संसद के निर्णय बदलने का अधिकार नहीं है । संसद द्वारा बनाये कानून यदि संविधान के विपरीत हो तब ही न्यायपालिका हस्तक्षेप कर सकती है । अन्यथा इन कानूनों के अनुसार ही निर्णय देने के लिये सर्वोच्च न्यायालय बाध्य है ।

संसद के वर्चस्व का आधार उसका निर्वाचित स्वरूप है । सैद्धांतिक रूप से लोकतन्त्र में जनता ही राजा है । जनता के प्रतिनिधि राज चलाते हैं । अत: जनता के प्रतिनिधियों को सर्वाधिक अधिकार प्राप्त हैं । जिसको संसद में बहुमत प्राप्त है वह भारतीय राजव्यवस्था में सर्वाधिकारी है । जनता के निर्वाचन द्वारा सांसदों को यह नैतिक अधिकार मिल जाता है कि वे देश के बारे में निर्णय करें । यह नैतिक अधिकार ही वास्तव में संसद को राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण संस्था का दर्जा देता है । संसद के ६० वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर विशेष सत्र का आयोजन हुआ । स्मृतियों को संजोया गया । पूर्व सांसदों का स्मरण किया गया । प्रथम लोकसभा के दो जीवित सदस्यों श्री रिशांग किशिंग तथा श्री रेशमलाल जांगिड का सम्मान भी किया गया । कुल मिलाकर उत्सव मनाया गया । पर क्या केवल उत्सव मनाना पर्याप्त है ? सैद्धांतिक रूप से जो सम्मान व महत्व संसद का है क्या वह गरिमा आज जनमानस में स्थापित है ? क्या देश की जनता संसद के हीरक महोत्सव के समारोह में मन से जुडी ? क्या उसे इसका कोई हर्ष हुआ ?

वास्तव में स्वतन्त्र भारत के पडौस में जो देश हैं उसकी राजनीतिक दृष्टि से समीक्षा करें तो यह अपने आप में हमारे लिए बहुत बडी उपलब्धि है । भारत के साथ उसी से कटकर बने सभी पडौसी देशों में लोकतन्त्र का अस्तित्व ही खतरे में रहा है । पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यान्मार, श्रीलंका, नेपाल, मालदीव तथा अफगानिस्तान सभी देशों में राजनैतिक उथल-पुथल ही चल रही है । ऐसे में १९७५ से ७७ के आपात्काल के कुछ माह छोड दिये जाये तो भारत ने स्थिर लोकतन्त्र का परिचय दिया है । इतने विशाल, विविधता सम्पन्न राष्ट्र के लिये यह अपने आप में ही बहुत बडी उपलब्धि है । किन्तु आज कितने भारतीय इस विचार से ऐसी सकारात्मकता से जुड सकते हैं ? दोष उनका भी नहीं है । हमारी लगभग सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं में से समाज की आस्था उठ चुकी है । इसके चारित्रिक कारण है । संसद की गरिमा की रक्षा सांसद ही कर सकते हैं और पिछले कई वर्षों में राजनीतिक दलों के साथ ही सांसदों के चरित्र में भी गिरावट आई है । जो हमारी विशेषतायें थी वे ही बाधा बन गई । कार्यपालिका पर निर्वाचित संसद का अंकुश रहने के स्थान पर भ्रष्टाचार में भागीदारी के लिए कार्यपालिका का अंग बनने हेतु सांसद चुने जाने की परम्परा प्रारम्भ हो गई । सेवा के स्थान पर राजनीति व्यवसाय बन गई । इसी कारण संसद के ६० वर्ष पूर्ण होने पर सांसदों के अलावा किसी ने उत्सव नहीं मनाया । यह तो ऐसा हुआ कि स्वयं का जन्मदिन केवल स्वयं ही मनाये । केवल व्यक्तिगत चारित्र्य ही संसद की गिरती गरिमा के लिए कारणीभूत नहीं है, वरन् वास्तव में ऐसे व्यवस्थागत कारण भी है जिसके चलते चरित्रहीन व्यक्ति लोकतन्त्र के मंदिर का पुजारी बन सकता है । भारत में पंचों को परमेश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है । यदि संसद को देश की सर्वोच्च पंचायत का यह दैवी सम्मान पुन: दिलाना है तो राजनैतिक दलों से सुयोग्य व्यक्ति को विधायिका में भेजने के साथ ही दो महत्वपूर्ण व्यवस्थागत सुधार भी अनिवार्य है ।

१.   निर्वाचन में सही अर्थों में बहुमत के प्रतिनिधि का चयन हो । वर्तमान चुनाव प्रणाली में मतदान के सर्वाधिक हिस्से का प्रतिनिधि निर्वाचित हो जाता है । विविधता के कारण दलों व प्रत्याशियों की संख्या बडी होती है । अत: ऐसा यदा कदा ही होता है कि निर्वाचित प्रतिनिधि को बहुमत ने चुना हो । अधिकतर सांसद १५ से २५ प्रतिशत मत पाकर सांसद बन जाते हैं । यह प्रतिशत भी उन मतों का है जो मतदान में सम्मिलित हुए । परंतु जो २५ से ४० प्रतिशत मतदाता अपने मताधिकार का आलस, व्यस्तता अथवा घोर अनास्था के कारण प्रयोग ही नहीं कर रहे, उनकी तो गणना ही नहीं है । इस प्रकार समाज के ८० प्रतिशत से अधिक लोगों द्वारा नकारे हुए प्रतिनिधि संसद में जनता का प्रतिनिधित्व करने का दंभ भरते हैं । इस नकारा पद्धति के कारण राजनीति का स्वरूप विभाजनकारी हो गया है । जाति, पंथ, भाषा अथवा जो भी मिल जाये उस आधार पर जनता को बाँटकर अपने लिये प्रभावी अल्पमत का समर्थन प्राप्त करना प्रत्येक दल व नेता का लक्ष्य बन गया है । इसी के चलते सांसदों की भी मंडी लगती है । अत: संसद के ६० वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर चुनाव में विजय के लिये ५० प्रतिशत से कम से कम एक मत अधिक का प्रावधान किया जाना चाहिये ।

२.   सांसदों में भ्रष्टाचार का दूसरा व्यवस्थागत कारण कार्यपालिका व विधायिका का घोलमेल है । मंत्री बनने के लिये सांसद होना अनिवार्य है । मंत्री के कार्यों पर नियन्त्रण व अंकुश रखने का काम भी संसद को करना है । इस दोहरे दायित्व के आपसी हितसम्बन्ध होने के कारण ही कार्यपालिका के भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के स्थान पर विधायिका उसकी भागीदार बनती दिखाई दे रही है । अत: कार्यपालिका के स्वतन्त्र स्वरूप को विकसित कर संसद केवल विधायिका के रूप में तथा कार्यपालिका की नीति के लिये मार्गदर्शक तथा समीक्षक की भूमिका में हो, यह आवश्यक है । वर्तमान स्थिति में इसका एक समाधान मुख्य कार्यपालक प्रधानमंत्री के प्रत्यक्ष चुनाव से हो सकेगा । यदि देश की पूरी जनता प्रधानमंत्री के चुनाव में मतदान करे तथा उसमें भी बहुमत से चयन का ही नियम हो तो, एक स्थिर कार्यपालिका के साथ ही तटस्थ विधायिका का निर्माण हो सकेगा ।

संसद के हीरक महोत्सव के अवसर पर हम वैचारिक मंथन के द्वारा देश में एक लोकतांत्रिक क्रांति का सुत्रपात करें जिससे कि विश्व का सबसे बडा लोकतन्त्र भारत और भी अधिक आदर्श एवं प्रभावशाली बनें ।

मई 16, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

लूला लोकतंत्र : जरुरी है सर्जरी


वर्ष २०११ में हुए आंदोलनों में जनता की प्रचंड ताकत देखने में आई |
किसी भी नीति के निर्धारण में जनता की सोच लोकतान्त्रिक ढांचे में एक महत्वपूर्ण कारक होती है| इसलिए नीतियाँ बनाने वालो की तरफ से हमेशा से ही जनमत या जनता की “सोच”  को ढालने का संगठित प्रयास होता रहता है | मिडिया के बड़े प्रभाव क्षेत्र से लोगो की सोच को प्रभावित करना अब एक विशेष कार्य बन चुका है | प्रिंट मिडिया का अपना एक वर्ग है, और वह उन्हें प्रभावित भी करती है | इलेक्ट्रोनिक मिडिया और सोशल मिडिया में हुयी बढोत्तरी से लोगो को अपनी राय व्यक्त करने के और भी मार्ग मिल गए हैं | पहले दो पर तो सरकार  का प्रभाव   हो सकता है, चूँकि उसके पास इन्हें देने के लिए  भारी भरकम मात्र में धन होता है जो वह अपने विज्ञापनों पर खर्च करती है विज्ञापनों के लिए| लेकिन पूरी दुनिया में सोशल मिडिया पर किसी भी सरकार का प्रभाव जमाना मुश्किल है|
लेकिन अब इस अभूतपूर्व चुनौती  से निपटने के लिए भी कुछ  व्यावसायिक रूप से लोगो की सोच प्रभावित करने वाले  “प्रोफेशनल” लोग काम पर लगाये जा चुके है | विकसित देशो में तो पिछले एक दशक से और अपने यहाँ कोई दो सालो से ही इस तरह के कला और विज्ञान ने प्रगति की है | वर्तमान सरकार तो इसमें बहुत ही निपुण है और इस काम में उसने इस क्षेत्र के सबसे अनुभवी लोगो को लगा रखा है | कुछ अखबारों की रिपोर्टिंग के अनुसार तो सत्ताधारी पार्टी के युवराज को “कौन से कपडे पहनने है” , “किस तरह बोला जाय ” यहाँ तक की कैमरे के सामने भीड़ में “किसी छोटे बच्चे को कैसे अपनी गोद में उठाना है ” यह तक सलाह देने के लिए प्रोफेशनल रखे गए है | कुछ अखबारों की माने तो पिछले दिनों चेहरे पर जो चमक दिखी वह भी प्रधानमंत्री के खास प्रोफेशनल सलाहकारों की सलाह का परिणाम थी | व्यावसायिक रूप से ऐसा करने वालो की करतूत का एक चिंताजनक उदहारण है अन्ना का मुम्बई अनशन |
इसके पूर्व आई. ए. सी. (बिना किसी प्रोफेशनल के ) लोगो में यह सोच बनाने में सफल रही थी की “जनलोकपाल” ही सरकार से सम्बंधित सारी समस्याओं की चाबी है | और केंद्र की सरकार ने बड़ी चालाकी से इसे संभाला …. उसने ऐसा माहोल बनाया  की भ्रष्टाचार के खिलाफ एक कानून “लोकपाल “बनाकर लाये है भले ही जनलोकपाल की कॉपी ही न हो , पर एक कदम तो बढाया! इस से लोगो के मन में एक भ्रम उत्पन्न हो गया की सरकार कुछ कर रही है और अन्ना सिर्फ अपने अहंकार की तुष्टि के लिए ही अनशन कर रहे है | टीम अन्ना ने अपनी राजनैतिक असमर्थता सिद्ध की| भारतीय जनता की मूल प्रवृत्ति है की वो कानूनी कार्यवाही  में अधिक विश्वास  करती है | अगर उन्हें थोड़ी बहुत आशा भी दिखती हो तो लोग सरकार में विश्वास बनाये रखते है | पूर्व में अप्रैल और जून में युपिए की सरकार लोगो को यह मौका देने में चूक गयी | ४ जून  को लोगो के शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर हुए वीभत्स सरकारी हमले (जिसमे महिलाये औ बच्चे भी शामिल थे ) से लोग भड़क गए और लोगो ने स्वयं को अकेला महसूस किया और इसीलिए फिर आन्दोलन को इतना भारी जनसमर्थन मिला |लेकिन सरकार इस बार लोगो में यह सोच बनाने में सफल रही की वे कुछ कर रहे है विपक्ष और टीएमसी जैसी पार्टिया केंद्र सरकार पर कड़े कानून के लिए दवाब बनाये हुए है ऐसे में अलग से कुछ करने की आवश्यकता नहीं रह जाती है ….भारत में सब कैसे होता है यह उस का सटीक उदहारण है |
इसी प्रकरण में एक जो अजीब चीज और देखने में आई वो है उनका कहना है की सारी गड़बड़ी की वजह शासन तंत्र ही है न की कोई शासन करने वाले लोग| जिस प्रकार लोकतान्त्रिक व्यबस्था भारत ने अपनाई हुयी है वास्तव में वाही सारी समस्याओ का मूल है यहाँ तक की टीम अन्ना ने तो सांसदों द्वारा उनकी पार्टी अनुशासन में बंधे रहने तक की आलोचना की | उन्होंने संसद से (व्हिप) “सचेतक”   के प्रावधान को हटाने की मांग की ताकि एक संसद अपनी मर्जी से अपनी सोच से वोट दे सके | दोगलेपन की हद हो गयी | एक तरफ तो आप लोगो के “राईट टू रिकाल ”  की बात कर रहे है , दूसरी तरफ सांसद अपनी ही पार्टी अनुशासन को न माने यह चाहते है | सचेतक का जो वैधानिक प्रावधान है वह  १९८० के समय हुयी सांसदों की खरीद फरोख्त के बाद बने “दल बदल विरोधी कानून” के बाद से और मजबूत हुआ है| एक सांसद अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह के आधार पर चुनाव जीतता है न की उसकी व्यक्तिगत जीत होती है | चुनावों में जनता के मध्य पार्टी की कार्य योजना रखी जाती है जिस पर लोग उन्हें वोट देंगे ऐसी उम्मीद की जाती है | अब कहना की पार्टी के घोषणा पत्र में बंधने की अपेक्षा एक सांसद किसी नैतिक स्थान के लिए व्यक्तिगत रूप से अधिक उपयुर्क्त होगा यह तो संसद में भ्रष्टाचार की बाढ़ ला देगी |
वास्तव में गठबंधन की  वर्तमान विडंबना ही हमारे इस त्रुटी पूर्ण  लोकतंत्र में एक भरी नौटंकी जैसे है| चुनावों में जो पार्टिया एक दुसरे के खिलाफ लडती है , वही जीतने के बाद मिलकर सरकार बनाती है, एक तरफ जहा केंद्र के स्तर पर सी.बी.आई. का डर दिखाकर या राहत का लालच देकर जिन पार्टियों से गठबंधन बनाया जाता है , राज्यों में वही एक दुसरे के कटुता पूर्ण अभियानों का निशाना बनती है |
लेकिन क्या हम इस सब के लिए लोकतंत्र को जिम्म्मेदार ठहरा सकते है ? लोकतंत्र ही मूल समस्या है ऐसा अभिमत बनाना एक वस्तुनिष्ठ समीक्षा के लिए ठीक नहीं बैठता | कोई और विकल्प ही स्वाभाविक रूप से शोषण और भ्रष्टाचार से निजत का उपाय हो सकता है |
१९७७ में जय प्रकाश नारायण की समग्र क्रांति और उसके बाद १९८६ के अयोध्या आन्दोलन में जो देखा, लोकतंत्र में राष्ट्रीय स्तर पर लोगो में हिम्मत जगाने की क्षमता है, और वही गैर राजनितिक रूप से पिछले वर्ष हुआ| निश्चित ही हम यह निष्कर्ष निकाल सकते है की लोकतंत्र के वर्तमान स्वरुप ने कुछ यथाक्रम में गलतियां की है जो हमारी आज की शासन व्यवस्था के ढहने के लिए जिम्मेदार है | पर सिर्फ लोकतंत्र को ही अपने आप ने जिम्मेदार मानकार नकारना समय के साथ उचित नहीं होगा | हमें खेल को खेल के नियमो का पालन करते हुए जीतना  होगा | इसमें कोई संदेह नहीं की बदलाव होना चाहिए | पर हमें सुधार इसी तंत्र में से इसी की अनुरूप उभार कर लाने होंगे न की एकदम अलग से कोई कदम उठाया जाय |
सैधांतिक रूप से देखा जाय तो लोकतंत्र के दो रूपों का चलन है .. पहला है  १- प्रत्यक्ष लोकतंत्र :  ऐसा माना जाता है की यूनान में एथेंस जैसे कुछ नगरो में और उत्तर भारत के कुछ गणों में सिकंदर के आक्रमण के समय यह लागू था, इसमें जनता प्रत्यक्ष रूप से शासन विधि में भाग लेती है और विधान परिषद् की कार्यकारिणी का और कही कही तो न्यायपालिका का भी चुनाव  करती है |
दूसरी है २. प्रतिनिधि आधारित लोकतंत्र :– यह वेस्टमिन्स्टर  नमूना है जो हमने अंगेजी हुकूमत की वसीयत रूप में अपनाया है| इसमें जनता द्वारा अपने प्रतिनिधि निर्वाचित किये  जाते है जो आगे कार्यपालिका का चुनाव करते है तथा अधिकांशतः न्यायपालिका को नियुक्त किया जाता है नाकि निर्वाचित किया जाता है | दोनों ही प्रकारों के तंत्र के अपने अपने गुण-दोष है | अमेरिका ने दोनों के संकर रूप को अपनाया हुआ है , इसमें राज्यों में तथा राष्ट्रीय स्तर पर भी कार्यपालिका का प्रत्यक्ष निर्वाचन होता है |जहाँ एक और विधान परिषद् के लिए प्रतिनिधि सभा होती है वही दूसरी ओर वह कार्यपालिका के नियामक प्राधिकरण के तौर पर भी  कार्य करती है | ऐसा प्रतीत होता है की अमेरिका के अधिकांश राज्यों में न्यायपालिका भी निर्वाचित होती है |
पर लगता है हमने अपने यहाँ भारत में लोकतान्त्रिक नियमो की बुरी गति कर रखी है , जिसमे बहुमत का नियम सबसे पहले है |दोनों ही प्रकार के तंत्र में  बहुमत द्वारा ही नीतिया तय होती है | निर्वाचन में यह निश्चित होना चाहिए की विजयी प्रत्याशी  को  में डाले गए मतों में से कम से कम ५०% से १ अधिक मत प्राप्त हो |जबकि यहाँ भारत में  लोकतंत्र के दिखावटी मुखिया, राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से होता है| और सबसे खतरनाक प्रावधान यह है की कार्यकारिणी का मुखिया, प्रधानमंत्री का निर्वाचन भी प्रत्यक्ष रूप से करना अनिवार्य नहीं होता है | वर्तमान प्रधानमंत्री भी राज्यसभा सदस्य है जहाँ जनता के मत का प्रत्यक्ष उपयोग नहीं होता है|  लेकिन एक प्रधानमंत्री के रूप में बने रहने के लिए  लोकसभा के सदस्यों का बहुमत उसके पास होना चाहिए , जिसमे १ +५०% का नियम अनिवार्य है | लेकिन हमारे सांसद  जिस प्रक्रिया से निर्वाचित होते है उसमे यह आवश्यक नहीं होता है की उन्हें बहुमत में वोट प्राप्त हुए हो और इसीलिए हमारे सांसद डाले गए वोटो में से ७% भी अपने पक्ष में पाकर चयनित  हो जाते है | मुश्किल से ही कोई सांसद हो जो यह दावा कर सके की उसे अपने निर्वाचन क्षेत्र से ५०% से भी अधिक वोट प्राप्त हुए हो |और इस प्रकार यह हमारेलोकतंत्र का क्रमश ढहना है | हमारे पास यहाँ तक की संवैधानिक प्रावधानों में भी वास्तविक लोकतंत्र है ही नहीं  | यह तो केवल एक झलक मात्र है | इसी से समाज में अभिजात शासन वर्ग और जाती, क्षेत्र, भाषा  और धर्मं की गन्दी ,भेद और फूट की राजनीती पनपती है | किसी भी  राजनेता के पास जीतने का यही मंत्र है की औरो को इतने टुकडो में बाँट दो की अपना हिस्सा सबसे बड़ा हो जाये | यह अनुवांशिक तौर पर व्याप्त हो चुका है|
जब तक हमारी लोकतान्त्रिक ढांचे की आधारभूत कमी दूर नहीं होती तब तक हम किसी सुधार की आशा नहीं कर सकते |
दो जरुरी आधारभूत सुधार मांगो को रखने की आवश्यकता है |
१. वर्त्तमान पटकथा के हिसाब से पहले  तो कार्यकारिणी के मुखिया, प्रधानमन्त्री का प्रत्यक्ष/सीधा  निर्वाचन हो | इसके लिए संवैधानिक संशोधन लाने होगा की गठबंधन  दौर की इस राजनीती में होना मुश्किल है, जहाँ एक छोटी क्षेत्रीय पार्टी को भी असंगत महत्व और मूल्य प्राप्त है | लेकिन हम शुरुआत  के तौर पर इस मांग का मुद्दा तो उठा ही सकते है | या दूसरा विकल्प यह हो की पहले कदम के रूप में  राष्ट्रपति शासन वाली सरकार जिसमे राष्ट्रपति का सीधा निर्वाचन हो , हो सकता है |
२. दूसरा यह की पंचायत से लेकर राष्ट्रपति तक के चुनाव में जीतने की शर्त , डाले गए कुल मतों में १+५० % मत प्राप्त करना अनिवार्य हो | यह अपेक्षाकृत आसान भी है | केवल “जनप्रतिनिधि अधिनियम” से संशोधन करने से यह हो जायेगा और साधारण बहुमत से इसे पारित भी किया जा सकता है | इससे दो सबसे बड़ी पार्टियों को सीधा लाभ मिलने की सम्भावना है, इसलिए यह सर्वसम्मति से हो भी सकेगा| यह नैतिक और तार्किक दोनों रूप से ही वजनदार तर्क है और कोई इसे नकार भी नहीं सकता | जिसे उसके निर्वाचन क्षेत्र की बहुमत जनता ने नकार दिया हो उसे जनता का प्रतिनिधित्व करने का कोई अधिकार नहीं है |
लेकिन यह कोई जादू की छड़ी भी नहीं है की सारी गड़बड़ियां  ही दूर हो जाएँगी | अंततोगत्वा हमें दो शताब्दी पूर्व के एतिहासिक अनुभवों के परे जनि की आवश्यकता है | वर्त्तमान व्यवस्था  ब्रिटिश शासन के परिणाम स्वरुप सामने आई है, इसकी जड़े वही उपनिवेशिक काल में जमी हुयी हैं| इसलिए अंतिम उपचार के लिए हमें मूल कारण तक जाना होगा और जिसके लिए हमें अपने राष्ट्र के इतिहास की और भी गहराइयो में जाना होगा |
हमारा ५००० वर्षो से भी अधिक का ज्ञात इतिहास है जिसमे प्रत्येक दूसरी शताब्दी में हमारा स्वर्णिम काल रहा है | और हमने आर्थिक सम्पन्नता, शिक्षा, विज्ञान और तकनीक, और सबसे महत्वपूर्ण शांतिपूर्ण सामाजिक-राजनैतिक तंत्र स्थापना में विश्व की अगुवाई की है | शासन तंत्र के विभिन्न प्रकारों  का हमने प्रयोग किया है|  हम भारत के विभिन्न भागो के उस विविध राजनीती तंत्र को पुनः नहीं ला सकते जो पहले हुआ करता था | हिन्दुओ का सदैव ही सामान सिद्धांत के विविध प्रगटीकरण में विश्वास रहा है और हमने राजनीती में भी इसे लागू किया था |चक्रवर्ती अपने जीते हुए राज्यों में उनके स्वयं के  लागू किये हुए शासन -व्यवस्था का सम्मान किया करते थे | इसी श्रंखला में हमारे यहाँ एक और जहाँ विविधताओं से पूर्ण राजनैतिक तंत्र वाले गणराज्य थे वाही दूसरी और मगध साम्राज्य जैसे जटिल ढांचे के  विविध रूप थे |  कुछ  व्यवस्थाये तो ऐसी थी जहाँ केवल एक महिला का ही शासन रहा | लेकिन इन सभी  का आधारभूत  सिद्धांत “धर्मं” था, उन सभी को एक सूत्र में बांधने वाला | आज वास्तव में जिस चीज की कमी है वाह है धार्मिक तंत्र |
आजके इस सामने आये तंत्र को स्वीकार्य कर हमें इसमें धार्मिक सिद्धांतो को लागू करना होगा | किसी ‘विदेशी’ को पचाने का यह हिन्दू तरीका है |  आज हमें वर्तमान समाज के अनुरूप  सनातन धर्म की व्याख्या और युगधर्म की आचार-संहिता तैयार करने के लिए एक नयी स्वच्छ स्मृति की आवश्यकता है | संविधान का यह हमारा स्वदेशी विचार है |
हमारी संसद-भवन  के  नक़्शे के पीछे की प्रेरणा मध्यप्रदेश के मितावली स्थित  चौसठ  योगिनी मंदिर का नक्शा है | वैसे ही हमारे लोकतंत्र को भी हमें अपने राष्ट्रधर्म के सिद्धांतो ठोस आधार पर आधारित करना होगा | वर्तमान लूली व्यवस्था की सम्पूर्ण शल्य-चिकित्सा बहुत जरुरी है न की केवल उपरी दिखावटी लीपापोती मात्र|

जनवरी 22, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

   

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