उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

जगत् हो विनम्र ऐसा शील हमको दें!


गढ़े जीवन अपना अपना -20
panchajanyaभागवत महापुराण के दशम स्कंध में एक कथा आती है पौण्ड्रक वासुदेव की। ये कुराह प्रदेश के राजा है। जरासंध के साथ है और इस कारण भगवान् कृष्ण से मत्सर करते है। ये अपने आप को कृष्ण से श्रेष्ठ बताने के लिये कृष्ण के समान ही वेशभूषा करने लगते है। वैसे ही पीताम्बर, मोरमुकुट, सारंग धनुष्य, नकली कौस्तुभ मणि, छातीपर श्रीवत्स का चिह्न भी सब कुछ कृष्ण के ही समान। यहाँ तक की एक नकली सुदर्शन चक्र भी बना लिया और उसे भी धारण करने लगे। हर बात पर कृष्ण का अपमान भी करते है और कहते है, ‘‘मै ही साक्षात् वासुदेव हूँ। ये नन्द का लला तो ढ़ोंगी है। भगवान कृष्ण इस नौटंकी को महत्व नहीं देते और जब भी यह विषय उनके सामने आता तो महत्वहीन कहकर टाल देते। एक बार अपने स्वयं के प्रलाप से ही भ्रमित पौण्ड्रक वास्तव में स्वयं को कृष्ण से अधिक शक्तिशाली मान बैठते है। कृष्ण को युद्धभूमि में ललकारते है।  पौण्ड्रक अपनी 2 अक्षोहिणी सेना और साथ काशी नरेश की 3 अक्षोहिणी सेना। फिर भी युद्ध तो कितना चलना था? नकली सुदर्शन से सज्ज नकली वासुदेव को साक्षात भगवान् से वारगती प्राप्त होती है। कृष्ण भगवान् उसे अपने नकली पाखण्ड से सदा के लिये मुक्त कर देते है। साथ में काशी नरेश को भी मुक्ति मिलती है।

पौण्ड्रक वासुदेव ने भगवान की नकल की तो कम से कम मृत्यु तो भगवान के हाथों मिली। आज हमारे युवा अपनी वेशभूषा और केशभूषा में ना जाने किस किस की नकल कर रहे है? इनका और इनके साथियों का क्या होगा भगवान ही जाने। पंचतन्त्र की कथा में नील के पानी में गिर कर रंगे सियार की भांती अपने बालों को रंगाकर ना जाने किसे प्रभावित करना चाह रहे है? बारीश के पानी में रंग धुल जाने के बाद जो दूर्गती सियार की हुई वही स्थिति जीवन संग्राम में उतरने के बाद इन नकली युवाओं की हो रही है।

वास्त्विक सौंदर्यबोध को समझकर अपने आप को आकर्षक बनाया जा सकता है। सही तरिके से सुदर्शन होना भी सदाचार का अंग है। सौन्दर्य बोध का जीवनमूल्य जब आचरण में आता है तब हर काम में सुव्यवस्था आ जाती है। अपने कपड़े अपने मन की स्थिति प्रगट करते है। केवल नकल और प्रचलित शोभाचार (Fashion) के नाम पर उटपटांग परिवेष कर लेना आकर्षक भले ही लगता हो पर दूरगामी प्रभाव तो सादे किन्तु साफसुथरे, सुव्यस्थित परिधान से ही होता है। अपना परिधान अपने भाव का परिचायक होना अपेक्षित है परिवार की आर्थिक स्थिति का नहीं। दूसरे के प्रति भी बाहरी बातों के कारण उपेक्षा, परिहास या व्यंग का आचरण नहीं हो। हम स्वयं बात को समझ गये है अतः शोभाचार के चक्कर में नहीं फँसेंगे पर कोई दूसरा कर रहा है तो उसपर हसेंगे भी नहीं।

कपड़े शरीर के अंगों को ढ़ककर उनकी रक्षा के लिये होते है उन्हें उघाड़ने के लिये नहीं यह याद रखना आवश्यक है। हमारे कपड़ों में हमारी परम्परा भी झलकती है। भारत में तो इसमें भी वैज्ञानिकता को सहजता से अपनाया गया है। हमारे यहाँ स्थान एवं ऋतु के अनुसार वेशभूषा का प्रयोग होता है। कश्मिर से लेकर कन्याकुमारी तक सारी विविधता के मध्य भी हम पायेंगे कि बालिकाओं के परिधान सदैव कमर के नीचे ढ़ीले और फैले हुए होते है। इसके पीछे वैज्ञानिक तथ्य है। बाल्यावस्था और किशोरावस्था में शरीर का विकास होता है। ऐसे में कसे (Tight) वस्त्रों से मांसपेशियों की ताकद नहीं बन पाती। ये भाई-बहनों दोनों के लिये सत्य है। बहनों को मातृत्व के लिये तत्पर होना है इसलिये जंघाओं को विकास का पूर्ण अवसर भारतीय पारम्पारिक परिधान देते है। ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये भाइयों को लंगोट कसना चाहिये किन्तु हमारी परम्परा में उनके भी बाकि वस्त्र शरीर से कस कर सटे नहीं होते। शरीर के रक्ताभिसरण, पेशियों के विकास एवं वायु के समुचित संचरण को ध्यान में रखकर विकसित ये परिधान रंग और आकर (Design) की सुन्दरता के साथ ही शील के भी परिचायक हैं। आनन्द का विषय है कि धीरे धीरे ये प्रचलित शोभाचार केा भी अंग बन रहे हैं।

केवल परिधान की ही बात नहीं है, सौन्दर्यबोध के अन्तर्गत हमारे हावभाव, उठना, बैठना सब आता है। इन सब में ही शील झलकना चाहिये। दूसरे के साथ व्यवहार में, बोलने, देखने में भी शरीर का महत्व न्यून हो उसके पूर्ण व्यक्तित्व को हम संबोधित करें। जहाँ तक सम्भव हो चिकित्सक ओर दर्जी को छोड़ किसी और के साथ शरीर हमारी चर्चा का विषय ही ना बनें। एक प्रोफेसर की कक्षा में छात्र ने उनकी तारिफ करने के लिये कहा कि आपकी टी-शर्ट बड़ी सुंदर है। प्राध्यापक ने छात्र को यह कहकर कक्षा से बाहर किया कि मेरे पढ़ाने में कोई कमी है जो तुम्हारा ध्यान मेरे कपड़ों की ओर गया। आजकल एक-दूसरे को परिधान के लिये बधाई (Complements) देने का रिवाज़ है। पर वास्तविकता में सुशील व्यक्ति को यह शोभा नहीं देता। न तो ऐसी क्षुद्र बातों पर किसी को बधाई देनी चाहिये ना ही बधाई को स्वीकार करना चाहिये। परस्पर सद्गुणों का सत्कार कर बधाई देना ही अपना अभ्यास बन जाये।

इससे ठोस बातों पर आधारित होने के कारण सम्बन्धों में भी प्रगाढ़ता आ जायेगी। सम्बन्ध हमें शक्ति और सत्व प्रदान करते है अतः सदाचार में सम्बन्धों का सम्मान सबसे अग्रणी है। माता-पिता और गुरु हमारे सर्वस्व के निर्माता होने के कारण हमारे स्वामी है। अतः इस सम्बन्ध का सम्मान तो चरणस्पर्श के द्वारा ही हो सकता है। प्रांत विशेष में परम्परा की भिन्नता के अनुसार इसका परिपालन अवश्य किया जाना चाहिये। उत्तरी भारत के कुछ प्रांतों में परम्परा है कि कन्या को देवी का रुप मानते है और उसका पूजन करते है। अतः, अविवाहित पुत्री अपने पिता के चरण नहीं छूती उलटे पिता ही उसका आशिर्वाद लेता है। इस परम्परा के पीछे के दिव्य तत्व का आचरण तो सबको ही करना चाहिये। छोटी से छोटी बालिका में भी माँ का देवी का शक्ति का दर्शन करना चाहिये। दक्षिण भारत में बालिका को भी अम्बा, अम्मा ही कहते है। सम्बन्धों की सफलता विस्तार में है। प्रत्येक अजनबी से भी सम्बन्ध बनाने की क्षमता शीलवान व्यक्ति में होती है। उसके लिये सब केवल ‘अंकल’ ‘आंटी’ नहीं है। कोई मामा है कोई मौसी है, दीदी है, भैया है, ताऊ है। आयु, परिचय और व्यवहार के अनुसार सम्बन्ध प्रस्थापित कर निभाना भी सदाचार का अंग है।

विविधता का सम्मान हमारी संस्कृति है। अतः हम सबके मतों का आदर करते है। शास्त्रार्थ होगा, चर्चा भी होगी, एक दूसरे के मतों के खण्डन-मण्डन से वाद विवाद भी होगा। पर सब विनम्रता से। एक नियम सर्वोपरी होगा ‘मत भिन्नता हो सकती है इस बात पर हमारा मतैक्य है।’ (We agree to disagree) तर्क तो करना ही चाहिये उससे मतों में स्पष्टता आती है। किन्तु संवाद होना चाहिये विवाद भी विनम्रता से हो तो चलेगा पर वितण्डा कभी नहीं होगा। विनम्रता कायरता या कमजोरी की निशानी नहीं है। विनम्रता तो ध्यैर्य, शक्ति और साहस की अभिव्यक्ति होती है। जिसकी बात में दम होता है और अपने सत्य पर आत्मविश्वास होता है उसे आवाज़ नहीं बढ़ानी पड़ती। चिल्लाते या तो असत्य भाषण करनेवाले या आत्मबलहीन व्यक्ति या फिर कपटी धुरन्धर। अपने वचन में तथ्यों की कमी को वे आवाज की मात्रा से पूरा करना चाहते है।

भारत में हम मानते है कि एक ही सत्य को समझने, कहने और प्रगट करने के भिन्न भिन्न मार्ग हो सकते हे अतः हम सभी मार्गोंका सम्मान करेंगे। किन्तु इसका अर्थ ये भी नहीं कि हम सबके आगे झुकेंगे और मूह देखी शालीनता के लिये असत्य या आसुरी तत्वों का साथ देंगे। जो मत यह कहे कि मेरी ही बात सत्य है बाकि सब झूठ अर्थात जो विविधता को नकारे ऐसी नाकारा भेदबुद्धि विचारधारा का विरोध हम निर्भयतासे करेंगे। अन्याय, अत्याचार और भ्रष्ट व्यवहार को सहन करना भी अपराध में सहभागिता है। अतः सुशील व्यक्ति निड़रता से ऐसे आचरण के विरोध में खड़ा हो जाता है। सहज भी अपने नित्य व्यवहार में यह निर्भयता झलकनी चाहिये। विनम्रता के साथ ही दृढ़ता भी हमारे चाल-ढाल, अंग-काठी (Posture) और संवाद में स्पष्टता से प्रगट होनी चाहिये। खड़े हो, बैठे हो या चल रहे हो गर्दन और मेरुदण्ड सीधा हो, सीना आगे और मस्तक उंचा हो। जब बोले तो स्पष्ट बिना झिझक और उचित गति से हो। अधिक जल्दी से बोलना भ्रम और न्यूनगण्ड (Inferiority Complex) का लक्षण है। बोलने में स्पष्टता हो और जितने लोगों तक बात पहुँचानी है उसके अनुसार स्वर (Pitch) एवं आवाज (Volume) हो। अभ्यास से शब्दों का चयन भी सही होने लगता है और फिर अनावश्यक स्पष्टीकरण या क्ष्मायाचना की आवश्यकता नहीं पड़ती। मृदु, मधुर व दृढ़ वाणी विचारों, भावों का ही नहीं पूरे व्यक्तित्व का ही सम्प्रेषण करती है। और फिर केवल पाँच शब्दों में सारे श्रोता अभिभूत हो जाते है। करतल ध्वनि ही नहीं पूर्ण आत्मीयता से सम्मान करने लगते है। केवल ढ़ाइ मिनट के वक्तव्य में शील की प्रतिमूर्ति, योद्धा हिन्दू सन्यासी विश्वविजय कर लेता है। उसी वीर विवेकानन्द से आओ हम प्रार्थना करें।
‘जगत् हो विनम्र ऐसा शील हमको दें!’

दिसम्बर 4, 2012 Posted by | आलेख | , , , , | 1 टिप्पणी

   

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