उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

Call for Rebooting Education System


TNIEThe New Indian Express deserves congratulations for publishing the series ‘Think Edu Conclave’. The articles by Amita Sharma in the 4th March issue [page 9], and that of  Dr. S. Vaidhyasubramaniam  in the issue of 11th March [page 7] both are really commendable.

Amita Sharma has given very comprehensive overview of the work going on in various IIT’s in the field of research in ancient Bhartiya knowledge system. Her approach towards this subject is very logical and scientific. Without unduly glorifying the traditional achievements of Bharatiya scientists from time immemorial, she emphasises the need of indepth study of their works. Her concluding point appeals to the intellectual mind to come out of dogmatic thinking in terms of binaries such as traditional and modern,  eastern and western and to integrate whole knowledge system for the betterment of humanity.

It has been understood in Bharat that knowledge has no boundaries. “आ नो भद्र: क्रतवो यन्तु विश्वत:” Bharat has been traditionally an open society where knowldge and wisdom are welcomed from all the frontiers. The only purpose of knowledge as per Bharatiya tradition has been the search of inherent oneness- truth and it’s applications for the good of whole humanity. Hence, as beautifully elaborated by Dr. S. Vaidhyasubramaniam in his piece, the traditional knowledge system in Bharat had been widespread and well evolved even in the first decades of 19th century.  

dharmapalDr. S. Vaidhyasubramaniam has extensively quoted from the seminal work of Shri Dharmpal. The data given in Dharmpal’s ‘One Beautiful Tree’ from the primary sources of British surveys is an eyey opener for all of us. It is indeed tragic that this great knowledge has not been made part of formal curriculum even after being in public domain for more than five decades now. read dharmapal here – http://www.samanvaya.com/dharampal/

Both the accomplished authors lament the fact that Bharatiya traditional knowledge system has been neglected completely by the formal education system in independent India. It is indeed hightime that we in Bharat take the revolutionary step of integrating our own indegeneous knowledge system in the main stream education policy. Whole world is facing similar problems in the field of education. Right kind of methodolgy for elementary education is an area of concern for both developed and developing countries. We have the advantage of having a deep rooted cultural background in evolving decentralised, need based, socially self-sufficient education system. We have done so for centuries together. With this genetic advantage we can provide a panacea to the universal problems of complementry education system; with the use of modern technology blended with traditional methodology. This is the paradigm shift called for by both the learned authors.

There is a hope that the atmosphere for complete change in the country auguers well to this much needed systemic change in the field of education right from primary to higher education.

See the original article in TNIE here

http://www.newindianexpress.com/opinion/Designing-Integrated-Knowledge-Systems/2014/03/04/article2088788.ece

 

http://www.newindianexpress.com/nation/Reboot-Indian-Primary-Education/2014/03/11/article2101794.ece

Both of them were speaker at the event 

http://www.newindianexpress.com/nation/Indian-Educators-Ignorant-of-Countrys-Academic-Contributions-to-West/2014/01/30/article2028717.ece

मार्च 14, 2014 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , , , , , , , | टिप्पणी करे

स्वाधीनता का मर्म


गत माह अमेरिकी विदेषमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने एक व्याख्यान में कहा कि चीन में लोकतन्त्र के विकास की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है और यह चीन के विकास में सबसे बड़ी बाधा है। चीन के एक शोध संस्थान ने इसकी प्रतिक्रीया में एक लेख प्रकाशित किया जिसमें चीनी विद्वानों ने अमेरिकी वैश्विकवाद को चुनौति दी। उन्होंने प्रश्न किये कि जो पश्चिम में अपनाया गया है उसी व्यवस्था को अपनाना विकास कैसे माना जायेगा? क्या पश्चिमी देश दावे के साथ कह सकते है कि उनके द्वारा गत कई वर्षों से अपनाये गये तन्त्र ने देश के सभी लोगों को सुख प्रदान किया है? यदि पश्चिम द्वारा अपनायी व्यवस्था आदर्श होती तो आज उन देशों में बेराजगारी, कर्ज, सामाजिक व पारिवारिक विघटन क्यों बढ़ रहा है? लोकतन्त्र यदि आदर्श व्यवस्था है तो क्या इसने सभी देशों में आदर्श परिणाम दिये है? जिन देशों ने इसे अपनाया वे आज भी जब आदर्श समाज, राजनीति व अर्थव्यवस्था को नही प्राप्त कर सके हैं तो फिर अमेरिका को क्या अधिकार है कि वो इस अधुरी असफल व्यवस्था को सबके उपर थोपें? चीनी विद्वान केवल प्रश्नों तक ही सीमित नहीं रहे। उन्होंने दावा किया कि चीन में व्यवस्थागत सुधार उसके अपने ऐतिहासिक अनुभव, संस्कृति व दर्शन के अनुसार ही होना चाहिये। उनके अनुसार चीन के लिये लोकतन्त्र के स्थान पर कन्फुशियन द्वारा प्रणीत ‘मानवीय सत्ता’ के सिद्धान्त पर विकसित व्यवस्था अधिक उपकारक व सम्यक होगी। शोधकारकों ने इस सिद्धान्त पर आधारित एक व्यवस्था के बारे में विस्तार से प्रस्ताव भी लिखा।

लोकतन्त्र की उपयोगिता अथवा चीनी विद्वानों द्वारा प्रस्तुत राजनयिक व्यवस्था पर विचार विमर्श अथवा विवाद भी हो सकता है किन्तु सबसे महत्वपूर्ण विचारणीय बिन्दू है कि उन्होंने छाती ठोक कर यह कहा कि उनके देश के लिये उनके अपने विचार व इतिहास में से निकली व्यवस्था ही उपयोगी है। किसी और के लिये जो ठीक है वह सबके लिये ठीक ही होगा यह साम्राज्यवादी सोच नहीं चलेगी। साथ ही अपने अन्दर से तन्त्र को विकसित करने के स्थान पर विदेशी विचार से प्ररित होकर व्यवस्था बनाना भी मानसिक दासतता का ही लक्षण है। जब हम स्वतन्त्रता के छः दशकों के बाद के भारत की स्थिति का अवलोकन करते हे तो हमे निराशा ही होती है। 15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतन्त्र हुआ तो हमारे राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ ही पूरे विश्व को भी भारत से अनेक अपेक्षायें थी। इसी कारण 1950 के दशक में पूरा विश्व जब दो खेमों में बटा हुआ था तब भारत के आहवान पर 108 देशों ने ‘‘निर्गुट आंदोलन’’ के रूप में भारत का नेतृत्व स्वीकार किया था। भारत के इतिहास व संस्कृति के कारण विश्व के समस्त दुर्बल देशों को भारत से एक कल्याणकारी मार्गदर्शक नेतृत्व की अपेक्षा थी। हमारे प्रथम प्रधानमंत्री ने 14 व 15 अगस्त की मध्यरात्री पर लाल किले पर तिरंगा फहराते हुये ही घोषणा की थी कि भारत विश्व के राष्ट्रपरिवार में अपनी सकारात्मक भुमिका को निभाने के लिये तत्पर है। 15 अगस्त को आकाशवाणी पर प्रसारित संदेश में महायोगी अरविन्द ने स्वतन्त्र भारत के समक्ष तीन चरणो में लक्ष्य रखा था। पहले चरण में भारत के अस्वाभाविक, अप्राकृतिक विभाजन को मिटा अखण्ड भारत का पुनर्गठन, द्वितीय चरण में पूरे एशिया महाद्विप का भारत के द्वारा नेतृत्व तथा अन्ततः पूरे विश्व में गुरूरूप में संस्थापना। आज 65 वर्ष के बाद क्या हम इनमें से किसी भी लक्ष्य के निकट भी पहूँच पाये है?

विश्व के मार्गदर्शन की तो बात दूर रही हम अपने देश को ही पूर्णतः समर्थ, समृद्ध व स्वावलम्बी भी कहाँ बना पाये है? सारा विश्व भारत की असीम सम्भावनाओं की चर्चा करता है। किन्तु उन सम्भावनाओं को प्रत्यक्ष धरातल पर उतारने का काम अभी भी कहाँ हो पाया है? देश 70 प्रतिशत जनता अभाव में जी रही है। धनी व निर्धन के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। संस्कारों का क्षरण तेजी से हो रहा है। भारतीय भाषाओं का महत्व व प्रासंगिकता दोनों ही इतनी गति से कम हो रही है कि कई देशी बोलियों के अस्तीत्व पर ही प्रश्नचिन्ह लग रहा है। कुल मिलाकर भारत में से भारतीयता की प्रतिष्ठा समाप्त हो रही है। कहीं पर भी कोई व्यवस्था नहीं दिखाई देती। राजनयिक, सामाजिक तथा प्रशासनिक व्यवस्था पूर्णतः शिथिल व दिशाहीन हो रही है। शिक्षा व्यवस्था भी इतनी प्राणहीन हो गई है कि चरित्रनिर्माण तो दूर की बात सामान्य लौकिक ज्ञान को प्रदान करने में भी इसे सफलता नहीं मिल पा रही। स्नातकोत्तर उपाधि धारण करनेवाले छात्र भी किसी भी एक भाषा में सादा पत्र भी नहीं लिख पाते है। इन शिक्षितों को बिना अंगरेजी का उपयोग किये 4 वाक्य बोलना भी असम्भव सा लगता है। दूसरी ओर वही उच्चशिक्षित छात्र शुद्ध अंगरेजी में भी 4 वाक्य नहीं बोल पाता है। ऐसी शिक्षापद्धति के कारण उत्पन्न चरित्रहीनता से सर्वत्र भ्रष्टाचार व अराजकता का वातावरण बन गया है। इस सबको बदलने के लिये अनेक आंदोलन भी चलाये जा रहे है। जब तक हम समस्या की जड़ को नही जान जाते तब तक सारे प्रयास पूर्ण प्रामाणिक होते हुए भी व्यर्थ ही होंगे।

देश की इस परिस्थिति के कई कारण है। समस्याएं बहुआयामी हैं। आर्थिक, नीतिगत, कार्यकारी, संस्थागत, सामाजिक, व्यक्तिगत कई कारणों से समस्या जटील होती जा रही है। कई प्रकार के देशभक्त व्यक्ति व संगठन इन कारणों के निवारण पर कार्य कर रहे है। फिर भी अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं दे रहा। समस्या के समाधान हेतु सभी पहलुओं पर काम तो करना ही पड़ेगा किन्तु दिशा एक होना आवश्यक है। हमें अपने देश के मूलतत्व, चिति के अनुरूप व्यवस्थाओं का निर्माण करने की ओर प्रयास करना होगा। भारत का जागरण भारतीयता का जागरण है। हमारा राष्ट्रीय तन्त्र हमारे स्वबोध को लेकर विकसित करना होगा तभी यह स्वतन्त्र कहा जायेगा। राज्यव्यवस्था हमारे राष्ट्रीय स्वभाव के अनुसार होगी तभी स्वराज्य का स्वप्न साकार होगा। स्वामी विवेकानन्द ने बार बार कहा है प्रत्येक राष्ट्र का विश्व को संप्रेषित करने अपना विशिष्ट संदेश होता है, नियति होती है जिसे उसे पाना होता है और जीवनव्रत होता है जिसका उसे पालन करना होता है। वे कहते है भारत का प्राणस्वर धर्म है और उसी के अनुरूप उसका मानवता को संदेश है आध्यात्म, नियति है जगत्गुरू तथा जीवनव्रत है मानवता को ऐसी जीवनपद्धति का पाठ पढ़ाना जो सर्वसमावेशक, अक्षय व समग्र हो।

स्वतन्त्र भारत को अपनी नियति को पाने के लिये अपने जीवनव्रत के अनुसार व्यवस्था का निर्माण करना था। उसके स्थान पर हम सदैव उधार की व्यवस्थाओं को अपनाते रहे। हमने अपना संविधान तक विभिन्न देशों से उधार लिया। अनेक शताब्दियों तक विविधता से सम्पन्न विस्तृत राज्य पर सुचारू संचालन करने वाली नैसर्गिक व्यवस्था का सैद्धान्तिक व व्यावहारिक प्रतिपादन करनेवाले चाणक्य, विद्यारण्य तथा शिवाजी आदि स्वदेशी चिंतको की सफल राजव्यवस्थाओं का अध्ययन कर उन्हें कालानुरूप समायोजित करने का विचार ही नहीं हुआ। क्या विदेशी आधार पर बने संविधान से विकसित तन्त्र स्वदेशी हो सकता है? इसी का परिणाम हुआ कि हमने आगे चलकर राष्ट्र के प्राण ‘धर्म’ को ही राजतन्त्र से नकार दिया। यही कारण है कि पूरी व्यवस्था ही प्राणहीन हो गई।

अर्थतन्त्र में भी हमने प्रथम चार दशक तक रूस की साम्यवादी व्यवस्था से प्रेरणा ग्रहण कर समाजवादी अर्थव्यवस्था का निर्माण किया। उसकी निष्फलता सिद्ध हो जाने पर 1991 के बाद आर्थिक उदारता के नाम पर पश्चिम के मुक्त बाज़ार व्यवस्था को अपनाया। जब कि यह विश्वमान्य तथ्य है कि 18 वी शति के प्रारम्भ तक भारत ना केवल विश्व का सबसे समृद्ध देश था अपितु वैश्विक संपदा का 33 प्रतिशत भारत में था। विश्व के धनी देशों के संगठन Organisation for Economic Co-operation and Development (OECD) ने ख्यातनाम अर्थवेत्ता एंगस मेडीसन को इसवी सन के प्रारम्भ से विश्व की सकल सम्पदा (गडप) पर अनुसंधान करने का प्रकल्प दिया। उन्होंने विश्व के आर्थिक इतिहास का संकलन किया। उनके अनुसार भारत व चीन विश्व के सबसे धनी देश रहे है। इसा के काल के प्रारम्भ से 14 वी शती तक तो चीन भी किसी होड़ में नहीं था। अंगरेजों ने इस प्राचीन समग्र व्यवस्था को तोड़ अपनी शोषण पर आधारित व्यवस्था को लागु किया तब से इस देश में विपन्नता का राज प्रारम्भ हुआ। आज राजनैतिक स्वतन्त्रता के 65 वर्षों बाद भी हम उसी दासता को क्यों ढ़ो रहे है? इस देश का अतीत जब इतना समृद्ध रहा है तब यदि आज भी हम अपने सिद्धान्तों पर आधारित व्यवस्था का निर्माण करेंगे तो पुनः विश्व के सिरमौर बन सकते है।

आज हम अपनी स्वतन्त्रता को खोने के कगार पर आ पहूँचे है ऐसे में मानसिक स्वाधीनता का वैचारिक आंदोलन प्रारम्भ करने की आवश्यकता है। एक ऐसे तन्त्र के निर्माण का आन्दोलन जो देशज हो अर्थात इस देश के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक अनुभव से उपजा हो। ऐसे तन्त्र का स्वाधीन होना भी आवश्यक है। अर्थात इसके सभी कारकों पर अपने राष्ट्र का ही निर्णय हो। इस हेतु शिक्षा के राष्ट्रीय बनने की आवश्यकता है। जिससे निर्णायक भी स्वदेश की भावना व ज्ञान से परिपूर्ण हो। स्व-तन्त्र का तिसरा आवश्यक पहलु है स्वावलम्बी तन्त्र। तन्त्र की सहजता व सफलता उसके निचली इकाई तक स्वावलम्बी होने में है। गाँव अपने आप में स्वावलम्बी हो तो ही सबका अभ्युदय सम्भव होगा। भारतीय व्यवस्था हर स्तर पर स्वावलम्बी होती है। इसमें तन्त्र के निर्माण के बाद नियमित संचालन के लिये शासन के भी किसी हस्तक्षेप अथवा सहभाग की आवश्यकता नहीं होती। समाज ही स्वयं संचालन करता है। आपात् स्थिति में ही शासन को ध्यान देना पड़ता है।

आज हम सब स्वाधीनता दिवस मनायेंगे। केवल देशभक्ति की भावना को उजागर करने के साथ ही स्वाधीनता के मर्म पर विचार भी हो यह शुभाकांक्षा।

अगस्त 15, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

दे दी तुने आज़ादी या पायी है हमने बलिदानों से?


जो राष्ट्र अपने वीरों का सम्मान नहीं करता वह अपनी अस्मिता को खो देता है। ऐसे पाप तो रक्त से ही धोये जाते हैं। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ऐसे वीरों में से एक हे जिनके साथ देश के शासन ने न्याय नहीं किया। आज जब सारा देश इस वीर के जन्मदिन को मना रहा है तब इस अन्याय का स्मरण करना आवश्यक हो जाता है। सरकार भले ही स्वयं भूल जाये और प्रयत्नपूर्वक देश की नई पीढ़ियों को इतिहास के इस महत्वपूर्ण तथ्य से अनभिज्ञ रखें पर सत्य तो घनघोर बादलों को चीर कर आलोकित होनेवाले सूर्य के समान अपने आप को प्रगट कर ही देता है। पर जब प्रस्थापित व्यवस्था जानबूझकर बलिदानों को भूलाने के घोर पातक करती है तो कीमत पूरे राष्ट्र को चुकानी पड़ती है। क्यों आज भारत में समस्त क्षमताओं के होते हुए हम दुय्यम नेतृत्व की कायर नीतियों को सहनें के लिये विवश है? पूरे देश से ही वीरत्व ना केवल लुप्त हो रहा है इसे तिरस्करणीय बनाया जा रहा है। आतंक, साम्प्रदायिकता व भ्रष्टाचार से इस पावन मातृभूमि को बार बार क्षत विक्षत किया जा रहा है। सर्वस्व देश के लिये अर्पण करनेवाले वीर के बलिदान को भी जब विवादास्पद बना दिया जाता है; न्यूनगण्ड से ग्रसित नेतृत्व अपनी सत्ता को खोने के भय से जब अपने वीर राष्ट्रनायक को षड़यन्त्र पूर्वक जीवित ही समाधि में गाड़ देने के लिये संदेह से देखे जाते है तब पूरे राष्ट्र को अपने रक्त, स्वेद ओर मेद की आहुति से कीमत चुकानी पड़ती है।

कुछ वर्ष पूर्व जब अपने विराट योग शिविरों में स्वामी रामदेवजी ने यह प्रश्न पूछना शुरु किया कि हमको क्या अधिकार है कि हम, ‘‘दे दी तुने आज़ादी हमे बिना खड्ग बिना ढ़ाल’’ जैसे पूर्णतः असत्य गीतों को आलापकर हमारे वीरों के बलिदान का अपमान करें, तब इसे गांधी के विरुद्ध बात कहकर उनकी आलोचना की गई। पर क्या वर्तमान पीढ़ि को अधिकार नहीं हे कि वे इतिहास का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण समस्त उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर करें? क्या आज के दिन यह प्रश्न नहीं पुछा जाना चाहिये कि गीता का प्रतिदिन पाठ करने वाले हे महात्मा, अंधे धृतराष्ट्र के समान किस मोह में पड़कर तूने काँग्रेस अधिवेशन में लोकतान्त्रिक विधि से निर्वाचित सुभाषचन्द्र बोस को हटाकर अपने चमचे पट्टाभिसीतारामय्या को अध्यक्ष बनाया था? हम में से कम ही लोग इस ऐतिहासिक तथ्य से अवगत होंगे कि इसी विराट हृदय के योद्धा ने इस अन्याय के बाद भी मोहनदास करमचंद गांधी को राष्ट्रपिता की उपाधि दी। नेताजी का प्रशंसा की अतिशयोक्ति में कहा गया विशेषण आज ऐसा चिपक गया है कि हम गांधी के निर्णयों का विश्लेषण ही नहीं करना चाहते। ऐसा करने का नाम लेना भी मानों घोर अपराध है।

पर 1947 में भारत के स्वतंत्र होने के महत्वपूर्ण अध्याय का तो विश्लेषण करना ही होगा ना। महानायक सुभाष बाबू के जन्मदिन से अधिक उपयुक्त पर्व इस पावन कार्य के लिये और कौनसा होगा। आधुनिक भारत के निर्विवाद रुप से सबसे सशक्त इतिहासकार आर सी मजुमदार ने इस पूरी घटना के बारे में स्पष्टता से लिखा है। अहिंसा, ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के माध्यम से गांधी को भारत की स्वतंत्रता पूरा श्रेय देनेवाले इतिहास को रोज रोज पढ़नेवाले और ‘दे दी हमें . . .’ के तरानों को निर्लज्जता से दोहरानेवाले भारतवासी इस ऐतिहासिक सच्चाई को अवश्य पढ़े।

Majumdar, R.C., Three Phases of India’s Struggle for Freedom, Bombay, Bharatiya Vidya Bhavan, 1967, pp. 58-59. There is, however, no basis for the claim that the Civil Disobedience Movement directly led to independence. The campaigns of Gandhi … came to an ignoble end about fourteen years before India achieved independence…. During the First World War the Indian revolutionaries sought to take advantage of German help in the shape of war materials to free the country by armed revolt. But the attempt did not succeed. During the Second World War Subhas Bose followed the same method and created the INA. In spite of brilliant planning and initial success, the violent campaigns of Subhas Bose failed…. The Battles for India’s freedom were also being fought against Britain, though indirectly, by Hitler in Europe and Japan in Asia. None of these scored direct success, but few would deny that it was the cumulative effect of all the three that brought freedom to India. In particular, the revelations made by the INA trial, and the reaction it produced in India, made it quite plain to the British, already exhausted by the war, that they could no longer depend upon the loyalty of the sepoys for maintaining their authority in India. This had probably the greatest influence upon their final decision to quit India.

अंतिम पंक्ति में वे स्पष्ट लिखते है कि आज़ाद हिन्द सेना के वीरों के उपर चलाये गये देशद्रोह के मुकदमें में उजागर तथ्यों व उनपर पूरे देश में उठी प्रतिक्रियाओं के कारण द्वितीय महायुद्ध में क्षीण हुए ब्रिटिश साम्राज्य का भारत में टिका रहना असम्भव था। वे भारत में उनकी सेना के सिपाहियों पर विश्वास नहीं कर सकते थे। इस बात का भारत छोड़ने के उनके अंतिम निर्णय पर सर्वाधिक प्रभाव था।

नेताजी भारत छोड़कर विदेश जाने से पूर्व रत्नागिरी में स्थानबद्ध सावरकर से मिलने गये थे। सावरकर ने उन्हें द्वितीय महायुद्ध के समय विदेश में जाकर सेना गठित करने का सुझाव दिया। योरोप के क्रांतिकारियों से अपने सम्पर्क भी उन्होंने नेताजी को दिये। इन्हीं में से एक की सहायता से नेताजी अफगानिस्तान मार्ग से योरोप पहुँचे। सावरकर की योजना का दूसरा अंग था- ब्रिटिश सेना का हिन्दवीकरण अर्थात हिन्दूओं क सैनिकीकरण। कुछ वर्ष पूर्व अंडमान से सावरकर के नाम पट्ट को हटाने वाले देशद्रोही नेता सावरकर के जिस पत्र का हवाला देकर उन्हें अंग्रजों का एजण्ट कहते थे वही पत्र सावरकर की चाणक्य नीति का परिचायक है। सावरकर ने अंग्रेजों को इस बात के लिये अनुमति मांगी कि वे देशभर घूमघूम कर युवाओं को सेना में भरती होने का आवाहन करना चाहते है। महायुद्ध के लिये सेना की मांग के चलते सावरकर को स्थानबद्धता से मुक्त किया गया। सावरकर ने देशभर में सभायें कर हिन्दू युवाओं से सेना में भरती होने को कहा। एक अनुमान के अनुसार उनके आह्वान के प्रत्यूत्तर के रूप में 6 लाख से अधिक हिन्दू सेना में भरती हूए। एक साथी के शंका करने पर सावरकर ने उत्तर दिया कि 20 साल पूर्व जिस ब्रिटिश शासन ने हमारे शस्त्र छीने थे वह आज स्वयं हमें शस्त्र देने को तत्पर है। एक बार हमारे युवाओं को शस्त्रबद्ध हो जाने दों। समय आने पर वे तय करेंगे कि इसे किस दिशा में चलाना है।

योजना यह थी कि बाहर से सुभाष की आज़ाद हिन्द सेना चलो दिल्ली के अभियान को छेड़ेगी और जब उनसे लड़ने के लिये अंग्रेज भारतीय सेना के भेजेंगे तो यह सावरकरी युवक विद्रोह कर देंगे। हिरोशिमा व नागासाकी पर हुए अमानवीय आण्विक हमले के कारण जापान के असमय युद्धविराम कर देने से यह योजना इस रूप में पूण नही हो सकीं। किन्तु भारत के स्वतन्त्रता अधिनियम को ब्रिटिश पार्लियामेण्ट में प्रस्तुत करते समय प्रधानमन्त्री क्लेमण्ट एटली द्वारा दिये कारण इस योजना की सफलता को स्पष्ट करते है। उन्होंने अपनी असमर्थता में सेना के विद्रोह की बात को पूर्ण स्पष्टता से कहा है। गांधी के ‘भारत छोड़ो’ अथवा सविनय आज्ञाभंग का उसमें कतई उल्लेख नहीं मिलता। आज़ाद हिन्द सेना का भय व भारतीय सेना पर अविश्वास के अलावा बाकि कारण केवल दिखावटी सिद्धान्त मात्र है।
कलकत्ता उच्च न्यायालय के पुर्व मुख्य न्यायाधीश पी वी चक्रवर्ति के 30 मार्च 1976 को लिखे पत्र से स्पष्ट है कि एटली ने उन्हें साफ शब्दों में भारत की स्वतन्त्रता के समय ब्रिटिश सोच के बारे में बताया था।

Dhanjaya Bhat, Writing in The Tribune,Sunday, February 12, 2006. Spectrum Suppl.

Which phase of our freedom struggle won for us Independence? Mahatma Gandhi’s 1942 Quit India movement or The INA army launched by Netaji Bose to free India or the Royal Indian Navy Mutiny of 1946? According to the British Prime Minister Clement Attlee, during whose regime India became free, it was the INA and the RIN Mutiny of February 18–23, 1946 that made the British realize that their time was up in India. It has been argued that when the leaders of the Congress were finally released, they came out as tired and broken men. This allowed the British and the sectarian parties to press home the advantage and negotiate better terms for themselves. An extract from a letter written by P.V. Chuckraborty, former Chief Justice of Calcutta High Court, on March 30, 1976, reads thus: “When I was acting as Governor of West Bengal in 1956, Lord Clement Attlee, who as the British Prime Minister in post war years was responsible for India’s freedom, visited India and stayed in Raj Bhavan Calcutta for two days`85 I put it straight to him like this: ‘The Quit India Movement of Gandhi practically died out long before 1947 and there was nothing in the Indian situation at that time, which made it necessary for the British to leave India in a hurry. Why then did they do so?’ In reply Attlee cited several reasons, the most important of which were the INA activities of Netaji Subhas Chandra Bose, which weakened the very foundation of the British Empire in India, and the RIN Mutiny which made the British realise that the Indian armed forces could no longer be trusted to prop up the British. When asked about the extent to which the British decision to quit India was influenced by Mahatma Gandhi’s 1942 movement, Attlee’s lips widened in smile of disdain and he uttered, slowly, ‘Minimal’.”

माननीय न्यायमुर्ति के अनुसार पूर्व प्रधानमन्त्री एटलीने दो बाते बिलकुल स्पष्टता से कही है – 1. गांधी का असहयोग व सविनय आज्ञाभंग का आंदोलन तो कबका समाप्त हो गया था। स्पष्ट प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि उसका प्रभाव ‘नहीं के बराबर’ था। 2. भारत छोड़ने की जल्दबाजी के मुख्य कारणों में सुभाष जी की आज़ाद हिन्द सेना और भारतीय शाही नौसेना में विद्रोह से उपजे अविश्वास को गिनाया।

अब इन तथ्यों पर चर्चा करने का समय आ गया है। केवल स्वतन्त्रता के श्रेय की बात नहीं, भारत के खोये आत्मविश्वास को पुनः पाने की बात है। कब तक भीरु बनकर मार खाने के तराने गर्व से गाते रहेंगे? दे दी तुने आज़ादी कहते लज्जा नहीं आती? अरे क्या किसी ने भीक्षा में दी है ये स्वतन्त्रता? वीरों ने अपने बासंती बलिदान से छीनी है अत्याचारी के क्रूर कराल जबड़े से माता की धानी चुनरियाँ।

‘दे दी . . ’ के कायर तराने छोड़ो! वीर सुभाष के जन्मदिन पर गर्व से सिंहगर्जन करों – दे दी तुने आज़ादी नहीं पायी है हमने बलिदानों से स्वतन्त्रता ! वीरों की शहादत ने छिनी है जालीम से आज़ादी। किसी का उपकार नही अपने लहू के पराक्रम की है ये गाथा।

हे वीर सुभाष! अच्छा ही है कि इस कायर सरकार के विज्ञापनों से अपवित्र नहीं है आपकी जयंति। हमारे हृदय की हर धड़कन में तेरा हर संघर्ष आज भी है जीवित। कसम है हमें किसी अज्ञात कोने में तुम्हारे अंतेष्टि को तरसते अस्थियों की – तुम्हारी गाथा को हम दुखान्तिका मे न बदलने देंगे। अपने पौरुष से तेरा खोया सम्मान पुनः दिलायेंगे।
जय हिन्द  . . .

जनवरी 23, 2012 Posted by | चरित्र, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

अन्नागिरी कही फिर गांधीगिरी ही न बन जाये??


अन्ना के अनशन का ८ व दिन है| सरकार कि संवेदनहीनता और मीडिया के जोरदार प्रसारण ने आन्दोलन को जबरदस्त प्रतिसाद मिल रहा है| इससे अधिक बड़े आन्दोलन तो केवल रामजन्मभूमि और जे पि की समग्र क्रांति ही थे| उनमे इससे अधिक लोग सड़कों पर उतारे थे| पर एक अंतर है वो दोनों आन्दोलन संगठित प्रयास का परिणाम थे| आज के आन्दोलन में लोगों का गुस्सा फुट रहा है| ये अधिक स्वयं स्फूर्त है| इसी कारण मीडिया भी TRP की दौड़ में लग गया है| पर जागरण जोरदार हुआ है| यह बड़ा ही महत्वपूर्ण पहलू है| जो सबसे ऊपर है| इसका श्री जितना अन्ना को है उतना ही सरकार की मुर्खता को भी है|
अनेक साथी प्रश्न पूछ रहे है | सोचा की एकसाथ उत्तर देकर लिख दिया जाये|
आन्दोलन के तप्त वातावरण में भी वैचारिक चिंतन जरुरी है क्योंकि राष्ट्रहित सर्वोपरि है|
१)कांग्रेस आखिर जन लोकप्र बिल पास से क्यों दर रही है???
जन लोकपाल बिल तो कोई पार्टी जैसे के तैसे पास नहीं करेगी| अन्ना जैसे चाहते है वैसा लोकपाल बन जाये तो सारा काम ही ठप्प हो जायेगा| केवल भ्रष्टाचार ही नहीं सारा सरकारी काम ही ठप्प होगा| कोई भी अधिकारी कुछ भी नहीं करेगा | काम भी नहीं भ्रष्टाचार भी नहीं| अन्ना का आन्दोलन वाकई बढ़िया है| उसका कोई विरोध नहीं है| पर
उनकी मांग थोड़ी अधिक कठोर है| पर ये आन्दोलन की जरुरत है| एक तो ठोस मांग होना आवश्यक है| यहीं बाबा की गफलत हो गयी थी| दूसरा मांग कठोर होंगी तो बातचीत में कुछ ठीक ठाक बात पर सफलता मिल जाएगी| अतः उनके स्तर पर ये ठीक है पर जो लोग पूछते है की कांग्रेस नहीं तो BJP ही इस बिल को support कर दे वो इसकी बारीकी को नहीं समझते| अभी वर्त्तमान में भी जो इमानदार लोग है वो आरोपों के दर से काम नहीं कर रहे| सोचते मेरे retire होने तक टांग देता हूँ इस file को | इस रवैये के कारण सेना को आवश्यक हथियार नहीं मिल पा रहे| और जिसमे भ्रष्ट लोगों का हित जुड़ा है ऐसे निर्णय हो रहे है| सबसे महंगे इटालियन हलिकोप्टर हमने इसी साल ख़रीदे| सही परिवार को हिस्सा मिल गया निर्णय हो गया| अन्ना के लोकपाल के बाद तो और स्थानों पर भी इमानदार लोग निर्णय लेने से डरेंगे|
वैसे भी कानून से तो भ्रष्टाचार बढ़ता है| कानून घटाने से भ्रष्टाचार घटेगा| डिमांड क़ानूनी हस्तक्षेप कम करने की होनी चाहिए| एक और नया कानून ये समाधान नहीं है| CVC के समय यही तर्क दिए थे कि ७०% भ्रष्टाचार कम होगा| क्या हुआ?? RTI के समय के अन्ना के विडियो दिखाए जा सकते है| उनके अनुसार इस कानून से पूरी पारदर्शिता आ जाएगी| क्या हुआ? आज इस का सबसे ज्यादा दुरूपयोग अधिकारी एक दुसरे से बदला लेने में और उद्योगपति अधिकारीयों को ब्लैक मेल करने के लिए कर रहे है| लोकपाल का भी ऐसे हो सकता है| दहेज़ और हरिजन कानून का भी यही हाल है|
२) कोई राजनीतिक पार्टी अपनी छबि स्वयं ख़राब करेगी ???
उनको लग रहा है की उनके साथ BJP की भी छवि ख़राब हो रही है तो फिर कोई ज्यादा नुकसान नहीं| भ्रष्टाचार चुनावी मुद्दा नहीं है|
३) क्या कांग्रेस की छबि (सोनिया सहित सभी मंत्रियों की )ख़राब नहीं हुई ??
यदि अन्ना के सामने झुक जायेंगे तो रही सही भी ख़राब हो जाएगी| इसलिए तो राहुल कार्ड खेला है| राहुल की छवि चमकने के लिए ही सही मान जाये कोंग्रेस! पर ये देश के लिए ठीक नहीं होगा|
४) क्या राहुल गाँधी की इस आन्दोलन से साख कमनही हुई??
उसकी कोई साख नहीं है| सब विज्ञापन जैसे बने है तो वो तो अं चुनाव के वक्त पर फिर बना लेंगे Media manage करके|
५)क्या आम जनता मै भ्रस्टाचार के खिलाफ जागरूकता पैदा नहीं हुई ???
ये ही एकमात्र फायदा इस आन्दोलन से हुआ है| १ जनता जागरूक हुई और सडकों पर आई| और २. उसमे विश्वास पैदा हुआ कि भ्रष्टाचार दूर हो सकता है| अन्ना और बाबा कि ये बहुत बड़ी सफलता है| अब राजनैतिक पार्टियों को एक ठोस agenda प्रस्तुत करना चाहिए भ्रष्टाचार के खात्मे का|
६) क्या अन्ना की तुलना किसी भ्रस्टाचारी से करना सही है ??
बिलकुल गलत है| अन्ना बाकि कुछ भी हो सकते है पर भ्रष्टाचारी नहीं है| वो एक इमानदार व्यक्ति है| कुछ गलत लोगों से घिरे है| समझौता कर लेते है| जैसे भारतमाता, स्वामी विवेकानंद, सुभाष और भगतसिंह के फोटो हटाकर केवल गांधीजी का रखना| ये समझौता है| फिर बुखारी पर टीका करने कि जगह उसको समझाने अपने लोगों को भेजना | ये वही गलतियाँ है जो गाँधी बाबा ने भी कि थी|

आज देश जग गया है किन्तु आन्दोलन ही समाधान नहीं हो सकता| यदि बातचीत होकर कुछ बाते मन ले सरकार तो क्या उससे व्यवस्था परिवर्तन आ जायेगा? आखिर इन राजनैतिक प्रश्नों का राजनैतिक हल जरुरी है| केवल एक कानून से बात नहीं बनेगी| पुरे संविधानिक ढांचे पर ही चर्चा करनी होगी| एक नै स्कृति के लिखने का समय आ गया है| क्या अन्ना या बाबा चाणक्य बन सूत्र लिखने को तत्पर है? नहीं तो फिर किसी न किसी को तो इस भूमिका में आना होगा| गाँधी बाबा भी यही रुक गए अंग्रेजों को तो भगा दिया पर अपने संविधान “हिंद स्वराज” को लागु नहीं करवा पाए| पटेल के स्थान पर नेहरु को देश पर थोप दिया अपनी जिद से और देश में अपना स्व नहीं आ पाया तंत्र में?? अग्निवेश और भूषण को साथ लेकर अन्ना फिर वही गलती तो नहीं दोहरा रहे| अब तो विनायक सेन और मेधा पाटकर जैसे बचे खुचे भी आ गए| बस अरुंधती ही विरोध में है| भगवन ने कृपा की| नहीं तो गिलानी भी रामलीला में नमाज पढ़ते दिखता|

अन्ना आप पर जनता को विश्वास है भारत माता को विश्वास है| कह तो रहे है आप आज़ादी की नै लड़ाई बना भी देना और पुरानी भूलों से बचके रहना… नहीं तो ये सारी शक्ति भी गांधीगिरी ही बनी रह जाएगी!!


अगस्त 23, 2011 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

   

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