उत्तरापथ

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कल्पतरु दिवस 1 जनवरी


श्री रामकृष्ण-विवेकानन्द भावधारा में 1 जनवरी को कल्पतरु दिवस के रुप में मनाया जाता है। इसके पीछे के इतिहास को देखने से पहले हम थोड़ा वर्तमान में मनाये जा रहे नववर्ष के बारे में सोच ले। ताकि ये मन में स्पष्ट हो कि केवल इसके बदले में कल्पतरु दिवस नहीं मनाया जा रहा। वास्तव में नववर्ष सारी दुनिया के लिये एक मनाने का आग्रह ही बड़ा विचित्र है। उत्सव तब मनाया जाता है जब मन में उत्साह हों। वातावरण में उत्साह हो या कोई ऐतिहासिक, सांस्कृतिक कारण हो आनन्द का उल्हास का। तब उत्सव मनाया जाता है। भारत में मुख्य नववर्ष वर्षप्रतिपदा पर होता है, जो मार्च अथवा अपैल के माह में होता है। उस समय अधिकतर भारत में उत्साह का वातावरण भी होता है। किन्तु फिर भी भारत के ही भिन्न भिन्न स्थानों पर अलग अलग समय पर नववर्ष होता है। गुजरात में दिवाली के समय होता हैं आसाम में भी अलग समय होता है।
भारत की जलवायु के अनुसार 1 जनवरी यह नववर्ष के लिये उपयोगी समय नहीं हैं। ग्रहों की दृष्टि से भी उस समय दक्षिणायन का अंत हो रहा होता है। ऋतु भी कड़ाके की सर्दी की होती है। निसर्ग भी आराम कर रहा होता हैं ऐसे में एत्सव नहीं मनाया जाता। भारत के अधिकतर भागों में इसे मल मास कहते है। इस समय में अपने मल अर्थात  मन, बुद्धि व शरीर के मैल को साफ करना होता है। अतः 31 दिसम्बर की काली रात को मध्यरात्री अथवा दूसरे दिन ठण्डी सुबह भी नववर्ष को मनाना उचित नहीं है। केवल विदेशी वर्ष की ही बात नहीं है यह विज्ञान की बात है।
जैसाकि उपर बताया गया यह मैल को धोने के लिये उपयुक्त समय है। अतः साधना का समय है। 1886 में अपनी महासमाधि से कुछ ही माह पूर्व स्वामी विवेकानन्द के गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस ने 1 जनवरी की शाम अपने शिष्यों को बड़ा ही अद्भूत प्रसाद प्रदान किया। काशिपुर उद्यान की घटना है। ठाकुर को गले का कर्करोग (Cancer) था। विश्राम के लिये काशिपुर उद्यान में वास्तव्य था पर भक्तगण तो रहते ही थे। शाम के समय जब कीर्तनानन्द में सब निमग्न थे तब ठाकुर समाधि से उठकर प्रांगण में आ गये। गिरीश घोष उनके साथ थे। उन्होंने गिरीश से पूछा, ‘‘ तुम मुझे क्या मानते हो?’’ वैसे ये प्रश्न वे गिरीश से कई बार कर चुके थे। गिरीशबाबू ने पूरी श्रद्धा से उत्तर दिया, ‘‘हम सब आपको ईश्वर का अवतार मानते है।’’ किसी बालक की भाँति श्री रामकुष्णदेव प्रसन्न हुए। ‘‘अब मै और क्या कहू?’’ ऐसा कुछ कहते हूए समाधिमग्न हो गये। समाधि से बाहर आते ही उन्होने सब शिष्यों पर अपनी कृपावृष्टि प्रारम्भ की। किसी को गले लगाकर, किसी को केवल दृष्टिक्षेप से उन्होने उपकृत किया। वह अलौकिक आशिर्वाद था। उस दिन उस समय जो भी वहाँ उपस्थित थे उन्न्होंने अपने अन्दर अलौकिक आध्यात्मिक शक्ति का संचार अनुभव किया। उनके शिष्य बताते है वर्षों से जिस जिस लक्ष्य को लेकर वे साधना कर रहे थे। ठाकुर के आशिर्वाद से वे उस दिन साक्षात हो गये। जो माँ के दर्शन करना चाहता था उसे वह मिल गया। जो मन क शांति चाहता था उसे वह मिल गया। जो भक्ति चाहता था उसे अविचल भक्ति का प्रसाद मिला। कोई निराकार को अनुभव करना चाहता था। उसकी वह ईच्छा पूर्ण हुई। ठाकुर स्वयं साक्षात् कल्पतरु बन गये।
कल्पतरु अथवा कल्पवृक्ष एक ऐसा वृक्ष है जिसके नीचे बैठकर जो भी ईच्छा की जाये वह पूर्ण होती है। ऐसी ही शक्ति कामधेनु में भी मानी गई है। इसीलिये भारत में गाय का बड़ा महत्व है। गोमाता की सेवा में भी मन, बुद्धि व शरीर का मैल धोने की क्षमता है। गाय के सान्निध्य में कोई विकार नहीं टिकता।
कामधेनु, कल्पतरू, यह सामाजिक साधना के ही नाम है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरूजी कल्पवृक्ष के बारे में एक कथा सुनाया करते थे। एक राज्य में यह प्रचलित था कि एक गुरुकुल में कल्पवृक्ष है। राजा को भी इसका समाचार था पर वो इसे केवल अंधश्रद्धा मानता था। एक बार राज्य में लगातार तीन वर्ष तक अकाल आया। राजा ने अपनी ओर से सब प्रयास किये पर तीन वर्ष तक अनावृष्टि से जब अन्न की ही कमी आ गयी तो वह क्या करेगा? भूख से मरती प्रजा के दुख को देखकर अन्ततः उसने विचार किया कि इस कल्पवृक्ष की मान्यता को जाँच ही लिया जाय। जब वह आश्रम पंहुचा तो उसने पाया कि गुरु और सारे शिष्य उग्र श्रम में लगे है। राजा ने गुरुजी से कल्पवृक्ष के बारे में पूछा टोर अपने आने का उद्देश्य बताया। गुरु जी ने कल्पवृक्ष के होने की पूष्टि की और राज को वहाँ भेज दिया। राजा ने कल्पवृक्ष से बारीश के लिये वरदान मांगा और उनकी ईच्छा तुरंत पूर्ण हो गई। वापिस आने पर राजा ने गुरु से पूछा एक शंका है जब आपके पास कल्पवृक्ष है तो फिर आप और सारे शिष्य इतने काम में क्यों लगे हो? गुरुजी का उत्तर कलपतरु दिवस पर मननीय है। कल्पवृक्ष में समाज की इच्छाओं का वरदान देने की शक्ति हमारे तप और त्याग से ही आती है। यदि हम त्याग और श्रम छोड़ देंगे तो कल्पवृक्ष का बल भी जाता रहेगा।
समाज में जब त्याग जीवित होता है तब ऐसा आदर्श समाज ही कल्पतरु के समान हो जाता है। फिर वहाँ कोई भी भूखा नहीं होता। प्रत्येक की ईच्छापूर्ति के धार्मिक साधन समाज उपलब्ध करा देता है। हमारे महापुरूष अपने तप से हम पर कुपादृष्टि का वरदान देकर हमारी इस त्याग व तप के जीवन में श्रद्धा को दृढ़ करते है। 16 अगस्त 1886 को शरीर छोडने से पूर्व 1 जनवरी को ठाकुर ने अपने शिष्यों पर ऐसी ही कृपा की, ताकि हम इस तप के पथ पर सदा दृढ़ता से अग्रेसर होते रहें।
अपने व्रत को सम्बल प्रदान करने हम सब 1 जनवरी को कल्पतरु दिवस मनाते है। उस दिन शाम को भजन करते है। श्रीरामकृष्ण की जीवनी, लीलीप्रसंग अथवा भक्तमालिका में से इस प्रसंग का पठन करते है। ठाकुर के समक्ष अपनी उदात्त इच्छा, जीवन के आध्यात्मिक, सामाजिक अथवा राष्ट्रीय ध्येय को प्रगट करते है। हमारी श्रद्धा है कि सच्चे मन से इस दिन की हुई प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाती। हाँ ! पर एक याद रहे प्रार्थना स्वार्थ की ना हो। व्यक्तिगत प्रार्थनाओं के बारे में कोई खातरी नहीं दे सकते। उसका असर तो उलटा होता है। स्वार्थ तो मन का मैल बढ़ाता है घटाता नहीं।

जनवरी 1, 2012 Posted by | चरित्र, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

   

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