उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

अस्मिता भारतीय की, परिचय भारत का . . .


कल वर्षप्रतिपदा है। पूरे देश में उल्हास व धार्मिक पवित्रता के साथ नववर्ष के उत्सव मनाये जायेंगे। विदेशी पंचांग के आदी तथाकथित आधुनिक लोग शायद इसको जानते भी नहीं होंगे। निश्चित ही माध्यमों द्वारा 1 जनवरी के समान हंगामा तो होगा ही नहीं। यदि कोई केवल प्रसार माध्यमों पर ही निर्भर करता हो तो सम्भवतः इस नववर्ष से अनभिज्ञ ही रहेगा। इन परिस्थितियों को देखकर मन में प्रश्न आता है- क्या यही भारत है?

पुदुचेरी के एक युवा लेखक ने अमेरिकी समाचारपत्र न्यूयार्क टाइम्स में लेख लिखा है कि ‘‘भारत अब अमेरिका बन गया है’’।

http://www.nytimes.com/2012/03/11/opinion/sunday/how-india-became-america.html?_r=4&hp

बड़े बड़े माल के चित्र दिखाकर भारत में फैल रहे पाश्चात्य प्रभाव का उदात्तीकरण ही इस लेख में किया है। इसी को विकास के पर्याय के रूप में चित्रित किया गया है। पूरे लेख में ऐसा चित्रण दिया गया है मानो भारत में पूरे संस्कार ही अमेरिका जैसे हो गये है। इस सब में लेखक का भाव उत्सव का है। मानों अमेरिका बन जाना भारत की कोई बहुत बड़ी उपलब्धी है। दो प्रश्न इस युवा पत्रकार को अपने आप से पूछने चाहिये। एक क्या वाकई बहुतांश भारत में यह पाश्चात्यीकरण हुआ है? और दूसरा कि क्या बाहरी परिवर्तन से भारत का मूल स्वभाव, भारत की आत्मा ही बदल जायेगी? हमारी शिक्षा ने हमें अपने आप से ही अनभिज्ञ कर दिया है। आज हमारे शिक्षित युवा नहीं जानते कि भारत क्या है। केवल किसी एक युवा पत्रकार की बात नहीं है अपने इतिहास, संस्कार व संस्कृति से परिचय ना होने के कारण अनेक तथाकथित उच्च शिक्षित युवा विकसित सम्पन्न भारत को अमेरिका की प्रतिकृति के रूप में ही देखना चाहते है।

इसमें वाकई इन युवाओं का दोष नहीं है। हमारे प्रबुद्ध वर्ग का यह दायित्व है। पर प्रबुद्ध वर्ग स्वयं ही भ्रमित दिखाई देता है। सर्वोच्च न्यायालय के एक भूतपूर्व न्यायाधीश जो वर्तमान में प्रसार माध्यमों की संस्था के अध्यक्ष है, ने अमेरिका में दिये अपने व्याख्यान में भारत को एक सराय के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने भारत को दूसरे देश से आये प्रवासियों का देश बताया। उनके अनुसार सहस्रों वर्षों से अनेक अलग अलग मूल के लोग यहाँ आते गये और बसते गये। अर्थात वर्तमान में जो हम सब यहाँ के निवासी है उनका इस भूमि से कोई नाता ही नहीं है। हमने भी अपने विद्यालय में इतिहास की पुस्तकों में ऐसी ही बातें पढ़ी है। किन्तु गत 2 से भी अधिक दशकों से मिली पुरातात्विक जानकारी ने इस कहानी को झूठा साबित कर दिया है। आर्यों के भारत बाहर से आने के सिद्धांत का विश्वभर के विद्वान पुरातत्व वेत्ताओं तथा इतिहासकारों ने खण्डन किया है। 1300 से भी अधिक स्थानों पर हुई खुदाई ने हड़प्पा व माहन जो दारों से भी 2000 वर्ष पूर्व से आज तक एक सलग, अखण्ड सरस्वति-सिंधु सभ्यता के होने के प्रमाण प्रचूर मात्रा मे प्रस्तुत किये है। भले ही विद्यालय व महाविद्यालयों की पुस्तकों में इन तथ्यों को आने में और देरी हो सकती है किन्तु विद्वान पूर्वन्यायाधीश को तो यह ज्ञात ही होगा। अतः उनके द्वारा विदेश में भारत की राष्ट्रीय अस्मिता के बारे में इस प्रकार का विपर्याय देख मन में प्रश्न उठता है कि यह भ्रमप्रणीत प्रामाणिक अभिमत है अथवा वाममार्गी विचारकों द्वारा हेतु पुरस्सर किये जा रहे बुद्धिभेद का अंग है?

स्वतन्त्र भारत में हम अपनी अस्मिता को भूलते जा रहे है। अस्मिता अर्थात पहचान। अपने होने का मूल्य, सार्थकता। बिना अस्मिता के भान के देश का स्वाभिमान जागना सम्भव ही नहीं है। विड़म्बना यह है कि भारत में विदेशी शासन के विकट काल में हमने अपनी अस्मिता को अक्षुण्ण रखा और आज जब राजनैतिक स्वतन्त्रता है तब हम इसे भूलते जा रहे है। भारत की आत्मा धर्म है। किसी विदेशी विश्वविद्यालय में इस बात पर अनुसंधान हो रहा है कि इस्लाम के कठोर आक्रमण के सामने विश्व की बड़ी बड़ी सामथ्र्यवान व समृद्ध सभ्यतायें, जैसे मिस्र, मेसोपोटेमिया, पारस आदि कुछ दशकों में ही ध्वस्त हो गई। वहाँ की पूरी जनसंख्या ईस्लाम में मतांतरित हो गई। आज वहाँ पूरानी सभ्यता के केवल अवशेष ही बचे है। कोई जीवित वंशधर नहीं बचा। 700 वर्षों से अधिक के इस्लामी आक्रमण व 170 साल के मुगल राज्य के बाद भी आज भारत में हिन्दू न केवल जीवित है अपितु फल फूल रहा है और अपने पूर्व वैभव को प्राप्त करने की ओर अग्रेसर है। इसके मूल में क्या कारण है? क्या इस संस्कृति की विशेषता है जो इसे शाश्वत सनातन अमृतत्व प्रदान कर रहा है? यह विदेशों में शोध का विषय है किन्तु भारत में आज इस बात का भान ही नहीं है।

वास्तव में हम भ्रमित हैं अतः विरोधाभास से भी ग्रसित हैं। गीता को सायबेरिया के कोर्ट में चुनौति दी जाती है तो सारा देश एकस्वर में विरोध करता है। देश के विदेशमन्त्री रशिया के राजदूत को बुलाकर अपनी नाराजगी व्यक्त करते है। किन्तु इसी के 6 माह पूर्व जब मध्य प्रदेश सरकार विद्यालयों में गीता का पाठ पढ़ाने का निर्णय करती है तो इन्हीं के दल के लोग जबलपुर उच्च न्यायालय में इसका विरोध करते है। नार्वे में हाथ से भोजन करने जैसी भारतीय परम्पराओं को स्वास्थ्य के विपरित बताकर बच्चों को मातापिता से दूर करने का घोर विरोध करते समय मिड़िया कहता रहा कि आप हमारी परम्पराओं को अपनी दृष्टि से कैसे देख सकते है? वही मिड़िया पाद्यपूजा की अतिप्राचीन परम्परा की आलोचना करते समय भूल जाता है कि ये सारी आलोचना पश्चिमी दृष्टि के कारण है। शिक्षित भारत की यह विडम्बना आज के सभी समस्याओं की जड़ है।

वर्तमान में भ्रमित भारत पुनः अपनी अस्मिता को खोज रहा है तब वर्षप्रतिपदा का अवसर भारतीय अस्मिता के जागरण का अवसर है। पूरे देश के अधिकांश भागों में यह नववर्ष का दिन है। हमारी मान्यता के अनुसार आजही के दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की। यह एक संकल्प लेने का अवसर है। नवीकरण, सृजन के संकल्प का अवसर। इसी दिन भारत की अस्मिता को मूल वेदों की रक्षा द्वारा पुनर्जागृत करने के लिये महर्षि दयानन्द सरस्वति ने आर्य समाज की स्थापना की। हिन्दू समाज को संगठित कर भारत की राष्ट्रीयता का अलख जगाने के लिये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना करनेवाले युगपुरूष डॉ केशव बळीरामपंत हेडगेवार का भी यह जन्मदिन है। कुल मिलाकर भारत की भारतीयता को जगाने का दिन है। इस वर्ष का संयोग ऐसा है कि इसी दिन हुतात्मा दिवस है। भारत की स्वतन्त्रता के लिये अपने यौवन को आहुत करनेवाले हुतात्मा भगतसिंह, सुखदेव व राजगुरू का बलिदान दिवस 23 मार्च सभी युवाओं के लिये अपने देश के लिये संकल्प लेने का दिन है। किस स्वप्न को संजोंये हँसते हँसते बलिदान हुए थे ये वीर? यह प्रश्न हर मन में गुंजाने का यह दिन है। भारत से भारत का परिचय करा हर भारतीय की अस्मिता को जगाने का संकल्प ही विश्व मानवता का त्राण कर सकता है।

मार्च 22, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

   

%d bloggers like this: