उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

आक्रोश का लक्ष्य शत्रु हो, अपनी सरकार नहीं


वर्तमान समय में भारत में होनेवाली घटनाओं पर केवल प्रसार माध्यमों में ही नहीं, सामाजिक माध्यमों (Social Media) में भी बहुत अधिक आक्रोश और क्रोध का भाव उत्पन्न किया जाता है लोगों को अपने भावों को व्यक्त करने के लिए एक माध्यम मिल गया सुकमा में CRPF के २६ जवानों का बलिदान निश्चित रूप से पूरे देश को विचलित कर गया।पाकिस्तान द्वारा भारत के सैनिकों की शिरछेद कर निर्मम हत्या किया जाना भी सारे देश को पूरी तरह से आहत कर गया। इन दोनों दुखद घटनाओं की प्रतिक्रिया में प्रसार माध्यमों ने भी बड़े प्रमाण में विद्रोह का वातावरण उत्पन्न किया पाकिस्तान से युद्ध करो’, ‘बर्बाद कर दो’, ‘तबाह कर दो’, ‘प्रतिशोध ले लोइस प्रकार के कार्यक्रम इलेक्ट्रोनिक माध्यमों में भी दिखाई देने लगे। समाचार पत्रों में लोगों ने अनेक प्रकार के लेख भी लिखे। अनेक देशभक्त लोग भी सोशल मिडिया में facebook, whatsapp आदि पर इन घटनाओं पर बोलते समय अपनी ही सरकार के विरुद्ध बोलने लगे सरकार क्या चूड़ियाँ पहनकर बैठी है ?’, ‘कहाँ गयी ५६ इंच की छाती ?’  इस प्रकार के सन्देश चारों ओर दिखाई देने लगे इन बातों पर थोड़ा गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है

          निश्चित रूप से देश में ऐसी कोई घटना होती है तो सबके मन में दुःख, कष्ट उत्पन्न होना स्वाभाविक है किन्तु उसका जब हम प्रगटीकरण करते हैं, अभिव्यक्ति करते हैं तब हमको यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि हम कही देश को तोड़नेवाली शक्तियों को तो अधिक बल नहीं दे रहे नक्सलवादियों का उद्देश्य ही यह है कि समाजमन में सरकार के विरुद्ध असंतोष भड़के ३०० लोगों ने १५० लोगों को घेरकर २६ जवानों को घात लगाकर मारा।  इस कायरतापूर्ण हिंसा का विरोध करने के स्थान परसरकार क्या कर रही है ?’, ‘राजनाथ सिंह जी को इस्तीफा देना चाहिए’, ‘CRPF का कोई प्रमुख ही नहीं हैइन बातों के ऊपर मिडिया विमर्श को ले जाना यही तो नक्सलवादी चाहते हैं तो हम कही ना कही देशभक्ति के नाम पर अपने देश के विरुद्ध तो बातें नहीं कर रहे ? पाकिस्तान ने सैनिकों को भारत में आकर बड़ी विद्रूपता के साथ, बड़ी क्रूरता के साथ, बर्बरता के साथ हुतात्मा किया लेकिन उसी के प्रतिशोध में तुरंत एक घंटे के अन्दर भारतीय सेना ने पाकिस्तान की सीमा में घुसकर चौकियां उड़ा दी और पाकिस्तान के सैनिकों को मार गिराया के बदले , के बदले इस प्रकार की कार्यवाही सेना ने की प्रसार माध्यमों ने पहली घटना को तो बड़े जोरशोर से प्रसारित किया लेकिन दूसरी घटना को ज्यादा प्रसारित नहीं किया इसलिए समाज में भाव निकला किसेना क्या कर रही है ?’  वास्तविकता में पहली बार सेना को खुली छूट दी गयी है कि वो प्रतिशोध लें लोगों ने सामाजिक मिडिया और प्रसार माध्यमों में यहाँ तक प्रतिक्रिया दी किफुल टाइम हमारे पास में डिफेंस मिनिस्टर नहीं है पर्रीकर जी के जाने के बाद अरुण जेटली जैसे व्यस्त जो वित्त मंत्री पहले से है, ऐसे मंत्री को ही अधिभार दिया गया है इस बात पर भी लोग गए किसी ने जब मुझसे यह कहा तब मैंने उन्हें मजाक में कहा किअच्छा है जो रक्षा मंत्री नहीं है, इसलिए सेना ने स्वतः निर्णय लेकर प्रतिशोध ले लिया रक्षा मंत्री होते तो उनसे अनुमति लेने में समय चला जाता

           ये केवल आज की ही बात नहीं है २६/११ के समय जब दिनों तक पाकिस्तान के क्रूरकर्मा आतंकवादियों ने मुंबई को स्तब्ध कर दिया था पूरा देश टीवी पर चिपटा हुआ उस तमाशा देख रहा था। हमारे सैनिक और कमांडोज ने वीरतापूर्वक कार्यवाही करते हुए अपने नागरिकों को कम से कम नुकसान पहुंचाने का लक्ष्य रखते हुए सारे आतंकवादियों को मार गिराया कसाब को जीवित पकड़ा जिसके कारण पाकिस्तान का सारा षडयंत्र खुलकर सामने आया किन्तु उसके तुरंत बाद गेट वे अव इंडिया पर मुंबई में जो कैंडल मार्च निकला वह सरकार के विरुद्ध था, आतंकी पड़ौसी के विरुद्ध नहीं। तो हम कही ना कही अपने जोश में देशभक्ति के नाम पर अपने देश के विरोध में तो काम नहीं कर रहे ? पाकिस्तान तो यही चाहता है कि भारत की सरकार के विरुद्ध हम बोले मैंने यह दूसरा उदाहरण इसलिए दिया क्योंकि सरकार नरेन्द्र मोदी की है या मनमोहन सिंह की है इससे फरक नहीं पड़ता, कांग्रेस की है या बीजेपी की है इससे फरक नहीं पड़ता। सरकार किसी राजनितिक दल की नहीं होती सरकार तो देश की सरकार होती है। हमारी अपनी सरकार होती है। इसलिए हमारी प्रतिक्रिया संयत और संयमित होनी चाहिए

           वर्तमान समय में राजनीति इतनी अधिक प्रतिस्पर्धी और कटुता भरी हो गयी है कि विपक्षी दल सरकार को प्रधानमंत्री को घेरने के लिए ऐसी संवेदनशील घटनाओं को भी अवसर बनाते है राष्ट्रहित का विचार बिना किए अनेक प्रकार की असत्य अथवा अतिशयोक्त बातें फैलाते है कुछ दलों ने तो ऐसे कामों के लिए विशेष मंत्रणा कक्ष (War Rooms) बना रखे है इनका कार्य ही प्रसार माध्यमों तथा सामाजिक माध्यमों पर भ्रामक सामग्री फैलाना होता है अभी इंदिरा गांधी के काल्पनिक वीरतापूर्ण कार्यों की असत्य अथवा अर्धसत्य सूची देकर वर्तमान सरकार के स्वच्छता अभियान, जनधन, नोट बंदी आदि महत्वपूर्ण पहल की भद्दी मज़ाक़ उड़ाने वाला एक संदेश प्रसारित हो रहा है कपट ये कि संदेश किसी मोदी समर्थक द्वारा लिखा हो इस प्रकार बनाया गया है अनेक सहज देशभक्त इस चाल को समझ नहीं पाते और इस सरकार विरोधी संदेश को अपनी आहत भावना की अभिव्यक्ति समझ आगे बढ़ा देते है अनेक अलगाववादी संगठन भी इन कामों में लिप्त हैं देश के प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में छिपें बौद्धिक नक्षलवादी इस कार्य में प्रवीण है ईसाई मिशनरी भी ऐसी देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहे है ऐसे प्रमाण है विदेशी ताकते इन जयचंदों का उपयोग भारत में असंतोष भड़काने में करती है अनेक ग़ैर सरकारी संस्थाएँ  NGO भी इन कार्यों में लिप्त पायी गयी है २६ वीर CRPF जवानों को कायरतापूर्वक मारने की घटना का समर्थन करने के लिए सुरक्षा बलों द्वारा बलात्कार की काल्पनिक कहानी गढ़ी गयी और सामाजिक माध्यमों पर फैलायी गयी सुरक्षा बलों द्वारा दिया खंडन सब जगह नहीं पहुँच पाया हम में से भी अनेक लोग इस प्रामाणिकता का पालन नहीं करते है कि यदि हमने ग़लती से असत्य वा भ्रामक संदेश अग्रेषित (Forward) किया है और बाद में उसका खंडन हमें मिल गया तो उसे भी उन सभी तक प्रसारित करें जिन्हें हमने ग़लत सूचना दी थी परिणामतः खंडन अप्रभावित ही रह जाता है

           इसमें एक और विचारणीय बिंदु है। आज सारे विश्व में जो खुफियातंत्र, गुप्तचर विभाग काम करते हैं उनका एक बहुत बड़ा काम मानसिक युद्ध का है। इस मानसिक युद्ध में प्रसार माध्यमों पर नियंत्रण एक बहुत बड़ी लड़ाई है दुसरे देशों के प्रसार माध्यमों में विज्ञापनों के द्वारा, पैसा देकर, पत्रकारों को खरीदकर देशविरोधी असंतोष का माहौल उत्पन्न किया गया तो इसका लाभ शत्रु देश को मिलता है। यह काम रशिया (USSR) जब अमीर था तब KGB करता रहा, CIA बहुत वर्षों तक करता रहा। अभी २००८ से अमेरिका की आर्थिक स्थिति विकट हो गयी इसलिए CIA का पैसा कम हो गया। किन्तु आज बड़े पैमाने में भारत में चीन और पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसियां यह काम करती हैं। ये गुप्तचर संस्थाएं भारत में प्रसार माध्यमों के माध्यम से इस प्रकार के सरकार विरोधी सन्देश फैलाने का काम करती हैं। अब पिछले कुछ दिनों से उन्होंने सामाजिक माध्यमों (facebook, whatsapp आदि) को भी अपना हथियार बनाया है। इनके द्वारा बड़ीबड़ी कंपनियों के सामग्री बनाने (content generation) दल बनाए गए है ये दल इस प्रकार की सामग्री तैयार करते हैं और कई बार सच को झूठा, विकृत करते हैं सरकार के विरुद्ध असंतोष बनाने वाली सामग्री को फैलाते हैं इनको कश्मीर में हो रही पत्थरबाजी, JNU में हुई घटनाएं ऐसी बातों से आधार मिल जाता है और फिर ऐसा समाचार तुरंत फैलता है   अपने आप को देशभक्त समझनेवाले भी इस बात को फैलाते हैं।पाकिस्तान को मिटा दो’, ‘full fledge war कर दो अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की जिन्हें समझ नहीं है उन्हें यह समझ नहीं आएगा कि इससे चीन का क्या हित साध्य होता है?  चीन इस प्रकार की बातें फैलाकर भारत की जनता को सरकार के विरुद्ध यदि भड़कायेगा तो जो परिस्थितियां बनेगी उसका लाभ चीन पाकिस्तान में उठा सकता है,  अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठा सकता है। इसलिए बहुत सतर्कता से सोशल मिडिया का  प्रयोग करने की आवश्यकता है

           एक और भावनात्मक बिंदु भी है। क्या यह देश वीरता को भूल गया ?  भारत माँ को एक विशेषणवीर प्रसविणी  बताया जाता है। और, वीरता की सत्य परीक्षा तो मृत्यु के सामने होती है। निश्चित रूप से हमारे सैनिकों की मृत्यु दुखद है। उनके प्रति हमारे मन में श्रद्धा होनी चाहिए और अपने श्रद्धासुमन और श्रद्धांजलि निश्चित रूप से उन्हें अर्पित करने चाहिए। किन्तु मृत्यु से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है मृत्यु से भयभीत होकर यदि हम उस मृत्यु का वर्णन करते हैं तो उनके हुतात्म्य का, उन्होंने किये हुए बलिदान का अपमान करते हैं। हमारे २६ सैनिक शहीद हुए तो हमारी श्रद्धांजलि भी वीरतापूर्ण होनी चाहिए और वीरतापूर्ण श्रद्धांजलि आक्रोश से नहीं होती। वीरता संयम में दिखाई देती है। इसलिए वह संयम केवल सरकार को ही नहीं, समाज को भी रखना है। सरकार को तो मानना पड़ेगा कि सरकार ने बहुत ही संयम के साथ इन सारी बातों का सामना किया है। पत्थरबाजों के ऊपर पेलेट गन का उपयोग भले ही किया हो, लेकिन कही पर भी गलती से भी गोली नहीं चलायी। अगर कोई एक मर जाता तो तुरंत उसे विक्टिम प्रस्तुत कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बवाल मचाने का अवसर मिल जाता। इसलिए सरकार ने तो संयम रखना ही होता है।

अफझल खान के आक्रमण के समय छत्रपति शिवाजी महाराज ने अद्भुत संयम दिखाया था प्रताप गढ़ के घने जंगल में उसे घेरने की योजना की अफझल ने बहुत उकसाने का प्रयत्न किया यहाँ तक कि महाराज की कलदेवी तुलजा भवानी का मंदिर भी तोड़ दिया पर महाराज डिगे नहीं प्रतीक्षा करते रहे सही समय और अवसर की समय आने पर अफझल की बलि माता को देने के बाद सब भग्न मंदिरों का जीर्णोद्धार किया ये तो अच्छा ही था कि उन दिनों २४ घंटे बकबक करने वाले ख़बरिया चैनल भी नहीं थे और घर बैठे रणनीति बखारने हेतु सामाजिक माध्यम भी नहीं थे आज भी हमें हमारी सेना पर विश्वास रखने की आवश्यकता है जैसे शिवाजी महाराज ने अपने समय पर अपने द्वारा तय स्थान पर कार्यवाही की वही बात तो हमारे सेनानायक ने कही, ” मुँहतोड़ जवाब देंगे पर समय भी हम तय करेंगे और स्थान भी

          आज सोशल मिडिया के युग में हम जैसे देशभक्तों को भी इन मामलों में संयम रखने की आवश्यकता है। हमको निश्चित रूप से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करना चाहिए। लेकिन भावनाओं को अभिव्यक्त करते समय हमारे सैनिकों के बलिदान के कारण आक्रमणकारी उन कायरों के विरुद्ध अपना पराक्रम होना चाहिए। नक्सलवादियों के ऊपर हमारा आक्रोश होना चाहिए   नक्सलवाद को दूर से, वैचारिक रूप से, बौद्धिक रूप से संबल प्रदान करनेवाले कम्युनिस्टों को, बाहर देश से उन्हें पैसा देनेवाले ISI और चीन के विरुद्ध हमारा आक्रोश होना चाहिए।  ना कि हमारी सेना, CRPF, रक्षामंत्री, गृहमंत्री, मुख्यमंत्री या हमारे प्रधानमंत्री के विरुद्ध   हमारा आक्रोश शत्रु के विरुद्ध हो, अपनों के विरुद्ध ना हो यह संयम हमको अपने मन में रखना पड़ेगा। पाकिस्तान के विरुद्ध हम बात करें इस कायरता का विरोध और जवाब देने के लिए अपनी सरकार पर दबाव बनाये यह तर्क ठीक है। लेकिन आज इस दबाव की आवश्यकता नहीं है सेना और नेतृत्व की क्षमताओं पर हमको विश्वास रखना चाहिए। इस प्रकार के सामाजिक उद्रेक से दबाव में आकर सरकारें काम नहीं करती हैं और यदि सरकार ऐसी सामाजिक कायरता से, आक्रोश से वशीभूत होकर काम करती है तो हमेशा गलत काम ही होता है   मृत्यु से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि मृत्यु अवश्यम्भावी है। मृत्यु से डरकर, भय में जो निर्णय लिए जाते हैं वे कभी सही नहीं हो सकते। पाकिस्तानी आतंकवादियों ने नेपाल से Air India के विमान का अपहरण किया उसमें बैठे हमारे जो १८० भारतीय नागरिक थे उनके रिश्तेदार सरकार के सामने उनके मृत्यु के भय से नंगा नाच कर रहे थे। सारी मिडिया ने उसे दबाव का तंत्र बनाया।  ये १८० लोग जीवित रहने चाहिए इसलिए सारे देश ने कायरता और नपुंसकता दिखाई। वीरता का परिचय देकर संयम का परिचय नहीं दिया और दुर्भाग्य से उस समय की सरकार भी इनके सामने झुकी। सरकार ने भी संयम नहीं दिखाया और तीन दुर्दांत आतंकवादियों को हमने १८० लोगों की मृत्यु के भय से, उनकी जान बचाने के लिए छोड़ दिया उन तीन में से एक है अजहर मसूद। उस एक की आतंकवादी घटनाओं के कारण ही पिछले १०१२ वर्षों में, १८० को बचाने के लिए तब उसको छोड़ा गया था, और तब से लेकर आज तक १८००० से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं १० गुना से अधिक मृत्यु भारतमाता को झेलनी पड़ी क्योंकि भारत के नागरिकों ने कायरता का परिचय दिया उस समय उन १८० में से केवल ऐसे लोग थे, जिनके रिश्तेदारों ने कैमरा के सामने जाकर कहा किहमारे लोग बलिदान हो जाए तो भी कोई बात नहीं लेकिन सरकार को आतंकवादियों को नहीं छोड़ना चाहिए।  बाकि बचे १७८ लोगों के रिश्तेदार सरकार पर दबाव डाल रहे थे किभले ही आतंकवादी छोड़ दो लेकिन हमारे रिश्तेदार को बचाओ   यह कैसा कायरों का देश हमने बना दिया?  क्या हमारे यहाँ वीरता नहीं ? आज भी जिस प्रकार की प्रतिक्रिया हमारे २६ जवानों के वीरगति पर समाज में की जा रही है वह कायरता की प्रतिक्रिया है, कायरता का आक्रोश है यह पराक्रम का आक्रोश नहीं है। पराक्रम का आक्रोश होता तो हमारे आक्रोश का लक्ष्य वो नक्सलवादी होते हमारे आक्रोश का लक्ष्य उनको पीछे से संबल देनेवाला चीन और पाकिस्तान होता, और उसके पीछे का अर्थतंत्र होता हम अपने अन्दर झाँककर देखते कि मेरे घर के अन्दर आनेवाली किसी चीनी वस्तु से ही तो पैसा नक्सलियों के पास नहीं गया ? उन २६ जवानों को जो गोली मारी गयी थी उन गोलियों के अन्दर जो पैसा लगा था वो पैसा कही मेरे द्वारा खरीदी गयी विदेशी चीजों के कारण तो नहीं था ? यह भी तो स्वयं को पूंछना चाहिए। पराक्रम इसे कहते है सरकार को कोसना पराक्रम नहीं है। प्रसार माध्यमों का तो हम कुछ नहीं कर सकते किन्तु हमारे जैसे सामाजिक माध्यमों पर काम करनेवाले देशभक्तों को ऐसी संवेदनशील स्थितियों में, ऐसी कठिन घड़ी में अपनी बंदूकों को, अपने वाग्बाणों को, अपने पूरे मोर्चे को शत्रु की ओर रखना चाहिए ना कि अपनी सरकार को कमजोर और हतोत्साहित करने के लिए सरकार देश की होती है और उसके ऊपर विश्वास रखना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है अगर विश्वास नहीं है तो साल बाद अवसर मिलेगा तब इनको हटाने का भी आपके पास अधिकार है लेकिन साल के लिए जिस सरकार को हमने चुनकर दिया है उसके उपर विश्वास रखना चाहिए दबाव बनाना चाहते है तो उसके लिए पूरे अध्ययनपूर्ण लेख लिखे जा सकते हैं

          लेकिन भावनाओं का यदि उद्रेक करना है तो वह शत्रु के विरुद्ध ही हो, अपनी सरकार के विरुद्ध ना हो यह अत्यंत आवश्यक बात है

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मई 9, 2017 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

स्मृति स्वाधीनता संग्राम की . . .


10 मई 1857, अंग्रेजी सत्ता के विरूद्ध प्रथम स्वाधीनता संग्राम का शुभारम्भ। 1908 में स्वातन्त्र्यवीर सावरकर ने लंदन में 10 मई को क्रांति दिवस के रूप में मनाया था। उन्होंने हुतात्माओं की शपथ ली थी कि जब तक देश स्वतन्त्र नहीं हो जाता क्रांति की अग्निशिखा को प्रज्वलित रखेंगे। सावरकर ने ही ‘प्रथम स्वातन्त्र्य समर‘ नाम से पुस्तक लिख कर इसके वास्तविक राष्ट्रीय स्वरूप का परिचय भारतीयों को करवाया था। यह विश्व की एकमात्र ऐसी पुस्तक है जिसे छपने पूर्व ही प्रतिबंधित कर दिया गया तथा मूल पुस्तक के प्रकाशन से पूर्व ही इसका फ्रेंच अनुवाद प्रकाशित हुआ।

सावरकर ने उस समय की परिस्थिति के अनुसार इसे केवल प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम कहा है किन्तु आज हमें यह स्पष्ट करना चाहिये कि यह अंग्रेजों के विरूद्ध प्रथम आंदोलन था। केवल प्रथम कहना तो पूर्ण सत्य नहीं होगा। शिवाजी, राणाप्रताप के संग्राम भी स्वाधीनता के ही संग्राम थे। शिवाजी से प्रेरणा प्राप्त कर छत्रसाल जैसे अनेक वीरों ने मुगलों के परकीय शासन को उखाड़ स्वकीयों के शासन को प्रस्थापित किया था। उससे भी अनेक शताब्दियों पहले सिकन्दर की सेना को भगाने का कार्य चाणक्य के शिष्यों ने किया था। अतः स्वाधीनता का संग्राम तो भारत में सतत चलता रहा है। गत 2000 वर्षों में कोई भी 25-50 वर्ष का भी कालखण्ड ऐसा ना बीता हो जब देश के किसी ना किसी कोने में स्वतन्त्रता का आंदोलन ना हुआ हो। हमने कभी भी विदेशी, विधर्मी सत्ता को पूर्णतः स्वीकार नही किया। इतना ही नहीं इस कालखण्ड के बहुत बड़े हिस्सें में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से हमारा अपना स्वदेशी शासन चलता रहा है। विदेशी इतिहासकारों के प्रभाव में आज भी हम इसे मराठा, राजपूत, सिख शासन इस प्रकार बाँटकर देखते है। जब कि ये सब स्वकीय शासन थे। इतिहास को पश्चिमी दृष्टि के स्थान पर भारतीय राष्ट्रीय दृष्टिकोण से देखने पर हमको इस कालखण्ड को दासता अथवा गुलामी का काल कहने के स्थान पर संग्राम युग कहना होगा।

प्लासी में द्रोहियों के कारण हुए पराभव के बाद पराधीन हुए भारत का अंग्रजों की सत्ता के विरूद्ध पहला संगठित संग्राम 1857 का है। इस संग्राम की अनेक विशेषतायें हैं। सामान्यतः जिसे केवल सिपाही विद्रोह कहा जाता रहा है तथा दुर्भाग्य से आज भी अनेक भारतीय विश्वविद्यायलों के पाठ्यक्रम में इसी रूप में पढ़ाया भी जाता है वह जन सामान्य का संग्राम था। अंग्रेजी फौज में सम्मिलित भारतीय सैनिक भी जनविद्रोह का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थे। दूसरा भ्रम यह फैलाया जाता है कि यह केवल राजे रजवाड़ों तथा नबाबों का अपने अपने संस्थानों के लिये किया युद्ध था। राष्ट्रीय स्वतन्त्रता का भाव इसमेे निहित नहीं था। यह भी जानबुझकर फैलाया भ्रम है। उस समय के अंग्रजों के दस्तावेज प्रमाण है कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई तथा उनके सेनापति तात्या टोपे के अद्भूत नियोजन से पूरे देश में ही इस संग्राम का जाल बिछाया गया था। ब्रिटिश सेना की छावनियों में फैला असंतोष भी कोई संयोग मात्र नहीं था। रानी के प्रभावी गुप्तचर विभाग का वह सफलतम छù युद्ध था। रानी ने सामान्य वेश्याओं को अपनी कला के माध्यम से राष्ट्र कार्य के लिये प्ररित किया। स्वर्गीय पति की नाट्यशाला की नटियाँ गुप्तचर बनीं और सैनिक शिविरों में नांच गाने के माध्यम से प्रथम असंतोष फैलाने का व बाद में संदेश पहुँचाने का कार्य इन वीरांगनाओं ने किया था।

पूरे देश में ही रोटी व कमल के निशान के द्वारा क्रांति का संदेश प्रवाहित हुआ था। जो इतिहासकार अज्ञान अथवा कपट के कारण इसे केवल उत्तरी भारत में सीमित बताते है वे भी सत्य से परें है। मैसूर तथा त्रावणकोर तक इस क्रांति की ज्वाला लगी थी। पूर्वनिर्धारित तिथि 31 मई को दोनों ही राज्यों ने अंग्रेजों के शासन को नकारा तथा युद्ध की घोषणा की। कंपनी के प्रतिनिधियों को निष्कासित कर दिया। मैसूर जैसे राज्यों में जहाँ कंपनी की टुकड़ियों ने विरोध किया वहाँ सभी अंग्रेजों को बंदी बना लिया गया। एक ही दिन में भारत के एक बड़े हिस्से ने स्वयं को कंपनी की सत्ता से मुक्त घोषित कर दिया। इतिहास की कठोर वास्तविकताओं में ‘‘यदि’’ की कल्पनाओं को कोई स्थान नहीं होता। फिर भी यह तो कहना ही होगा कि यदि 10 मई को मंगल पाण्डें संयम नहीं खोता और पूर्वनिर्धारित योजना के अनुसार 31 मई को क्रांति की चिंगारी एकसाथ पूरे देश में प्रगट होती तो अंग्रेजों के लिये इसे नियंत्रित करना निश्चित ही असम्भव हो जाता। अतः 10 मई के क्रांति दिवस का एक संदेश यह भी है कि जोश, उत्साह, उमंग, उत्सर्ग व समर्पण के साथ ही देशसेवा में धैर्य तथा संयम का भी बड़ा स्थान है। कई बार परिवर्तन के आंदोलन की अनिवार्यता व आग्रह के चलते हम प्रतिक्षा को असहनीय मान बैठते है किन्तु बृहत् योजना में इसका भी महत्वपूर्ण स्थान है।

अंग्रेजों को समूल भारत से बाहर करने के जिस उद्देश्य से इस महाक्रांति का आज ही के दिन सूत्रपात हुआ था क्या वह लक्ष्य पूर्ण हुआ है? आज के दिन हमें यह सोचने पर विवश होना पड़ता है कि क्या देश मानसिक दासता से स्वाधीन हुआ है? का हम वास्तव में स्वतन्त्र हुए है? क्या यह जो तन्त्र, व्यवस्था हमने अपनायी है वह स्व की है? स्वदेशी है? इस देश के ऐतिहासिक अनुभव व संस्कारों में से पनपी है? यदि इन सारे प्रश्नों के उत्तर नहीं में दिये जा रहे है तो फिर आज पुनः क्राति की ज्वाला प्रज्वलित करनी होगी। सच्ची स्वाधीनता के लक्ष्य को प्राप्त करने तक यह क्रांति जीवित रहेगी। यही संकल्प 1857 के वीरों की स्मृति में हर देशभक्त को लेना होगा।

सावरकर का उद्बोधन १० मई १९०८ अवश्य देखें

http://www.youtube.com/watch?v=nCMk3HcXr-8&feature=youtu.be

मई 10, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

   

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