उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

प्रसार माध्यम भी कहे – ‘पहले भारत!’


newshourयह बहस का विषय है की प्रसार माध्यम और पत्रकारिता समाज के दर्पण के रूप में काम करे या उनपर समाज के प्रबोधन का दायित्व हो? वर्तमान में प्रसार माध्यम गंदगी को परोसते समय यह तर्क देते है की समाज यही देखना/पढ़ना चाहता है | वैसे तो यह कुतर्क ही है और इसकी सत्यता को भी प्रमाणित नहीं किया जा सकता | समाज में फूहड़ पत्र-पत्रिकाओं की पाठकसंख्या कुछ हजार ही होगी वहीं दूसरी ओर ‘अखंड ज्योति’ जैसी धार्मिक पत्रिकाएँ लाखों की संख्या में प्रकाशित, मुद्रित व वितरित होती है | चित्रवाहिनियों (Channels) में भी आस्था, संस्कार जैसे धार्मिक वाहिनियों की दर्शकसंख्या MTV या iTunes जैसी दिनभर फूहड़ गाने बजानेवाली वाहिनियों से कई गुना अधिक है| फिर भी प्रसार माध्यम कहते है की ‘जो बिकता है वही छपता है’ | तर्क के लिए यह बात मान भी ली जाये की समाज अश्लीलता को देखना-पढ़ना चाहता है | तब हमारे पास यह प्रश्न उठता है कि प्रसार माध्यम और उनमें काम करनेवाले पत्रकारों का नैतिक, सामाजिक व राष्ट्रीय दायित्व क्या है?

स्वतंत्रतापूर्व राष्ट्रीय आंदोलन में पत्रकारिता राष्ट्रजागरण व जनप्रबोधन का माध्यम बनी | लगभग सभी राष्ट्रीय नेताओं ने या तो समाचारपत्र चलाये या किसी न किसी पत्र-पत्रिका में कार्य किया | लोकमान्य तिलक द्वारा प्रारंभ किये गए ‘केसरी’ और ‘मराठा’ राष्ट्रीय आंदोलन के महत्वपूर्ण आधार रहे | महात्मा गाँधी ने भी ‘Young India’ व ‘हरिजन’ को जनप्रबोधन का माध्यम बनाया | अरविंद घोष ने भी राष्ट्रीय आंदोलन का प्रारंभ ‘वंदे मातरम्’ इस पत्र के संपादन द्वारा किया | ऐसे और भी कई उदाहरण दिए जा सकते है जहा पत्रकारिता क्रांति की मशाल बन गयी | गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे राष्ट्रनायक भी पत्रकारिता की ही देन है | स्वतंत्र भारत में भी आपातकाल की तानाशाही का विरोध करने के लिए जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रांति का साथ रामनाथ गोयनका ने Indian Express समूह के माध्यम से दिया | अरुण शौरी, एस. गुरुमूर्ति जैसे पत्रकारों ने इस राष्ट्रधर्म का निर्वाह आगे भी किया |

आज भी अनेक स्तंभलेखक पत्रकारिता को प्रबोधन का माध्यम मानकर लेखनकर्म करते है किंतु मुख्यधारा की पत्रकारिता ने यह भाव खो दिया है | 24 घंटे की समाचारवाहिनियों ने सतत ख़बरों की खोज के चलते पत्रकारिता के स्तरों को नित्य नूतन नीचाइयों के दर्शन कराए है | हमारे समाचार देने से समाज पर उसका क्या असर होगा इसका विचार शायद ही कोई पत्रकार करता है | केवल एक अंधी प्रतियोगिता में नकारात्मक समाचार लेखन/चित्रण की दौड़ चल पड़ी है | कई बार सारे तथ्य जाने बिना ही सनसनी के रूप में समाचार दिए जाते है | अनेक बार तो अच्छी बातों को भी नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया जाता है | नवरात्रि के दिनों में एक समाचार चला कि अहमदाबाद के सरकारी अस्पताल ने राज्य के स्वास्थ्य मंत्री के कार्यक्रम के बाद डॉक्टरों और नर्सों ने गरबा किया | लगभग सभी समाचारवाहिनियों ने इसे नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया | स्वास्थ्य मंत्री से भी प्रश्न पूछे गए और उन्होंने भी पूछताछ करने का आदेश दे दिया तथा दोषी कर्मचारियों पर कारवाई करने का आश्वासन भी | यह माध्यमों की ताकत है | किन्तु, जब तथ्य सामने आये तो वे चौंकानेवाले थे | एक अत्यंत सकारात्मक पहल के रूप में यह कार्यक्रम आयोजित हुआ था | घुटना प्रत्यारोपण (knee replacement) के बारे में समाज में जागृति लाने हेतु यह आयोजन था | गरबा करनेवाले सभी लोग ऐसे थे जिनके घुटने बदले जा चुके थे और इस शस्त्रक्रिया के बाद आप सामान्य जीवन जी सकते है इस बात का संदेश देने के लिए गरबा के सांस्कृतिक कार्यक्रम का प्रयोग किया गया था | वास्तव में इस घटना में सकारात्मक समाचार छुपा हुआ है किंतु सनसनी खोजने की जल्दबाजी में हर बात का नकारात्मक चित्रण करना ही हमारा पत्रकारधर्म है ऐसा मानकर यह उल्टा काम हुआ |

समाचार किस बात में है यह समझना पत्रकार का पहला धर्म है | नए पत्रकारों को सिखाते समय यह समझाया जाता है कि पत्रकार की नाक तेज होनी चाहिए | सड़क पर घटित होनेवाली सामान्य घटना में भी समाचार सूंघने की शक्ति पत्रकार में होती है | वही सच्चे अर्थ में पत्रकार है | किंतु, इसके साथ ही यह भी समझाया जाता है कि हर घटना समाचार नहीं होती | सामान्य से हटकर कोई बात हो तब ही वह समाचार की श्रेणी में आती है | सामान्यतः दिया जानेवाला उदाहरण है कि कुत्ता यदि मनुष्य को काटे तो समाचार नहीं बनता किन्तु यदि मनुष्य कुत्ते को काटे तो समाचार है क्योंकि यह असामान्य घटना है | असामान्यत्व के इस उदाहरण में ही इतनी नकारात्मकता छिपी हुई है कि पत्रकार का स्वभाव ही बन जाता है कि हर बात में उल्टा समाचार ही ढूंढे | जिस प्रकार गिद्ध को ऊँचे आकाश में विहार करते हुए नीचे के सुन्दर दृश्य में और कुछ नहीं दिखाई पड़ता, केवल शव ही दिखाई देता है, सडी हुई लाश हो तो और पहले दिखाई देती है, उसी प्रकार वर्तमान मीडियाकर्मी समाज में से सडांध को ढूंढकर समाज के सामने प्रस्तुत करना अपना कर्तव्य मान बैठे हैं | समाज में हो रहे सकारात्मक कार्य उनके दृष्टिपथ में ही नहीं आते | जबकि ऐसी अनेक असामान्य किन्तु अनुकरणीय घटनायें, कार्य समाज में चल रहे है | समाचार उन सकारात्मक बातों में भी छिपा है और जब कभी ऐसी बातें समाज के सामने प्रस्तुत की जाती है तो उनका बहुत अधिक स्वागत एवं सराहना होती है | समाज जो देखना चाहता है वह परोसने की बात करनेवाले माध्यम इस पर ध्यान नहीं देते |

वास्तविकता में मनुष्य की दृष्टि उसके उद्देश पर निर्भर करती है | अतः समाचारमाध्यमों के उद्देश पर विचार करना आवश्यक है | ‘केसरी’, ‘मराठा’ या ‘वंदे मातरम्’ जैसे समाचारपत्रों का उद्देश ही स्वतंत्रता आंदोलन था | अतः उसमें कार्य करनेवाले पत्रकारों की दृष्टि भी उसी प्रकार से थी | वर्तमान में प्रसारमाध्यमों को भी व्यापारिक दृष्टिकोण से ही देखा जा रहा है | जिसके कारण पत्रकारों का दृष्टिकोण भी व्यापारिक हो गया है | पत्रकारिता अब व्रत (mission) नहीं रहा | अब उसे व्यवसाय (profession) के रूप में देखा जाने लगा है | इस स्थिति को राष्ट्रभाव के जागरण से ही बदला जा सकता है | जब हर बात में राष्ट्रहित महत्वपूर्ण हो जायेगा तो समाचार लिखनेवाले पत्रकार से लेकर उसे संपादित करनेवाले संपादक और माध्यमों के कर्ताधर्ता स्वामियों में भी दृष्टिपरिवर्तन संभव होगा | जिन्हें यह अत्यंत आदर्शवादी व अव्यावहारिक बात लगती है उनके लिए वर्तमान समय के एक अत्यंत विकसित राष्ट्र का उदाहरण दिया जाना उचित होगा| डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की आत्मकथा में एक प्रसंग आता है | वे किसी संगोष्ठी हेतु इजराइल गए थे | तेल-अवीव में जिस होटल में वे रुके थे उसी पर आतंकवादी हमला हुआ | विस्फोटकों से भरा हुआ ट्रक लेकर आतंकवादी होटल की दीवार से टकरायें | विस्फोट के बाद सड़क पर लाशें बिछी हुई थी | ऊपर होटल के कमरे से इस दृश्य को देखकर डॉ. कलाम ने सोचा की कल सुबह सभी समाचारपत्रों के मुखपृष्ठ पर यही तस्वीरें दिखाई देंगी | किंतु उन्हें आश्चर्य तब हुआ जब दूसरे दिन के किसी भी समाचारपत्र में मुखपृष्ठ पर न तो घृणित तस्वीरें थी न ही इस समाचार ने कोई स्थान पाया था | सभी समाचारपत्रों के 12वे से 15वे पृष्ठ पर एक छोटीसी घटना के रूप में इस समाचार का वर्णन किया गया था और मुखपृष्ठ पर – देश के कोने में एक छोटेसे गाँव के किसान ने सिंचाई में नए प्रयोग द्वारा गन्ने का विक्रमी उत्पादन किया – यह समाचार उस किसान की हंसती हुई तस्वीर के साथ प्रमुखता से प्रकाशित था |

‘अग्निपंख’ (Wings of Fire) पुस्तक में इस प्रसंग को पढ़ने के बाद इस बात पर खोजबीन की कि ऐसा कैसे संभव है ? क्या इजराइल में कोई कानून है जो समाचारपत्रों को सकारात्मक समाचार प्रमुखता से प्रकाशित करने के लिए विवश करता है ? ऐसा कोई कानून नहीं है, ना ही कोई विवशता | वहाँ की शिक्षा पद्धति प्रत्येक नागरिक को देशभक्ति का ऐसा पाठ पढ़ाती है की वह किसी भी व्यवसाय में हो, देश उसके लिए सर्वोपरि है | व्यवसाय से चिकित्सक भी स्वेच्छा से वर्ष में कुछ माह सीमा पर जाकर सुरक्षा का कार्य करता है | हर व्यक्ति को आयु के 12 वर्ष पूर्ण करते ही 2 साल का सैनिकी प्रशिक्षण दिया जाता है | इसलिए वे अपनेआप को देश के सिपाही ही मानते है | बातचीत में भी यह सुनने को मिल सकता है की ‘मैं देश का सिपाही पहले, प्रोफेसर बाद में; सिपाही पहले और पत्रकार बाद में हूँ |’ जब ऐसा राष्ट्रीय भाव हो तब अपनेआप ही आतंकवादी गतिविधियों की खबर प्रमुखता नहीं पायेगी | हमारे देश में भी सेना व पुलिस नहीं चाहती की अपराधियों का महिमामंडन हो | यदि पत्रकार/मीडियाकर्मी स्वयं को सैनिक मानने लगे तो वह समाचारों को उसी दृष्टि से देखने लगेगा फिर घटना का समाज के मन पर और राष्ट्र के मानस पर होनेवाला परिणाम प्रमुख स्थान निश्चित करेगा |

अमेरिका जैसे घोर व्यापारिक देश में भी, समाचार माध्यमों के बीच गलाकाट प्रतिस्पर्धा होने के बाद भी, राष्ट्रहित का ध्यान रखा जाता है | न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमले के बाद 2 साल तक मलबा हटाया नहीं जा सका किंतु अमेरिका की किसी समाचारवाहिनी ने यह बात विश्व के सामने नहीं रखी | ना ही कोई पत्रकार माइक लेकर न्यूयॉर्क के महापौर के पीछे भागा कि ‘देश जानना चाहता है कि मलबा अभी तक साफ़ क्यों नहीं हुआ?’ समस्त सांस्कृतिक, आर्थिक एवं सामाजिक खामियों के बावजूद अमेरिका के शक्तिशाली होने का सबसे महत्वपूर्ण कारण नागरिकों की देशभक्ति है | इसके मूल में है शिक्षा | केवल 500 साल का इतिहास होते हुए भी वे अपने प्रत्येक नागरिक को बचपन से ही उसपर गर्व करना सिखाते है | दुनियाभर के देशों के प्रवासी लाखों की संख्या में प्रतिवर्ष अमेरिकी नागरिकता के लिए प्रयास करते है | उन सभी को अमेरिका का इतिहास पढ़ना पड़ता है, परीक्षा देनी होती है | तभी नागरिकता प्राप्त होती है |

पत्रकारिता को राष्ट्रीयता का माध्यम तब बनाया जा सकता है जब हमारी शिक्षा राष्ट्रगौरव और राष्ट्रीयता का निर्माण नागरिकों में करने लगे | वर्तमान समय में परेशानी यह है कि हमारी आज की पत्रकारिता शिक्षा में इस प्रकार के परिवर्तनों के प्रयास को भी नकारात्मक रूप से प्रचारित करेगी | क्या कोई सोच सकता है कि विद्यालयों में ‘सुबह उठकर माता-पिता के चरण छूना’ यह शिक्षा देना सांप्रदायिकता है ? किंतु ऐसा भारत में हुआ | जब गुजरात सरकार ने दीनानाथ बत्रा जी की बालकों को संस्कारित करनेवाली पुस्तकें सह-पठन के लिए प्रकाशित करवाकर सरकारी विद्यालयों में वितरित की तब देश के प्रमुख अंग्रेजी समाचारपत्रों ने इसे घोर राष्ट्रद्रोही कदम के रूप में प्रचारित किया |

अतः शिक्षा बदले ना बदले, कुछ पत्रकारों को तो बदलना होगा| सकारात्मक समाचारों को सुव्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करना होगा | ग्वालियर में जब सूर्यनमस्कार का गिनीज विश्वविक्रम बना तब 4 पृष्ठों में उसकी खबर छापनेवाले संपादक मित्र ने टिप्पणी की थी, “अच्छी बातों को समाचार बनने के लिए बहुत प्रयत्न करने पड़ते है| 150 कार्यकर्ताओं द्वारा 6 माह तक 350 विद्यालयों में प्रशिक्षण के महान परिश्रम के कारण यह अच्छा समाचार तयार हुआ|” संपादक मित्र को जो उस समय उत्तर दिया था वह आज भी प्रासंगिक है | अच्छे प्रयास समाचार बनने का प्रयत्न तो छोड़ो, स्वप्न भी नहीं देखते | सच्चा पत्रकार ऐसे प्रयासों को ढूंढकर उन्हें समाचार बना देता है | अच्छे काम तो समाज में हो ही रहे है | पर आज के वातावरण में उन्हें समाचार बनने में प्रयास करना पड़ रहा है | इजराइल जैसी राष्ट्रीय पत्रकारिता भले ही भारत के लिए अभी दूर हो किंतु हमारे पत्रकार इतना काम तो कर ही सकते है कि अच्छी खबरों को प्रयत्नपूर्वक खोजकर समाज के सामने लाये | संपादक व प्रसारमाध्यमों के स्वामी ऐसे पत्रकारों को प्रोत्साहन दे, कम से कम प्रतिरोध तो ना करे | देश में राष्ट्रीय पत्रकारिता का अगला चरण होगा जब पत्रकार, संपादक व स्वामी देश में घटनेवाली नकारात्मक घटनाओं का चित्रण करते समय भी राष्ट्रहित का ध्यान रखेंगे | तब प्रसारमाध्यमों के लिए भी राष्ट्र सर्वोपरि होगा |

प्रसारमाध्यम ऐसी अगुवाई करेंगे तो उनके साथ ही देश का हर व्यवसायी, हर नागरिक अपने नीजी हित के पहले सोचने लगेगा – ‘पहले भारत!’

नवम्बर 3, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

या देवी सर्वभूतेषु माया रूपेण संस्थिता . . .


संगठन की कार्य प्रणाली:

दुर्गा सप्तशति में मधु-कैटभ वध की कथा आती है। यह अत्यन्त रोचक रुपक है। दो असुर ब्रह्माजी के कान से निकले मैल से उत्पन्न होते हैं। उग्र तपस्या से देवी का वरदान पा लेते हैं। वरदान पाकर उन्मत्त हो जाते हैं। फिर महाविष्णु उनका वध करते हैं। देवी की भूमिका असुरों को वर देने पर समाप्त नहीं होती। वे ही क्षीरसागर में शेषशैया पर लेटे विष्णु को सुलानेवाली योग निद्रा भी हैं। ब्रह्माजी के प्रयासों से जब विष्णु नहीं जगते तब वे देवी की प्रार्थना करते हैं। तब देवी महाविष्णु को जगाती है और असुर संहार के लिये प्रेरित करती है, असुरों की शक्ति तथा कमजोरी का परिचय देकर मंत्रणा भी देती है।

कथा के रुपक में छिपे प्रतीकों को समझने से ही पुराणों का मर्म खुलकर सामने आता है। ब्रह्मा जी सृष्टिकर्ता है। वे सृजन में रत रहते हैं। विद्या की देवी सरस्वति के वे सर्जक होने के नाते पिता भी हैं और आगे के सृजन हेतु बनाने के नाते पति भी हैं। अर्थात विद्या के स्वामी हैं। आज की शब्दावली में समझें तो यह प्रबुद्ध वर्ग का प्रतीक है जो संकल्पनाओं का सृजन करते हैं और उनके माध्यम से नये विश्व का ही सृजन करते हैं। उनके कानों का मैल – अर्थात उनके सुनने में आनेवाली बातें। बार-बार कानों में जो बातें पड़ती है उनसे मन पर प्रभाव पड़ता है। प्रचार माध्यमों का यही कार्य होता है। हिटलर का प्रचार विभाग प्रमुख गोबेल्स कहा करता था, ‘‘एक असत्य को सौ बार कहो तो वह सत्य माना जाने लगता है।’’ आज हमारे देश में सारे प्रचार माध्यम यही कार्य कर रहे हैं। प्रबुद्ध वर्ग 24 घण्टे चलने वाले इस प्रचार से प्रभावित हो जाता है और फिर उसका सृजन भी भ्रमित होता है। यह प्रचार की भ्रामक बातें दो प्रकार की होती है – मधुर व कटु। जब इनकी अति हो जाती है तो ये असुर बन जाती हैं। यही रुपक है – कानों का मैल अति होकर बाहर रिसने लगा उसी से मधु और कैटभ असुर पैदा हुए। ये असुर भी बड़ा तप करते हैं, हमारे पत्रकारों के समान ही, जो सतत बड़े परिश्रम से कार्य करते हैं। पर समाचार के चक्कर में देशहित का विचार नहीं रहता। धर्म का भान छूट जाता है। मुंबई में ताज हमले के समय आतंकवादियों को सुरक्षाबलों की योजना की सारी जानकारी आधुनिक मधु-कैटभ की कृपा से ही मिल रही थी। इन असुरों के प्रभाव से पालनकर्ता भी सो जाते हैं। देवी ने इन्हें वरदान दिया है कि अपनी ईच्छा से ही इनकी मृत्यु होगी। यह रहस्य देवी के द्वारा विष्णु को पता चलता है और वे योगमाया से युद्ध के मध्य असुरों के मन में मृत्यु की इच्छा जागृत करते हैं। यही इन दुष्ट प्रचार माध्यमों का उपाय है।

आज के युग में धर्म संस्थापना कार्य में रत संगठनों को यह प्रबोधन का कार्य करना है। समाज के प्रबुद्ध वर्ग का प्रबोधन कर उसे मधु-कैटभ के प्रति सजग करना है। ऐसे जागृत प्रबुद्धजनों को संगठित करना है और फिर कार्य में लगाना है। महान ब्रिटिश इतिहासकार अर्नोल्ड टॉयनबि के अनुसार संस्कृति की रक्षा जागृत संगठित ‘सृजनशील अल्पसंख्य’ (Creative Minority) ही करते हैं। संगठनों का कार्य ऐसे सजग, सर्जक प्रबुद्ध वर्ग की सुगढ़ चमू का निर्माण करना है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में गाँव, जिले से प्रारंभ कर राष्ट्रीय स्तर तक ऐसी चमुओं का निर्माण करना है। इसके चार चरण है – जागरण, संकलन, प्रशिक्षण व प्रत्यक्ष कार्य। इन सब को मिलाकर संगठन की कार्यप्रणाली बनती है। विवेकानन्द केन्द्र के संस्थापक माननीय एकनाथ रानडे इसे संगठन की चतुःसूत्री कहते हैं। उनकी पुस्तक ‘सेवा ही साधना’ में ‘‘लोकसंपर्क, लोकसंग्रह, लोकसंस्कार व लोकव्यवस्था’’ यह नामावली देते हैं। जागरण के लिये लागों से संपर्क, संकलित करने के लिये संग्रह, प्रशिक्षण का कार्य लोकसंस्कार व प्रत्यक्ष कार्य का दायित्व देना लोकव्यवस्था। इसी प्रक्रिया से वैचारिक आंदोलन खड़ा कर आज के मधु-कैटभ, मिड़िया के अन्दर के असुर का नाश हो सकता है। इस नाश की अनिवार्यता व इच्छा उनके ही भीतर से पैदा करना यह हमारा कार्य है।

वर्तमान में विष्णु का पालनकार्य हमने समाज के स्थान पर सरकार को दे दिया है। शासन निद्रा में खोया है। ऐसे में विष्णुगुप्त चाणक्य की चेतावनी का स्मरण करना होगा, ‘‘जब शासन अपने कर्तव्य का पालन करने में असमर्थ होता है तब शिक्षक को धर्म जागरण का दायित्व निभाना पड़ता है।’’ आइए इस नवरात्री के अवसर पर देवी योगमाया की आराधना करें कि वे भारती को पुनः जागृत कर असुर नाश की मंत्रणा धर्म-संस्थापना में रत संगठनों के कार्यकर्ताओं को प्रदान करें।

 

 

सितम्बर 30, 2011 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

   

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