उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

हताश स्वार्थों का असफल बंद


जातियों के नाम पर आंदोलनों की बाढ़ आ गयी है। राजनीति में हारे हुए दलों की हताशा का यह परिणाम है कि समाज को तोड़ने के लिए विभिन्न बहानों का आधार लेकर जातीय अस्मिता का उपयोग करने का प्रयत्न किया जा रहा है। आरक्षण जैसे स्वार्थी मांगों के लिए पटेल, गुर्जर, जाट, मराठा आदि जातियों को भड़काने का प्रयत्न किया। प्रायोजित नेतृत्व के पीछे करोड़ों रूपया खर्च किया गया। इन आंदोलनों में समाज के कुछ लोग भ्रमित होकर सम्मिलित हो गए। किंतु शीघ्र ही सत्य सामने आ गया और समाज के बड़े वर्ग का इस प्रायोजित नेतृत्व से मोहभंग हो गया। जिन चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखकर ये सारे षडयंत्र किए गए वे भी असफल हो गए। महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात में देश के सबसे पुराने दल को इन समस्त हथकंडों के बाद भी करारी हार झेलनी पड़ी। इन सभी स्वार्थी तत्वों का अब लक्ष्य दलित वर्ग बना है। भीमा-कोरेगांव हो अथवा 2 अप्रैल इ.स. 2018 का भारतबंद, दोनों ही झूठी कहानियों पर दलितों को भड़काने का प्रयत्न था। दोनों प्रयत्न पूर्णतः असफल हुए। दलित समाज के बड़े वर्ग का समर्थन इन झूठे आंदोलनों को नहीं मिला।

बसें जलाना, गाड़ियों को तोड़ना और अन्य प्रकार की हिंसा में पुलिस को लक्ष्य करना आदि के द्वारा प्रसार माध्यमों में दर्शनीय प्रचार होने के कारण यह बात फैलाने का प्रयत्न हुआ कि आंदोलन सफल हुए। किंतु थोड़ा भी निष्पक्ष सूक्ष्मता से अवलोकन किया जाए तो दोनों ही घटनाओं में भाड़े के प्रदर्शनकारी ही प्रमुखता से दिखाई देंगे। दलित समाज इन राजनैतिक दलों के स्वार्थी सत्य को समझ गया है। अतः प्रायोजित नेताओं के पीछे अपनी आजीविका को छोड़कर समय नहीं व्यर्थ गंवाते। यदि भीमा-कोरेगांव में थोड़ा भी सत्य होता तो केवल 2-3 दिन में आंदोलन शांत होना संभव नहीं था। गांवों में सौहार्द बना रहा और मुंबई में किराये के गुंडों से उत्पात मचाया गया। जालीदार टोपी पहने ‘दलितों’ को अशोकचक्र सहित नीले झंडे लेकर तोड़फोड़ करता हुआ देखा गया। दलित अत्याचार अधिनियम के कथित परिवर्तन की झूठी कहानी को लेकर किए भारतबंद में भी यही दृश्य पुनः दिखाई दिया। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में हुए किसान आंदोलन भी इसी प्रकार के प्रायोजित राजनैतिक प्रयत्न थे। कर्नाटक और पंजाब जहां किसान सर्वाधिक पीड़ित हैं वहां कोई आंदोलन नहीं हुए। भारतबंद में भी 32% दलित जनसंख्या होते हुए भी पंजाब में कोई हिंसा की घटना नहीं हुई। संभवतः आंदोलन को प्रायोजित करने वाले दल ही सत्ताधारी होने के कारण ऐसा हुआ होगा।

सभी आंदोलनों में राज्य एवं केंद्र सरकार के धैर्य की सराहना करनी होगी। इस धैर्य के कारण ही पूरी तैयारी होने के बाद भी आंदोलनों को हिंसक स्वरुप नहीं दिया जा सकता। इस बात के लिए केवल प्रशासनिक सूझबूझ ही नहीं अपितु राजनैतिक दूरदृष्टि की भी आवश्यकता होती है। अस्थायी चुनावी हितों के लिए देश की सुरक्षा व समाज की एकात्मता को दांव पर लगानेवाली राजनीति का उत्तर अपनी ओर से उसी प्रकार के तुष्टिकरण से उत्तर देने के स्थान पर जाती, पंथ, लिंगभेद के परे जाकर सबको समर्थ बनाने का कार्यक्रम लागू करना वर्तमान केंद्र सरकार की सफलता का रहस्य है। जनसामान्य को सक्षम बनानेवाली योजना में अप्रत्याशित गति गत तीन वर्षों में आई है। अनेक योजनाएं तो पूर्व सरकार द्वारा प्रारंभ की गयी थी किंतु प्रशासनिक अक्षमता के कारण उनका कोई परिणाम जमीन पर नहीं दिखाई दे रहा था। मोदी सरकार ने पूरी शासकीय यंत्रणा को संकल्पबद्ध (mission-mode) गति प्रदान की। हजार दिनों में 5 करोड़ जनधन खाते खोलने का लक्ष्य सरकारी बैंकों को दिया गया। केवल 15 माह में लक्ष्य पूरा हुआ। हजार दिनों में तो दस करोड़ खाते खुल जाएंगे। इन खातों के माध्यम से सरकारी योजनाओं की सहायता सीधे हितकारी तक पहुंचाने का कार्य प्रारंभ हुआ जिससे बिचौलियों द्वारा भ्रष्टाचार को बड़ी मात्रा में कम किया।

पंजाब में कोई प्रदर्शन अथवा हिंसा भारत बंद के मध्य नहीं हुई। इन बातों से यह स्पष्ट है कि पूरा का पूरा आंदोलन किसी विशेष दल द्वारा चलाया गया है। भारत बंद की पूर्ण असफलता का कारण यह है कि समाज से जुड़ा हुआ यह विषय नहीं है। कोई बड़ा आक्रोश दलित समाज में इस विषय को लेकर नहीं हैं। राजनीतिक दलों द्वारा अपने स्वार्थ के लिए मुद्दों को उठाया गया है जिनका समाज से कोई संबंध नहीं है। हिंसा की घटनाएं, बसों का जलाना आदि माध्यमों में प्रमुखता से दिखाया गया। इस कारण यह भ्रम फैला कि जातिगत विषमता समाज में बढ़ी है। वास्तविकता इसके विपरीत दिखाई देती है। नई पीढ़ी पुराने दकियानूसी विचारों से मुक्त हुई है। समाज के सभी वर्गों के युवा देश को एक नई दिशा दिखाना चाहते हैं इसलिए जातिगत समीकरण अब और अधिक समय तक राजनीतिक लाभ नहीं देंगे। सारे दल इस बात को समझे तो समाज का भी भला होगा और उनका भी जिन दलों ने गत 5 वर्षों में भी अपने जातिगत विभाजनकारी विचार को नहीं बदला वे आज समाप्ति के कगार पर हैं। पूर्वोत्तर में इन दलों की सोच थी कि वनवासी और ईसाई बहुल राज्यों में केवल तुष्टीकरण से सत्ता बनाई जा सकती है। किंतु भारत की लोकतांत्रिक जनता ने ऐसे दलों को उनका स्थान दिखा दिया। आज देश की जनता सबके सर्वांगीण विकास का विचार करते हुए एक स्थिर सरकार बनाने के लिए मतदान करती है। सभी राज्यों में यही दृश्य दिखाई दिया कि जिस दल का पूर्ण बहुमत आने की संभावना है उसे जनता ने सभी मतभेदों से ऊपर उठकर आशिर्वाद प्रदान किया। अतः विभाजनकारी राजनीति के दिन अब लद चुके हैं। 2019 के चुनाव के लिए जो लोग विभाजन की रणनीति बना रहे हैं वे जनता के भाव से पूरी तरह कटे हुए हैं। वे नहीं जानते कि समाज किस प्रकार सोच रहा है।

जो लोग सामाजिक माध्यमों में भारत बंद का विरोध कर रहे थे वे भी परोक्ष रूप में इन्हीं विभाजनकारी शक्तियों का साथ दे रहे थे। प्रमुख माध्यमों ने भारतबंद की हिंसा को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया। उन्होंने यह नहीं दिखाया कि लगभग पूरे देश में सभी बाजार खुले हुए थे, संचार व्यवस्था सुचारू चल रही थी क्योंकि समाज का साथ भारतबंद करने वाले तथाकथित नेताओं को नहीं था। इस बात को समाज के सम्मुख रखने का दायित्व हम जैसे कार्यकर्ताओं का है। हम सकारात्मक पहलुओं को समाज के सम्मुख उजागर करें ताकि 2019 का चुनाव सच्चे अर्थ में भारतीय लोकतंत्र के प्रौढ़ होने का प्रमाण बनें। इस बात से अधिक अंतर नहीं पड़ता कि कौन चुनाव में विजयी होता है। राष्ट्र के लिए अधिक आवश्यक है कि किन मुद्दों पर चुनाव लड़ा जाता है। राजनीतिक दल किस विमर्श का प्रयोग करते हैं और उसकी दिशा तय करने के लिए सकारात्मक बातों को प्रचारित करना आवश्यक है।

अप्रैल 4, 2018 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

   

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