उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

कुशल मंगल है।


गढ़े जीवन अपना अपना -15

चरित्र निर्माण के बाहरी आयामों में चौथा व अंतिम है – कौशल। शारीरिक बल, रूप ओर स्वास्थ्य के साथ ही विभिन्न प्रकार के कौशल भी जीवन में वांछित सफलता पाने के लिये आवश्यक है। जीवन के लक्ष्य की ओर बढ़ने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है अन्यथा भी अनेक प्रकार की परिस्थितियों में जीवन को अपने निश्चित लक्ष्य की ओर अग्रेसर करने की चुनौति आ सकती है। आचार्य चाणक्य अपने शिष्यों को शिक्षा देते है कि यदि मार्ग में बाधा नहीं है तो समझना चाहिये कि मार्ग सही दिशा में नहीं है। इसलिये जब हम अपने जीवन में लक्ष्यप्राप्ती का मार्ग चुनते है तो हमें सभी प्रकार की स्थितियों के लिये स्वयं को तैयार करना चाहिये। अतः व्यक्तित्व विकास में कौशल प्राप्ति का असाधारण महत्व है। पांडवों के जीवन में आई प्रत्येक बाधा को उन्होंने कौशल प्राप्ति का साधन बनाया। अर्जुन ने सारे जीवन भर नये नये अस्त्रों को प्राप्त करने के लिये अलग अलग खतरों का सामना किया। किरात रूप में स्वयं शंकर भगवान का सामना कर पाशुपतास्त्र प्राप्त करना हो या नारायणास्त्र की उग्र तपस्या हो, इन सब ने ही अन्ततः धर्मयुद्ध में पाण्डवों को विजयश्री प्रदान की।

वर्तमान युग में तीन प्रकार के कौशल में प्रशिक्षित होना विकसित व्यक्तित्व के लिये आवश्यक है। पहली श्रेणी में जीवनोपयोगी कौशल आते है जो व्यक्ति को स्वावलम्बी बनाते है। स्वयं के लिये हम नियम सा बना ले जो मुझे चाहिये वो मै बना सकूं। खाना खाते है ना तो भोजन पकाना आना चाहिये। आधुनिक घरों के बच्चों को तो भोजन परोसना और थाली धोना भी नहीं आता। कपड़े पहनते है तो कपड़े धोना, प्रेस करना या कुछ थोड़ी बहुत सिलाई करना सीख लेना चाहिये। कुछ सम्पन्न घरों के बालकों को तो कपड़ों की घड़ी करना भी नहीं आता। विकसित व्यक्तित्व का ध्येय हो कि किसी भी परिस्थिति में दूसरे पर निर्भर ना रहना पड़ें। ये उपर से सरल लगने वाली बाते कभी कभी बड़ी बाधा बन जाती है। कपड़े धोने का अभ्यास ना हो तो अचानक साफ कपड़े नहीं धो सकेंगे। स्वावलम्बन की आदत बाल्यकाल में ही पड़ जानी चाहिये। समझदार अभिभावक सामथ्र्य के बावजूद 10 से 16 वर्ष के आयु में बालकों को नौकरों पर निर्भर नहीं होने देते।

दूसरी श्रेणी में अभिव्यक्ति का कौशल आता है। अपने व्यक्तित्व को प्रगट करने के लिये अभिव्यक्ति-कौशल अत्यावश्यक है। जीवनलक्ष्य की प्राप्ति में यह महत्वपूर्ण है। वर्तमान समय में व्यावसायिक सफलता में भी यह अनिवार्य हो गया है। इस श्रेणी के कौशल में भाषा का ज्ञान आता है। व्यक्ति को अधिक से अधिक भाषाओं को सीखना चाहिये। वर्तमान में केवल अंग्रेजी पर बल दिया जाता है पर भाषा कौशल का सर्वोत्तम विकास मातृभाषा में ही होता है। यदि एक बार मातृभाषा में प्रवीणता हासिल कर ले तो फिर अन्य किसी भी भाषा को सीखना सरल हो जाता है। हमारे मस्तिष्क में जो भाषा सम्बंधी केन्द्र है उनका विकास होना आवश्यक है यदि ये केन्द्र ठीक से विकसित हो जाये तो कोई भी नई भाषा सीखना सहज सुलभ हाता है। यन्त्र मानव (रोबोट) के विकास के लिये अनिवार्य कृत्रिम बुद्धि (Artificial Intelligence) के बारे में जो अत्याधुनिक अनुसंधान हुए है वे हमें बताते हैं कि संस्कृत एक ऐसी परिष्कृत भाषा है कि जिसके अध्ययन से मस्तिष्क का पूर्ण विकास होता है। यह भाषा गणितीय होने के कारण बिना किसी विसंगति के भाषीय तर्क का विकास होता है जो मस्तिष्क के भाषा केन्द्रों के स्नायविक उतकों (Neurons) के विकास में गति प्रदान करता है। इसी शास्त्रीयता के चलते इंग्लैण्ड के कुछ विद्यालयों में वैदिक मंत्रो तथा संस्कृत के अध्यापन को प्रारम्भ किया गया है। यदि संस्कृत व अपनी मातृभाषा पर प्रभुत्व प्राप्त कर लिया जाये तो फिर अंग्रेजी में भी सहज प्राविण्य मिल जायेगा। हाँ प्रयास तो करना ही पड़ेगा। मातृभाषा फिर संस्कृत और उसके बाद अंग्रेजी यदि यह क्रम रखा जाये तो भाषा सीखने में आनन्द आयेगा और प्रयास कठीन होने से भी खेल के समान आनन्ददायी होंगे।

अभिव्यक्ति कौशल का दूसरा अंग है कला। प्रत्येक व्यक्ति में अपनी भावनाओं के प्रेषित करने की आकांक्षा भी होती है और उसकी अपनी एक विधा भी। यही विधा कला के रूप में प्रगट होती है। सारी कलायें भावों की अभिव्यक्ति के लिये ही होती है। प्रत्येक के स्वभाव के अनुरूप व्यक्ति अपने भाव शब्द या रूप के द्वारा अभिव्यक्त करता है। शब्द या ध्वनि के द्वारा सम्प्रेषण काव्य, लेखन, संगीत आदि कलाओं में विकसित होता है। रूप अथवा आकार के द्वारा सम्प्रेषण शिल्प, चित्रकला, नृत्य नाट्य आदि कलाओं में विकसित होता है। संसार में प्रत्येक व्यक्ति कलोपासक होता है अर्थात कलाभिव्यक्ति को करनेवाला अथवा उसका आस्वादन करनेवाला होता है। अपने अन्दर की कला का विकास भी व्यक्तित्व के विकास के लिये अत्यावश्यक है। व्यावसायिक लक्ष्य को महत्व देते समय कला को अतिरिक्त एवं अनावश्यक मानते हुए दुर्लक्षित किया जाता है पर यह आत्मघाती है। कलाविहीन व्यक्ति में जो अधुरापन रहता है वह उसे किसी भी क्षेत्र में अपनी पूरी क्षमता से कार्य नहीं करने देता। अतः अपनी अपनी रूचि के अनुसार कलाविधा का चयन कर उसके प्रशिक्षण, अभ्यास व आस्वादन के लिये नियमितता से समय देना चाहिये। जीवन के लक्ष्यप्राप्ति में सहायक होने के साथ ही कलोपासना जीवन को रसमय बनाकर परिपूर्ण कर देती है।

तीसरी श्रेणी के कौशल में यन्त्रविद्या (Technology) का अन्तर्भाव होता है। मानव की शारीरिक क्षमताओं को विस्तारित करने का काम यन्त्र करते है। यन्त्रों के सुविधाजनक प्रयोग से कार्य को सुचारू, सक्षम एवं कम समय में किया जा सकता है। आधुनिक जीवन में संचार के साधन बढ़ जाने के साथ ही जीवन में उपकरणों की संख्या एवं भुमिका दोनों में प्रचण्ड वृद्धि हुई है। संगणक (Computer) और चल-दूरभाष (Mobile) तो प्रत्येक के अनिवार्य उपांग हो गये है। इनके प्रयोग एवं उपयोग में असीम सम्भावनायें है और शायद ही कोई ऐसा दम्भ भर सकें कि इनको पूरी तरहा से जान लिया। इन उपकरणों का प्रयोग तो सभी करते है पर अनेक सुक्ष्म पहलुओं की ओर ध्यान नहीं देते। हममें से कितने लोग जानते है कि केवल कुछ नम्बर डायल करके ही अपने मोबाईल की पूर्णतः समाप्त (Discharged) बैटरी को कुछ और देर तक चलाया जा सकता है। ऐसी अनेक बातें है जिनकी बारीकियों के बारे में हम लोग नहीं जानते। दिल्ली के छतरपूर मंदिर की घटना है। एक अमेरिकी पर्यटक ने अपना अत्याधुनिक कॅमेरा देकर एक भारतीय छात्र को फोटो लेने को कहा। दो-तीन फोटो लेने के बाद कॅमेरा लौटाते हुए छात्र ने पर्यटक को कॅमेरे के बारे में कुछ तकनिकी प्रश्न पूछे। अमेरिकी ने जबाब दिया मै इसकी तकनिक के बारे में कुछ नहीं जानता केवल उपयोग जानता हूँ। जापानी चीजे बनाते हैं हम प्रयोग करके खराब होने पर फैंक देते है। हम भारतीय ही है जो खराब चीजों को भी सुधारकर प्रयोग में लेते है। ये जुगाड़ हमारी कंजुसी या कमी नहीं यन्त्र ज्ञान के प्रति हमारी स्वाभाविक जिज्ञासा है। आधुनिक पीढ़ि में भी ये जिज्ञासा है पर प्रतिस्पद्र्धा की आपाधापी में हम इस कौशल को भूल ना जाये, प्रयत्नपूर्वक विकसित करें।

स्वावलम्बन, कला और यन्त्रविद्या तीनों श्रेणियों के कौशल विकसित करने के लिये नित्य अभ्यास ही एकमात्र उपाय है। कौशल के नैपुण्य में ही हमारा कुशल है और सार्वजनिक उद्देश्य के प्रति समर्पित कुशल ही मानवता के लिये मंगल होता है।

मार्च 14, 2012 Posted by | आलेख | , , , , , , , , , , , | 8 टिप्पणियाँ

प्राणवान ही पूर्ण स्वस्थ


गढ़े जीवन अपना अपना -14
आद्य क्रांतिकारी वासुदेव बलवन्त फडके को जेल में बंद रखना भी सम्भव नहीं था। जेल से भागने के लिये उन्होंने कोई बहुत बड़ी योजना नहीं बनाई। उनका अपनी शक्ति पर विश्वास था। उन्होंने अपनी कोटरी के आगे लगे सलाखों के जाल को दोनों हाथों से पकड़कर उखाड़ लिया और फिर उसे उठाकर ही दौड़ पड़े। उसी फाटक को जेल की दिवार से सटाकर खड़ा किया और उसी की सीढ़ी बनाकर दिवार फांद गये। जंगल में फिर भीलों की सेना बनाई और क्रांति का कार्य जारी रखा। कोई उन्हें कभी पकड़ ही नहीं पाता यदि वे बुखार से पीड़ित नहीं हो जाते। ज्वर ने ऐसा घेरा कि मंदिर में नींद में ही बेहोश हो गये। तब अंगरेज सेनापति सोते वासुदेव की छाती पर सवार हो गया। फिर भी होश आते ही उसे धक्का देकर गीरा दिया। पर शस्त्र निकाल लिये गये थे और कमजोरी भी इतनी थी कि भागना सम्भव नहीं था इसलिये पकड़े गये।

बाघा जतीन भी बालासोर के जंगलों में 9 सितम्बर 1915 को अंगेजों से लड़ते हुए मरणांतक घायल हुए और दूसरे दिन अस्पताल में उन्होंने अंतिम श्वास ली। उससे पहले 4 दिन से बारीश के बीच जंगल में भागते भागते उन्हें भी बुखार चढ़ गया था और इस ज्वर में लड़ने के कारण ही वे अंग्रेजों के शिकार हो गये। यदि स्वास्थ्य साथ देता तो शायद इन दोनों क्रांतिकारियों का कार्य और अधिक आगे बढ़ता। इसी महत्व को ध्यान में रखते हुए लोकमान्य बाल गंगाधर टिळक ने 11 वी कक्षा के बाद अपनी पढ़ाई में से एक वर्ष का विराम लेकर योग व्यायाम आदि के द्वारा पूर्ण स्वास्थ्य को प्राप्त किया। इसी के चलते मण्डाले में घोर शारीरिक यातनाओं के बाद भी वो पूरे बल के साथ राष्ट्र का नेतृत्व करने लौट सके।

जीवन को गढ़ने की प्रक्रिया में व्यक्तित्व विकास के बाहरी आयामों में बल और रुप के बाद तीसरा है – स्वास्थ्य। यह केवल शरीर के स्तर पर ही नहीं है। पूरे व्यक्तित्व का ही स्वस्थ होना अत्यन्त आवश्यक है। व्यक्तित्व के पांचों स्तर – शरीर, मन, भाव, बुद्धि तथा आध्यात्मिक स्तर पर स्वस्थ होना चरित्र के सम्यक विकास के लिये अनिवार्य है। सामान्यतः निरोगी होने अर्थात रोग ना होने को ही स्वास्थ्य समझा जाता है। पर वास्तव में स्वस्थ होना एक सकारात्मक विधा है। स्वामी विवेकानन्द ने लण्डन में दिये एक व्याख्यान में कहा कि ‘हम भारतीय इतने आध्यात्मिक हैं कि जब एक-दूसरे से मिलते है तब अभिवादन में भी गहरा प्रश्न पूछते है।’ उन्होंने अंग्रेजी में वह प्रश्न बताया – Are you upon yourself? अर्थात क्या आप अपने आप में स्थित है? भिन्न भिन्न भाषाओं में अभिवादनों को देखने पर इस अर्थ का कोई सीधा अभिवादन ध्यान में नहीं आता है। पर अभिवादन के साथ सामान्यतः हम स्वास्थ्य की पृच्छा करते है। ‘क्या आप स्वस्थ है?’ यदि संस्कृत में संधि तोड़कर देखे तो ‘क्या आप स्व में, -अपने आप में स्थित है?’  भारत में ‘स्व में स्थित होने’ को ही स्वस्थ होना मानते है।

स्व में स्थित होना केवल आध्यात्मिक ही नहीं व्यक्तित्व के सभी स्तरों पर होता है और इन स्तरों के आपसी संबन्ध में भी। जैसे मन और शरीर का सीधा सम्बन्ध है। मन प्रसन्न हो तो शरीर भी स्वस्थ होता है। भावों के असंतुलित होने से श्वसन, पाचन, रक्तदाब जैसी सामान्य शारीरिक प्रक्रियाएँ भी बाधित होती है। अतः पूर्ण रुप से स्वस्थ रहने के लिये इन सब स्तरों को जोड़नेवाले तत्व को समझना पड़ेगा। छान्दोग्य उपनिषद् में रेक्व महामूनि की कथा आती है। केवल 15 वर्ष की आयु में विश्व में व्याप्त शक्ति को समझने के लिये तप किया और तत्व का साक्षात्कार भी किया – ‘यथा ब्रह्माण्डे वायु तथा पिण्डे प्राणः’। जैसे सारे जगत में वायु व्याप्त है उसी प्रकार व्यक्तित्व में प्राण सर्वव्यापी है। बिना वायु के कोई स्थान नहीं रह सकता वैसे ही प्राण का भी निर्बाध प्रवाह चलना अनिवार्य है। मन और शरीर को जोड़ने वाला भी प्राण ही है। अतः स्वस्थ होने का अर्थ है प्राणवान होना। प्राण अर्थात जीवनी उर्जा। इस उर्जा की मात्रा (Quantity) तथा गुण (Quality) दोनों स्वास्थ्य के प्रमुख कारक हैं।

प्राण का एकमात्र स्रोत सूर्य है। सूर्य से ही हमें प्राणउर्जा प्राप्त होता है। भोजन में भी जो शक्ति हम पाते है वह भी सूर्य की ही उर्जा होती है। वनस्पति सूर्य की उर्जा को अन्न में परिवर्तित करती है। शाकाहारी भोजन में हमे यह प्राण सीधे प्राप्त होता है। मांसाहारी भोजन में यह परोक्ष रुप से ही प्राप्त होती है क्योंकि अधिकतर जिन प्राणियों का मांस खाया जाता है वे स्वयं शाकाहारी होते है अतः उनके द्वारा वनस्पति से प्राप्त सूर्य के प्राणों को द्वितीय चरण में मनुष्य उनके मांस से प्राप्त करते है। अतः मांसाहार में मात्रा एवं गुण दोनों स्तरों पर प्राण का ह्रास होता है। भोजन से अधिकतम प्राण की उर्जा प्राप्त करने के लिये ताजा भोजन सर्वाधिक उपयोगी होता है।

पारम्पारिक ज्ञान की दृष्टि से प्राण 3 गुणों से भावित होता है। सात्विक, राजसिक व तामसिक। किन्तु आधुनिक समय में इन सब तकनिकी बातों में उलझने के स्थान पर शुद्धि एवं ताजगी का ध्यान रखना ही पर्याप्त होगा। प्राण की पर्याप्त प्राप्ति के साथ ही उसके समुचित प्रयोग एवं अपव्यय को रोकना भी आवश्यक है। प्राण के सम्यक प्रयोग के लिये हमारी प्रणालियों, खासकर श्वसन तथा पाचन की प्रणालियों का सुदृढ़ होना जरूरी होगा। इन सब के लिये अपनी क्षमता के अनुसार नियमित व्यायाम करना चाहिये। प्राण का अपव्यय मन के स्तर पर सर्वाधिक होता है अतः अपनी आदतों को संयमित करने से ही हम अधिक प्राणवान हो सकते है। अपव्यय को रोकने का दूसरा प्रभावी माध्याम है सही विश्राम। हम सोते भले ही 8 घण्टे हो पर विश्राम पूरा नहीं पाते है। इसीलिये तो पूरे रात की नीन्द के बाद भी सुबह उठने पर ताजगी के अनुभव की जगह और कुछ समय सोने की ईच्छा बनी रहती है। सब बच्चे माँ से यही कहते है ‘पांच मिनट और . . .’ सोने से पूर्ण आराम पाने के लिये गहरी नीन्द होना आवश्यक है। इसके लिये सरल उपाय है सोने से पूर्व हाथ पांव धोना। मन को शांत करने के लिये जप, प्राणायाम अथवा किसी भावात्मक पुस्तक का स्वाध्याय। योग में प्रशिक्षित लोग शवासन तथा योगनिद्रा का भी प्रयोग समयक विश्राम द्वारा प्राण संरक्षण के लिये कर सकते है।

प्राण की प्रचुरता से ही व्यक्तित्व के सभी स्तर निरामय होते है और पूर्ण स्वास्थ्य का लाभ मिलता है। प्रतिरोधी प्रणाली के समर्थ होने के कारण रोग पास ही नही फटकेंगे अतः निरोगी होने का सह उत्पाद (By-Product) भी प्राप्त होगा। पर ये ध्यान रखना चाहिये की योग एवं अन्य साधनाओं का उद्देश्य पूर्ण स्वास्थ्यलाभ से चरित्र का विकास है ना कि रोगों से छुटकारा। अन्यथा स्थिति उस साधक की तरहा होगी जो शिवरात्रि के दिन पूरी रात जागकर चारो याम पूजन करता है। सुबह शिवजी प्रसन्न होकर दर्शन देते है और कहते है ‘मांगो जो वरदान मांगना हो।’ कुछ देर पहले ही साधक के पीठ पर एक कीड़ा काटा है और ऐसी जगह खुजली हो रही है जहाँ हाथ भी नहीं पहुँच पा रहा। तो जब शिवजी प्रगट हुए तब सबसे बड़ी समस्या पीठ की खुजली है। अतः शिवजी से वर भी मांगा तो यही कि खुजली मिटा दो। जो सर्वकल्याणकारी शंकर सबकुछ दे सकता है उनके वर को केवल खुजली मिटाने में व्यर्थ गवांने के समान ही मूर्खता है रोगमुक्ति के लिये योग करना।

याद रहे! प्राणवान होना ही पूर्ण स्वास्थ है केवल निरोगी होना नहीं।

फ़रवरी 11, 2012 Posted by | आलेख | , , , , | 4 टिप्पणियाँ

मै हूँ सबसे सुन्दर !


गढ़े जीवन अपना अपना -13

“बताओ! गुलाब क्यों सुन्दर होता है?” कुलकर्णी सर थे तो अंग्रजी के शिक्षक पर उनकी आदत थी कि कक्षा का प्रारम्भ किसी ना किसी प्रश्न से किया जाये। और लगभग हर बार प्रश्न ऐसा ही कुछ उटपटांग हुआ करता था। अब इसी को ले लो। गुलाब क्यों सुन्दर होता है? 7 वी कक्षा की बुद्धि के अनुसार छात्र उत्तर देते रहे, ‘गुलाब का रंग सुन्दर होता है इसलिये!’ किसी ने कहा उसकी पंखुड़ियों की रचना के कारण। कोई भी जबाब कुलकर्णी सर को संतुष्ट नहीं कर सका। वैसे भी उनके प्रश्नों का उत्तर उनके स्वयं के पास जो होता था वही उनको मान्य होता था। दो दिन का समय दिया गया छात्रों को ताकि घर में भी सब को पूछ सकें और फिर ये सिद्ध हो जाय कि कोई भी सही जबाब नहीं जानता। वैसे भी इस प्रश्न का माता -पिता भी क्या जबाब दें। ‘‘ये भी कोई बात हुई भला! गुलाब सुन्दर होता ही है अब इसमें क्यों क्या बताये। भगवान ने ही उसे सुन्दर बनाया है।’’

पढ़ते समय आप भी सोचने लगे ना कि गुलाब क्यों सुन्दर होता है? अब आपको कुलकर्णी सर का उत्तर बता ही देते है। सारे उत्तरों को खारीज कर देने के बाद ही शिक्षक वो उत्तर बताता है जो उसके अनुसार सही होता है और अक्सर छात्र इस बात से सहमत नहीं होते कि वो सही उत्तर है। पर कुलकर्णी सर का प्रश्न पूछने के पीछे हेतु ही अलग होता था। उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘गुलाब इसलिये सुन्दर होता है क्योंकि सब कहते है कि वो सुन्दर होता है। हर कवि कहता है, हर फिल्म में कहा जाता है कि तुम गुलाब सी सुन्दर हो। इसलिये हम भी मान लेते है।’’ देखा सर ने भी नहीं बताया कि क्यों गुलाब सुन्दर होता है? जब छात्रों ने ये बोला तो सर ने कहा, ‘‘मै तो बता दूँगा। पर मेरा पूछने का आशय ये था कि अधिकतर बाते हम जीवन में ऐसे ही मान लेते है क्योंकि सब कहते है। सोचते कहाँ है कि इसका वास्तविक अर्थ क्या है?’’

हम सब सुन्दर बनना चाहते है या सुन्दर दिखना चाहते है? शायद केवल दिखना चाहते है क्योंकि हम सोचते है सौन्दर्य तो ईश्वरीय देन है। अब हम जैसे पैदा हुए है वैसे ही तो नाक नक्श रहेंगे ना? हाँ! आजकल लोग प्रसाधन शल्य चिकित्सा (Cosmetic Surgery ) से अपने अंगो की रचना भी बदलने लगे है। सब के बस का ये भले ही ना हो पर कम से कम कुछ क्रीम पाउडर लगाकर सुन्दर दिखने का प्रयास तो सब करते ही है। एक सर्वेक्षण के अनुसार अब इस मामले में पुरुषों ने महिलाओं को पीछे छोड़ दिया है। पुरुषों के लिये विशेष प्रसाधनों की बिक्री अब अधिक होने लगी है। हर कोई क्रीम लगाकर गोरा होना चाहता है। बाल बढ़ाकर या भिन्न भिन्न तरह से कटवाकर अपने आप को सुन्दर दिखाने की होड़ लगी है। वैसे इस प्रयास में गलत कुछ नहीं है। केवल ये सारे प्रसाधनों के विज्ञापन मात्र उल्लु बनाओ प्रोग्राम है। इससे सुन्दर व्यक्तित्व का कोई लेना देना नहीं।

किसी कवि ने कहा ही है ना कि सौन्दर्य तो देखनेवाले की दृष्टि में होता है। इसका अर्थ हुआ सुन्दरता का अर्थ है आकर्षित करने की क्षमता। तो गुलाब भी इसीलिये सुन्दर है क्योंकि वह सबको आकर्षित करता है। मन मोह लेता है। यह आकर्षण विशेषता से आता है। दिखने की विशेषता या सुगन्ध की या फिर रचना की। कुछ अलग हटके होगा तो आकर्षण होगा। शायद इसीलिये शोभाचार (Fashion) के नाम पर कुछ ना कुछ विचित्र ही किया जाता है। चित्र विचित्र केशभूषा व वेषभूषा के द्वारा अलग दिखने से लोग आकर्षित होंगे ऐसा विचार होता होगा। पर विड़म्बना देखो। कोई शोभाचार चल जाये, लोकप्रिय हो जाये तो सब वैसे ही बाल कटवाने लगते है और फिर आप अलग दिखने की जगह सभी बन्दरों की तरहा ही लालमुहें दिखने लगते है। सब एक जैसे हो जाये तो फिर आकर्षण कहाँ रहा?

व्यक्तित्व के बाहरी पहलुओं में बल के बाद रूप दूसरा महत्वपूर्ण पहलु है। आकर्षक रूप का विकास भी व्यक्तित्व के विकास का अंग है। कृष्ण के नाम का ही अर्थ है आकर्षित करने वाला। कर्षयति इति कृष्णः। उसकी बांसुरी के पीछे मनुष्य ही क्या पशु पक्षी सब खींचें चले आते थें। रंग काला है गोरा नहीं। कपड़े भी सामान्य पीले रंग के वस्त्र, आभूषण के नाम पर पत्तों की माला और मोर मुकुट। फिर भी विश्व इतिहास का सबसे आकर्षक व्यक्तित्व। तो मानना ही पड़ेगा ये कुछ और बात है। इस सौंदर्य के तत्व को समझना होगा। बाहरी नकल से काम नहीं चलेगा, हमारे अन्दर के कृष्ण को जगाना होगा तभी वास्तविक सुन्दरता का जागरण होगा। सुन्दर दिखने की कोशिश के स्थान पर सुन्दर बनने की कोशिश करनी होगी तो आकर्षण अपने आप आ ही जायेगा।

सुन्दरता का प्रगटीकरण भले ही बाहरी हो पर उसका उद्गम तो भीतर से होता है। सुन्दरता की पहली आवश्यकता है पवित्रता। शरीर, मन और वाणी की पवित्रता। शौच अर्थात शुद्धि को योग में बड़ा महत्व दिया गया है। शरीर शुद्ध ही नहीं होगा तो उपर से कितना भी सजा लो आकर्षण कैसे आयेगा? हमको स्नान के तुरन्त बाद अनुभव होनेवाली ताजगी में कितना सौन्दर्य छिपा है। स्नान के बाद हमारा रूप सर्वोत्तम होता है। फिर हम उपर से प्रसाधन चुपड़कर उसे अपवित्र बना लेते है। नियमित पूर्ण स्नान भी सुन्दर बनने का सहज साधन है। शरीर को शुद्ध रखने की और भी कई विधियाँ योग में बताई गई है। ज्ञाता प्रशिक्षक से सीखकर करने से लाभ होगा। इसीलिये यहाँ उनका वर्णन नहीं कर रहे। बिना प्रशिक्षक के मार्गदर्शन के केवल पढ़कर करने से दुष्परिणाम हो सकते है। वैसे संकल्प के साथ रोज स्नान भी पर्याप्त है। मन की शुद्धि भी अत्यावश्यक है। विचार में शुद्धता का अर्थ है उपर उठाने वाले विचार, विस्तार देनेवाले विचार, बिना छल कपट के विचार। नाक नक्श अच्छे होने के बाद भी विचार दुष्ट या कपटी होने से आकर्षण चला जाता है। वाणी की शुद्धता भी सौन्दर्य को निखरने में अनिवार्य है। सदाचार पर विचार करते समय इसपर विस्तार से चर्चा करेंगे।

सुन्दर रूप का दूसरा घटक है प्रसन्नता। कितने भी संतुलित अंग हो, रुप सुहाना हो पर क्या रोते हुए कोई आकर्षक लग सकता है? अतः सतत प्रसन्न रहने का स्वयं को प्रशिक्षण देना होगा। जरा सोचिये बिना किसी बाहरी प्रेरणा के हमारा भाव क्या होता है? प्रसन्नता का या चिंता का या कष्ट का? जब कोई नहीं है, कोई देख नहीं रहा क्या तब हम प्रसन्न होते है? जो अपने आप से प्रसन्न रहता है वो मदमस्त ही सबसे आकर्षक होता है। मुस्कुराने के लिये कोई कारण नहीं चाहिये। वो हमारा सहज स्वभाव बन जाये। कारण तो दुखी होने के लिये आवश्यक हो।

आकर्षण का तीसरा अनिवार्य अंग है प्रमाणबद्धता या सुव्यवस्था। आकर्षण का सबसे बड़ा उदाहरण है चुम्बक। लोहे और चुम्बक की रासायनिक रचना एक ही है फिर भी चुम्बक में आकर्षण है और लोहे में नहीं है। पर उसी सादे लोहे के टुकड़े को चुम्बक पर लगातार घिसने से वो भी चुम्बक बन जाता है। दोनों के आयनों की संरचना में भेद है। लोहे के आयन अस्त व्यस्त है तो चुम्बक के आयन दक्षिण और उत्तर धृवों के बीच पंक्तिबद्ध हो गये है। लगातार घिसने से लोहे के आयन भी प्रमाणबद्ध हो जाते है और वो भी चुम्बक बन जाता है। अच्छी संगत का यह सुपरिणाम है। अपनी वस्तुओं को व्यवस्थित करना व्यक्तित्व को आकर्षक बनाने का प्रारम्भ है। तो अपना कमरा सुव्यवस्थित कर लो, कपड़ें, किताबें ठीक से रखने लगो। इससे हमारे व्यक्तित्व के आयन भी सुव्यवस्थित होने लगेंगे और हम आकर्षक बन जायेंगे।

प्रत्येक व्यक्ति ही स्वभावतः सुन्दर होता है। केवल लम्बे होने में ही सौन्दर्य नहीं है या किसी का शरीर स्थूल है तो उसका अर्थ ये नहीं कि वो आकर्षक नहीं हो सकता। हम अपने शरीर रचना के अनुसार अपने परिधान आदि का चयन करना सीखेंगे तो रुप निखरेगा। मुख्य बात तो ये है कि पवित्रता, प्रसन्नता और प्रमाणबद्धता ये हमें सुन्दर बनाते है, प्रसाधन नहीं। इसका अभ्यास करें और फिर आपका रोम रोम कह उठेगा,
मै हूँ सबसे सुन्दर!

फ़रवरी 3, 2012 Posted by | आलेख | , , , , , , , , , , , , , | 5 टिप्पणियाँ

सफलता की चाह नहीं! चिरविजय का पराक्रम !!


कर्मयोग 10:
‘‘हर कोई सफल होना चाहता है। पर क्या यह सम्भव है? आपकी गीता क्या कहती है?’’ युवाओं की जिज्ञासायें विद्रोह के आवरण में ही व्यक्त होती है। पर भाईजी को तो इस प्रकार की आपत्तियों को झेलने का पुराना अभ्यास है। उन्हें पता था युवक की बात अभी पूरी नहीं हुई है अतः वे केवल हँस दिये। प्रश्नकर्ता ने कहा, ‘‘मुझे पता है आप कहेंगे सच्ची सफलता अलग होती है। सफलता का अर्थ क्या है? आदि आदि। पर जब आप कहते है कि गीता जीवन का मार्गदर्शन करती है तो फिर इस बारे में भी तो कुछ होगा ना उसमें?’’

भाईजी ने कहा गीता में सफलता के बारे में कुछ कैसे हो सकता है? गीता तो कहती है आपका कर्म पर तो पूरा अधिकार है किंतु फल पर कोई अधिकार ही नहीं है। जब फल पर अधिकार ही नहीं है तो फिर स-फल अर्थात फल पाने वाले होने का क्या अर्थ हुआ? गीता तो कहती है – न मे कर्मफले स्पृहा।। कर्मफल के प्रति कोई लिप्सा नहीं है। हमारी पारम्पारिक व्रत कथाओं में इससे अधिक गहरे पद का प्रयोग होता है। सुफल – अच्छा फल। हमारे व्रत का परिणाम अच्छे फल को देनेवाला हो ऐसी प्रार्थना है। सु-फल कौनसा होगा यह प्रत्येक की स्थिति पर निर्भर करेगा। देवताओं की स्तुति में किये जानेवाले स्तोत्रों के अंत में फलश्रृति आती है जिसमे अक्सर यह प्रार्थना होती है – विद्यार्थि लभते विद्या, धनार्थि लभते धनम्। पुत्रार्थि लभते पुत्रान् मोक्षार्थि लभते गतिम्।। जिसको जो चाह हो उसको वो मिले। संत ज्ञानेश्वर ने तो इन्हीं शब्दों में पसायदान, प्रसाद मांगा है। जो जे वांछिल तो ते लाहो। प्राणिजात। ये तो बड़ी ही बढ़िया बात हुई। जो चाहो वो मिल जाये। गीता से तो ये ही अच्छा है। पर ज्ञानेश्वरी तो गीता की ही मराठी में व्याख्या है फिर इसके अंत में मांगे पसायदान में गीता के विपरित बात कैसे हो सकती है?  यह गीता के अनुसार ही है। गीता में भगवान कह रहे है – ये यथा माम् प्रपद्यन्ते तांस तथैव भजाम्यहम्। मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वशः।। गी 4.11।। जो जैसे भाव से पूजा करेगा वैसा ही ईश्वर को प्राप्त करेगा।

यह भाव कैसे आता है? हमारी मर्जी अथवा चाह भी हमारे भाव पर ही निर्भर करेगी। हम इसी के अनुरूप कार्य करेंगे। और उसी के अनुसार फल को प्राप्त करेंगे। हमारा कर्म ही हमारी पूजा है अतः उसका फल उस पूजा का प्रसाद। मन अपनी क्षमता, स्तर व योग्यता के अनुसार ही कामना करेगा। इन तीनों के सम्मिलित प्रभाव को हम हमारी स्थिति कह सकते है। गीता में इसके लिये बड़ा ही मार्मिक शब्द प्रयोग हुआ है -उपपत्ति। क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ न एतद् त्वयि उपपद्यते। गी 2.3।। कापुरूषता को मत प्राप्त हो अर्जुन। यह तेरी उपपत्ति नहीं है। सरल भाषा में तुम्हारे स्तर के व्यक्ति को यह शोभा नहीं देता। हमारी उपपत्ति के अनुसार किया कार्य ही हमें शोभा देता है। उपपत्ति का अर्थ है अंतिम लक्ष्य के सन्दर्भ में हमारी स्थिति। कहाँ तक हम पहुँचे हैं? किस स्थान पर बैठने की हमारी योग्यता है? इसी के अनुसार हमारा मन कामना करेगा। कर्म भी इस प्रकृति के अनुसार होंगे और फलकामना भी इसी की सीमा में होगी। कई बार कर्म करते समय हम अपनी उपपत्ति को भूल जाते है फिर भी उसी के अनुरूप फल की कामना करने लगते है। तब कर्म और परिणाम की अपेक्षा में विभेद हो जाता है। कर्म पर ध्यान दिये बिना केवल परिणाम की ईच्छा करना सामान्यतः इसे ही सफलता की चाह माना जाता है। ये चाह हमेशा मर्यादित, सीमित ही होगी। अतः इसके पूर्ण हो जाने से क्षणिक आवेशयुक्त सुख का अनुभव भले ही हो, संतोष नहीं मिलेगा। क्योंकि हमे अपनी प्रकृति की सीमा से परे जोने में ही संतोष मिलता है। कर्म प्रकृति के वशी भूत होकर चलता है तो कामनापूर्ति भी सुख नहीं देती। अंग्रजी शब्द Success का भी शाब्दिक अर्थ है -‘के पार जाना’। अपने लक्ष्य को पार करना अथवा अपनी क्षमता की सीमा को पार पाना या फिर बाधाओं पर पार पाना इसे ही वास्तव में Success माना गया है। तो हिन्दी में इसका सही अनुवाद होगा विजय। प्रकृति पर विजय। अपनी स्वाभविक सीमा पर विजय। प्रकृति पर विजय उसके विपरित जाकर नहीं हो सकती। अपनी प्रकृति के अनुरूप कर्म करते हुए ही उसके पार जाया जा सकता है।

प्रकृति के दो मोटे मोटे वर्ग किये गये है- प्रवृत्तिं च निवृत्तिंच। प्रवृत्ति अर्थात कामनाओं की ओर मन की गति। निवृत्ति अर्थात कामनाओं से वैराग्य की ओर मन की स्वभावतः गति। हमे अपनी स्थिति इन दो में से किस ओर अधिक है यह देखना चाहिये ताकि इसके अनुरूप हम अपने लिये सही कर्म मार्ग चुन सकें। यदि हमारा मन अधिक बहिर्मुख है। बाहरी बातों में अधिक रमता है। ईच्छाओं में इन्द्रियों के सुख के लिये अधिक लालायित होता है तो मानना होगा कि हमारे लिये प्रवृत्ति मार्ग ठीक है। यदि किसी उदात्त ध्येय के लिये काम करते हुए इन सुखों का त्याग करने में आनन्द का अनुभव होता है। स्वयं को भूला देने वाले कार्य में मन अधिक रमता है। स्वयं से अधिक औरों के हित में विचार करने का मन है तो फिर हम कह सकते है कि हमारी गति वैराग्य की ओर है और हमारे लिये निवृत्ति मार्ग श्रेयस्कर है। ‘श्रेय’ इस शब्द का गीता में बार बार प्रयोग हुआ है। कामना, वासना या इच्छा से कर्म का निर्धारण नहीं होगा। हमारी प्रकृति के अनुरूप जो हमारे लिये श्रेय की ओर ले जानेवाला है वही हमारा कर्तव्य है।
गीता के प्रथम अध्याय में अपने मन के सम्भ्रम का वर्णन करते समय भी अर्जुन प्रारम्भ इसी से करता है।

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। न च श्रेयोनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे।। गी 1.31।।  हे केशव सारे लक्षण मुझे अपने विपरित दिखाई पड़ते है। इस युद्ध में अपने स्वजनों को मारने में मै कोई श्रेय नहीं देखता हूँ। आगे पूरा वर्णन इसी क्रम में है कि किस प्रकार यह युद्ध धर्म का नाश करेगा अतः श्रेयस्कर – श्रेय की ओर ले जाने वाला नहीं है। इसलिये मै युद्ध नहीं करूंगा। श्रेय ही अर्जुन का तर्क है। फिर भगवान द्वारा उपपत्ति का भान करा दिये जाने पर अपने भय व भ्रम का साक्षात्कार हो जाने पर जब अर्जुन शरणागति से शिष्यत्व ग्रहण करता हे तब फिर श्रेय का उल्लेख है। कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः। यत् श्रेयः स्यात् निश्चितं ब्रुहि तन्मे शिष्यस्तेSहम शाधि माम् त्वां प्रपन्नं।।गी 2.7।।  भय के कारण मेरा स्वभाव कृपणता अर्थात संकुचितता से ढ़क गया है और इसके कारण मै अपने धर्म अर्थात कर्तव्य के प्रति भ्रमित हो गया हूँ। इसलिये मेरे लिये क्या श्रेयस्कर है वह निश्चित कर आप मुझे बताओ। मै आपका शिष्य हूँ और आपकी शरण आया हूँ। मेरी रक्षा करें। भगवान भी जीवन के यथार्थ का ज्ञान बताते है और फिर कहते है – धर्म्याद्धि युद्धाद् श्रेयो अन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते।। गी 2.31।।  धर्म की स्थापना के उद्देश्य से किये गये युद्ध से क्षत्रिय के लिये और अधिक श्रेयस्कर कुछ भी नहीं है। आगे के 6 श्लोंकों में स्वधर्म से पलायन के दुष्परिणामों का वर्णन करने के बाद अपने श्रेय के लिये युद्ध का आदेश देते है। तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय।। गी 2.37।। आगे भी जहाँ जहाँ शंका आई वहाँ वहाँ अर्जुन ने अपने लिये श्रेयस्कर क्या है यही पूछा है। तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोSहमाप्नुयाम्।। गी 3.2।।  अतः एक तय करके बता दो कि मेरे लिये क्या श्रेयस्कर होगा – कर्म का मार्ग या ज्ञान का मार्ग?

गीता श्रेय का मार्ग बताती है। श्रेय अर्थात जो श्री की ओर ले जाये। श्री को प्राप्त करने का मार्ग। श्री के कई अर्थ लगाये जाते है। सबसे प्रचलित अर्थ है – लक्ष्मी। इसी से श्रीमन्त अर्थात अमीर जैसे शब्द भी प्रचलित हुए। श्री का अर्थ केवल धन से लेना अधुरा ही होगा। श्री अर्थात परिपूर्णता के साथ समृद्धि। समृद्ध का अर्थ है जिसके पास सबकुछ है। भौतिक साधनसम्पन्नता के साथ ही आत्मिक सामथ्र्य भी। जो स्वावलम्बी होने के साथ ही औरों को भी आवश्यकतानुसार सम्बल देने की क्षमता व नियत दोनों का होना वास्तविक श्रीमन्ती है।

‘श्री’ का एक और अर्थ है – विद्या। किसी विषय का पूर्ण ज्ञान, स्वामीत्व होना विद्या है। केवल सैद्धान्तिक जानकारी ही नही अपितु पूर्ण व्यावहारिक ज्ञान भी। विद्वान अर्थात जिसके पास विद्या है। तो विद्वान होने का अर्थ केवल किसी विषय की व्याख्या करने की क्षमता से नहीं है अपितु आवश्यकतानुसार उसके प्रयोग का भी पूर्ण ज्ञान आवश्यक है। वाहनशास्त्र (Automobile) का विद्वान अभियन्ता (Engineer) यदि अपना स्वयं का वाहन ठीक नहीं कर सकता हो तो वह कैसा विद्वान? उससे तो वह अनपढ़ यन्त्री (Mechanic) अच्छा जो रासायनिक व भौतिक विज्ञान के सुत्र तो नहीं जानता जिससे वाहन चलता है किन्तु बन्द पड़े वाहन की तृटी को पहचान कर उसको ठीक करने का कौशल तो उसके पास है। विद्या का अर्थ ज्ञान व कौशल दोनों का समन्वय है। अतः श्री से युक्त -श्रीयुत का अर्थ होगा जो ज्ञानी होने के साथ ही व्यावहारिक भी है। विद्या का एक और शास्त्रीय वर्गीकरण भी है। परा विद्या व अपरा विद्या। पराविद्या वह आध्यात्मिक ज्ञान व विज्ञान है जो ईश्वर से सम्बंधित है। अर्थात ईश्वरसाक्षात्कार का ज्ञान व कौशल। अपरा विद्या में अन्य सभी भौतिक जगत के विषयों का ज्ञान आता है। ‘श्री’ पद में परा व अपरा दोनों विद्याओं का समावेश होता है।

श्रेय अर्थात श्री की ओर ले जानेवाला यह कहते समय श्री का अर्थ और अधिक गहन व परिपूर्ण लिया गया है। इसमें उपरोक्त दोनों अर्थों के साथ ही और भी अधिक समृद्धि की बात अभिप्रेत है। प्रत्येक की उपपत्ति के अनुसार उसका स्वभाव होता है। इस स्वभाव के अनुरूप उसके जीवन का विशिष्ठ लक्ष्य होता है। इस लक्ष्य को पाने हेतु उसे सामर्थ्य, क्षमता व विद्या के साथ ही सम्यक व्यवहार भी करना होता है। यह श्री है जिसे पाने की ओर अग्रेसर होना श्रेय कहलायेगा। तो हमारे लिये वह श्रेयस्कर होगा जो हमें अपने स्वधर्म की ओर ले जाये। ऐसा कर्म जो हमारे स्वधर्म को साकार करने में सहायक हो वही हमारा कर्तव्य कहलायेगा। ऐसे कर्तव्य पथ पर सब अग्रेसर हो ऐसी अपेक्षा है इसिलिये नाम के साथ श्री लगाने की परम्परा है। श्रीराम अर्थात श्री से युक्त राम। हम एक दुसरे के नाम में आदरपूर्वक श्री का प्रयोग करते है तब वह योग्यता वाचक भले ही ना हो किन्तु लक्ष्य का स्मरण करानेवाला तो होता ही है कि हमे श्री की ओर ही जाना है। इस ध्येयमार्ग को ही कठोपनिषद् में ‘श्रेयो मार्ग’ कहा है। आवश्यक नहीं की श्रेयो मार्ग प्रेयो मार्ग भी हो। यमराज तो नचिकेता को दिये उपदेश में दोनों को एक दूसरे के विपरीत बताते है। उनके अनुसार प्रवृत्ति की ओर जानेवाला इन्द्रिय सुख का मार्ग प्रेयो मार्ग है और निवृत्ति की ओर ले जानेवाला श्रेयो मार्ग जिसके बारे में अन्त में वे कहते है कि यह तलवार की धार पर चलने के समान कठीन मार्ग है। शुरस्य धारा निषिदा दुरत्यया। यमराज के उपदेश का विषय आत्मज्ञान होने के कारण ऐसा कहा होगा। किन्तु कर्मयोग में श्रेयगामी मार्ग सहज, स्वभावगत होने के कारण आनन्ददायी भी होता है। सुखकर होगा ही ऐसा नहीं किन्तु कल्याणकारी कष्ट भी तो आनन्द देता है। अपनी पूरी शक्ति के साथ दौड़ लगाकर स्वर्णपदक जीतनेवाला धावक पूरी थकान के बाद भी कितने आनन्द का अनुभव करता है। विजय प्राप्ति के लिये किया गया कष्ट भी आनन्ददायी होता है। यदि लक्ष्य का भान भूल जाये तब सुख-सुविधा से सम्पन्न जीवन भी उपर से चाहे जितना प्रिय लगे अर्थहीन होने के कारण उबाउ और थका देनेवाला ही होता है। जीवन में स्वभावानुसार सही कर्म चुना हो तब श्रेय मार्ग प्रियकर भी होता है। किन्तु यदि किसी समय संयम की शिथिलता के कारण श्रेय मार्ग पे्रय ना हो तब चुनाव अप्रिय होते हुए भी श्रेयका ही करना है। सामान्य सा उदाहरण मधुमेह के रोगी को मिठाई खाने की इच्छा का है। इसमें जो प्रिय है वो श्रेय नहीं है। अतः क्षणिक सुखकर होते हुये भी दीर्घतः दुखदायी है। सर्वदा सुख व आनन्ददायी तो श्रेयो मार्ग ही है।

श्री प्राप्त करने के लिये प्रयास ही विजय का प्रयास है। अपने जीवनध्येय को पहचान उसकी पूर्णता में स्वयं को पूरा झोंक देना चिरविजय का मार्ग है। जीवन संग्राम के छोटे छोटे संघर्षों पर विजय प्राप्त करने की आपाधापी में यदि हम जीवन के परमध्येय को भूल गये तो फिर सफल भले ही हो संतुष्ट नहीं होंगे। संतुष्टि तो चिरविजय में ही है। यह चिरविजय की कामना ही हमारे जीवन को गतिमान व ध्येयगामी बनाये रखती है। भारतीय संस्कृति प्रत्येक को उदात्त ध्येय की ओर ही प्रेरित करती है। जन्म जन्मांतर की अखण्डयात्रा में इस बार का जो पाड़ाव हमने पाया है वह हमारी उपपत्ति है। यहाँ तक पहुँचे है यह तो तय है। इसे ही प्रारब्ध भी कहते है। इसे नहीं बदल सकते पर चिंता की कोई बात नहीं यह हमारी सीमा थोड़े ही है। यदि अपनी उपपत्ति के अनुरूप श्रेयो मार्ग चुन लिया तो आगे बढ़ने की कोई सीमा नहीं है। शायर कहता है – सरे अक्स सितारों से आगे जहां और भी है। बुलन्दी परों की उड़ानों से आगे आसमां और भी है।
सफलता की चाह तो केवल सीमित परिणाम की नपुंसक अपेक्षा मात्र है। अपनी प्रकृति के अनुरूप कर्म करते समय अधिक और अधिक बड़े ध्येय को प्राप्त करने का पराक्रम करते रहना ही चिरविजय की कामना है।

जनवरी 19, 2012 Posted by | योग | , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

क्या हम तत्पर है?


गढ़े जीवन अपना अपना -10
एक गुरुकुल में दो शिष्य थे सुहृत और सुकृत। सुकृत बड़ा विद्वान था। जो भी पाठ पढ़ाया जाता तुरन्त याद कर लेता। अतिरिक्त भी बहुत पढ़ता रहता। आचार्योंसे चर्चा में भी आगे ही रहता था। सुहृत पढ़ने में तो साधारण था पर कुलगुरु का बड़ा प्रिय था। वे अक्सर कहा करते थे कि ये तो धर्म का मर्म जानता है। दोनों गहरे मित्र थे। फिर भी सुकृत के मन में बार बार आता था कि ऐसा क्या है जो सुहृत को गुरुजी का प्रिय बनाये हुए है। मैने सारे धर्मशास्त्र पढ़ लिये है मित्र से अधिक सुत्र मुझे याद है पर फिर भी सम्भवतः मर्म को मै नहीं जान पाया। ये मर्म क्या है? एक बार किसी अत्यावश्यक कार्य से सुकृत को पास के किसी नगर भेजा गया। जाने से पहले उसने सुहृत को कहा कि वो भी साथ चले ताकि साधन भजन में सहायता हो जायेगी। सुहृत ने जो उत्तर दिया उससे स्पष्ट हो गया कि वो क्यों सबका प्रिय है। उसने कहा, ‘मै साथ तो चल सकता हूँ। भजन जप भी साथ में कर सकता हूँ किन्तु सहायता कि कोई सम्भावना नहीं है। इस मामले में कोई किसी की सहायता नहीं कर सकता। ना गुरु ना शास्त्र ना मित्र। ये सब अधिक से अधिक साधना का पथ बता सकते है पर चलना तो स्वयं को ही पड़ेगा। स्वयं के चलने से ही लक्ष्य तक पहुँचेंगे।’ यही है धर्म का मर्म – ‘हम स्वयं ही अपने सहायक है।’ और हाँ गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते है अपने शत्रु भी हम आप ही है। आत्मैव आत्मनो बन्धुः आत्मैव रिपुरात्मनः।
चरित्र गठन की प्रक्रिया को समझने में हमने भी अभी तक के अध्यायों में ये देखा की जीवन का निश्चित उद्देश्य है, लक्ष्य है। यह प्रत्येक का अपना अलग अलग है, अद्वितीय है। एक दिव्य तत्व से ही उपजे ओर जुड़े इस संसार में प्रत्येक की भुमिका अपने आप में विशिष्ट है ओर उसे पहचान कर निभाने में ही जीवन की सार्थकता है। ये भी कि हमारा जीवन अपनी ही बड़ी इकाईयों से जुड़ा होने के कारण हमें अपना जीवनध्येय और कार्य अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के ध्येय व कार्य के अनुरूप रखना होगा। इससे चरित्र गठन में सहजता भी होगी और हमारी उपलब्धियों की पूरे विश्व में सार्थकता भी होगी। पर इस सबको करने के लिये हमारा एकमात्र साधन है हमारा अपना व्यक्तित्व। यही हमारा वाहन है जो हमें गन्तव्य तक पहुँचायेगा। यही हमारा अस्त्र है जिससे हमें लक्ष्यवेध करना है।
हमारे व्यक्तित्व के विकास के बारे में विचार करते समय हमने सबसे पहले आंतरिक उपकरणों पर विचार किया था। हनुमानजी की जलधि लांघती छलांग से हमने देखा था कि प्रेरणा, वीरता, ध्यैर्य और विवेक इनके बल पर हम भी अपने जीवन सागर को और उसमें आने वाली समस्त बाधाओं को लीलया-खेल खेल में पार कर सकते है। आप जैसे आधुनिक साथी पूछना चाहेंगे कि ये सब तो ठीक है किन्तु इन आंतरिक उपकरणों का विकास कैसे किया जाये? तो हनुमानजी को ही पूछते है कि इतना कठिन कार्य उन्होंने कैसे कर लिया? जब वानरदल माता सीता के खोज का शुभसमाचार लेकर किष्किंधा पहुँचां तो महाराज सुग्रीव के साथ सब रामजी के पास पहुँचे। सारा समाचार सुनकर भगवान का हृदय बजरंग बली के प्रति प्रेम से भर आया और वो उनसे सारा वृत्त विस्तार से समझना चाहते थे। कैसे महाबली रावण की लंका को भस्मसात् कर आये। हनुमानजी सारा श्रेय श्रीराम को ही देते है। प्रभु इसमें मेरी कोई बढ़ाई नहीं है यह सब आपका ही प्रभाव है। मै तो क्या कर सकता हूँ जन्म का बन्दर हूँ शाखा से शाखा जाते रहता हूँ वैसे ही छलांग वहाँ भी लगा दी। इस उत्तर में व्यक्तित्व के आंतरिक विकास का रहस्य छिपा है।
स्वामी विवेकानन्द जी कहते है, ‘‘अन्तःकरण में सारे चमत्कारों की सम्भावना है और इस चमत्कारी शक्ति का रहस्य है श्रद्धा! श्रद्धावान् मनुष्य बाधाओं के हिमालय सहज पार कर लेता है। समुद्र को पी जाने की शक्ति रखता है। नचिकेता के समान हँसते हँसते मृत्यु का सामना कर लेता है।’’ महावीर हुनमान के अलावा कठोपनिषद् का वीर हिरो नचिकेता स्वामीजी का प्रिय आदर्श था। वे कहा करते थे, ‘मुझे 100 नचिकेता दे दो और मै विश्व का कायापालट कर दूंगा।’
इस 10 वर्षीय बालक नचिकेता के जीवन को समझने से हम श्रद्धा के जागरण का तन्त्र समझ सकते है। बालक के पिता वाजश्रवा माने हुवे ऋषि है और समय समय पर बड़े बड़े सर्वस्व त्यागी महायज्ञ करते रहते है। और इसी के लिये ख्यातिप्राप्त है। एक समय के यज्ञ में बालक नचिकेता पिता का भ्रष्टाचार देख कर विचलित होता है। वो देखता है कि अपने पूज्य पिता ब्राह्मणों को मृतप्राय गायें दान में दे रहे है। पीतोदका, जितना पानी पीना था पी लिया, दग्धतृणा, अब घास भी खाने की शक्ति जिनमें नहीं बची और वन्ध्या, जो बांझ है; ऐसी पूर्णतः निरुपयागी गायों का दान तो याचक का बोझ बढ़ाना है। ममता के कारण तटस्थ रहने के स्थान पर बालक नचिकेता श्रद्धा से भर गया। श्रद्धा से प्रेरणा पा कर वह पिता से प्रश्न पूछने का साहस कर पाता है। पर अपना ध्यैर्य और विवेक नहीं खोता। पिता पर आरोप नहीं लगाता केवल उनसे विनम्रता से प्रश्न पूछता है।
महायोगी अरविन्द कहते है, ‘श्रद्धा प्रश्नहीन विश्वास नहीं है। अन्ध अनुकरण नहीं है। श्रद्धा तो प्रश्न पूछने का साहस प्रदान करती है। अपने आप से और अपनों से ‘समाधान अवश्य मिलेगा’ इस विश्वास के साथ प्रश्न पूछना श्रद्धा है।’ तो श्रद्धा का पहला अंग है ‘आत्मावलोकन’। श्रद्धावान् स्वयं का यथातथ्य आकलन करता है। श्रद्धा से आविष्ट नचिकेता भी पिता से संवाद यहाँ से ही प्रारम्भ करता है- मै बहुतों से बढ़कर हूँ और बहुतों से कम भी हूँ। मै ना तो सर्वप्रथम हूँ पर नाही अंतिम। अर्थात मै कुछ तो योग्य हूँ। आप मूझे किसे दान देंगे? यह आत्मावलोकन है। वृथा अभिमान नहीं कि मै धर्म जानता हूँ, आप गलत है। कोई अभिमान नहीं। पर झूठी विनम्रता के नाम पर स्वयं का अवमूल्यन भी नहीं। नियमित आत्मावलोकन से आत्मविश्वास जगता है जो श्रद्धा के जागरण का माध्यम बनता है।
नचिकेता ने पिता को पूछा तो ऐसे अपने प्रिय सुयोग्य पुत्र को आप किसे दान दोगे। पिता ने सम्भवतः झल्लाकर या टालने के लिये कह दिया, ‘मृत्यवे ते ददामि।’ जैसे गुस्से से कभी माँ कह देती है ना ‘जा मर!’ नचिकेता के पिता ने कह दिया मै तुझे मृत्यु को दान देता हूँ। सुननेवाले सब अवाक् रह जाते है पर श्रद्धावान् नचिकेता अविचल मुस्कुराता सम्मूख आयी चुनौती को स्वीकार करता है और यमनगरी को जाने को तत्पर होता है। श्रद्धा के विकास की वैज्ञानिक तकनिक को समझने के लिये हमें भी नचिकेता के साथ यमराज जिनका दूसरा नाम धर्मराज भी है उनके पास जाना होगा। पर पहले अपनी क्षमता का अवलोकन तो कर लें। निमर्मता से अपना नित्य आत्मावलोकन करना प्रारम्भ कर दे। रोज सोन से पहले अपनी क्षमता का आकलन करें। अपनी दिनचर्या का अवलोकन कर पूछे स्वयं से श्रद्धा के जागरण के लिये ‘क्या हम तत्पर है?’

दिसम्बर 20, 2011 Posted by | आलेख | , , | 8 टिप्पणियाँ

छलांग तो लगानी पड़ेगी!


गढ़े जीवन अपना अपना -9
छलांग तो लगानी ही पड़ती है। साधारणतः जीवन में किसी बड़े निर्णय को कर लेने के बाद भी जब व्यक्ति उस दिशा में पहला कदम उठाने से ड़रता है तो उसे ऐसे ही समझाइश दी जाती है। तैरना सीखने के लिये भी तो पहले पानी में उतरना ही पड़ेगा ना? कहते है कि धक्का दे के पानी में डाल दो तो बच्चा भी अपने आप तैरना सीख ही लेता है। कितनी भी सोच समझ या प्रेरणा से जीवन में कार्य करने की दिशा और क्षेत्र चुन भी लिया तब भी सारी बात तो इसी पर निर्भर होगी कि पहला कदम डाला जाय। कहते ही है ना कि कितनी भी लम्बी यात्रा हो प्रारम्भ तो एक कदम से ही होता है। यही सबसे महत्वपूर्ण होता है। यही वो छलांग हे जो सफलता की संगिनी है।
जटायु के बड़े भाई संपाति ने अपनी दूरदृष्टि से सागरपार देख कर बता तो दिया की श्रीलंका में अशोक वाटिका में माता सीता बैठी है। तो लक्ष्य निश्चित हो गया। कार्य भी स्पष्ट है। प्रभु का संदेश सीतामैया को पहुँचाना है और उनका कुशलक्षेम जानकर प्रभु को बताना है। लक्ष्य भी स्पष्ट और कार्य भी स्पष्ट। जांबवंत के वचनों से अंतःप्रेरणा का जागरण भी हो गया – ‘रामकाज लगी तव अवतारा। सुनतहि भयहु पर्वताकारा।’ रामकार्य के लिये तुम्हारा जन्म है इसका स्मरण होते ही हनुमानजी की शक्ति का जागरण हुआ। पर केवल इतने से ही काम नहीं बनता। हनुमान जी को महावीर ऐसे ही नहीं कहते। वीरता के सभी आवश्यक गुण उनमें विद्यमान है। साहस, धैर्य, बल, और विवेक चारों का अद्भूत मिश्रण ही इस कपिश्रेष्ठ को ‘महावीर’ बनाता है।
पर्वताकार हो जाने के बाद वे अपनी पुनर्जागृत शक्ति को प्रगट करने लगे। जांबवंत को कहने लगे बताइये अब मै क्या करू? आप कहो तो पूरी लंका को ही उखाड़ लाउ? या रावण के सभी सहायकों के साथ उसका विनाश कर दूँ? पर वीरता तो कार्य को उचित मात्रा में करने में ही होती है। इसलिये जांबवंत जी ने कहा कि अभी तो तुमको केवल इतना ही कार्य करना है कि माता सीता को ढ़ाढ़स बंधाना हे और उनकी स्थिति के बारे में रामजी को वापिस आकर सूचना देनी है। साहस का अर्थ ये नहीं कि मनमानी करें। दल के नेता की आज्ञा के अनुसार पराक्रम करने के लिये साहस के साथ ही धैर्य भी चाहिये। फिर इसका अर्थ ये भी नहीं कि अपनी बुद्धि का प्रयोग ही नहीं करना है। दो काम बताये थे पर जब लंका आ ही गये तो लगे हाथ शत्रु की सेना का आकलन भी कर लिया।
हनुमानचालिसा में हम गाते है, ‘‘प्रभुमुद्रिका मेली मुख माहि। जलधी लांघि गये अचरज नाहि।।’’ यदि इस समुद्र लांघने वाली छलांग को ध्यान से समझे तो हम अपने चरित्र निर्माण के लिये महत्वपूर्ण संकेत प्राप्त कर सकते है। सबसे पहले तो पिता के मित्र मैनाक पर्वत ने मित्रतापूर्ण विघ्न ड़ाला। ‘आओ कुछ क्षण विश्राम करों!’ पर कार्य में विघ्न ड़ालते सुख को ठीक से समझ कर वीर उससे बच निकलता है। पवनपुत्र ने पिता के मित्र को विनम्रता से उत्तर दिया, ‘राम काजु किन्हें बिनु मोहि कहा विश्राम!’ यह कार्य के प्रति लगन वीरता का लक्षण है। सुरसा और छाया के विघ्नों को विवेकपूर्ण बुद्धि से जहाँ आवश्यक वहाँ छोटा बनकर पार किया और लंकीनी के लिये ऐसे बल का प्रयोग किया की एक ही मुठ्ठी के प्रहार में उसे चित कर दिया। जैसा विघ्न वैसा ही उपाय। यह वीरता है। सब समय आवेश और शक्ति का ही प्रयोग नहीं तो जहाँ जो उचित हो उस प्रकार से समस्या का समाधान करना।
हमारे भी जीवन में रोज अनेक ऐसे प्रसंग आते हे जहाँ हमें छलांग लगानी होती है। पर वीरता अपने आप नहीं आती है। अपने आप तो कुछ भी नया करने में संकोच और कुछ कुछ भय भी लगता है। जिस कमरे में अंधेरा हो उसमें प्रवेश करने में भी तो हिचकिचाहट होती है। पता नहीं क्या होगा अंधेरे में। और मन सहज ही विपरित से विपरित ही कल्पनायें करता है और भय को बढ़ाता है। एक तो अज्ञात का भय और दूसरा आलस ये हमें छलांग लगाने से रोकते है। आलस केवल शारीरिक ही नहीं होता। मन का आलस बड़ा होता है। पर यदि नये प्रयोग नहीं करेंगे तो हमें हमारी क्षमताओं का परिचय कैसे होगा? यदि पानी में ही नहीं उतरेंगे तो तैरेंगे कैसे? अतः मन को संस्कार देना होता है कि नये काम करें। प्रयत्नपूर्वक कुछ ना कुछ नया करते रहना। ताकि जब कार्य के लिये कुछ नया करना पड़ें तो मन हिचकिचाये नहीं। साहस का संस्कार जितना बचपन में हो उतना सहज और पक्का होता है। क्योंकि एक बार मन में तरह तरह के भय भर गये तो फिर उनको हटाना ही बड़ा काम हो जाता है।
धैर्य तो बाद में आ जायेगा पर पहले साहस और पराक्रम विकसित होना चाहिये। बिना साहस के धैर्य तो भीरुता है और शौर्य के साथ धैर्य है वीरता। हम सब जीवन में स्थायित्व लाना चाहते है। Settle होना चाहते है। सारे व्यावसायिक लक्ष्य बंततपमत की योजना जीवन को स्थिर करने के लिये है। ये तो होना ही है समय के साथ हो भी जायेगा। पर बचपन में या युवावस्था में ही यह मानसिकता बना लेने से वीरता का विकास नहीं होता। व्यवसाय में भी विशिष्ठ सफलता तो वीरों को ही मिलती है जो साहस करते है। जिसे आधुनिक भाषा में Risk कहते है। चुनौती के बिना प्रगति की कल्पना ही नहीं कर सकते। धैर्य का अर्थ है परिस्थिति को भाँपकर प्रतीक्षा करने की क्षमता। समय के अनुरूप ही साहस विजय देता है। कई बार सही समय की प्रतीक्षा करने का धैर्य नहीं होने के कारण सामर्थ्य और पूर्ण योजना के बाद भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते।
14 साल की आयु के शिवाजी तोरणगढ़ के किले पर हमले की योजना बनाते है और सफलता पूर्वक स्वराज्य की पहली विजय प्राप्त करते है। सोचिये, आज 14 साल का बालक 10 वी कक्षा में होता है। अपनी पढ़ाई में आगे क्या विषय लेने है इसका निर्णय लेने का साहस भी हम 10 वी तक विकसित नहीं कर पाते है। जिस विधि से शिवाजी जैसे वीरों का निर्माण होता है वही है यह साहस और धैर्य के उचित सदुपयोग की विधि। कब, कहाँ किसका प्रयोग करना है इसके निर्णय के लिये विवेक। यह सब सिद्धान्त जानने से ही विकसित नहीं हो जाते उसके लिये व्यवहार में अभ्यास करना होता है। गलतियाँ भी होंगी। कुछ नुकसान भी हो सकता है पर निराश होने कि आवश्यकता नहीं यदि सही सबक सीख लिये तो ये छोटे मोटे नुकसान तो उस सीख की ट्यूशन फीज मात्र है। जीवन में प्रयोग करने के लिये तत्पर होना चाहिये। जिस बात का भय लगता हो उसे करके देख लेने से ही भय दूर होगा। वीरों की जीवनियां पढ़ने से भी मन तैयार होता है।
महावीर हनुमान को अपने जीवन का आदर्श बना ले ओर सोचें इस स्थिति में मेरे स्थान पर पवनसुत होते तो क्या करते? राह मिल ही जायेगी। वीरतापूर्ण सार्थक जीवन का मन्त्र तो यही है ‘छलांग तो लगानी ही पड़ेगी।’

दिसम्बर 14, 2011 Posted by | आलेख | , , , , , , , , , , | 10 टिप्पणियाँ

अद्वितीय! फिर भी सब एक ही है . . .


गढ़े जीवन अपना अपना -6
एक कविहृदय व्यक्ति एक घने जंगल में गया। देखा तो चारों ओर विविधता से नटा संसार। कहीं गगनचुम्बी वृक्ष जिनकी उंचाई को नापना भी असंभव, तो दूसरी और छोटे-छोटे पौधे। वटवृक्ष से विशाल पेड़ जिनके तने को नापना तो छोड़ो पूरा एक साथ देखना भी असंभव। उन्हीं शक्तिशाली बून्धों पर लहराती नाजुक सी बेलें। रंग भी कितने सारे-हल्के हरे से लेकर देवदार के गहरे हरे तक केवल हरे रंग की ही अगणित छटाएं। फूलों के रंग तो इन्द्रधनुष को भी लजा दे। शायद ऐसे ही किसी कवि ने लिखा होगा, ‘ये कौन चित्रकार है?’ सहसा मन इस रचना के रहस्यमय रचनाकार की ओर भी चला जाता है और कोई कवि कह उठता है, ‘जिसकी रचना इतनी सुन्दर वो कितना सुन्दर होगा?’
‘वेब ऑफ़ लाइफ’  के लेखक फ्रिट्जोफ काप्रा इस अद्वितीय विविधता के रहस्य को जानने का अनोखा मार्ग दर्शाते है। ऊपर इतनी विविधता से सजा यह जंगल- प्रत्येक पेड़, पौधा, वल्ली, पत्ता, फूल, फल सब स्वयं में अद्वितीय, कोई भी दो एक समान नहीं। पर कल्पना करें इस जंगल को हम जमीन के अन्दर से देख रहे है, बीस फिट नीचे से। सोचों वहां से कैसा दिखेगा यह जंगल? ठीक कहा! वहां से तो केवल जड़ें ही जड़ें दिखेंगी। मोटी-पतली, लम्बी-छोटी जड़ें ही जड़ें और वह सब भी एक दुसरे में गुथी हुई। एक विशाल जड़ों का जाल एक ही जीवनतत्व का रसपान कर पोषण पाता – एक जीवनजाल। ऊपर जंगल की समस्त विविधता को पोषित करता एक ही तत्व।
एक अंग्रेजी लेखक जिसने बाद में अपना नाम लोबसांग राम्पा रख लिया, अपनी लगन से तिब्बत के बौद्ध मठ में लामा बन गया। ल्हात्सा से ऊपर हिमालय की गहन कन्दराओं में उसने अपने गुरू से दीक्षा प्राप्त की। जीवन की सामान्यसी घटनाओं से गूढ़तम तत्व को समझाने की गुरू की विधि उसे बड़ी रास आती थी। एक दिन गुफा के बाहर हिमालय की एक चोटी पर बैठे थे। शिष्य आकाश में असंख्य तारों को देख आश्र्चयचकित हो रहा था। हिमालय में तो तारे कुछ ज्यादा ही दिखाई देते है। वह अनगिन तारका समुह, उनके चारों ओर भ्रमण करती ग्रहमाला, ऐसे अनेक तारकामण्डलों से प्रचंड निहारिकाओं में विस्तारित होता अंनत आकाश। गुरू ने पूछा, ‘क्या देख रहे हो?’
शिष्य बोला, ‘तारांगण देख रहा हुँ।’
‘अरे उस खाली जगह (रिक्तता) (Space) आकाश को क्या देखते हो?’
शिष्य बोला, ‘आकाश (रिक्तता) कहां है?’
गुरू ने कहा, ‘सर्वत्र वही तो है। दो तारों के बीच क्या है? आकाश! इस आकाश में ही तो ये सब आकाशगंगायें बिखरी हैं। कुल मिलाकर तारों के आकार से कई गुना बड़ा यह भकास, रिक्त आकाश ही तो है।’ शिष्य  आश्चर्यवत देखता रहा। आकाश के अवकाश को निहारता रहा।
गुरू ने उसकी भाव समाधी तोड़ी। बोलें, ‘अरे ऐसे क्या आश्र्चय से देख रहे हो? सर्वत्र यह खाली आकाश ही भरा पड़ा है।’
‘यह क्या है?’ गुरू ने कपड़े की और इशारा करके पूछा।
‘वस्त्र है’।
‘अच्छा ध्यान से देखा और करीब से देखो।’
थोड़ी देर देखकर विचारमग्न हो उसने कहा ‘हां अब समझा यह तो धागे हैं। एक दूसरे में बुने हुए।’
‘बिलकुल ठीक। अब धागों के ताने-बाने को देखो ध्यान से।’
शिष्य ने ध्यान से देखना शुरू किया। आड़े धागे को ताना कहते है और उसमें बुने खड़े धागे को बाना। ताने-बाने के जाल के मध्य खाली स्थान-आकाश। बिना गुरू के कहे ही वह समझ गया यदि सुक्ष्मदर्शी से देखे तो पाएंगे कि कुलमिलाकर धागों के आकार से कई गुना बड़े आकाश (रिक्तता) को इस ताने-बाने के जाल ने जकड़ रखा है और हमें पूर्णतः भरे, पूर्ण अपारदर्शी कपड़े का आभास हो रहा है।
यही हाल ठोस दिखते शरीर का है। आंखें बन्दकर ध्यान से अनुभव करें तो हम देखेंगे कि शरीर विभिन्न प्रणालियों से बना है। श्वसन प्रणाली, पाचन प्रणाली आदि। ये प्रणलियाँ बनीं हैं अवयवों से, अवयव कोशिकाओं से, कोशिकायें भिन्न भिन्न रसायनों से। फिर और सुक्ष्मता से देखें तो ये रसायन बने है अणुओं से, अणु परमाणुओं से। परमाणुओं की रचना तो हम जानते ही है। प्रोटोन व न्युट्रोन से बनें केन्द्र के चारों ओर भ्रमण करते असंख्य इलेक्ट्रोन । देखा हमारे शरीर में भी हम उसी आकाशगंगा के दर्शन कर सकते है जो आसमान में दिखाई दे रही है। तो ठोस दिखते शरीर में भी कितना बड़ा आकाश व्याप्त है।
‘तो क्या हम भी रिक्तता से भरे है? क्या सारा अस्तित्व अधिकांशतः रिक्त है?’ शिष्य ने डरकर पूछा।
गुरू ने मन्द-मन्द मुस्काते उत्तर दिया, ‘पगले! आकाश भी कहां रिक्त है। जिसको तुम ठोस मानते थे वो आकाश से भरा मिला। अब यह समझ लो कि वो सब एक ही चैतन्य से पूर्ण है। जो खाली दिखता है वो भी और जो भरा दिखता है वो भी। सब एक ही चैतन्य है। एक ही ऊर्जा। दिव्य, आलोकित चेतन्य!’
‘ओह। तो यही (God) ईश्वर है। सब कुछ उसी से निकला है।’ शिष्य  ने समझने के आवेश में कहा।
गुरू जोर से हंसे, ‘अब तुम नाम चाहे जो लो, ईश्वर कहो या और कुछ, सब है एक। सब पूर्ण, अंनत, अखण्ड एक! ना खाली, ना भरा, ना विविध, ना भिन्न! जड़ में जाकर देखो सब एक ही है।’
यही सृष्टि का नियम है। प्रत्येक अद्वितीय रचना जड़ में उसी एक पूर्ण का अंग है। अर्थात् हम अद्वितीय तो है पर विलग नहीं। अंनत, अखण्ड, पूर्ण के विविध अद्वितीय अंग है।
जीवन की दिशा तय करते समय इन दोनों बातों का भान रखना होगा। और एक तीसरी बात का भी इस अद्वितीय अंग का अखण्ड एक पूर्ण से संबंध क्या है? देखते है अगली बार…….

नवम्बर 14, 2011 Posted by | आलेख | , , , | 4 टिप्पणियाँ

तुम सा नहीं देखा ….


गढ़े जीवन अपना अपना -5

चार्ल्स  की उर्जा को दिशा देना उसकी माँ के बस का नहीं था। 10 साल का बालक और इतने प्रश्न। माँ ने अपने भाई के पास चार्ल्स को भेज दिया। मामा एक चर्च में पादरी थे। बच्चों को काम देना, अनुशसित करना इसका उन्हें बड़ा अनुभव था। वे समझ गये चार्ल्स उस भूत की तरह है जिसे काम में न लगा पाये तो लगातार प्रश्न ही पूछता रहेगा। उन्होंने चर्च के ग्रंथालय में बकाया कामो में चार्ल्स को लगा दिया। कपाटों की सफाई, ग्रंथों का रखरखाव ऐसे अनेक काम थे उनके पास। पर चार्ल्स तो चार-चार मजदूरों का काम अकेले कर जाता। मामा ने जिस काम के लिए महीने भर की छुट्टियों का समय तय किया था, चार्ल्स ने उसे एक सप्ताह में ही पूरा कर दिया।

अब मामा के सामने समस्या थी। भांजा खाली था और खाली दिमाग तो शैतान का घर होता है। इस शैतान के पास तो प्रश्नों की  खदान थी। पादरी मामा जहाँ जाते वहीं उनके पीछे पहुँच जाता और तरह तरह के प्रश्न पूछता रहता। मामा ने चार्ल्स को व्यस्त रखने के लिए अनूठा काम दे दिया। ‘जाओ बगीचे में से किसी भी पेड़ के दो पत्ते ले  आओ। हाँ! दोनों बिल्कुल एक जैसे होने चाहिए। कोई  भी अंतर नहीं।’ चाल्र्स को लगा ये तो बड़ा सरल काम है। दौड़ कर बगीचे में गया और एक जैसे दिखने वाले दो पत्ते ले आया। मामा ने गौर से देखा और अंतर ढूँढ लिया। सिलसिला चल पड़ा। चार्ल्स पत्ते ले आता और मामा कोई न कोई अंतर दिखा ही देते। किसी की डंठल में भेद था तो किसी का आकार, किसी का रंग गहरा होता तो कभी शिराओं की रचना भिन्न निकल आती।

अब चार्ल्स सुबह से शाम तक बाग में अटका रहता। उसने मामा के पास भी जाना बंद कर दिया। अब वो स्वयं ही कोई न कोई अंतर पकड़ लेता। अब तो ये खेल हो गया कि एक समान लगने वाले पत्तों में अंतर ढूँढों। खेल-खेल में चार्ल्स को सृष्टि के अद्भुत नियम का साक्षात्कार हुआ। विश्व में लाखों पत्तें हैं। लाखों पेड़ पर कोई भी दो एक से नहीं हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में अद्वितीय है। ईश्वर की ईस अनुपम सर्जनात्मकता का आनंद लेते लेते चार्ल्स सोचने लगा इसके रहस्य के बारे में। इस सृष्टि की अद्वितीय रचना के बारे में। उसके चिंतन में उसे तो विशेष बना ही दिया। यही चार्ल्स बड़ा होकर -‘विकासक्रम के सिद्धांत’  –  Theory of Evolution का जनक चार्ल्स डार्विन बना। हाँ! वही डार्विन जिसने बंदरों को हमारा पूर्वज बताया।

हमारी रूचि डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत में नहीं है पर उसके बचपन के अनुभव ने सिखाए सृष्टि के शाश्वत सिद्धांत में अवश्य है। जब पेड़ के दो पत्ते एक जैसे नहीं होते, विश्व की 6 अरब आबादी में से किन्ही भी दो लोगों की उंगलियों के निशान भी एक दुसरे से नहीं मिलते; केवल अभी जीवित है उनके ही नहीं जो मर गये उनके भी। तो इन सब तथ्यों से ये तो स्पष्ट हुआ कि हम में से प्रत्येक अपने आप में अद्वितीय हैं। अतः जीवन का ध्येय व लक्ष्य निर्धारित करते समय किसी और जैसा बनाने का विचार तो बेमानी ही है। जब हम अद्वितीय ही हैं तो हमें अपने स्वयं के ही वैशिष्ठ्य को खोजना होगा ना?

यह अद्वितीय होना नाक नक्श या उंगुलियों के निशान जैसी शारीरिक बनावट तक सिमित नहीं है, तो हमारे जीवन का उद्देश्य अद्वितीय है। इस विशिष्ट उद्देश्य के लिए केवल हमारा ही जन्म हुआ है। पर इतराने की कोई बात नहीं क्योंकि जितने अद्वितीय हम है उतने ही अन्य सभी है। हाँ इसी कारण जीवन की इस अद्भुत लीला में हमारी भूमिका अद्वितीय है। जिस प्रकार शरीर के प्रत्येक अंग का अपना कार्य है उसी प्रकार हमारा भी कार्य अद्वितीय है।

हमारा जीवन ध्येय व कर्मक्षेत्र इस अद्वितीय उद्देश्य की प्राप्ति के लिए, अद्वितीय भूमिका को निभाने अपने अद्वितीय कार्य को करने का माध्यम होगा। अतः आत्मविश्वास से ये जान ले कि कोई हमें कुछ भी कहे पर सृष्टि का सिद्धांत तो ये ही कह रहा है – ‘तुम सा नहीं देखा’।
        

नवम्बर 3, 2011 Posted by | आलेख | , | 10 टिप्पणियाँ

अंग भी पूर्ण है


गढ़े जीवन अपना अपना -4
एक बार शरीर के सारे अंगों में विवाद हो गया। पांव कहने कहने लगे ‘हम ही श्रेष्ठ है। हमारे आधार पर ही तो सारा शरीर खड़ा होता है।’ हाथ कहने लगे ‘हम तो सारा काम करते है। हमारे कार्य से ही कमाई होती है। कमाई से पोषण। हम ही सर्वश्रेष्ठ है।’ पेट ने अपना तर्क दिया ‘मैं भोजन ना पचाऊ तो सबकी बैटरी डाऊन हो जाएगी।’ हृदय ने कहा, ‘मैं धड़कना बन्द कर दूं क्या?’ मस्तिष्क कह उठा ‘सब मेरे नियत्रंण से ही संचालित होता है। मैं ही सबका राजा हूं।’ फेफड़ों ने कहा कुछ नहीं एक क्षण रूक गये। श्वास रूकी और सब परेशान। सारे अंग अपनी-अपनी श्रेष्ठता साबित करने में लग गये। कहानी का अंत तो लेखक ने किया आत्मा के विधान द्वारा आत्मा घर छोड़ जाने लगी तो सबकी शक्ति क्षीण हो गई। सब कहने लगे आत्मा ही श्रेष्ठ है क्योंकि इसके बिना तो किसी का कोई अस्तित्व ही नहीं है। किन्तु आत्मा ने कहा ‘आप सभी अपने आप में श्रेष्ठ हो। प्रत्येक अपने अपने कार्य में श्रेष्ठ है। सब अपना कार्य व्यवस्थित करेंगे। तभी शरीर अपना काम कर सकेगा।’ अंगों का कार्य तथा ध्येय पूरे शरीर के अनुरूप होगा तभी उसका महत्व है। शरीर को जहां जाना है पैरों को उसी दिशा में चलना होगा। अन्यथा पैरों का कार्य निरर्थक ही होगा। अंगों की सार्थकता पूरे शरीर के लक्ष्य-पूर्ति में हैं।
अब हम स्वयं को देखें। हमारा अपना एक सर्वश्रेष्ठ भाव है। जैसे पैरों का कार्य हाथ नहीं कर सकते वैसे यदि हम अपने स्वभाव एवं क्षमता के अनुसार जीवन ध्येय चुनेंगे तो सहज सफलता प्राप्त होगी। हमारी क्षमता व रूचि का मेल होता है उसी के अनुसार हमें काम में आनन्द आता है। पूर्व में जो वर्णव्यवस्था थी वह इसी प्रकार गुण-कर्म पर आधारित थी। आज भी यदि हम अपना जीवनध्येय वैज्ञानिक तरीके से तय करना चाहते है तो हमें अपने स्वभाव का वर्ण पहचानना होगा। हमें आनन्द यदि सेवा में आता है तो उसके अनुसार हमें जीवनध्येय चुनना होगा। यदि हमें लाभ प्राप्ति में रस आता है तो हम व्यापारादि उत्पादक कार्यों में अपना जीवनध्येय तय कर सकते है। शारीरिक बल अथवा नेतृत्व में सहजता से रमनेवाले व्यक्ति को रक्षासेवा, प्रशासनिक सेवा अथवा राजनैतिक सेवा का चयन करना उपयोगी होगा। अन्ततः यदि अध्ययन, अनुसंधान या कला संगीत में रूचि हो उसके अनुसार जीवनध्येय बनाने से सहज सफलता मिलेगी।
इस विचार के बाद भी एक बात बच ही जाती है। केवल अपने स्वभाव एवं शक्ति का निर्णय कर लेने से काम नहीं चलेगा। समग्रता से भी विचार करना होगा। जैसे हाथ-पांव आदि हमारे शरीर के अंग है उसी प्रकार हम भी तो राष्ट्रपुरूष के अंग है। भारतमाता के हम अंग है अतः हमारा जीवनध्येय मां भारती के जीवनधर्म के अनुकुल होगा तब ही वह उपयोगी होगा। स्वामी विवेकानन्द कहते है कि भारत का जीवनध्येय (मिशन) है विश्व का मार्गदर्शन करना। हम भारत को विश्वगुरू के पद पर आसीन देखना चाहते है। हमारा जीवनध्येय, कर्म और व्यवसाय चुनते समय हम यदि इस बात का ध्यान रखे तो हमारी सफलता राष्ट्र-सेवा का माध्यम बनेगी और यह भाव कर्म की विशेष प्रेरणा देगा।

एक और बात…
व्यावसायिक लक्ष्य को ही जीवनध्येय न मान बैठे। प्रतिवर्ष लाखों छात्र पीईटी, पीएमटी अथवा आईआईटी की प्रतियोगी परीक्षा में बैठते है। कुछ ही सफल होते है। असफलता छात्र निराशा व हताशा के शिकार हो जाते है। हमने इंजिनियर व डाॅक्टर बनने के व्यावसायिक लक्ष्य को ही जीवनध्येय मान लिया है। व्यवसाय तो साधन है। हमें मुम्बई जाना है। रेल के आरक्षण की लाईन में लगे है। आरक्षण नहीं मिला तो क्या जाना रूक जाएगा? किसी और साधन से चले जाएंगे। हमें अपना ध्येय स्पष्ट होना चाहिए फिर साधन पाने की सफलता अथवा असफलता से निराशा नहीं होगी। डॉक्टर बनना, सीए बनना तो साधन है साध्य अलग-अलग हो सकते है। एक डॉक्टर बनकर सेवा करना चाहता है, दुसरा पैसा कमाना, कोई नया अनुसंधान करना। यदि ध्येय स्पष्ट है तो पी एम टी में असफल रहने पर भी सेवा करने, पैसा कमाने अथवा अनुसंधान करने के वैकल्पिक रास्तों पर विचार किया जा सकता है। दूसरी ओर ध्येय स्पष्ट नहीं हो और केवल भेड़चाल में व्यवसायिक लक्ष्य प्राप्त भी कर लिया तब भी जीवन में संतोष नहीं मिल पाएगा। अतः व्यावसायिक लक्ष्यप्राप्ति पर चिंतन करते समय ही उसके द्वारा प्राप्त करने के जीवनध्येय पर भी ध्यान दें। दोनों स्पष्ट हो जाने पर राह सुगम और आनन्दमय हो जाती है।
एक व्यक्ति ने घर पहूंचकर अपनी पत्नि को कहा, ‘आज मैंने पांच रुपये बचाये।’ ‘कैसे?’ ‘मैं बस के पीछे दौड़ता चला आया।’ पत्नि ने कहा, ‘कल टैक्सी के पीछे दौड़कर आना पच्चीस रुपये बचेंगे।’
साधन का मूल्य सुविधा नहीं, पहुंचना है। क्या बड़े व्यवसाय के पीछे भागकर ज्यादा लाभ मिलेगा? उसी प्रकार एक बार ध्येय, मार्ग और वाहन तीनों का चयन कर लेने के बाद फिर जल्दबाजी या तनाव का क्या काम? रेल गाड़ी में चढ़ जाने के बाद भी यदि कोई अपना सामान सिर पर उठाये रखे तो उसे क्या कहेंगे? या फिर कोई रेल में चढ़ने के बाद भी इंजिन की दिशा में दौड़ता रहे तो क्या जल्दी पहुंच जाएगा?

अक्टूबर 28, 2011 Posted by | आलेख | , , , | 2 टिप्पणियाँ

एक खोज अंदर की ओर ……………….


एक देश सारे विश्व मे विख्यात था। किसी पत्रकार ने सोचा इसकी ख्याति का रहस्य खोजा जाय। जब वह अपनी खोजबीन के लिये उस देश मे पहुंचा तो उसे पता चला की एक प्रान्त के कारण वह सारे विश्व मे प्रसिद्ध था। वह उस प्रान्त में गया तब उसने पाया कि वहां एक जिला है जिसके कारण वह प्रान्त देश में, देश विश्व में विख्यात है। जिले के मुख्यालय पहुचने पर उसे एक गाँव का पता बता दिया गया जिसके कारण जिला प्रान्त में, प्रान्त देश में व देश विश्व में नामवर था। गाँव में भी एक मोहल्ला व मोहल्ले में एक मंदिर जिसके कारण गाँव जिले में, जिला प्रान्त में, प्रान्त देश में और देश सारे विश्व में प्रसिद्ध थे।

मंदिर के गर्भगृह में तो मूर्ति होगी ही। उस मूर्ति की ही प्रतिष्ठा थी जो ख्याति की सुगन्ध सभी भौगोलिक स्तरों पर फैला रही थी। पत्रकार जब गर्भागार में पहुंचा तब उसे बड़ा दुःख हुआ। मूर्ति हल्दी कुमकुम तथा अन्य पूजा सामग्री की परतों से ढकी हुई थी। पुजारी तथा अन्य भक्तगण भी उस देवता का नाम नहीं बता पाये जिसने उस मंदिर को विश्वभर में प्रसिद्ध कर दिया था। पत्रकार बड़ा जीवट का खोजी था। उसने पूजा सामग्री की परतों को खोलना प्रारंभ किया। परत दर परत उसकी संकल्प शक्ति की परीक्षा हो रही थी। वह बड़ी लगन से अपने कार्य में  लगा रहा। कुदेरते-कुदेरते जब वह तह तक पहुंचा, जब सारा आवरण हटा दिया तब उसके आश्चर्य की सीमा ही न रही। वहां कोई मूर्ति थी ही नहीं। था एक दर्पण, शीशा, आईना।

सदियों पूर्व हमारे पूर्वजों ने मंदिर में पूजास्थल की स्थापना की थी। दर्पण जो हमें अपने अंदर झाँकने की प्रेरणा देता है। अपने आप का परिक्षण करने की प्रेरणा देता है। ईश्वर तो हमारे अंदर ही है। उसे खोजना भी अंदर ही है अतः  आत्मस्वरूप का पूजन ही सच्चे अर्थ में पूजा है। मंदिर का अर्थ यही है की हम अपने आप को पहचानना प्रारम्भ करें। मूर्ति के रूप में एक शीशा हो या न हो मंदिर में हम जाते अपने आप के दर्शन हेतु ही। भगवान के दर्शन करना तो निमित्तमात्र है।
दिल्ली में एक गरीब मजदूर रहता था। दिनभर 100-100 किलो अनाज के बोरे उठाता-ठेला चलाता तब शाम तक रु 90-100  कमाता। कभी कबार  एकाध  बोरे की फेरी ज्यादा कर ले तो रु 20-25 अधिक मिल जाते थे। उसी रोजी में से घर की रोटी, बच्चों की पढाई, कपडे सब चलाता था। फिर भी घर में छोटे से कोने में स्थापित मंदिर में रोज कुछ न कुछ चढ़ाता था। जब अधिक रोजी मिलती तो फिर उस दिन तो दानपात्र में रु 20-25 भी डल जाते थे। पत्नी पूछती – भगवान के पास तो सबकुछ है फिर आप उन्हें क्यों देते रहते हो? बच्चों के दो कपड़े अच्छे आ जायेंगे। कभी किसी दिन फल ही खाने को मिलेंगे। वह चुप रहता हँस देता। बचत का क्रम जारी रहता।

उसके मन में दढ़ संकल्प था। वह पर्याप्त बचत के बाद वैष्णौ देवी जाना चाहता था। वर्षों तक मेहनत कर, अपने और अपने बच्चों की सुविधाओं में कटौती  कर इसी एक आस में बचत कर रहा था। जब पर्याप्त राशी जुट गयी तो सबको लेकर कटरा गया कटरा से पैदल पहाड़ी चढ़ना। 14 किमी. की चढाई नाचते – गाते भक्तों के साथ पार हो गई। जय माता दी का घोष कानों में ही नहीं मन में भी गूँज रहा था। सारे वातावरण में यही स्वर थे -मै भी बोलू जय माता दी -तुम भी बोलो जय माता दी। सब मिल के बोलो,  प्रेम से बोलो, जोर से बोलो, गाते बोलो, नाचते बोलो, आते बोलो, जाते बोलो -जय माता दी।

सब अजनबी पर एक दुसरे से प्रेम से अभिवादन करते जय माता दी। सबकी ही पहचान है – सब माता के भक्त। सबका लक्ष्य एक ही -पहाडावाली, शेरावाली के दर्शन। अनेक आयु अवस्था के लोग। कोई टट्टू पर तो कोई पालखी में, कोई झूमता, कोई लंगड़ता, कोई लाठी का सहारा लिए पर सब जा रहे एक ही भवन कि ओर माँ के दर्शन करने………..

जब ऊपर मंदिर के बाहर पहुंचा तो शरीर थक के चूर था पर मन में थी एक अनोखी शांति। लम्बी कतार में खड़े प्रतीक्षा, माँ के दर्शन की… इतने वर्षों की मेहनत, त्याग, बचत और आज के भी लम्बे परिश्रम के बाद वो क्षण आ ही गया जब गुफा के अंदर माँ के दरबार में दाखिल हुआ। मूर्ति के सामने खड़े होने की जगह भी कम है और भीड़ के कारण पुजारी खड़े भी नहीं होने देते। केवल चंद क्षण मिलते है माँ के सामने। अपना बहादुर भाई भी खड़ा हुआ गर्भगृह के सामने। एक क्षण ही माँ के रूप को निहारा होगा कि पुजारी बोल उठा-चल आगे चल। कुछ ही क्षण में उसे निकास गुफा कि ओर धकेला जाना था फिर भी उसने हाथ  जोड़े और आँखे मूँद ली।
वर्षों मजदूरी करके संचित धन को खर्च कर वैष्णौ देवी आया। किसलिए? माँ का दर्शन करने… 14 किमी. पहाड़ी पर थका देने वाली यात्रा की, किसलिए? माँ के दर्शन करने। लम्बी कतार में खड़े होकर प्रतीक्षा की किसलिए? माँ के दर्शन करने….
और फिर जब माँ के सामने दो चार क्षण मिले तो उसमे भी कुछ देर के लिए आँखें बंद कर ली। इतना प्रयास इतना परिश्रम….. माँ के दर्शन के लिए फिर….टकटकी लगाकर देखता रहता आँखें क्यों बंद की?
क्योंकि हम माँ के दर्शन करना चाहते हैं। अपने ही अंदर। अपने ही अंतर्मन में। उपनिषदों में वर्णित इतना बड़ा सच हम जानते हैं उस पर अमल कर रहे हैं और फिर भी हम अंजान हैं। अनजाने मे हम मंदिर में हम दर्शन करने जाते हैं तब अपनी आँखें बंद कर लेते हैं। हम अपने अंदर ईश्वर की खोज करते हैं। किन्तु सजगता के आभाव में वह हमारे जीवन पर प्रभाव नहीं डालता। यदि हम इसका अर्थ समझने का प्रयास करेंगे तो पायेंगे कि देवालय, मंदिर तो निमित्त हैं कि हम अपने अंदर कि खोज प्रारम्भ करें।

सितम्बर 17, 2011 Posted by | आलेख | , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

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