उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

एक मन, विचार, संकल्प और स्वप्न


 

केवल ध्येय और विचार ही उदात्त होने से काम नहीं चलता, संगठन के सामने दृष्टि भी उदार होना आवश्यक है। बड़े लक्ष्य लेकर चलने से ही बड़े कार्य सम्भव होते हैं। यदि संगठन अपने सम्मुख लक्ष्य ही छोटा रख ले तो फिर उसका दायरा भी सीमित हो जाएगा। शक्तिपूजा हमें उदात्तता की ही प्रेरणा देती है। 1897 में जब भारत की स्वतंत्रता का भी कोई चिन्ह नहीं दिखाई दे रहा था तब स्वामी विवेकानन्द ने भारत के सम्मुख विश्वविजय का ध्येय रखा। 12 संन्यासी भाइयों से प्रारम्भ कर रामकृष्ण मठ को स्थापित कर विश्व को हिन्दू संस्कृति व वेदान्त के संदेश का कार्य दिया। डॉ हेड़गेवार ने जब 1925 की विजयादशमी को कुछ मुठ्ठीभर बालकों के साथ संघ शाखा का प्रारम्भ किया था तभी उनके सम्मुख पूरे हिन्दू समाज के संगठन का लक्ष्य था। इन उदात्त विचारों ने ही चमत्कार किये हैं।

महान विचार के साथ लोग जुड़ते हैं तभी संगठन का स्वरूप बनता है। केवल कुछ लोगों तक विचार पहुँचाने मात्र से संगठन का काम नहीं हो जाता। अधिक से अधिक लोगों के जीवन में यह विचार उतारना ही संगठन का ध्येय है। ध्येयवादी संगठन सत्य पर आधृत होता है। इस विचार की सार्वभौमिकता के कारण ही यह सब के लिये स्वीकार्य हो सकता है। सनातन हिन्दू धर्म इन्हीं शाश्वत सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप में उतारने का नाम है। जब संगठन का आधार भी ऐसा ही पूर्णतः शास्त्रीय सनातन सिद्धांत होता है तब संगठन सार्वजनीन हो जाता है और उससे जुड़ने की क्षमता के लोगों की संख्या असीम होती है। वास्तव में कोई भी ऐसे संगठन से विचार के स्तर पर जुड़ सकता है। कार्यप्रणाली व पद्धति के अनुसार रूचि रखनेवाले लोग ही संगठन से जुड़ेंगे किन्तु विचार के स्तर पर किसी को भी कोई आपत्ती नहीं होगी। इन सनातन सत्यों को अनेक प्रकार से पुकारा जाता है। उनमें से एक नाम है ‘ब्रह्म’। संगठन का ध्येय ही ब्रह्म है।

ब्रह्मचर्य का सही अर्थ है – ब्रह्म की ओर चलना – ब्रह्मैव चरति इति ब्रह्मचारी। संगठनात्मक सन्दर्भ में इसका अर्थ हुआ सतत ध्येय की ओर चलना। मार्ग में आनेवाले अन्य प्रलोभनों अथवा आकर्षणों की ओर किंचित भी ध्यान ना बंटने देना। नवरात्री के दूसरे दिन की देवी है माँ ब्रह्मचारीणी। माता पार्वती द्वारा पूर्ण एकाग्रता से दीर्घकाल तक किये तप के कारण उन्हें यह नाम मिला है। अपने ध्येय शिवकृपा के लिये सबकुछ दांव पर लगानेवाले तप की अवधि में माता ने पूर्ण कठोरता के साथ ब्रह्मचर्य का पालन किया। यहाँ तक की आहार का भी पूर्ण त्याग कर दिया। एक समय पेड़ के पत्तों का सेवन भी त्याग देने के कारण ही उनका एक नाम पड़ा – अपर्णा। पार्वती की तपस्या से विह्वल उनकी माता ने करूण पुकार के साथ उन्हें कहा, “अरी मत”, संस्कृत में उSSमा और पार्वती का नाम ही पड़ गया उमा। माता ब्रह्मचारिणी इस तप की प्रतिक हैं। इसीलिए उनके हाथ में जपमाल है। जप मन की एक तानता से की गई धारणा का द्योतक है। यह जपमाल रूद्राक्ष की है। रूद्र के अक्ष की आस में ही तो सारा तप चल रहा है ना?

संगठन में ब्रह्मचारिणी की साधना का क्या अर्थ होगा? यहाँ केवल एक व्यक्ति की व्यक्तिगत निष्ठा की बात नहीं है। पूरे संगठन का ही एकसाथ एक विचार पर एकाग्र होना संगठनात्मक ब्रह्मचर्य होगा। इसलिए यह लम्बी प्रक्रिया है। अत्यंत सुव्यवस्थित योजना से संगठन के मन का संस्कार करना होता है। सब एक विचार पर एकाग्र हो सकें इस हेतु संगठन को एक सामान्य शब्दावली का निर्माण करना होता है। संगठनात्मक अनुशासन की रचना करनी होती है। विविध स्वभाव के कार्यकर्ता संगठन में एक विचार से, एक ध्येय के लिये एकसाथ आकर कार्य कर रहे होते हैं। थोड़ा सा भी व्यवधान होने से व्यक्तिगत आकांक्षायें, क्षुद्र अहंकार ऊपर आ जाते हैं। यह सब संगठन की एकाग्रता को भग्न करने के लिये पर्याप्त होते हैं। उपाय एक ही है सतत ध्येयस्मरण। पर फिर याद रहे कि एक व्यक्ति के मन की बात नहीं है। अनेक विविधताओं से भरे, कई बार मीलों की दूरी पर फैली शाखाओं में कार्यरत व्यक्तियों के समूह को अनेक प्रकार की स्थितियों के मध्य इस ध्येयस्मरण को जीवित रखना है। संगठन के सभी सदस्यों को, कार्यकर्ता, पदाधिकारी सभी को एक मन से एक विचार पर एकाग्र होना है। एक संकल्प के साथ एक समान स्वप्न देखने से ही यह सम्भव है। सबके स्वप्न एक हो, संकल्प एक हो और वे एक मन से किये गये एक विचार पर आधृत हो। इस अद्वितीय एकात्मता हेतु विशिष्ट तकनिक का प्रयोग करना होता है। इस तकनिक को ‘नित्य कार्यपद्धति’ कहते हैं।

ब्रह्मचारिणी माता की जपमाल ही संगठन की कार्यपद्धति है। संगठन के विचार, ध्येय व स्वभाव के अनुरूप ही संगठन की कार्यपद्धति को गढ़ना होता है। जैसे जपमाल में एक-एक मणके को फेरने के साथ इष्ट का नामस्मरण किया जाता है, वैसे ही कार्यपद्धति में नियमित अंतराल में नियत गतिविधि के द्वारा ध्येयस्मरण किया जाता है। कार्यपद्धति की नियमितता उसका सबसे प्रमुख लक्षण है। नियमित समय के अंतराल पर आयोजित होने के कारण इसकी आदत पड़ती है। मन को संस्कारित करने का यही एकमात्र उपाय है। कार्यपद्धति की गतिविधि सबके लिये होती है। अतः उसके बहुत अधिक क्लिष्ट होने से नहीं चलेगा। कार्यपद्धति के कार्यक्रम सहज सरल होने चाहिये। बहुत अधिक साधनों अथवा स्थान आदि में विशिष्टता की आवश्यकता नहीं होनी चाहिये। कार्यपद्धति जितनी सरल होगी उतनी ही प्रभावी होगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रभाव का सबसे प्रमुख कारण उसकी अत्यंत सरल कार्यपद्धति में है। प्रतिदिन लगनेवाली शाखा के लिये किसी भी विशेष साधन अथवा प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती। सहज, सरल, सुलभ होना ही इसकी सफलता का रहस्य है।

प्रत्येक संगठन को अपनी कार्यपद्धति की रचना करनी होती है। जो संगठन ऐसा कर पाते हैं, वे संगठन लम्बे चलते हैं और एक मन, विचार, संकल्प और स्वप्न के साथ ध्येय की ओर अग्रसर होते हैं। ब्रह्मचारिणी की कृपा का यही माध्यम है। आइए, अपनी कार्यपद्धति की माला जपें और संगठनात्मक ब्रह्मचर्य के द्वारा ध्येय की ओर बढ़ें।

अक्टूबर 6, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

स्वामीजी और संघ


16‘‘माँ आज मुझे किसी से प्यार हो गया है ।’’ एक शाम स्वामी विवेकानन्द ने साराह ओले बुल को कहाँ, जिन्हें वे मेरी ममतामयी अमेरिकी माँ कहा करते थे। ठिठोली करते हुए माँ ने पूछा ‘‘कौन है वह भाग्यवान युवती?’’ स्वामीजी ने गंभीरता से उत्तर दिया -‘‘ संगठन! माँ वह कोई युवती नहीं अमेरिका की संगठन क्षमता है जिससे मूझे प्यार हो गया है।’’

हिन्दूओं की खोई संघ क्षमता का पुनः परिचय स्वामी विवेकानन्द ने करवाया । उन्होंने संगठन की शक्ति को बार बार अधोरेखित किया । हिन्दू धर्म के सम्मान को विश्वमंचपर प्रतिष्ठित करने के बाद स्वामी विवेकानन्द जब भारत लौटे तब उन्होंने भारत को चार मन्त्र दिए – आत्म गौरव, संगठन, पुनरूत्थान तथा विश्वविजय। भेड़ों के मध्य पले सिंह के समान अपने पराक्रम को भूल चुके हिन्दुओं के आत्मगौरव को स्वामी विवेकानन्द ने जागृत किया । ‘तभी और केवल तभी तुम हिंदू कहलाने के अधिकारी हो जब इस शब्द को सुनते ही आपकी नसों में विद्युत तरंग दौड़ जाती हो । जब इस नामाभिधान को धारण करनेवाले किसी जाति, वर्ग, भाषा, प्रांत के व्यक्ति को देखते ही तुम्हारा हृदय अकथनीय आत्मीयता व स्नेह से भर पड़े कि यह मेरा बन्धू है ।’

उन्होंने संगठन के महत्व को केवल प्रतिपादन ही नहीं किया अपितु श्रीरामकृष्ण संघ की स्थापना की । स्वामीजी ने भारत में हर क्षेत्र में संगठन की 31आवश्यकता पर बल दिया । किसी युवा के पूछने पर कि देश में कितने संगठन होने चाहिए । स्वामीजी ने कहा असंख्य । हम करोड़ो है । हमारे कार्य भी अनेक है । सब संगठित होकर ही चल सकते है । संगठन को ही उन्होंने भारत के पुनरूत्थान का मार्ग बताया । उन्होंने स्पष्ट किया समाज सुधार कोई नवनिर्माण की प्रक्रिया नहीं है । यह तो खोए गौरव को प्राप्त करना है । अतः यह पुनर्निमाण है । पुनरूत्थान है नवोत्थान नहीं । यह महत्वपूर्ण दृष्टिभेद था । अंग्रेजों के शासन में पश्चिम की हर बात को ही अनुकरीणय मानकर कार्य करनेवाले सुधारकों को स्वामीजी ने आगाह किया – यह तो विनाश का मार्ग है । यह समाज सदियों से अपनी जड़ों से जुड़ा है । उसका उत्थान उनकी आस्थाओं को क्षति पहुँचाये बिना करना होगा ।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि स्वामीजी ने भारत को उसके जीवनध्येय के प्रति जागृत किया । उन्होंने घोषणा की – ‘‘उठो भारत! अपनी आध्यात्मिकता से विश्वविजय करो!’’ विश्वविजय को स्वामीजी ने भारत का लक्ष्य बताया । उन्होंने स्पष्ट किया भारत की आकांक्षा विश्वगुरू बनने  की है । मानवता को जीवन जीने की वैज्ञानिक पद्धति का पाठ पढ़ाना ही भारत का अवतार कार्य है । इसी के लिए भारत को कार्य करना है ।

dr Hedgewar1925 में जब पूरे भारत में स्वतंत्रता आंदोलन चरम पर था तब डा केशव बलिरामपंत हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की । केवल स्वतंत्रता नही भारत के पूर्ण विजय को लक्ष्य बनाकर हिन्दूओं के संघटन का लक्ष्य उन्होंने सामने रखा । आज पूरे विश्व में वटवृक्ष की भाँति फैला संघ स्वामी विवेकानन्द के स्वप्न को साकार करने का ही कार्य कर रहा है । चरित्र निर्माण के प्रेरणा केन्द्र निर्माण करने की योजना स्वामी विवेकानन्द ने मद्रास में युवाओं के संम्मूख रखी थी । ऐसे प्रेरणाकेन्द्र जहाँ सभी जाति, मतों के हिन्दू एकत्रित हो सके । उन्होंने ॐ कार के मंदिरों की स्थापना का भी संकेत दिया था । जनसमान्य को संगठित कर आत्मबल से परिपूर्ण समाज का निर्माण ही स्वामीजी के अनुसार भारत निर्माण का एकमात्र मार्ग था । अनुशासन, प्रामाणिकता, निष्ठा, श्रद्धा से सम्पन्न व्यक्तिगत चारित्र्य व एकात्मता देशभक्ति, त्याग, सेवा व समर्पण से युक्त राष्ट्रीय चारित्र्य के निर्माण की जो योजना स्वामी विवेकानन्द ने रखीथी उसी को डा हेडगेवार ने संघ शाखा के रूप में व्यवहारिक तन्त्र प्रदान किया । स्वामीजी के मन्त्र मनुष्य निर्माण – चरित्रवान् मनुष्यों का राष्ट्रगठन के लिए निर्माण को संघ ने साकार कर दिखाया ।

वर्तमान में विश्व के सबसे विशाल स्वयंसेवी संगठन के रूप में ख्यात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने shakhaस्वामी विवेकानन्द के विचारों को ही मूर्त रूप प्रदान किया है । सभी जाति, वर्ग, भाषा, प्रांत, मत, सम्प्रदायों के हिन्दू समस्त मतभेदों को भूल भारतमाता की पूजा करने प्रतिदिन भगवे ध्वज के सम्मूख एकत्रित होते है । भारत की सामान्य जनता को एकसूत्रता में बांधने क यह अभिनव प्रयोग है । अमेरिका से अपने शिष्य आलासिंगा पेरूमाल को लिखे पत्र में स्वामीजी ने आहवान किया कि देशकार्य के लिए लाखों युवक समर्पित हो । संघ ने प्रचारकों की टोली के रूप में स्वामीजी के इसी कार्य को मूर्तरूप प्रदान किया है । सन्यासेतर समर्पित कार्यकर्ताओं की श्रृखंला का निर्माण संघ ने किया है । स्वयं के व्यक्तिगत जीवन को पूर्णतः आहूत कर अपना सर्वस्व राष्ट्रकार्य में लगानेवाले प्रचारक स्वामीजी के आहवान का ही प्रत्युत्तर हैं ।

Shri Gurujiराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक प.पू. श्री. गुरूजी स्वामी विवेकानन्द के गुरूभाई स्वामी अखण्डानन्द से दिक्षित थे । यह संघ का स्वामीजी से सीधा आध्यात्मिक नाता है । स्वामी अखण्डानन्द ने बंगाल के सारागाछी में श्रीरामकृष्ण आश्रम के सेवाकार्यों का प्रारम्भ किया । ‘जीवभावे शिव सेवा’ के श्रीरामकृष्ण परमहंस के मन्त्र को उन्होंने वहाँ साकार किया । पः पू. श्री गुरूजी ने सारगाछी आश्रम में स्वामी अखण्डानन्उ जी की सेवा की । उन्हीं के आदेशानुसार गुरूजी ने जीवनभर केशधारण किए । गुरू ने कहा था ये दाढ़ी व बाल तुम्हें जँचते है इसे काटना मत । गुरू अन्य सभी शिक्षाओं के साथ ही इस व्रत का भी पालन इस अद्भूत शिष्य ने जीवनभर किया ।

सेवा को समाजधारण व सभी के उत्थान का सर्वोत्तम साधन के रूप में स्वामी विवेकानन्द ने प्रतिपादित किया । वंचितों के उद्धार का मार्ग संघर्ष नहीं अपितु प्रभावी लोंगों के हृदय में जागृत संवेदना से उपजी सेवा है । स्वामीजी के इस संर्वांगीण उत्कर्ष के सेवा मंत्र को संघ ने अपने विविध क्षेत्रों के माध्यम से साकार किया है । स्वामीजी ने सेवा के भिन्न भिन्न स्तर बताये थे । भौतिक सेवा सबसे निम्न पहला स्तर है । भूखे को रोटी और बेघर को घर देनेवाली सेवा । उससे उपर लौकिक ज्ञान के दान की सेवा । और सबसे उँची आध्यात्मिक ज्ञान के दान की सेवा । पर इन सबसे भी परे एक ऐसी सामूहिक साधना की ओर स्वामीजी ने संकेत किया जिसके द्वारा एक ऐसे आदर्श समाज का निर्माण करना जिसमें सब सूखी हो । किसी को सेवा की आवश्यकता ही ना लगे । इस हेतु एकात्म विचार पर आधारित व्यवस्थाओं की रचना करनी होगी । आज संघ पूर्ण समर्पण से संगठन व सेवा के कार्य में लगा है ।

स्वामीजी ने तिसरा मन्त्र दिया था विश्वविजय का । संघ का कार्य विश्व के अनेक देशों में चल रहा है । आज स्वामी विवेकानन्द की सार्द्ध शती के अवसर पर ‘भारत जागो ! विश्व जगाओ !’ इस बोधविचार के साथ जनजागरण का महाअभियान चल पड़ा है इस निमित्त राष्ट्रीय आध्यात्मिक शक्तियों के संगठन में लगायी है । इसी के माध्यम से स्वामी विवेकानन्द की ऐतिहासिक भविष्यवाणी साकार होगी –

bharatmata
‘‘एक दृश्य में जीवंत स्पष्टता से अपनी आँखो के सामने देखता हूँ – यह मेरी चिरपुरातन भारतमाता जागृत होकर पूर्व से भी अधिक गौरव व दिप्ती के साथ विश्व के गुरू पद पर सिंहासनारूढ़ है । आइये अपने जीवन की आहूति देकर विश्व के सम्मूख उसके विजय की घोषणा करे ।’’

फ़रवरी 13, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

   

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