उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

धर्मानुसारी शिक्षा की स्थापना में शिक्षकों की भूमिका


Ruprekhaमानव की पहचान संबंधों से है | बिना संबंधों के मनुष्य का कोई परिचय ही नहीं है | समस्त सृष्टि के अन्तर्निहित एकत्व का सुप्त ज्ञान मानव मन को अनंत विस्तार हेतु प्रेरित करता है | प्रकटतः भले ही हम स्वयं को सबसे अलग मानते है फिर भी अंतर्मन में इस बात का भान सदैव रहता है कि हम उस एक ईश्वरीय चेतना के अंग है | इस अनुभूति के कारण ही मनुष्य सदैव अपनी चेतना का विस्तार करने का प्रयत्न करता है | इसीलिए मानव को सामाजिक प्राणी भी कहते है | यह सामाजिकता मनुष्यता का महत्वपूर्ण अंग है किंतु सृष्टि के सम्बन्ध केवल मानव समाज तक ही सीमित नहीं है | इसके तंतु सर्वव्यापी है | मानव का मानव से, मानव का समाज से, मानव का अन्य प्राणियों से, सृष्टि से, समूचे ब्रम्हांड से तथा अंततोगत्वा परमात्मा से जो सम्बन्ध है, उन संबंधों के निर्वहन को धर्म कहते है | इस पूरे अस्तित्व को जिन अन्तर्निहित नियमों द्वारा धारण किया गया है उसी को धर्म कहते है | यही धर्म व्यवहार में भी अपेक्षित है | धर्मानुसारी शिक्षा का अर्थ है प्रत्येक को इस धर्म की अनुभूती कराना तथा उसपर आधारित व्यवहार का प्रशिक्षण प्रदान करना |

वर्तमान समय में धर्मसंकल्पना का अर्थ स्पष्ट न होने के कारण पूरी शिक्षा ही धर्मविहीन हो गयी है| उपासना के रूप में धर्म का सीमित अर्थ प्रचलित होने के कारण उसे भेद का मूल मान लिया | परिणामतः धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धर्म के समग्र रूप को ही व्यवहार से बाहर कर दिया | धर्मानुसारी शिक्षा तो क्या, शिक्षा में धर्म के अंतर्भाव की भी कल्पना वर्तमान वातावरण में नहीं कर सकते | ऐसी स्थिति में से धर्मानुसारी शिक्षा के आदर्श तक पहुँचने हेतु जिन महत्प्रयासों की आवश्यकता है उनमें शिक्षकों की भूमिका सर्वोपरि है | शिक्षक ही शिक्षा की धुरी है | चाहे जैसी भी व्यवस्था हो, शिक्षक के बिना शिक्षा की कल्पना ही नहीं कर सकते | व्यवस्था चाहे जितने भी निर्बंध लगा ले, कक्षाकक्ष में पढ़ाते समय विधि एवं व्यवहार की स्वतंत्रता को कोई छीन नहीं सकता | शिक्षक यदि अपने इस स्वातंत्र्य का समुचित उपयोग करे तो शिक्षा व्यवस्था के पुनरुत्थान में चमत्कार संभव है | वैसे भी धर्म आचरण से ही संभव है और आचरण का प्रशिक्षण किसी पाठ्यक्रम की अपेक्षा व्यावहारिकता से अधिक दिया जा सकता है | अतः यदि शिक्षक अपनी भूमिका का धर्म के अनुसार निर्वहन करने लगे तो वर्तमान व्यवस्था में भी धर्मानुसारी शिक्षा प्रदान करना संभव है | २ से ३ प्रतिशत शिक्षकों के दृष्टिकोण में सम्यक परिवर्तन आ जाये तो व्यवस्था परिवर्तन भी प्रारंभ हो जायेगा | व्यवस्था परिवर्तन के २ मार्ग है | क्रान्ति के मार्ग से व्यवस्था को एक झटके में बदला जाता है | किंतु इस पद्धति में परिवर्तन का आधार राजतंत्र होता है जोकि अपनेआप में धर्मानुसारी शिक्षा के सिद्धांतों के विपरीत है | क्रान्ति में परिवर्तन ऊपर से नीचे की ओर होता है | परिवर्तन का दूसरा मार्ग सहज, स्वाभाविक, क्रमशः होनेवाला परिवर्तन है | परिवर्तन संसार का स्थायी स्वभाव है | संसरति इति संसारः | अतः समाज में स्वतः होनेवाले परिवर्तनों के साथ शिक्षा में भी क्रमशः परिवर्तन होता है | इसे उत्क्रांति मार्ग कहते है | वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अनियंत्रित परिवर्तन पतन की ओर ही जाता है | भौतिक शास्त्र में इसे Entropy (परिक्षय) का सिद्धांत कहते है | क्रांति में प्रस्थापित व्यवस्था का ध्वंस निहित है | १८३५ में मैकोले ने यही किया था | सकारात्मक शिक्षा की प्रस्थापना हेतु क्रांतिकारी परिवर्तन कितना भी आकर्षक लगे, अत्यंत कठिन है | एक तो ऐसे परिवर्तन हेतु आवश्यक सम्पूर्ण सैद्धांतिक स्पष्टता तथा उसे व्यवहार में उतारनेवाले प्रशिक्षित आचार्य एक साथ एक समय इतनी बड़ी संख्या में तैयार करना तथा इस व्यवस्था को स्थापित करने हेतु अनुकूल राजतंत्र का उपलब्ध होना, दोनों ही बातें दुष्प्राप्य है | यदि महत्प्रयास से धर्मसत्ता आदर्श आचार्यों को तथा राजसत्ता राजनैतिक इच्छाशक्ति को प्राप्त भी कर ले तब भी अचानक व्यवस्था परिवर्तन समाज में सांस्कृतिक क्षोभ (cultural shock) उत्पन्न करेगा | दूरस्थ वनवासी क्षेत्रों में अचानक आधुनिक शिक्षा को प्रस्थापित करने से ऐसा विक्षोभ देखने में आता है | ऐसे सामूहिक विक्षोभ की स्थिति में अधिकतर समय समाज अच्छी बातों को भी नकार देता है |

उत्क्रांति का पथ सहज, स्वाभाविक व नैसर्गिक है | किंतु फिर भी उसमें विकास के स्थान पर पतन की ही अधिक संभावना है | प्रयत्नपूर्वक धर्मानुसारी शिक्षा की chanakyaस्थापना हेतु आवश्यक परिवर्तन करना यह मार्ग ना तो अचानक झटके से की हुई क्रान्ति हो सकता है और ना ही अत्यंत धीमी गति से होनेवाली उत्क्रांति | जिस मार्ग का अवलंबन धर्मसंस्थापना के लिए किया जाना अपेक्षित है उसे सम्यक क्रान्ति कहा जा सकता है | संस्कृत में इसे यदि एक शब्द में कहना हो तो कहेंगे ‘संक्रांति’ | संक्रांति में परिवर्तन क्रमशः व नैसर्गिक है किंतु परिवर्तन की गति व दिशा सुनियोजित होगी | क्रमशः उत्थान करते हुए अंतिम आदर्श को प्राप्त किया जायेगा | यही भारतीय पद्धति है | संक्रांति में क्रान्ति की तरह विस्फोट नहीं है और ना ही उत्क्रांति की तरह पतन | जो-जो जिस-जिस स्तर पर है वही से क्रमशः उत्थान की ओर अग्रसर हो यही संक्रांति का मार्ग है | धर्मसंस्थापना की यही शाश्वत विधि है |

शिक्षा में संक्रांति की आधारशिला शिक्षक ही होंगे | संक्रांति में चूंकि परिवर्तन बाहर से थोपा नहीं जाता अपितु अन्दर से ही किया जाता है | अतः यह हमेशा मानव-केन्द्रित होगा, व्यवस्थानुगत नहीं हो सकता | शिक्षक धर्मानुसारी शिक्षा की संकल्पना को अर्थात धर्म की सुस्पष्ट संकल्पना को हृदयंगम करे | इसीसे शिक्षा में संक्रान्ति प्रारम्भ होगी | इस धर्म को अपने व्यक्तिगत जीवन में आचरण से प्रारम्भ करना होगा | धीरे-धीरे अध्ययन, अध्यापन व शिष्यों के साथ व्यवहार में धर्म का प्रभाव प्रारम्भ होगा | शिक्षक के कक्षा में धर्माचरण प्रारम्भ करने से सकारात्मक परिवर्तन दृष्टिगोचर होंगे | किसी भी शैक्षिक संस्थान में यदि १० प्रतिशत शिक्षक धर्माचरण करनेवाले हो जाये तो प्रयत्नपूर्वक उस शिक्षा संस्थान को धर्मानुसारी शिक्षा के आदर्श के रूप में प्रस्थापित किया जा सकता है | जब इन शिक्षा संस्थानों से समाज के सभी क्षेत्रों में सर्वोत्तम व्यक्तित्व प्रदान किये जायेंगे तब सारा समाज इन शिक्षा संस्थानों का अनुसरण करने लगेगा | परिवर्तन का धर्मानुसारी मार्ग यही है |

संक्रांति का प्रारम्भ शिक्षकों के सुगठन हेतु आयोजन करने से होगा | आचार्य निर्माण की यह प्रक्रिया बाहरी प्रशिक्षण से नहीं अपितु अंदरूनी स्वाध्याय से ही संभव है | धर्मसंस्थापना की प्रेरणा से उद्दीपित आचार्य एकत्रित आकर धर्म को समझने हेतु अध्ययन, विमर्श, मनन, चिंतन करेंगे तब उसे स्वाध्याय कहा जायेगा | इस स्वाध्याय का मूल आधार तो शास्त्र ग्रन्थ ही हो सकते है | किंतु साथ ही शास्त्रीय सिद्धांतों की युगानुकुल अभिव्यक्ति को भी स्वाध्याय का आधार बनाना होगा | धर्म के तत्व को हृदयंगम करना स्वाध्याय का प्रथम चरण है | इसका अगला चरण धर्मावलंबन के व्यावहारिक आयामों का सृजन है | कुछ दो, चार, दस या पचास लोग भी कुछ विधियों की सूचि बनाकर सारे अध्यापकों को दे देंगे तो काम नहीं चलेगा | धर्मावलंबन की विधियों का सृजन प्रत्येक को अपनी प्रतिभा का समुचित उपयोग करते हुए करना होगा | यह सृजन प्रक्रिया प्रत्येक के लिए स्वतंत्र होते हुए भी व्यक्तिगत नहीं हो सकती | धर्म का मर्म सामूहिक क्रिया में है | अतः स्वाध्याय भी सामूहिक ही करना पड़ेगा | चिंतन मनन द्वारा समझे हुए तत्व को व्यवहार में उतारने का नाम है निदिध्यासन | इसी से स्वाध्याय परिपूर्ण होगा | स्वाध्यायी आचार्यों के नियमित मंडल सर्वत्र प्रारम्भ करने होंगे | प्रयत्नपूर्वक पूरे समाज में इस योजना को क्रियान्वित करना होगा |

स्वाध्याय से प्राप्त विधियों को अपने-अपने अध्यापन में प्रयोग कर परिष्कृत किया जायेगा | ऐसे कुछ शिक्षक साथ मिलकर या तो पूर्व से चल रहे शिक्षा संस्थान को आदर्श बनायेंगे अथवा नूतन पूर्णतः धर्मानुसारी शिक्षा संस्थानों का निर्माण करेंगे | इनके प्रभाव से नीतियों में भी परिवर्तन होगा | प्रारम्भ में केवल इतना भी हो जाये कि राजसत्ता ऐसे पूर्णतः निःस्वार्थ भाव से चलनेवाले गैर-वाणिज्यिक धार्मिक शिक्षा संस्थानों को स्वतंत्रता से कार्य करने दे, किसी भी प्रकार का नीतिगत हस्तक्षेप ना करने दे तो भी पर्याप्त है | ऐसे समाजपोषित शिक्षा संस्थान क्रमशः प्रमुखता प्राप्त करते जायेंगे व शासनमुक्त शिक्षा व्यवस्था का विकास करेंगे |

Saraswati-Statue-to-Washingtonइस पूरी प्रक्रिया में शैक्षिक संगठनों की भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है | इस हेतु शैक्षिक संगठनों के कार्यकर्ताओं का मानस धर्मसंकल्पना के प्रति दृढ़ करना होगा | वर्तमान में देश में भारतीय दृष्टी को ध्यान में रखकर काम करनेवाले तीन प्रकार के शैक्षिक संगठन कार्यरत हैं | कुछ संगठन शिक्षा संस्थानों का संचालन करते हैं | निःस्वार्थ सेवा भाव से राष्ट्रनिर्माण हेतु चरित्र निर्माण करनेवाली संस्कारवान शिक्षा प्रदान करनेवाले कई शैक्षिक संगठन हैं | संख्या की दृष्टी से विद्याभारती इनमें अग्रणी है | रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन, भारत सेवक समाज, सर्वोदयी विचारधारा से चलनेवाले संगठन आदि अनेक संगठन इस श्रेणी में आते हैं | यद्यपि इन शिक्षा संगठनों द्वारा चलाये जानेवाले शिक्षा संस्थान आधुनिक व्यवस्था का अंग होने के कारण पूर्णतः भारतीय नहीं है | फिर भी इन संगठनों का संचालन करनेवाले कार्यकर्ताओं की मंशा धर्माधिष्ठित भारतीय पद्धति को स्थापित करने के लिए अनुकूल है | धर्मदृष्टि को समझने से इन शिक्षा संस्थानों के शिक्षकों द्वारा संक्रांति होना तुलनात्मक रूप से अधिक सुकर होगा |

दूसरे प्रकार के संगठन शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न घटकों के हितों की रक्षा हेतु काम करते हैं | विद्यार्थियों के हितों के लिए विद्यार्थी संगठन जैसे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षकों के हितों के लिए विभिन्न राज्यों में गठित शिक्षक संघ तथा कई राज्यों में निजी संस्थाचालकों के संगठन भी हैं | इस प्रकार के शैक्षिक संगठन प्रमुखतः अपने सदस्यों के अधिकारों, आर्थिक हितों तथा समस्याओं के समाधान हेतु आन्दोलन शासन से चर्चा अथवा न्यायालयीन दावों के माध्यम से कार्य करते हैं | इन संगठनों का मूल स्वभाव सदस्यों की स्वार्थपूर्ति होने के कारण इनमें जुडनेवालों के मन में भी निजी हितों की वरीयता अधिक होती हैं | इसका सकारात्मक परिणाम यह है कि इन संगठनों की सदस्य संख्या बहुत अधिक होती है | यह संख्याबल इनकी प्राथमिक शक्ति है | धर्मानुसारी शिक्षा के तत्वों का प्रचार कर अनुकूल वातावरण निर्मिती में ये संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं | इनके माध्यम से शिक्षा में जुड़े हुए एक बड़े वर्ग तक वैचारिक सन्देश पहुंचाना संभव हो सकता है | यद्यपि इसका सैद्धांतिक गुणांकन नहीं होगा फिर भी धर्माचरण में रत शिक्षकों को नैतिक समर्थन देनेवाले अनुकूल मन के समर्थकों का वर्ग तैयार किया जा सकता है | ये लोग स्वाध्याय और संक्रांति के क्रियान्वयन में पूरी तरह से सहभागी भले ही न हो उसके लिए पोषक उर्वराभूमि का निर्माण निश्चित रूप से कर सकते हैं | संक्रांति के द्वितीय चरण धर्माधिष्ठित शिक्षा के सर्वव्यापीकरण में लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत संख्या का भी बड़ा महत्त्व है | इस चरण में इन शैक्षिक संगठनों की भूमिका सबसे प्रभावी होगी | इन संगठनों में धर्मानुसारी शिक्षा के विचार का बीजारोपण करने हेतु कुछ वैचारिक कार्यक्रमों की योजना करना आवश्यक होगा | ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से कार्यकर्ताओं को धर्मसंकल्पना का परिचय दिया जा सकेगा | संख्या बड़ी होने के कारण पूर्ण वैचारिक स्पष्टता की अपेक्षा तो नहीं कर सकते, केवल अधिकारों के साथ कर्तव्यों का विचार करने का संस्कार भी प्रेरित किया जा सके तो प्रारंभ के लिए पर्याप्त होगा | अधिकारों के लिए लड़ने के साथ ही कर्तव्यपालन में ही हमारा अधिक स्थायी हित है यह बात समझना धर्मविचार का शुभारम्भ है |

तीसरे प्रकार के शैक्षिक संगठन वैचारिक कार्य करनेवाले संगठन हैं | इनका मूल काम ही शिक्षा के भारतीय प्रतिमान पर अनुसंधान कर उसे युगानुकूल रूप में प्रस्थापित करने का नियोजन करना है | पुनरुत्थान विद्यापीठ, भारतीय शिक्षण मंडल, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास आदि संगठन इस श्रेणी में आते हैं | धर्माधिष्ठित शिक्षा को ही विभिन्न नामाभिधानों से प्रकट करते हुए उसकी संस्थापना हेतु ये वैचारिक संगठन कार्य कर रहे हैं | शिक्षा व्यवस्था में धर्मसंस्थापना हेतु संक्रांति करने में इन संगठनों की योजक भूमिका अपेक्षित है | संक्रांति के लिए आवश्यक विभिन्न घटकों को एक सूत्र में गूंथने का परोक्ष कार्य इन संगठनों को करना होगा | संक्रांति के तात्विक अधिष्ठान की सुस्पष्टता की जिम्मेवारी भी इन्ही संगठनों की बनती है | अनादि काल से भारत में जीवंत धर्मसंकल्पना को मूल रूप में समझकर उसका युगानुकुल स्पष्टिकरण समाज में प्रदान करना धर्मानुसारी शिक्षा के लिए प्रथम आवश्यकता है | धर्म तो साक्षात्कार का विषय है | अतः इन संगठनों के कार्यकर्ताओं को साधक बनना होगा | उपरी प्रवचन, उद्घोषणाएं, प्रस्ताव आदि तो संगठनात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप चलते रहेंगे किंतु इन संगठनों का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि गहन गंभीर साधना को तत्पर कितने कार्यकर्ताओं का निर्माण इन संगठनों की प्रेरणा से हुआ | संक्रांति के अन्य सभी चरणों की शुद्धि, पावित्र्य, प्रभाव, साफल्य तथा सार्थकता इस साधना पर निर्भर करती है | अतः इन संगठनों से जुड़े सभी कार्यकर्ताओं का शास्त्राध्ययन तथा स्वाध्याय कठोर नियमितता के साथ होना अपेक्षित है | समय-समय पर सामूहिक विमर्श, प्रत्यक्ष प्रयोग, उन प्रयोगों से प्राप्त अनुभवों पर पुनः सर्वांगीण संविमर्श तथा आपसी समन्वय यह इस साधना की कार्यपद्धति बनती है | इस चर्चा स्वाध्याय के साथ ही इन विचारों का युगानुकुल शब्दावलि में संहिता लेखन भी अनिवार्य है | तैतरीय उपनिषद् के शिक्षावल्ली अनुवाक् में गुरु अपने दीक्षांत आदेश में स्पष्ट निर्देश दे रहा है – स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां मा प्रमदितव्यं – स्वाध्याय और प्रवचन में कभी आलस न करना | यहाँ वर्तमान युग के अनुरूप प्रवचन के अर्थ को विस्तारित करके समझना होगा | वैसे भी प्रवचन का अर्थ है पूर्ण गंभीरता से प्रकट करना – प्रकर्षेण वाच्यति इति प्रवचनं | वर्तमान स्थिति में वैखरी वाणी का अक्षररूप अर्थात लिखित साहित्य अधिक प्रामाणिक माना जाता है | अतः प्रवचन के अर्थ में गंभीर लेखन को सम्मिलित करना पड़ेगा | वैचारिक संगठनों के कार्यकर्ताओं को प्रयत्नपूर्वक नित्यलेखन का अभ्यास करना होगा | प्रतिदिन नियमपूर्वक कुछ पृष्ठ लिखने की आदत बन जाये तो शनैः शनैः लेखनी में स्पष्टता व लेखन में गांभीर्य आ जायेगा |

धर्म के सुस्पष्ट साक्षात्कार के साथ ही वैचारिक संगठनों के कार्यकर्ताओं का यह भी दायित्व बनता है कि उसका युगानुकुल प्रयोग करे | अतः शिक्षकों व पहले दो प्रकार के संगठनों के साथ मिलकर शिक्षा में धर्मप्राण नवोन्मेष करने का शुभ व्रत भी इन संगठनों का है | ऐसे प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्षों को संहिताबद्ध कर अनेक स्थानों पर दोहराने योग्य प्रतिमान का निर्माण करना होगा | यह प्रतिमान सभी स्तरों पर स्वाध्याय, प्रयोग व धर्माचरण का आधार बनेगा | इसी प्रतिमान से धर्मानुसारी शिक्षा को स्थापित करने, धर्मप्राण, स्वाध्यायी आचार्यों की संक्रांति संभव होगी |

अप्रैल 4, 2016 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , | 11 टिप्पणियाँ

   

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