उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

सूर्यनमस्कार का विज्ञान


जो सूर्यनमस्कार का प्रतिदिन अभ्यास करते हैं, उनको आयु, वीर्य, बल, प्रज्ञा तथा तेज की प्राप्ति होती है  और सामूहिक सूर्यनमस्कार के अभ्यास से समाज में राष्ट्रीय चारित्र्य का निर्माण होता है। 
 
snm‘भारत’ शब्द का ही अर्थ है ‘प्रकाश की उपासना करनेवाला।’ भा अर्थात ‘प्रकाश’, रत अर्थात ‘में व्यस्त’। प्रकाश की उपासना भारतीय संस्कृति का वैज्ञानिक आधार है। हमारी सारी परम्पराएं वैज्ञानिक हैं। उसका आधार प्राण विज्ञान है। मध्यकाल के संघर्ष के कारण इस प्राणविद्या का ज्ञान समाज में नहीं रहा। किन्तु हमें पता नहीं है इसका अर्थ यह नहीं कि वह विज्ञान ही लुप्त हो गया। चाहे आयुर्वेद हो, ज्योतिष विद्या अथवा वास्तुशास्त्र सबका मूल आधार प्राणविद्या ही है। प्राण के प्रवाह को ही देखकर वास्तुशास्त्र की दिशा तय होती है। प्राण प्रवाह की गणना ही ज्योतिष के मुहूर्तों का भाव तय करती है। जगत में प्राण का मूल स्रोत सूर्य है। इस कारण सूर्य की उपासना का हिन्दू जीवन में बड़ा महत्व है। सूर्य की स्तुति, उसका पूजन और जल द्वारा उसको अध्र्य प्रदान करना यह उपासना के सामान्य आधार रहे हैं। जनजातियों में भी सूर्य की उपासना का महत्व है। सूर्य की उपासना की सबसे वैज्ञानिक विधि योगविद्या द्वारा विकसित की गई ‘सूर्यनमस्कार’ है। सूर्यनमस्कार सूर्य की उपासना का सम्पूर्ण माध्यम है। साधरणत: पूजा में कुछ उपचार एवं भाव ही प्रयोग में लाए जाते हैं, सूर्यनमस्कार पूर्ण व्यक्तित्व से ही सूर्य की पूजा है। शरीर, मन, बुद्धि को लेकर प्राणशक्ति के द्वारा सूर्य के यजन की विधि है- ‘सूर्यनमस्कार’! विभिन्न आसनों के माध्यम से शरीर का पूर्ण संचालन करते हुए साष्टांग प्रणिपात किया जाता है। साथ ही मन से सूर्य का ध्यान व बुद्धि में वही प्रखर विचार। सूर्यनमस्कार की चक्रीय विधि है ही ऐसी की उस समय कोई और विचार मन में आ ही नहीं सकता। पूरा व्यक्तित्व सूर्य की ऊर्जा पर एकत्र हो जाता है। प्राण का प्रवाह पूरे शरीर में सुव्यवस्थित प्रवाहित होता है। सारी नाड़ियों में ही चालना आती है। अधिकतर विकार प्राण के कुप्रवाह, अप्रवाह या अतिप्रवाह के कारण होते हैं। आयुर्वेद इसे कुजीर्ण, अजीर्ण व अतिजीर्ण की संज्ञा देता है। सूर्यनमस्कार से प्राण का सम्यक व समुचित प्रवहण हो जाता है। इस सुजीर्ण के चलते सकारात्मक स्वास्थ्य की प्राप्ति हो जाती है। अत: सूर्यनमस्कार के नियमित अभ्यास से सभी रोगों से रक्षा हो जाती है। जीवन बलपूर्वक, प्रसन्नता से दीर्घकाल तक सार्थक चल सकता है। 
सूर्यनमस्कार व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का सहज सुलभ साधन है। अत्यंत कम समय में शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, बौद्धिक व आध्यात्मिक विकास का इससे ब‹ढकर कोई अन्य एकात्म साधन नहीं है। शरीर का स्थायी सौष्ठव सूर्यनमस्कार से ही मिलता है। अन्य व्यायाम तात्कालिक परिणाम दे सकते हैं किन्तु स्थायी परिवर्तन का माध्यम योगिक सूर्यनमस्कार ही है। श्वास पर ध्यान देकर किए गए सूर्यनमस्कार से मन को एकाग्र करने की क्षमता का अद्भुत विकास होता है। विद्यार्थियों को नियमित सूर्यनमस्कार का अभ्यास अनिवार्य रूप से करना चाहिए। इससे अध्ययन के लिए अत्यावश्यक एकाग्रता के साथ ही स्मणरशक्ति का भी चमत्कारिक विकास होता है। ऊर्जा के संतुलन के कारण भावनाएं भी संतुलित हो जाती हैं। 
सूर्यनमस्कार में प्रयुक्त मन्त्रों का भी अपना महत्व है। मन्त्र बहुआयामी प्रभाव डालते हैं। उच्च स्वर में स्पष्ट मन्त्रोच्चारण से उत्पन्न ध्वनि के shiv samarthस्पन्दन शरीर, मन, बुद्धि तीनों को ही शुद्ध करते हैं। मन्त्रों में सूर्य के जो 12 नाम लिए जाते हैं, उनमें से प्रत्येक नाम का विशिष्ट परिणाम है। व्यक्तित्व के आवश्यक अनेक गुणों का विकास इन मन्त्रों के उच्चारण से होता है। सूर्य का एक नाम सविता है। सविता बुद्धि के देवता है। सूर्यनमस्कार से भ्रम, वितर्क व विपर्याय से परे सत्य को देखने की प्रखर बुद्धि प्राप्त होती है। नियमित सूर्यनमस्कार करनेवाला छात्र संकल्पना को सुस्पष्टता से समझ लेता है। अत: उसका अध्ययन केवल परीक्षा के लिए संग्रहित जानकारी तक सीमित न होकर जीवनोपयोगी ज्ञान का साधन बन जाता है। कम समय में सदा के लिए पढ़ाई हो जाती है। बार-बार रटने की मजबुरी में समय व्यर्थ नहीं गवांना पड़ता। 
वैसे तो भारत में अनादिकाल से ही सूर्यनमस्कार प्रचलित रहे हैं। किन्तु अनेक विषयों की तरह ही संघर्षकाल में इसका समाज को विस्मरण हो गया। आधुनिक काल  में सूर्यनमस्कार को समाज में प्रचलित करने का श्रेय छत्रपति शिवाजी के गुरु समर्थ रामदासजी को जाता है। उन्होंने बलोपासना का सुगठित तन्त्र विकसित किया। गांव-गांव में मारुति (हनुमान) के मंदिर स्थापित किए। उनके सम्मुख युवाओं को एकत्रित कर सामूहिक सूर्यनमस्कार का अनुष्ठान किया। इन वीर सूर्योपासकों में से ही शिवाजी की अजेय सेना का निर्माण हुआ। हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना, मुगल शासन का अंत तथा पूरे देश में मराठों के शासन के चमत्कार का मूल समर्थ रामदास द्वारा प्रचलित सूर्यनमस्कार की संगठित ऊर्जा में ही था। 
6 वर्ष की आयु से ऊपर के सभी स्त्री-पुरुष सूर्यनमस्कार का नियमित अभ्यास कर सकते हैं। वर्तमान में भारत में सूर्यनमस्कार की 10-12 पद्धतियां प्रचलित हैं। आसनों के क्रम अंकों में कुछ थोड़े-थोड़े भेद से आचार्यों ने अपनी-अपनी पद्धतियों का विकास किया है। समर्थ रामदास द्वारा प्रचलित 10 अंकों की विधि सर्वाधिक अभ्यास में है। तोलासन से सीधे साष्टांग प्रणिपात में जाने के कारण इसमें बजरंगी दण्ड लगता है। यह बलवद्र्धन के लिए सर्वोत्तम है। बाल, किशोर व युवाओं को इस विधि से ही अधिक लाभ प्राप्त होता है। योगाभ्यासी मण्डल के जनार्दन स्वामी द्वारा प्रचारित 12 अंकों की विधि में दो बार शशांकासन किया जाता है, साष्टांग प्रणिपात से पूर्व तथा पर्वतासन के बाद। अधिक आयु के लोगों के लिए यह सुकर होने के साथ ही नाभी में प्राण को संग्रहित करने में भी सहायक है। 
वैसे तो 12 मंत्रों के साथ 12 चक्र सूर्यनमस्कार अपनेआप में पूर्ण है। सूर्य की इस उपासना को ईश्वर प्राप्ति का अधिष्ठान प्रदान करने के लिए समर्थ रामदास ने 13 मन्त्र नारायण के प्रति जोड़ दिया- ‘श्री सवितृ सूर्यनारायणाय नम:’ यह पूरी प्रक्रिया को पूजा बना देता है। इसी भाव से सूर्यनमस्कार का मन्त्र आता है – 
ध्येय: सदा सवितृ-मण्डल-मध्यवर्ती
नारायण: सरसिजासन-सन्निविष्ट:।
केयूरवान् मकर-कुण्डलवान् किरीटि
हारी हिरण्यमय वपुर्धृत शंख-चक्र:।।
सूर्य जिनके मध्य स्थान में है ऐसे स्वर्णीम कांतिवाले परमेश्वर नारायण की यह स्तुति सूर्यनमस्कार के आरम्भ में की जाती है। हमारे सूर्यनमस्कार उस परमशक्ति तक पहुंचे यह भाव है। 
प्रतिदिन नियम से प्रात: अथवा सायं सूर्यनमस्कार करने चाहिए। 13 चक्रों से प्रारम्भ कर सकते हैं किन्तु बाल, युवा, किशोर और युवा वर्ग के भाई-बहनों को धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ानी चाहिए। समर्थ रामदास स्वयं प्रतिदिन 1200 सूर्यनमस्कार करते थे। वर्तमान युग में भी यह सम्भव है। कन्याकुमारी में ली गई प्रतियोगिता में दो कार्यकर्ताओं ने 3 घण्टे में 1201 सूर्यनमस्कार किए थे। इतने तक ना भी जाए तब भी 108 सूर्यनमस्कार तो हर युवा को करने ही चाहिए। इसमें 25 से 30 मिनट का समय लगता है और पूर्ण व्यक्तित्व का व्यायाम हो जाता है। अजेय आत्मविश्वास, सुशीलवान, विनम्रता, प्रगल्भ मेधा, संवेदनशील हृदय इन सभी गुणों का एक साथ विकास होता है। 
सूर्यनमस्कार के सामूहिक अभ्यास का भी बड़ा महत्व है। अकेले किए सूर्यनमस्कार से तो अपने प्रयत्न का ही फल मिलेगा। सामूहिक अभ्यास से प्रत्येक को सभी की साधना का सुफल प्राप्त होगा। अत: जितने साधक साथ होंगे उतने गुणा सबको पुण्य प्राप्ति होगी। वर्तमान राष्ट्रीय परिस्थितियों का निदान भी सामूहिक अभ्यास में ही है। आज माँ भारती को केवल व्यक्तित्व ही नहीं अपितु राष्ट्रीय चारित्र्य के विकास की आवश्यकता है। सामूहिक सूर्यनमस्कार के अभ्यास से इस संगठित राष्ट्रीय चारित्र्य का विकास होगा। 
सूर्यनमस्कार के अंत में फलश्रुति का पाठ करते हैं- 
आदित्यस्य नमस्कारान् य कुर्वन्ति दिने दिने।
आयुप्र्रज्ञा बलं वीर्यं, तेजस् तेषां च जायते।।
जो सूर्यनमस्कार का प्रतिदिन अभ्यास करते हैं, उनको आयु, वीर्य, बल, प्रज्ञा तथा तेज की प्राप्ति होती है। आइए, हम सामूहिक अभ्यास से मां भारती को यह सब अर्पित करें ताकि वह विश्वगुरु पद की नियति को प्राप्त कर सके।

फ़रवरी 9, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , | 6 टिप्पणियाँ

राष्ट्रीय शिक्षा के प्रवर्तक विश्वात्मा विवेकानन्द


SVquote Bharat utho    स्वामी विवेकानन्द विश्वात्मा थे। उन्होंने सृष्टि की एकात्मता का अनुभव किया था। अमेरिका में सहस्त्रद्विपोद्यान (Thousand Island Park) में अपने अंतरंग शिष्यों कें प्रशिक्षण के मध्य एक दिन स्वामींजी अपने कक्ष मे एक कोने से दुसरे तक चक्कर लगा रहे थे। उनके शिष्यों ने लिखा है कि पिंजडे में बंद क्रुध्द सिंह के समान स्वामीजी की छटपटाहट थी। किसी की बीच में बोलने की हिम्मत नहीं थी। चलते चलते अचानक स्वामीजी रूके और अपने शिष्य कप्तान सेवियर के कंधे झकझोरते हुए बोले ‘‘ये विश्व समझता क्यों नहीं कि वह ईश्वर से व्याप्त है?’’ विश्व को उसके दिव्यत्व का परिचय कराना उनकी व्याकूलता का मर्म था। यही इनका जीवन ध्येय था।
भारत मे लौटने के बाद उन्होंने पूरे भारत के दिग्विजयी प्रवास में यही घोषणा की। विश्व मानवता को अपने दिव्यत्व का परिचय कराने के लिए इस राष्ट्र का तपःपूत अविष्कार हुआ है। जगत् का मार्गदर्शन ही भारत का जीवनोद्देश्य है। यही स्वामी विवेकानन्द की विश्वविजय की संकल्पना थी। उन्होंने कहा था, ‘उठो भारत! अपनी आध्यात्मिक शक्ति से विश्व पर विजय प्राप्त करो।’ भारत विश्व को राजनैतिक अथवा सामरिक दासता से जीतना नहीं चाहता। हमें विश्व का राज्य नही चाहिए। ना ही हम व्यापार से विश्व बाजार पर कब्जा करना चाहते है। भारत की आंतरिक अभिलाषा है जगद्गुरू बनना। यही हमारी राष्ट्रीय नियति है। स्वामीजी की भारतभक्ति मानवकल्याण का ही मार्ग थी।
इस राष्ट्रीय उद्देश्य के अनुरूप ही राष्ट्रीय शिक्षा का स्वरूप होना चाहिए। स्वामी विवेकानन्द ने ऐसे समर्थ, समृध्द व समरस भारत के निर्माण हेतु आवश्यक शिक्षा पध्दतिtatasv का प्रतिपादन किया। विज्ञान की शिक्षा को उन्होंने अत्यंत आवश्यक माना। शिकागो जाते समय मुम्बई से जापान तक जमशेदजी टाटा स्वामीजी के साथ थे। स्वामीजी ने टाटा को दो ऐतिहासिक प्रेरणायें दी। एक तो भारत में फौलाद उद्योग को पुनर्जीवित करना। 18 वी शताब्दी तक भारत की लौह भट्टियाँ विश्व का सर्वोत्तम फौलाद निर्माण करती थी। स्वामीजी ने स्वप्न देखा कि भारत पुनः लौह उद्योग का अग्रणी बन जाए। जमशेदजी टाटा को दूसरी प्रेरणा दी विज्ञान में अनुसंधान की। ‘टाटा भौतिक अनुसंधान संस्थान’ बंगलुरू की स्थापना के बाद टाटा ने स्वामीजी को पत्र लिखा जिसमें इस चर्चा का उल्लेख है। टाटा की इच्छा थी कि स्वामीजी इस संस्थान के निदेशक बने। आज भी संस्थान के स्वागत कक्ष में यह पत्र बडे अक्षरों में अंकित है।
बाद में रामकृष्ण मठ व मिशन की स्थापना के समय स्वामीजी ने सन्यासियो से कहा, ‘जाओं! गांवो को शिक्षित करों! इन्हें सच्चे धर्म की शिक्षा दो। पाखंड़ और आडम्बर से मुक्त करों। एक हाथ में पृथ्वी का गोल व दूसरे में टार्च लेकर इन्हें शिक्षा दो कि ग्रहण कैसे होता है।’
स्वामीजी चरित्र-निर्माण करनेवाली सर्वांगीण शिक्षा की बात करते थे। उनकी शिक्षा की परिभाषा थी, ‘मानव के अन्तर्निहित पूर्णत्व की अभिव्यक्ति’। बाहरी सूचनाओं को मस्तिष्क में ठूसने को वे शिक्षा नहीं मानते थे। अन्दर के ज्ञान को प्रस्फुटित करनेवाली अनुभूति मूलक प्रायोगिक शिक्षण पध्दति का उन्होंने प्रतिपादन किया। आज अनेक शैक्षिक प्रयोग इस विधि को आधुनिकतम मानकर अपना रहे है ।
स्वामीजीने शिक्षा के लोकव्यापीकरण की कल्पना की भी। उन्होंने भारत निर्माण के लिए जनसामान्य को शिक्षित करने पर बल दिया। सामान्य व्यक्ति की आर्थिक वास्तविकताओ का भान इस सन्यासी को था। दो समय की रोटी की चिंता करनेवाले श्रमिक, किसान के लिए विद्यालय तो अकल्पनीय अपव्यय था। इस बात को समझकर स्वामीजी ने कहा, ‘प्यासा कुए के पास न आ सके तो कुए को प्यासे के पास ले जाओ। शिक्षा को श्रमिक के कार्यस्थल किसान के खेत में ही उपलब्ध करा दो। गाँव की चैपाल को विद्यादान का केन्द्र बना दो।’
नारी शिक्षा की अनिवार्यता को स्वामीजी ने भलीभाँति जाना था। माँ के शिक्षित होने का अर्थ है परिवार का सुशिक्षित होना। मार्गारेट नोबल को उन्होंने भारत में स्त्रीशिक्षा की नीव रखने के लिए प्रेरित किया। पूर्ण प्रशिक्षण के बाद समर्पित शिष्या को नाम दिया भगिनी निवेदिता। भगिनी निवेदिता ने सारदा बालिका विद्यालय की स्थापना की। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा के आंदोलन का सूत्रपात किया। आगे चलकर महर्षि अरविन्द, टिळक, आगरकर व महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय शिक्षा को स्वतंत्रता आंदोलन का आधार बनाया।
स्वतंत्रता के बाद हमने शिक्षा के प्रसार पर विशेष ध्यान दिया। कुछ जनजातीय क्षेत्रों को छोड दिया जाए तो आज देश के कोने कोने में शिक्षा की व्यवस्था उपलब्ध है। पूर्ण सफलता में निश्चित ही अभी और परिश्रम आवश्यक है, किन्तु इससे अधिक अनविार्य है शिक्षा में भारतीयता की। भारत के राष्ट्रीय लक्ष्य के अनुरूप भारतहित की देशज शिक्षा पध्दति के निर्माण का चिंतन, प्रयोग व प्रसार करना स्वामी विवेकानन्द की 150 वी जयंतिपर उन्हें समुचित श्रध्दांजली होगी।

जनवरी 12, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

   

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