उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

सफलता की चाह नहीं! चिरविजय का पराक्रम !!


कर्मयोग 10:
‘‘हर कोई सफल होना चाहता है। पर क्या यह सम्भव है? आपकी गीता क्या कहती है?’’ युवाओं की जिज्ञासायें विद्रोह के आवरण में ही व्यक्त होती है। पर भाईजी को तो इस प्रकार की आपत्तियों को झेलने का पुराना अभ्यास है। उन्हें पता था युवक की बात अभी पूरी नहीं हुई है अतः वे केवल हँस दिये। प्रश्नकर्ता ने कहा, ‘‘मुझे पता है आप कहेंगे सच्ची सफलता अलग होती है। सफलता का अर्थ क्या है? आदि आदि। पर जब आप कहते है कि गीता जीवन का मार्गदर्शन करती है तो फिर इस बारे में भी तो कुछ होगा ना उसमें?’’

भाईजी ने कहा गीता में सफलता के बारे में कुछ कैसे हो सकता है? गीता तो कहती है आपका कर्म पर तो पूरा अधिकार है किंतु फल पर कोई अधिकार ही नहीं है। जब फल पर अधिकार ही नहीं है तो फिर स-फल अर्थात फल पाने वाले होने का क्या अर्थ हुआ? गीता तो कहती है – न मे कर्मफले स्पृहा।। कर्मफल के प्रति कोई लिप्सा नहीं है। हमारी पारम्पारिक व्रत कथाओं में इससे अधिक गहरे पद का प्रयोग होता है। सुफल – अच्छा फल। हमारे व्रत का परिणाम अच्छे फल को देनेवाला हो ऐसी प्रार्थना है। सु-फल कौनसा होगा यह प्रत्येक की स्थिति पर निर्भर करेगा। देवताओं की स्तुति में किये जानेवाले स्तोत्रों के अंत में फलश्रृति आती है जिसमे अक्सर यह प्रार्थना होती है – विद्यार्थि लभते विद्या, धनार्थि लभते धनम्। पुत्रार्थि लभते पुत्रान् मोक्षार्थि लभते गतिम्।। जिसको जो चाह हो उसको वो मिले। संत ज्ञानेश्वर ने तो इन्हीं शब्दों में पसायदान, प्रसाद मांगा है। जो जे वांछिल तो ते लाहो। प्राणिजात। ये तो बड़ी ही बढ़िया बात हुई। जो चाहो वो मिल जाये। गीता से तो ये ही अच्छा है। पर ज्ञानेश्वरी तो गीता की ही मराठी में व्याख्या है फिर इसके अंत में मांगे पसायदान में गीता के विपरित बात कैसे हो सकती है?  यह गीता के अनुसार ही है। गीता में भगवान कह रहे है – ये यथा माम् प्रपद्यन्ते तांस तथैव भजाम्यहम्। मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वशः।। गी 4.11।। जो जैसे भाव से पूजा करेगा वैसा ही ईश्वर को प्राप्त करेगा।

यह भाव कैसे आता है? हमारी मर्जी अथवा चाह भी हमारे भाव पर ही निर्भर करेगी। हम इसी के अनुरूप कार्य करेंगे। और उसी के अनुसार फल को प्राप्त करेंगे। हमारा कर्म ही हमारी पूजा है अतः उसका फल उस पूजा का प्रसाद। मन अपनी क्षमता, स्तर व योग्यता के अनुसार ही कामना करेगा। इन तीनों के सम्मिलित प्रभाव को हम हमारी स्थिति कह सकते है। गीता में इसके लिये बड़ा ही मार्मिक शब्द प्रयोग हुआ है -उपपत्ति। क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ न एतद् त्वयि उपपद्यते। गी 2.3।। कापुरूषता को मत प्राप्त हो अर्जुन। यह तेरी उपपत्ति नहीं है। सरल भाषा में तुम्हारे स्तर के व्यक्ति को यह शोभा नहीं देता। हमारी उपपत्ति के अनुसार किया कार्य ही हमें शोभा देता है। उपपत्ति का अर्थ है अंतिम लक्ष्य के सन्दर्भ में हमारी स्थिति। कहाँ तक हम पहुँचे हैं? किस स्थान पर बैठने की हमारी योग्यता है? इसी के अनुसार हमारा मन कामना करेगा। कर्म भी इस प्रकृति के अनुसार होंगे और फलकामना भी इसी की सीमा में होगी। कई बार कर्म करते समय हम अपनी उपपत्ति को भूल जाते है फिर भी उसी के अनुरूप फल की कामना करने लगते है। तब कर्म और परिणाम की अपेक्षा में विभेद हो जाता है। कर्म पर ध्यान दिये बिना केवल परिणाम की ईच्छा करना सामान्यतः इसे ही सफलता की चाह माना जाता है। ये चाह हमेशा मर्यादित, सीमित ही होगी। अतः इसके पूर्ण हो जाने से क्षणिक आवेशयुक्त सुख का अनुभव भले ही हो, संतोष नहीं मिलेगा। क्योंकि हमे अपनी प्रकृति की सीमा से परे जोने में ही संतोष मिलता है। कर्म प्रकृति के वशी भूत होकर चलता है तो कामनापूर्ति भी सुख नहीं देती। अंग्रजी शब्द Success का भी शाब्दिक अर्थ है -‘के पार जाना’। अपने लक्ष्य को पार करना अथवा अपनी क्षमता की सीमा को पार पाना या फिर बाधाओं पर पार पाना इसे ही वास्तव में Success माना गया है। तो हिन्दी में इसका सही अनुवाद होगा विजय। प्रकृति पर विजय। अपनी स्वाभविक सीमा पर विजय। प्रकृति पर विजय उसके विपरित जाकर नहीं हो सकती। अपनी प्रकृति के अनुरूप कर्म करते हुए ही उसके पार जाया जा सकता है।

प्रकृति के दो मोटे मोटे वर्ग किये गये है- प्रवृत्तिं च निवृत्तिंच। प्रवृत्ति अर्थात कामनाओं की ओर मन की गति। निवृत्ति अर्थात कामनाओं से वैराग्य की ओर मन की स्वभावतः गति। हमे अपनी स्थिति इन दो में से किस ओर अधिक है यह देखना चाहिये ताकि इसके अनुरूप हम अपने लिये सही कर्म मार्ग चुन सकें। यदि हमारा मन अधिक बहिर्मुख है। बाहरी बातों में अधिक रमता है। ईच्छाओं में इन्द्रियों के सुख के लिये अधिक लालायित होता है तो मानना होगा कि हमारे लिये प्रवृत्ति मार्ग ठीक है। यदि किसी उदात्त ध्येय के लिये काम करते हुए इन सुखों का त्याग करने में आनन्द का अनुभव होता है। स्वयं को भूला देने वाले कार्य में मन अधिक रमता है। स्वयं से अधिक औरों के हित में विचार करने का मन है तो फिर हम कह सकते है कि हमारी गति वैराग्य की ओर है और हमारे लिये निवृत्ति मार्ग श्रेयस्कर है। ‘श्रेय’ इस शब्द का गीता में बार बार प्रयोग हुआ है। कामना, वासना या इच्छा से कर्म का निर्धारण नहीं होगा। हमारी प्रकृति के अनुरूप जो हमारे लिये श्रेय की ओर ले जानेवाला है वही हमारा कर्तव्य है।
गीता के प्रथम अध्याय में अपने मन के सम्भ्रम का वर्णन करते समय भी अर्जुन प्रारम्भ इसी से करता है।

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। न च श्रेयोनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे।। गी 1.31।।  हे केशव सारे लक्षण मुझे अपने विपरित दिखाई पड़ते है। इस युद्ध में अपने स्वजनों को मारने में मै कोई श्रेय नहीं देखता हूँ। आगे पूरा वर्णन इसी क्रम में है कि किस प्रकार यह युद्ध धर्म का नाश करेगा अतः श्रेयस्कर – श्रेय की ओर ले जाने वाला नहीं है। इसलिये मै युद्ध नहीं करूंगा। श्रेय ही अर्जुन का तर्क है। फिर भगवान द्वारा उपपत्ति का भान करा दिये जाने पर अपने भय व भ्रम का साक्षात्कार हो जाने पर जब अर्जुन शरणागति से शिष्यत्व ग्रहण करता हे तब फिर श्रेय का उल्लेख है। कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः। यत् श्रेयः स्यात् निश्चितं ब्रुहि तन्मे शिष्यस्तेSहम शाधि माम् त्वां प्रपन्नं।।गी 2.7।।  भय के कारण मेरा स्वभाव कृपणता अर्थात संकुचितता से ढ़क गया है और इसके कारण मै अपने धर्म अर्थात कर्तव्य के प्रति भ्रमित हो गया हूँ। इसलिये मेरे लिये क्या श्रेयस्कर है वह निश्चित कर आप मुझे बताओ। मै आपका शिष्य हूँ और आपकी शरण आया हूँ। मेरी रक्षा करें। भगवान भी जीवन के यथार्थ का ज्ञान बताते है और फिर कहते है – धर्म्याद्धि युद्धाद् श्रेयो अन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते।। गी 2.31।।  धर्म की स्थापना के उद्देश्य से किये गये युद्ध से क्षत्रिय के लिये और अधिक श्रेयस्कर कुछ भी नहीं है। आगे के 6 श्लोंकों में स्वधर्म से पलायन के दुष्परिणामों का वर्णन करने के बाद अपने श्रेय के लिये युद्ध का आदेश देते है। तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय।। गी 2.37।। आगे भी जहाँ जहाँ शंका आई वहाँ वहाँ अर्जुन ने अपने लिये श्रेयस्कर क्या है यही पूछा है। तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोSहमाप्नुयाम्।। गी 3.2।।  अतः एक तय करके बता दो कि मेरे लिये क्या श्रेयस्कर होगा – कर्म का मार्ग या ज्ञान का मार्ग?

गीता श्रेय का मार्ग बताती है। श्रेय अर्थात जो श्री की ओर ले जाये। श्री को प्राप्त करने का मार्ग। श्री के कई अर्थ लगाये जाते है। सबसे प्रचलित अर्थ है – लक्ष्मी। इसी से श्रीमन्त अर्थात अमीर जैसे शब्द भी प्रचलित हुए। श्री का अर्थ केवल धन से लेना अधुरा ही होगा। श्री अर्थात परिपूर्णता के साथ समृद्धि। समृद्ध का अर्थ है जिसके पास सबकुछ है। भौतिक साधनसम्पन्नता के साथ ही आत्मिक सामथ्र्य भी। जो स्वावलम्बी होने के साथ ही औरों को भी आवश्यकतानुसार सम्बल देने की क्षमता व नियत दोनों का होना वास्तविक श्रीमन्ती है।

‘श्री’ का एक और अर्थ है – विद्या। किसी विषय का पूर्ण ज्ञान, स्वामीत्व होना विद्या है। केवल सैद्धान्तिक जानकारी ही नही अपितु पूर्ण व्यावहारिक ज्ञान भी। विद्वान अर्थात जिसके पास विद्या है। तो विद्वान होने का अर्थ केवल किसी विषय की व्याख्या करने की क्षमता से नहीं है अपितु आवश्यकतानुसार उसके प्रयोग का भी पूर्ण ज्ञान आवश्यक है। वाहनशास्त्र (Automobile) का विद्वान अभियन्ता (Engineer) यदि अपना स्वयं का वाहन ठीक नहीं कर सकता हो तो वह कैसा विद्वान? उससे तो वह अनपढ़ यन्त्री (Mechanic) अच्छा जो रासायनिक व भौतिक विज्ञान के सुत्र तो नहीं जानता जिससे वाहन चलता है किन्तु बन्द पड़े वाहन की तृटी को पहचान कर उसको ठीक करने का कौशल तो उसके पास है। विद्या का अर्थ ज्ञान व कौशल दोनों का समन्वय है। अतः श्री से युक्त -श्रीयुत का अर्थ होगा जो ज्ञानी होने के साथ ही व्यावहारिक भी है। विद्या का एक और शास्त्रीय वर्गीकरण भी है। परा विद्या व अपरा विद्या। पराविद्या वह आध्यात्मिक ज्ञान व विज्ञान है जो ईश्वर से सम्बंधित है। अर्थात ईश्वरसाक्षात्कार का ज्ञान व कौशल। अपरा विद्या में अन्य सभी भौतिक जगत के विषयों का ज्ञान आता है। ‘श्री’ पद में परा व अपरा दोनों विद्याओं का समावेश होता है।

श्रेय अर्थात श्री की ओर ले जानेवाला यह कहते समय श्री का अर्थ और अधिक गहन व परिपूर्ण लिया गया है। इसमें उपरोक्त दोनों अर्थों के साथ ही और भी अधिक समृद्धि की बात अभिप्रेत है। प्रत्येक की उपपत्ति के अनुसार उसका स्वभाव होता है। इस स्वभाव के अनुरूप उसके जीवन का विशिष्ठ लक्ष्य होता है। इस लक्ष्य को पाने हेतु उसे सामर्थ्य, क्षमता व विद्या के साथ ही सम्यक व्यवहार भी करना होता है। यह श्री है जिसे पाने की ओर अग्रेसर होना श्रेय कहलायेगा। तो हमारे लिये वह श्रेयस्कर होगा जो हमें अपने स्वधर्म की ओर ले जाये। ऐसा कर्म जो हमारे स्वधर्म को साकार करने में सहायक हो वही हमारा कर्तव्य कहलायेगा। ऐसे कर्तव्य पथ पर सब अग्रेसर हो ऐसी अपेक्षा है इसिलिये नाम के साथ श्री लगाने की परम्परा है। श्रीराम अर्थात श्री से युक्त राम। हम एक दुसरे के नाम में आदरपूर्वक श्री का प्रयोग करते है तब वह योग्यता वाचक भले ही ना हो किन्तु लक्ष्य का स्मरण करानेवाला तो होता ही है कि हमे श्री की ओर ही जाना है। इस ध्येयमार्ग को ही कठोपनिषद् में ‘श्रेयो मार्ग’ कहा है। आवश्यक नहीं की श्रेयो मार्ग प्रेयो मार्ग भी हो। यमराज तो नचिकेता को दिये उपदेश में दोनों को एक दूसरे के विपरीत बताते है। उनके अनुसार प्रवृत्ति की ओर जानेवाला इन्द्रिय सुख का मार्ग प्रेयो मार्ग है और निवृत्ति की ओर ले जानेवाला श्रेयो मार्ग जिसके बारे में अन्त में वे कहते है कि यह तलवार की धार पर चलने के समान कठीन मार्ग है। शुरस्य धारा निषिदा दुरत्यया। यमराज के उपदेश का विषय आत्मज्ञान होने के कारण ऐसा कहा होगा। किन्तु कर्मयोग में श्रेयगामी मार्ग सहज, स्वभावगत होने के कारण आनन्ददायी भी होता है। सुखकर होगा ही ऐसा नहीं किन्तु कल्याणकारी कष्ट भी तो आनन्द देता है। अपनी पूरी शक्ति के साथ दौड़ लगाकर स्वर्णपदक जीतनेवाला धावक पूरी थकान के बाद भी कितने आनन्द का अनुभव करता है। विजय प्राप्ति के लिये किया गया कष्ट भी आनन्ददायी होता है। यदि लक्ष्य का भान भूल जाये तब सुख-सुविधा से सम्पन्न जीवन भी उपर से चाहे जितना प्रिय लगे अर्थहीन होने के कारण उबाउ और थका देनेवाला ही होता है। जीवन में स्वभावानुसार सही कर्म चुना हो तब श्रेय मार्ग प्रियकर भी होता है। किन्तु यदि किसी समय संयम की शिथिलता के कारण श्रेय मार्ग पे्रय ना हो तब चुनाव अप्रिय होते हुए भी श्रेयका ही करना है। सामान्य सा उदाहरण मधुमेह के रोगी को मिठाई खाने की इच्छा का है। इसमें जो प्रिय है वो श्रेय नहीं है। अतः क्षणिक सुखकर होते हुये भी दीर्घतः दुखदायी है। सर्वदा सुख व आनन्ददायी तो श्रेयो मार्ग ही है।

श्री प्राप्त करने के लिये प्रयास ही विजय का प्रयास है। अपने जीवनध्येय को पहचान उसकी पूर्णता में स्वयं को पूरा झोंक देना चिरविजय का मार्ग है। जीवन संग्राम के छोटे छोटे संघर्षों पर विजय प्राप्त करने की आपाधापी में यदि हम जीवन के परमध्येय को भूल गये तो फिर सफल भले ही हो संतुष्ट नहीं होंगे। संतुष्टि तो चिरविजय में ही है। यह चिरविजय की कामना ही हमारे जीवन को गतिमान व ध्येयगामी बनाये रखती है। भारतीय संस्कृति प्रत्येक को उदात्त ध्येय की ओर ही प्रेरित करती है। जन्म जन्मांतर की अखण्डयात्रा में इस बार का जो पाड़ाव हमने पाया है वह हमारी उपपत्ति है। यहाँ तक पहुँचे है यह तो तय है। इसे ही प्रारब्ध भी कहते है। इसे नहीं बदल सकते पर चिंता की कोई बात नहीं यह हमारी सीमा थोड़े ही है। यदि अपनी उपपत्ति के अनुरूप श्रेयो मार्ग चुन लिया तो आगे बढ़ने की कोई सीमा नहीं है। शायर कहता है – सरे अक्स सितारों से आगे जहां और भी है। बुलन्दी परों की उड़ानों से आगे आसमां और भी है।
सफलता की चाह तो केवल सीमित परिणाम की नपुंसक अपेक्षा मात्र है। अपनी प्रकृति के अनुरूप कर्म करते समय अधिक और अधिक बड़े ध्येय को प्राप्त करने का पराक्रम करते रहना ही चिरविजय की कामना है।

जनवरी 19, 2012 Posted by | योग | , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

   

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