उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

परिवर्तन का मत


बहुप्रतिक्षित चुनाव परिणाम आ गये। कहीं भी कोई आश्चर्य नहीं रहा। 24 घण्टें कुछ ना कुछ परोसने की मजबुरी में समाचार माध्यम कुछ ना कुछ विश्लेषण करेंगे ही। संविधान की भावना व भाषा के विपरित पंथ व जाति की चर्चा तथाकथित विशेषज्ञ बड़ी निर्लज्जता से करते है। राजनेताओं को जनता में गुट बनाबनाकर उनके मत पाने है अतः वे पंथ, जाति आदि आधार पर घोषणायें कर प्रचार करते है यह तो समझा जा सकता है किन्तु समाचार वाहिनियों के सुत्रधारों, अंग्रेजी में तो इन्हें लंगर कहते है, तथा उनके साथ चर्चा करने के लिये एकत्रित ‘विशेषज्ञों’ की क्या अनिवार्यता हे जो वे इन विभाजनकारी तत्वों के आधार पर चुनाव का विश्लेषण करते है? उत्तर प्रदेश में स्पष्ट बहुमत पानेवाली स पा के युवा नेता अखिलेश यादव ने बड़ी प्रगल्भता के साथ पहली पत्रकार परिषद में जनता का आभार मानते हुए स्पष्ट किया कि ‘‘हमें जनता ने जाति, पंथ (भैयाजी ने तो धर्म ही कहा था) से उपर उठकर समर्थन दिया है।’’ पर तथाकथित विशेषज्ञ कहाँ मानने वाले? वे तो अभी तक रट लगा रहे है कि साम्प्रदायित मतों के ध्रुवीकरण के कारण ही उ प्र में स पा को विजय प्राप्त हुई। आशा है कि अखिलेश यादव अपने पिता के विपरित, साम्प्रदायिकता व आपराधिक बाहुबल के स्थान पर विकासोन्मुखी राजनीति करेंगे।

समाचार माध्यमों की रट ने काँग्रेस को भी अपनी हार के लिये कारण मिल गया। जिन वाहिनियों ने प्रतिदिन काँग्रेस के बाबा को अवास्तव महत्व दिया था वे काँग्रेस की करारी हार को नहीं पचा पा रहे थे। वे और काँग्रेस के अंतहीन नेता हार के लिये अपने युवराज के बचपने को छोड़ कर और सभी कारण ढ़ुंढ़ने में लगे है। इसमे फिर साम्प्रदायिक विलेषण से उनके लिये अच्छा अवसर मिल गया। सलमान खुर्शीद जिनकी पत्नि ना केवल चुनाव हारी अपितु तीसरे क्रमांक पर रही, बिना किसी लाग लपेट के कॅमेरा के सामने कह रहे थे कि ‘‘मुस्लिम आरक्षण की हमारी रणनीति बिल्कुल ठीक थी। स पा को भी विजय इन्हीं के भरोसे मिली है।’’ चुनावों को साम्प्रदायिक बनाने के बावजूद पूर्णतः सपाट हो जाने के बाद भी इस प्रकार की विघटनकारी वृत्ति राष्ट्रद्रोह ही कही जा सकती है।

यदि सभी राज्यों के परिणामों को एकसाथ देखा जाये तो देश के मूड़ का भान हो सकता है। देश परिवर्तन चाहता है। अधुरे परिवर्तन से समाज को संतुष्टि नहीं है। आज जनता परिणामकारी परिवर्तन चाहती है। अतः जहाँ विकल्प स्पष्ट था वहाँ जनता ने पूर्ण परिवर्तन कर दिखाया। भ्रष्ट सरकारों को जनता सबक सीखाना चाहती है। सब जगह इसी इच्छा से सभी राज्यों में मतदान का प्रतिशत भी अधिक रहा है। भले ही चुनाव विधानसभा के हो, लोगों का केन्द्र सरकार के प्रति आक्रोश मतदान में व्यक्त हुआ है। पंजाब व उत्तराखण्ड में राज्य सरकारों के विरूद्ध परिवर्तन की हवा को केन्द्र सरकार के प्रति आक्रोश ने काटा। जिसके कारण आसन्न दलों को पूर्णतः हटाया नहीं जा सका। उत्तर प्रदेश के समान गैर काँग्रेसी विकल्प होता तो पंजाब व उत्तराखण्ड में भी उ प्र व गोवा के समान ही परिवर्तन दिख सकता था।

जनता की इस परिवर्तन की मनिषा को समझे बिना किसी भी दल के लिये आगामी राज्य चुनावों अथवा कभी भी सम्भव लोकसभा चुनावों के लिये प्रभावी रणनीति बनाना सम्भव नहीं है। जनता भ्रष्ट, निकृष्ट शासन से उब चुकी है। व्यवस्था की शिथिलता, अप्रामाणिकता तथा प्रभावहीनता ने देश की समस्त क्षमताओं को ग्रहण लगा रखा है। इन बातों से देश का युवा त्रस्त है। अतः वह उस दल को चुनना चाहता है जिसमें उसे परिवर्तन की सम्भावना दिखाई देती है। गत वर्ष तामिलनाडु व पश्चिम बंगाल में भी यही भाव जनता ने व्यक्त किया। अतः जो व्यवस्था परिवर्तन के पक्ष में समाज का अभिमत बना है उसे चुनावी मतदान में रूपांतरित करना हो तो केवल जाति पाति के गणित बिठाकर काम नहीं चलेगा। अपनी भावी नीति को ठीक से रेखांकित करना होगा। केवल सत्तासीन पक्ष की आलोचना से काम नहीं चलेगा अपितु व्यवस्था के परिक्षालन की, पूर्ण परिवर्तन की अपनी योजना भी समाज के सम्मूख रखनी होगी। वर्तमान केन्द्र सरकार ने अक्षमता, भ्रष्टाचार व अनिर्णय के समस्त कीर्तिमान तोड़ दिये है। किन्तु केवल उसकी नीतियों की आलोचना भर करने से काम नहीं चलेगा।

काँग्रेस नीत सं प्र ग के विरूद्ध जनता की हवा तो इस बात से ही स्पष्ट है कि शासनविरोधी लहर तथा एकमात्र विकल्प होने के बावजूद पंजाब व उत्तराखण्ड में वह पूर्ण बहूमत नहीं पा सकी है। आगामी विधानसभा चुनावों में अधिकतर राज्य भाजपा शासित हैं। शासन के विरूद्ध जो अभिमत होगा उसका लाभ उठाने में काँग्रेस तभी सफल हो पायेगी जब वो केन्द्र में भ्रष्टाचार व महंगाई जैसे जनता से जुड़े मुद्दों पर कुछ कारवाई करती हुई दिखाई दें। अन्यथा धीरे धीरे इन राज्यों में भी क्षेत्रीय दलों की शक्ति उभर सकती है। वैश्विक स्तर पर भारत की सम्भावनाओं को देखते हुए राष्ट्रहित में केन्द्र में सशक्त सरकार की अनिवार्यता है। यदि अनेक क्षेत्रीय दलों पर निर्भर गठबन्धन पुनः केन्द्र में शासन में आता है तो ऐसी स्थिति में आगामी 5 वर्ष बड़े ही कठीन होंगे। भारत के सम्मूख विश्वमंच पर प्रभावी भूमिका के लिये खुल रहे अवसर के द्वार अधिक समय तक खुले रहेंगे ऐसा नहीं है। यदि समर्थ सरकार की अनुपस्थिति के कारण भारत यह अवसर खो देता है तो ऐसे में फिर ऐसी अनुकूल स्थितियाँ बनने में दशकों का समय लग जायेगा। अतः 2013 या 2014 जब भी अगले साधारण चुनाव हो भारत को एक दल के सशक्त शासन के लिये प्रयासरत होना चाहिये।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भा ज  पा व काँग्रेस ही ऐसे विकल्प है जो एकदलीय स्थिर सरकार दे सकने की स्थिति में है। काँग्रेस की नीतियों की विफलता के कारण उसके विरूद्ध जनमत को देखते हुए यह दायित्व भा ज पा पर अधिक है। गठबन्धन की राजनीति के साथ ही स्वयं के बूते पर 250 सांसद चुनने का लक्ष्य लेकर काम करने की आवश्यकता है। अभी तो इस दल के संसद के दोनों सदनों के नेता भी मिड़िया में खुली चर्चा में 160-170 के आंकड़े गिनाते दिखाई देते है। जबकि अब तक 302 ऐसे निर्वाचन क्षेत्र है जहाँ कभी ना कभी भा ज पा के सांसद चुनाव जीत चूके हैं। ऐसे में परिवर्तन की हवा में सही प्रकार से प्रयास करने पर 250 स्थानों पर विजय प्राप्त करना बहुत असम्भव स्वप्न नहीं है। किन्तु वर्तमान चुनाव परिणामों से सही सबक सीख कर इस ओर तेयारी करने के लिये बहुत अधिक समय नहीं बचा है। साम्प्रदायिकता के आधार पर चुनाव जीतने की तकनिक गत 3-4 चुनावों से स्वयं को सेक्यूलर कहलाने वाले दलों ने विकसित की है। यह देशविघातक तकनिक तभी कारगर होती है जब बाकि मतों का जाति आधारित विभाजन होता है। यदि भा ज पा अपनी मूल राष्ट्रवादी विचारधारा पर बनीं रहती है तब ही जाति से उपर उठकर मतों को पाने की सम्भावना हो सकती है। प्रचार माध्यमों द्वारा हिन्दुत्व, भगवा आदि संकीर्ण नामों से सम्बोधित कर कुख्यात किये जाने के भय से अपनी मूल विचारधारा को छोड़ने का ही परिणाम है कि उ प्र में परिवर्तन के मत को भा ज पा अपने पक्ष में नहीं कर सकी। मिड़िया के कहने से अपने प्रचारक तय करने की भूल अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की साम्प्रदायिकता को अवसर प्रदान करती है। यदि जाति, पंथ के उपर उठकर देशहित का आहवान करना है तो राष्ट्रहित की बात करने में आक्रमक आग्रह आवश्यक होगा।

इसके साथ ही केवल आलोचना के स्थान पर पर्यायी व्यवस्था का खाका प्रस्तुत करने की क्षमता भी इस राष्ट्रवादी विचारधारा में है। स्वतन्त्रता से लेकर अब तक हमने विदेशी विचार पर आधारित व्यवस्था को ही अपनाया है। नीतिनिर्धारण में 1991 से पूर्व रूस प्रेरित समाजवाद तथा 1991 के भूमण्डलीकरण के दौर से पश्चिम का अन्धानुकरण हमारी सरकारों ने किया है। भारत की विशिष्ठ आवश्यकताओं के अनुरूप भारत की अपनी व्यवस्था निर्माण का प्रयास किया ही नहीं गया। वैचारिक स्तर पर भी इस प्रकार के मौलिक चिंतन का अभाव रहा है। गांधी व पं दीनदयाल उपाध्याय ने क्रमशः सर्वोदय व अन्त्योदय के लक्ष्य को सामने रखते हुए लोकहितकारी शासन तथा राजव्यवस्था की शुद्ध भारतीय वैचारिक पृष्ठभूमि दी थी। आज इन दोनों की ही थाती भा ज पा की पैतृक विचारधारा ने ही जीवित रखी है। राज्यों में इस विचारधारा पर आधरित विकास व सुशासन के प्रादर्श माॅड़ेल खड़े करने का दावा करने के साथ ही पूरे देश के लिये एक देशज, प्रभावी व्यवस्था का खाका प्रस्तुत कर चुनाव लड़ने से ही आगामी समय में समाज का समर्थन मिल सकेगा।

भारत में चुनाव जीतने के लिये भाव जागरण तो आवश्यक ही है साथ ही प्रत्यक्ष धरातल पर परिणामकारी व्यवस्था की खातरी ;ळनंतंदजममद्ध भी। देश को सांस्कृतिक आधार पर एकत्र करनेवाले आह्वान का भावजागरण व भावी सुशासन की योजना इन दो ध्रुवों पर ही परिवर्तन का मत अपने पक्ष में किया जा सकेगा। जो भी दल इस प्रकार का विश्वास देनें में सक्षम होगा वहीं देश को अत्यावश्यक समर्थ, सक्षम व स्थिर शासन प्रदान कर सकेगा। अन्यथा जनता में परिवर्तन प्रज्वलित आकांक्षा क्षेत्रशः भिन्न भिन्न आधार पाकर प्रगट होगी व विपरित विचार व विरोधी हितों से परिचालित दलों के गुटबंदी में देश का भावी पुनः भटक जायेगा।

मार्च 9, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

मुस्लिम आरक्षण: व्हाय धिस कोलावरी दी ? अभी ही क्यों ?


उत्तर प्रदेश के चुनाव हमेशा ही बड़े आकर्षक होते है। सबसे बड़ी जनसंख्या का प्रांत होने के साथ ही राजकीय दृष्टि से पूरे देश की राजनीति को प्रभावित करने का सामथ्र्य रखता है। सम्भवतः इसी कारण प्रसार माध्यम भी उत्तर प्रदेश के चुनावों को अत्यधिक महत्व देते है। वहाँ की छोटी से छोटी खबर भी तुरन्त सूर्खी का रूप लेती है। इस बार के चुनाव भी कोई अपवाद नहीं है। किन्तु इस बार जिन विषयों को उठाया जा रहा है वे निश्चित ही महाभयानक हैं। इन समाचारों, चर्चाओं तथा प्रतिक्रियाओं को देखकर डोमिनिक लापेर की किताब “Freedom at Midnight” की याद आने लगती है। बात जयपुर साहित्य मेले की नौटंकी से प्रारम्भ होती है। सलमान रूश्दी को नहीं आने देने की राजनीति से मुस्लिम तुष्टिकरण का जो घिनौना खेल प्रारम्भ होता है वो बाटला हाउस के शहीदों के अपमान से होता हुआ गैर कानुनी कानून मंत्री सलमान खुर्शीद के पंथाधारित आरक्षण की असंवैधानिक घोषणा में परिणित होता है। नवीन चावला के समय से ही अपनी धार खो चुके चुनाव आयोग की क्या मजबुरी है पता नहीं, स्वयं कोई कारवाई करने के स्थान पर राष्ट्रपति को पत्र लिखने का मजाक उसे सूझता है। राष्ट्रपति सदासर्वदा मौन मोहन के पालें में उस कागज को उछालकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है। चुनाव आयोग की बृहन्नला स्थिति का केन्द्र के दूसरे काबिना मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा मखौल उड़ाते है। पूरा तन्त्र ही मानों इस विषय पर हतप्रभ सा दिखता है।

इस सब नौटंकी के पीछे के मूल कारण व उसमें छिपे भयावह खतरे की कोई चर्चा ही नहीं करना चाहता। वर्तमान में सुविख्यात तमिल गीत मन में उभर आता है .वही थिस Kolavari Kolavari दी? यह सब क्या हो रहा है? देश के विभाजन के समय नकली आंसु बहाने वाले देश के सबसे पूराने राजनयिक दल की इस साम्प्रदायिक रणनीति की ओर कोई माध्यम किसी प्रकार से संकेत करने को तैयार नहीं है।

राजनीति में चुनावी जीत को ही महत्व देने को यह परिणाम है कि देश विघातक नीतियों को अपनाया जा रहा है। आसाम, बंगाल व केरल के विधानसभा चुनावों में यह प्रयोग सफलतापूर्वक अपनाया जा चुका है। वर्तमान आसाम में 52 विधायक मुस्लिम समुदाय से है। मुख्य विपक्षी दल बांग्लादेशी मुस्लिमों को समर्थन के लिये कुख्यात दल ।प्क्न्थ् के 30 सदस्य है। यदि दूसरे स्थान पर रहे मुस्लिम प्रतिद्वंद्वियों की संख्या को देखे तो ये 89 तक जा पहुँचती है जो कुल 126 विधायकों  में दो तिहाई बहुमत के निकट पहुँचता है। केरल में तो वर्तमान विधायिका में हिन्दु अल्पसंख्य हो चुका है। शासनकर्ता गठबन्धन के 71 में से 35 विधायक मुस्लिम व ईसाई समुदाय से है। विपक्ष की स्थिति भी यही है 69 में से 28 अहिन्दू विधायक है। बंगाल में भी सत्ताधारी तृणमूल के तुष्टिकरण चलते पूर्वी भाग के कुछ जिलों में हिन्दुओ का जीवन पूर्णतः असुरक्षित हो गया है। नित होनवाले आक्रमणों व अत्याचारों से मेदिनीपुर जैसे जिलों में सामूहिक पलायन की स्थिति बन रही है। हिन्दूओं को अपने हितों के लिये एकत्रित होने का भी अधिकार नहीं दिया जा रहा है। बुधवार 16 फरवरी को कोलकाता में 1 लाख हिन्दूओं का विरोध प्रदर्शन आयोज्य था। राज्य सरकार ने पाबंदी लगाकर सभी नेताओं को कैद कर लिया। सभा तो हुई पर केवल नाममात्र की पुलिस ने किसी प्रकार की चर्चा से पूर्व ही एकत्रित हजारों लागों को बलपूर्वक खदेड़ दिया। किसी प्रचार माध्यम ने समाचार तक नहीं दिया।

उत्तर प्रदेश में भी काँग्रेस, समाजवादी पार्टी तथा ब स पा इस होड़ में है कि इस समुदाय कौन कितना रिझा सकता है। संविधान में स्पष्ट लिखा है कि पंथ, मजहब के आधार पर किसी प्रकार का आरक्षण नहीं दिया जा सकता। फिर भी मण्डल कमिशन के प्रावधानों का दूरूपयोग कर पीछड़े वर्ग के 27 प्रतिशत कोटे में से 4.5 प्रतिशत कोटा अल्पसंख्यकों में से पीछड़ों के लिये निर्धारित करने का निर्णय केन्द्रीय मंत्री परिषद ने उ प्र चुनावों की घोषणा से एक दिन पूर्व ही लिया। यह पंथ पर आधारित है किन्तु केवल उस समुदाय में से पीछड़ों के लिये है। प्रचार ऐसे किया जा रहा है कि सभी मुस्लिमों को आरक्षण दिया गया है। काँग्रेस नेता निर्लज्ज होकर इस कोटे को जनसंख्या के अनुपात में बढ़ाने की असंवैधानिक घोषणा किये जा रहे है। इसका राजनैतिक कारण यह है कि उ प्र में मुस्लिम मतों का गणित अत्यन्त भयावह होता जा रहा है। 2001 की जनगणना के अनुसार 11 जिलों में मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत से अधिक थी। बच्चों के आधिक्य को ध्यान में ले तो मतदाताओं में 25 प्रतिशत से अधिक बनता है। रामपुर जैसे जिले में मुस्लिम आबादी 49 प्रतिशत थी जो अब मुस्लिम बहुसंख्य जिला बन गया होगा। परिसीमन के बाद इन 11 जिलों में 68 विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र आते है। इन क्षेत्रों में मुस्लिम तुष्टिकरण के सीधे प्रभाव की अपेक्षा इन घोर साम्प्रदायिक दलों को है। सारा घमासान इसे प्राप्त करने के लिये है। किसी को चिंता नहीं है कि इसका देश की एकता व अखण्डता पर क्या प्रभाव होगा।

सामान्यतः यह माना जाता है कि जहाँ भी मुस्लिम मतों का प्रतिशत 20 से अधिक होता हे वहाँ सामूहिक मतदान के कारण वे निर्णायक बन जाते है। हालाँकि आज उ प्र  की स्थिति में यह कहना सम्भव नहीं है कि चुनाव में यह मत किसी एक दल के खाते में जायेगा। भयावह स्थिति तो इसको पाने के लिये किये जा रहे प्रयासों में है। यह सब स्वतन्त्रता पूर्व के दशक की घटनाओं के समान ही हो रहा है। इसको रोकने के लिये सभी देशभक्तों को एकजूट होकर प्रयास करने की आवश्यकता है। पंथाधारित धृवीकरण तो ठीक नहीं है किन्तु वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में हिन्दुआंे का सुदृढ़ संगठन देश की एकता के लिये अनिवार्य है। एक ओर जाति वर्ग के भेदों से उपर उठकर सभी हिन्दूओं के संगठित होने व अपनी शक्ति को राजनैतिक अभिव्यक्ति देने के लिये तत्पर होने की आवश्यकता है और दूसरी ओर भारतीय मुसलमानों में इस जागरण की आवश्यकता है कि इस विभाजनकारी राजनीति से सर्वाधिक नुकसान उसी समूदाय का हुआ है। चाहे वर्तमान में पाकिस्तान की स्थिति देखे अथवा देश में काँग्रेस शासित प्रदेशों की। 60 वर्ष तक मुस्लिमों के रहनुमा बनें रहने का दावा करने के बाद उनके पीछड़ेपन के अध्ययन के लिये सच्चर समिति का गठन करनेवाली काँग्रेस का षडयन्त्र भारतीय मुसलमानों को समझना चाहिये। उसी समिति की रिपोर्ट में मुस्लिम समाज की सबसे अच्छी स्थिति गुजरात में है ऐसा लिखा है। यह भी मुस्लिम समुदाय के लिये समझना आवश्यक है।

भारती के पुत्रों के लिये समय जागने का है अन्यथा तुष्टिकरण का यह खेल पता नहीं देश को कहाँ ले जायेगा?

फ़रवरी 23, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , | 7 टिप्पणियाँ

केवल पर्दा उठने की ही देरी है


गत सप्ताह भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने दो ऐतिहासिक निर्णय दिये। किसी भी लोकसेवक के विरूद्ध अभियोजन के लिये सरकार की अनुमति का प्रावधान ब्रिटिश राज की व्यवस्था की अनेक देनों में से एक है। जिस अधिकारी पर भ्रष्टाचार का आरोप है उसके विरुद्ध कारवाई करने हेतु अनुमति उसी के वरिष्ठ अधिकारी अथवा मन्त्री से प्राप्त करनी पड़ती है। इसके पीछे का तर्क यह था कि अनावश्यक रुप से शासकीय अधिकारियों को कानूनी झंझटों में घसीटे जाने से बचाया जाय ताकि वे अपने कर्तव्य को निर्भय होकर निभा सके। वर्तमान सड़ी व्यवस्था में भ्रष्ट अधिकारियों को दण्डात्मक कारवाई से बचाने के लिये इस प्रावधान का दुरुपयोग हो रहा है। अनेक बार जिस मंत्री के आदेश पर भ्रष्ट अधिकारी कार्य कर रहा होता है वही अनुमति देनेवाला होता है। ऐसे में निर्णय को लटकाये रखने का चलन सामने आया है। सर्वोच्च न्यायालय ने अब इसपर 4 माह की समयसीमा लगा दी है। आदेश का सर्वोत्तम पहलू यह है कि इसने सरकार को निर्णय लेने पर बाध्य किया है। अपराधियों को बचाने के लिये निर्णयों को लम्बित रखने की बाबूगिरी अब नहीं चलेगी। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि चार माह में निर्णय ना किये जाने पर अनुमति मान ली जायेगी।

इस प्रावधान का सबसे बड़ा व तात्कालिक असर सुब्रह्मणियम स्वामी द्वारा प्रधानमंत्री से सोनिया गांधी के विरूद्ध अभियोजन के लिये मांगी अनुमति पर होगा। यदि शासन समय सीमा में निर्णय नहीं लेता है तो वह परोक्ष अनुमति ही हो जायेगी। यदि समय सीमा में प्रधानमंत्री तथ्यों को जानकर भी अनुमति नकारते है तब वे भी भ्रष्टाचार के सहयोगी हो जायेंगे। वर्तमान अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री अंग्रेजी शासन की कुख्यात देन प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे हैं अतः निर्णयों को लम्बित रखने को उन्होंने एक कला का रुप दे दिया है। प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव अत्यन्त संवेदनशील मुद्दोंपर चुप्पी साधने के विशेषज्ञ थे। उन्होंने कहा था कि ‘‘कारवाई ना करना भी अपने काप में एक कारवाई है।’’ मनमोहनसिंहजी ने उनके पदचिह्नों पर चलने के नये आयाम स्थापित किये है। अब सर्वोच्च न्यायालय के क्रांतिकारी निर्णय से उनको इस उंघाउ नींद से जागना होगा। वैसे भी युवराज का अभिषेक करने को लालायित काँग्रेस कभी भी इस सर्कस के सिंह को सेवानिवृत्ति का आदेश दे सकती है। हे वीर खालसा सरदारों को दशमेश की दी पगड़ी जीवनभर धारनेवाले सिंह अपने सिंहत्व को एक बार तो दिखा दो और जाने से पूर्व सोनिया के विरूद्ध अभियोजन की अनुमति दे ही दो। सारा देश आपके सब अपराधों को भूल आपको सर आँखों पर रख लेगा।

दूसरा निर्णय भ्रष्ट वाणिज्यिक संस्थानों पर कड़ा प्रहार था। जितना राजनैतिक तन्त्र भ्रष्ट है उससे कई गुना अधिक कलुषित कार्पोरेट जगत है। दोनों के गठजोड़ ने पूरे देश को गिरवी रख दिया है। प्राकृतिक संसाधनों की अंधाधुंद लूट मची है। 2जी मामले में 122 लाइसेन्स रद्द करने का निर्णय इस दिशा में अत्यन्त सार्थक कदम है। न्यायालय ने दिखा दिया है कि जो भी अपराध में लिप्त है उसे उसकी कीमत चुकानी ही होगी। राजनेताओं को भ्रष्ट कर अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाले व्यावसायिकों के लिये यह चेतावनी की घण्टी है। केवल स्वार्थ व लालच के लिये ही धंधा करनेवाले लोगों से हम जगने की अपेक्षा तो नहीं कर सकते किन्तु पीढ़ियों से नैतिक व्यवसाय के लिये जाने जा रहे टाटा व बिड़ला जैसे समूह तो आगे से भ्रष्ट नीतियों द्वारा अनुचित लाभ के प्रयत्नों को विराम देंगे ऐसी अपेक्षा की जा सकती है।

उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण चुनावों से पूर्व इन न्यायालयीन निर्णयों तथा सरकार को दी गई स्पष्ट फटकारों से यु पी ए शासन की पूर्व से ही कलंकित साख और अधिक गर्त में गिर गई है। अपने गृहमंत्री के कुछ समय के लिये बच जाने से सरकार राहत की सांस भले ही ले ले किन्तु विशेष सी बी आय सत्र न्यायाधीश के निर्णय की भाषा उच्च न्यायालय में कुछ विपरित निर्णय आने की आस लगाती है। ऐसा यदा कदा ही होता है कि न्यायाधीश तथ्यों की तो पुष्टि कर दे किन्तु उनके अपर्याप्त होने का कारण देकर याचिका को बरखास्त कर दे। न्यायालय ने माना है कि संचार मंत्री के निर्णयों को बदलने का अधिकार होते हुए भी तत्कालीन वित्त मंत्री ने उन निर्णयों से सहमति दिखाई। इस तथ्य को मानने के बाद न्यायाधीश महोदय इसे आपराधिक षड़यन्त्र मानने के लिये अपर्याप्त मानते है। इस भाषा में इस बात के लिये जगह बन जाती है कि अधिक पूछताछ व छानबीन से कुछ और तथ्य सामने आ सकते है जो अपराधिक नियत को स्पष्ट करें। ऐसे में आश्चर्य नहीं होना चाहिये कि सर्वोच्च न्यायालय सी बी आय को जाँच के आदेश दे।

इसी सप्ताह कनाड़ा के एक अदालती मामाले में तत्कालीन उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल को रिश्वत दिये जाने का मामला सामने आया है। अब प्रश्न केवल यही बचा है कि इस सरकार में कोई एक भी इमानदार मंत्री बचा है क्या? या केवल पर्दा उठने की ही देरी है। यह तो निश्चित है कि कलंक से घिरी यह सरकार देश पर शासन करने का नैतिक अधिकार खो चुकी है। विपक्ष, सामान्य जनता व सबसे महत्वपूर्ण देश के प्रबुद्ध नागरिक इस सरकार को बिना विलम्ब पदच्युत करने के लिये आंदोलन प्रारम्भ करें।

सिंहासन खाली करों कि जनता आती है।

फ़रवरी 8, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

   

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