उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

चुनावी रणभूमी मे राष्ट्रवाद का शंखनाद


Republic day2चुनाव लोकतंत्र का महोत्सव है। वर्तमान में चुनाव आयोग द्वारा डाले गये कठोर निर्बंधों के कारण इस महोत्सव का उत्साह कुछ धीमा पड गया दिखता है। जमीनी गतिविधियों का स्थान अब प्रसार माध्यमों के अंदर होनेवाली प्रचार उथल-पुथल ने ले लिया है फिर भी चुनाव का समय सबके लिए ही अतिविशिष्ट सक्रियता का समय होता है। सभी प्रकार के कार्यकर्ता सक्रिय हो जाते हैं। सामाजिक कार्यों मे लगे, सामन्यतः गैर राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय कार्यकर्ताओं के लिए यह चिरंतन संभ्रम बना रहता है कि इस सक्रियता में योगदान करें अथवा नहीं और करें तो किस प्रकार से करें? भारत के वर्तमान परिदृश्य में सरकारी व्यवस्था से अछूता रहना लगभग असंभव है। जीवन के हर क्षेत्र में शासन का हस्तक्षेप है। माना कि ये स्थिति आदर्श नहीं है और विदेशी दासता के अवांछनीय अवशेष के रुप मे विद्यमान है किंतु यह भी नकारा नही जा सकता कि यह वास्तविकता है।

स्वतंत्रता पश्चात् हमने लोकतंत्र को राजनैतीक व्यवस्था के रुप मे स्वीकार किया। भारत के संविधान ने जनता को सर्वोपरि सार्वभौम सत्ता के केन्द्र के रुप के प्रतिष्ठित किया। अपेक्षा थी कि लोकतांत्रिक व्यवस्था इस धारणा को सृदृढ कर प्रत्यक्ष मे उतारती किन्तु प्रतिनिधिक लोकतंत्र के जिस स्वरुप को हमने भारत में अपनाया उसने समाज को जोडने के स्थान पर विघटित करने का ही काम किया। सर्वाधिक मत पाने वाले प्रत्याशी के विजय की व्यवस्था के कारण सबसे बडे गुट का प्रतिनिधि ही जनप्रतिनिधि कहलाया जाता है। बहुदलीय व्यवस्था के अंतर्गत चुनाव क्षेत्र मे अनेक प्रत्याशी होते हैं। जिसको सर्वाधिक मत प्राप्त होते हैं उसे विजयी घोषित कर दिया जाता है। इस व्यवस्था ने ऐसी हास्यास्पद विडम्बना की स्थिति उत्पन्न कर दी है कि कई स्थानो पर 15% से कम मत प्राप्त करने वाले प्रत्याशी भी जनप्रतिनिधि के रुप मे चुने जाते हैं। वास्तव मे देखा जाए तो डाले गए मतों मे से 85% से अधिक मतदाताओं ने इस नेता को प्रतिनिधि के रुप मे नकार दिया फिर भी सबसे बडे गुट का नेता होने के कारण वह उन 85% लोगो का भी प्रतिनिधि कहलाया जाता हैं। यह स्वाभाविक ही था कि राजनीतिक दलों ने अपने निहित स्वार्थ के लिए व्यवस्था की इस कमजोरी का उपयोग किया।

EVMजाति, वर्ग, भाषा आदि जो भी समाज को तोडने के माध्यम मिले उनके द्वारा अपने गुट को सबसे बडा सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाने लगा। क्षेत्रीय दलों के उभार ने रणनीति को और आगे बढ़ाकर अपने सीमित समर्थन को बड़ा बनाने के लिए बाकी बचे समाज को छोटे छोटे टुकड़ों में खंडित करने का काम किया। यदि किसी नेता या दल के पास जाति अथवा ऐसे ही किसी आधार पर 100 मे से 20 मतदाताओं का समर्थन है तो उसने भिन्न-भिन्न तरीकों से समाज के बाकी बचे 80 मतदाताओं को इतने टुकडों मे बाँटने का काम किया कि कोई गुट उसके गुट से बड़ा न हो जाए। विभाजनकारी राजनीति ने स्वतंत्रता के 66 वर्षों के पश्चात भी भारत की सुप्त क्षमता को प्रकट नहीं होने दिया है। आज विश्व मे चहुँ ओर सभी देश भारत के सामथ्र्य की सराहना करते हैं। जिनके मन मे मित्रता नही है वे भारत के उभरने की संभावना से आशंकित रहते हैं। किंतु इस राष्ट्र के सामथ्र्य-सूर्य को विघटनकारी राजनीति का ग्रहण लगा है। भारत में राष्ट्र पुनर्निर्माण के कार्य को यदि पूर्ण गति प्रदान करनी है व व्यवस्थागत प्रतिष्ठा दिलानी है तो उसके लिए राजनीति के विभाजक तंत्र को बदलना आवश्यक है। इसके बिना बाकी सारे प्रयास छलनी मे पानी भरने के समान निष्प्रभावी हो जाते हैं।

व्यवस्था  परिवर्तन इसका स्थायी समाधान है।First past the post ’सर्वाधिक मत पानेवाला विजयी’ इस व्यवस्था के स्थान पर प्रत्यक्ष एवं पूर्ण लोकतंत्रकारी ECव्यवस्था ‘बहुसंख्य का समर्थन’ ‘Mojority representation’ की व्यवस्था को लागू करना होगा। इसके अंतर्गत किसी भी चुनाव में जीतने के लिए डाले गए कुल मतों में से 50 प्रतिशत से कम से कम एक मत अधिक पानेवाला व्यक्ति ही विजयी घोषित होगा। ऐसी स्थिति में समर्थन करने वाले मतदाताओं की संख्या नकारने वाले मतदाताओं से निश्चित ही अधिक होगी। तब चुना हुआ नेता सच्चे अर्थ में क्षेत्र का प्रतिनिधि होगा। इस व्यवस्था को लागू करने मे अनेक आक्षेप व कठिनाइयाँ गिनाई जाती है किन्तु राजनीति को राष्ट्रीय एकात्मता के लिए बाध्य करने के लिए यही चिरस्थायी उपाय है। विश्व के अनेक देशों में इसी व्यवस्था के अंतर्गत चुनाव होते है। भारत से भी भौगोलिक रुप से विस्तृत व आबादी में भी लगभग बराबरी के रशिया में भी सभी आम चुनाव इसी विधि से होते हैं। यदि किसी चुनाव क्षेत्र में प्रथम चरण के मतदान में किसी को भी 50% से अधिक मत नही प्राप्त होते हैं तो प्रथम व द्वितीय स्थान पर रहने वाले प्रत्याशियों के मध्य दूसरे दिन पुनः मतदान कराया जाता है। अपने आप किसी न किसी को 50% से अधिक मत मिलेंगे ही। प्रायः ऐसा देखा गया है दूसरे चरण के मतदान की आवश्यकता ही नही पड़ती। इस व्यवस्था में स्वाभाविक रुप से ही प्रत्येक दल ऐसे प्रत्याशी का चयन करता है जिसे समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों का समर्थन मिल सके। गुटीय हितों के स्थान पर सामूहिक हित चुनावी मुद्दे बन जाते हैं। क्षेत्रीयता, साम्प्रदायिकता, जातीयता आदि चुनाव जिताने के लिए सक्षम नही होते। अतः राष्ट्रीयता, एकात्मता, एकता, समरसता यह विषय अधिक प्रभावी होते हैं।

मन में यह प्रश्न आना स्वाभाविक है कि जब तक यह व्यवस्था परिवर्तन नही हो जाता तब तक राष्ट्रवाद का चुनावी राजनीति में कोई स्थान ही नहीं? वास्तव में बात बिल्कुल इसके विपरीत है जब तक संपूर्ण एवं प्रभावी लोकतंत्र के रुप मे बहुसंख्या का प्रतिनिधित्व यह नियम लागू नही होता तब तक राजनीति के द्वारा समाज के विभाजन को रोकने का एकमात्र उपाय है ’राष्ट्रवादी राजनीति’। जातीयता, साम्प्रदायिक तुष्टीकरण, वर्गवाद, धनबल तथा बाहुबल आदि लोकतंत्र के असाध्य विकारों को ठीक करने का एकमात्र उपाय है – ’चुनावी रणभूमी मे राष्ट्रवाद का शंखनाद’। राष्ट्र का हित, राष्ट्र की संस्कृती, राष्ट्रीय परंपरायें, राष्ट्रीय जीवनध्येय इन पर आधारित नीतियों को महत्व देनेवाले दल एवं नेता का जब समाज स्वयंस्फूर्त समर्थन करने लगेगा तब अन्य सभी संकुचित स्वार्थों पर आधारित विघटनकारी मुद्दे गौण हो जायेंगे। समाज में काम कर रहे प्रत्येक सामाजिक कार्यकर्ता का यह कर्तव्य बन जाता है कि ऐसे राष्ट्रवादी वातावरण का जागरण करें।

bharatmataलोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ प्रसार माध्यमों का भी कर्तव्य बन जाता है कि विघटनकारी मुद्दों को महत्व देने के स्थान पर जोडनेवाले एकात्मता को बढावा देने वालें विषयों, नेताओं तथा दलों का अधिक प्रचार दें। धन के द्वारा क्रय की हुयी प्रसिद्धी के आधार पर समाज को तोडनेवाले नेताओं व दलों को सबक सिखाने का काम राष्ट्रकार्य के रुप में प्रसार माध्यमों को भी करना होगा। पेड न्यूज के द्वारा माध्यमों का धनबल के आगे समर्पण लोकतंत्र के विनाश का कारण बन रहा है। भारत एक निर्णायक दौर से गुजर रहा है। वैश्विक परिदृश्य में अवसर की जो एक छोटी सी खिडकी खुली है उसका यदि निर्णायक उपयोग करना है तो आज राष्ट्र को सुदृढ, सक्षम व निःस्वार्थ नेतृत्व की आवश्यकता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही ऐसे नेतृत्व को जन्म एवं पोषण दे सकता है। पश्चिम में राष्ट्रवाद की अवधारणा राजैनतिक व आर्थिक है। इस कारण से वह राष्ट्रों के मध्य प्रतिस्पर्धा को जन्म देती है। इस प्रतिस्पर्धा का रुपांतरण बाजारी शोषण, शस्त्र स्पर्धा व अंततः युद्धों में भी होता है। द्वितीय महायुद्ध में सारे विश्व पर युद्ध की विभीषिका थोपने वाल हिटलर ने भी जर्मन राष्ट्रवाद के नारे का ही तात्विक आधार लिया था। उसके बाद से अंतरराष्ट्रीय विमर्श में राष्ट्रवाद एक घृणित एवं निन्दनीय पद बन गया है। भारत में भी साम्यवादी व समाजवादी विचार को पोषित करनेवाले विचारकों ने इसी पश्चिमी दृष्टि से प्रभावित होकर राष्ट्रवाद की घोर आलोचना की है। इसे संकुचित, तानाशाही व फासिस्ट जैसे संबोधनों से पुकारा है। इस कारण सामान्य बुद्धिजीवी भी राष्ट्रवाद के प्रति सकारात्मक विचार नही रखते किन्तु भारत में राष्ट्रवाद की संकल्पना कतई आर्थिक अथवा राजनैतिक नहीं है। भारत में यह मूलतः आध्यात्मिक व व्यवहार में सांस्कृतिक विचार है। आर्थिक व राजनैति राष्ट्रवाद जहाँ भौगोलिक सीमाओं और बाजारी प्रतिस्पर्धाओं के कारण विभाजनकारी बन जाता है वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद व्यक्ति से परिवार, समाज से आगे राष्ट्र तक मन के विस्तार का माध्यम होने के कारण एकात्मदृष्टि का विकास करता है। स्वाभाविक ही यह राष्ट्रवाद विस्तार की अगली सीढ़ी के रुप में मानवता को देखता हैं। अतः इस राष्ट्रवाद में राष्ट्रहित के साथ ही विश्वहित व उससे भी परे सृष्टि का हित भी निहित है। यह राष्ट्रवाद तोडता नही जोड़ता है।

जाति, पंथ, सम्प्रदाय, वर्ग, भाषा, क्षेत्र आदि के द्वारा विभिन्न वादों का निर्माण कर चल रहे समाज विघटन के तांडव को यदि रोकना है तो सभी को मिलकर एक ही उद्घोष करना होगा कि ‘राष्ट्र सर्वोपरि है’। मेरे व्यक्तिगत, पारिवारिक, क्षे़त्रीय, सामाजिक, पांथिक, साम्प्रदायिक अथवा प्रांतीय हितों से अधिक महत्वपूर्ण राष्ट्रहित हैं। इस विचार को अपने हर कार्य मे अभिव्यक्त करना होगा। चुनाव में आग्रह पूर्वक सहभागी होना, मतदाताओं का पंजीयन करना अधिक से अधिक लोगों को सकारात्मक मतदान के लिए प्रेरित करना, दलों व नेताओं को राष्ट्रहित के मुद्दों पर विचार एवं बात करने के लिए विवश करना यह हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है। आइए! लोकतंत्र के महोत्सव में राष्ट्रवाद के उजास को प्रकाशित करने का संकल्प लें।

नवम्बर 29, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

लूला लोकतंत्र : जरुरी है सर्जरी


वर्ष २०११ में हुए आंदोलनों में जनता की प्रचंड ताकत देखने में आई |
किसी भी नीति के निर्धारण में जनता की सोच लोकतान्त्रिक ढांचे में एक महत्वपूर्ण कारक होती है| इसलिए नीतियाँ बनाने वालो की तरफ से हमेशा से ही जनमत या जनता की “सोच”  को ढालने का संगठित प्रयास होता रहता है | मिडिया के बड़े प्रभाव क्षेत्र से लोगो की सोच को प्रभावित करना अब एक विशेष कार्य बन चुका है | प्रिंट मिडिया का अपना एक वर्ग है, और वह उन्हें प्रभावित भी करती है | इलेक्ट्रोनिक मिडिया और सोशल मिडिया में हुयी बढोत्तरी से लोगो को अपनी राय व्यक्त करने के और भी मार्ग मिल गए हैं | पहले दो पर तो सरकार  का प्रभाव   हो सकता है, चूँकि उसके पास इन्हें देने के लिए  भारी भरकम मात्र में धन होता है जो वह अपने विज्ञापनों पर खर्च करती है विज्ञापनों के लिए| लेकिन पूरी दुनिया में सोशल मिडिया पर किसी भी सरकार का प्रभाव जमाना मुश्किल है|
लेकिन अब इस अभूतपूर्व चुनौती  से निपटने के लिए भी कुछ  व्यावसायिक रूप से लोगो की सोच प्रभावित करने वाले  “प्रोफेशनल” लोग काम पर लगाये जा चुके है | विकसित देशो में तो पिछले एक दशक से और अपने यहाँ कोई दो सालो से ही इस तरह के कला और विज्ञान ने प्रगति की है | वर्तमान सरकार तो इसमें बहुत ही निपुण है और इस काम में उसने इस क्षेत्र के सबसे अनुभवी लोगो को लगा रखा है | कुछ अखबारों की रिपोर्टिंग के अनुसार तो सत्ताधारी पार्टी के युवराज को “कौन से कपडे पहनने है” , “किस तरह बोला जाय ” यहाँ तक की कैमरे के सामने भीड़ में “किसी छोटे बच्चे को कैसे अपनी गोद में उठाना है ” यह तक सलाह देने के लिए प्रोफेशनल रखे गए है | कुछ अखबारों की माने तो पिछले दिनों चेहरे पर जो चमक दिखी वह भी प्रधानमंत्री के खास प्रोफेशनल सलाहकारों की सलाह का परिणाम थी | व्यावसायिक रूप से ऐसा करने वालो की करतूत का एक चिंताजनक उदहारण है अन्ना का मुम्बई अनशन |
इसके पूर्व आई. ए. सी. (बिना किसी प्रोफेशनल के ) लोगो में यह सोच बनाने में सफल रही थी की “जनलोकपाल” ही सरकार से सम्बंधित सारी समस्याओं की चाबी है | और केंद्र की सरकार ने बड़ी चालाकी से इसे संभाला …. उसने ऐसा माहोल बनाया  की भ्रष्टाचार के खिलाफ एक कानून “लोकपाल “बनाकर लाये है भले ही जनलोकपाल की कॉपी ही न हो , पर एक कदम तो बढाया! इस से लोगो के मन में एक भ्रम उत्पन्न हो गया की सरकार कुछ कर रही है और अन्ना सिर्फ अपने अहंकार की तुष्टि के लिए ही अनशन कर रहे है | टीम अन्ना ने अपनी राजनैतिक असमर्थता सिद्ध की| भारतीय जनता की मूल प्रवृत्ति है की वो कानूनी कार्यवाही  में अधिक विश्वास  करती है | अगर उन्हें थोड़ी बहुत आशा भी दिखती हो तो लोग सरकार में विश्वास बनाये रखते है | पूर्व में अप्रैल और जून में युपिए की सरकार लोगो को यह मौका देने में चूक गयी | ४ जून  को लोगो के शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर हुए वीभत्स सरकारी हमले (जिसमे महिलाये औ बच्चे भी शामिल थे ) से लोग भड़क गए और लोगो ने स्वयं को अकेला महसूस किया और इसीलिए फिर आन्दोलन को इतना भारी जनसमर्थन मिला |लेकिन सरकार इस बार लोगो में यह सोच बनाने में सफल रही की वे कुछ कर रहे है विपक्ष और टीएमसी जैसी पार्टिया केंद्र सरकार पर कड़े कानून के लिए दवाब बनाये हुए है ऐसे में अलग से कुछ करने की आवश्यकता नहीं रह जाती है ….भारत में सब कैसे होता है यह उस का सटीक उदहारण है |
इसी प्रकरण में एक जो अजीब चीज और देखने में आई वो है उनका कहना है की सारी गड़बड़ी की वजह शासन तंत्र ही है न की कोई शासन करने वाले लोग| जिस प्रकार लोकतान्त्रिक व्यबस्था भारत ने अपनाई हुयी है वास्तव में वाही सारी समस्याओ का मूल है यहाँ तक की टीम अन्ना ने तो सांसदों द्वारा उनकी पार्टी अनुशासन में बंधे रहने तक की आलोचना की | उन्होंने संसद से (व्हिप) “सचेतक”   के प्रावधान को हटाने की मांग की ताकि एक संसद अपनी मर्जी से अपनी सोच से वोट दे सके | दोगलेपन की हद हो गयी | एक तरफ तो आप लोगो के “राईट टू रिकाल ”  की बात कर रहे है , दूसरी तरफ सांसद अपनी ही पार्टी अनुशासन को न माने यह चाहते है | सचेतक का जो वैधानिक प्रावधान है वह  १९८० के समय हुयी सांसदों की खरीद फरोख्त के बाद बने “दल बदल विरोधी कानून” के बाद से और मजबूत हुआ है| एक सांसद अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह के आधार पर चुनाव जीतता है न की उसकी व्यक्तिगत जीत होती है | चुनावों में जनता के मध्य पार्टी की कार्य योजना रखी जाती है जिस पर लोग उन्हें वोट देंगे ऐसी उम्मीद की जाती है | अब कहना की पार्टी के घोषणा पत्र में बंधने की अपेक्षा एक सांसद किसी नैतिक स्थान के लिए व्यक्तिगत रूप से अधिक उपयुर्क्त होगा यह तो संसद में भ्रष्टाचार की बाढ़ ला देगी |
वास्तव में गठबंधन की  वर्तमान विडंबना ही हमारे इस त्रुटी पूर्ण  लोकतंत्र में एक भरी नौटंकी जैसे है| चुनावों में जो पार्टिया एक दुसरे के खिलाफ लडती है , वही जीतने के बाद मिलकर सरकार बनाती है, एक तरफ जहा केंद्र के स्तर पर सी.बी.आई. का डर दिखाकर या राहत का लालच देकर जिन पार्टियों से गठबंधन बनाया जाता है , राज्यों में वही एक दुसरे के कटुता पूर्ण अभियानों का निशाना बनती है |
लेकिन क्या हम इस सब के लिए लोकतंत्र को जिम्म्मेदार ठहरा सकते है ? लोकतंत्र ही मूल समस्या है ऐसा अभिमत बनाना एक वस्तुनिष्ठ समीक्षा के लिए ठीक नहीं बैठता | कोई और विकल्प ही स्वाभाविक रूप से शोषण और भ्रष्टाचार से निजत का उपाय हो सकता है |
१९७७ में जय प्रकाश नारायण की समग्र क्रांति और उसके बाद १९८६ के अयोध्या आन्दोलन में जो देखा, लोकतंत्र में राष्ट्रीय स्तर पर लोगो में हिम्मत जगाने की क्षमता है, और वही गैर राजनितिक रूप से पिछले वर्ष हुआ| निश्चित ही हम यह निष्कर्ष निकाल सकते है की लोकतंत्र के वर्तमान स्वरुप ने कुछ यथाक्रम में गलतियां की है जो हमारी आज की शासन व्यवस्था के ढहने के लिए जिम्मेदार है | पर सिर्फ लोकतंत्र को ही अपने आप ने जिम्मेदार मानकार नकारना समय के साथ उचित नहीं होगा | हमें खेल को खेल के नियमो का पालन करते हुए जीतना  होगा | इसमें कोई संदेह नहीं की बदलाव होना चाहिए | पर हमें सुधार इसी तंत्र में से इसी की अनुरूप उभार कर लाने होंगे न की एकदम अलग से कोई कदम उठाया जाय |
सैधांतिक रूप से देखा जाय तो लोकतंत्र के दो रूपों का चलन है .. पहला है  १- प्रत्यक्ष लोकतंत्र :  ऐसा माना जाता है की यूनान में एथेंस जैसे कुछ नगरो में और उत्तर भारत के कुछ गणों में सिकंदर के आक्रमण के समय यह लागू था, इसमें जनता प्रत्यक्ष रूप से शासन विधि में भाग लेती है और विधान परिषद् की कार्यकारिणी का और कही कही तो न्यायपालिका का भी चुनाव  करती है |
दूसरी है २. प्रतिनिधि आधारित लोकतंत्र :– यह वेस्टमिन्स्टर  नमूना है जो हमने अंगेजी हुकूमत की वसीयत रूप में अपनाया है| इसमें जनता द्वारा अपने प्रतिनिधि निर्वाचित किये  जाते है जो आगे कार्यपालिका का चुनाव करते है तथा अधिकांशतः न्यायपालिका को नियुक्त किया जाता है नाकि निर्वाचित किया जाता है | दोनों ही प्रकारों के तंत्र के अपने अपने गुण-दोष है | अमेरिका ने दोनों के संकर रूप को अपनाया हुआ है , इसमें राज्यों में तथा राष्ट्रीय स्तर पर भी कार्यपालिका का प्रत्यक्ष निर्वाचन होता है |जहाँ एक और विधान परिषद् के लिए प्रतिनिधि सभा होती है वही दूसरी ओर वह कार्यपालिका के नियामक प्राधिकरण के तौर पर भी  कार्य करती है | ऐसा प्रतीत होता है की अमेरिका के अधिकांश राज्यों में न्यायपालिका भी निर्वाचित होती है |
पर लगता है हमने अपने यहाँ भारत में लोकतान्त्रिक नियमो की बुरी गति कर रखी है , जिसमे बहुमत का नियम सबसे पहले है |दोनों ही प्रकार के तंत्र में  बहुमत द्वारा ही नीतिया तय होती है | निर्वाचन में यह निश्चित होना चाहिए की विजयी प्रत्याशी  को  में डाले गए मतों में से कम से कम ५०% से १ अधिक मत प्राप्त हो |जबकि यहाँ भारत में  लोकतंत्र के दिखावटी मुखिया, राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से होता है| और सबसे खतरनाक प्रावधान यह है की कार्यकारिणी का मुखिया, प्रधानमंत्री का निर्वाचन भी प्रत्यक्ष रूप से करना अनिवार्य नहीं होता है | वर्तमान प्रधानमंत्री भी राज्यसभा सदस्य है जहाँ जनता के मत का प्रत्यक्ष उपयोग नहीं होता है|  लेकिन एक प्रधानमंत्री के रूप में बने रहने के लिए  लोकसभा के सदस्यों का बहुमत उसके पास होना चाहिए , जिसमे १ +५०% का नियम अनिवार्य है | लेकिन हमारे सांसद  जिस प्रक्रिया से निर्वाचित होते है उसमे यह आवश्यक नहीं होता है की उन्हें बहुमत में वोट प्राप्त हुए हो और इसीलिए हमारे सांसद डाले गए वोटो में से ७% भी अपने पक्ष में पाकर चयनित  हो जाते है | मुश्किल से ही कोई सांसद हो जो यह दावा कर सके की उसे अपने निर्वाचन क्षेत्र से ५०% से भी अधिक वोट प्राप्त हुए हो |और इस प्रकार यह हमारेलोकतंत्र का क्रमश ढहना है | हमारे पास यहाँ तक की संवैधानिक प्रावधानों में भी वास्तविक लोकतंत्र है ही नहीं  | यह तो केवल एक झलक मात्र है | इसी से समाज में अभिजात शासन वर्ग और जाती, क्षेत्र, भाषा  और धर्मं की गन्दी ,भेद और फूट की राजनीती पनपती है | किसी भी  राजनेता के पास जीतने का यही मंत्र है की औरो को इतने टुकडो में बाँट दो की अपना हिस्सा सबसे बड़ा हो जाये | यह अनुवांशिक तौर पर व्याप्त हो चुका है|
जब तक हमारी लोकतान्त्रिक ढांचे की आधारभूत कमी दूर नहीं होती तब तक हम किसी सुधार की आशा नहीं कर सकते |
दो जरुरी आधारभूत सुधार मांगो को रखने की आवश्यकता है |
१. वर्त्तमान पटकथा के हिसाब से पहले  तो कार्यकारिणी के मुखिया, प्रधानमन्त्री का प्रत्यक्ष/सीधा  निर्वाचन हो | इसके लिए संवैधानिक संशोधन लाने होगा की गठबंधन  दौर की इस राजनीती में होना मुश्किल है, जहाँ एक छोटी क्षेत्रीय पार्टी को भी असंगत महत्व और मूल्य प्राप्त है | लेकिन हम शुरुआत  के तौर पर इस मांग का मुद्दा तो उठा ही सकते है | या दूसरा विकल्प यह हो की पहले कदम के रूप में  राष्ट्रपति शासन वाली सरकार जिसमे राष्ट्रपति का सीधा निर्वाचन हो , हो सकता है |
२. दूसरा यह की पंचायत से लेकर राष्ट्रपति तक के चुनाव में जीतने की शर्त , डाले गए कुल मतों में १+५० % मत प्राप्त करना अनिवार्य हो | यह अपेक्षाकृत आसान भी है | केवल “जनप्रतिनिधि अधिनियम” से संशोधन करने से यह हो जायेगा और साधारण बहुमत से इसे पारित भी किया जा सकता है | इससे दो सबसे बड़ी पार्टियों को सीधा लाभ मिलने की सम्भावना है, इसलिए यह सर्वसम्मति से हो भी सकेगा| यह नैतिक और तार्किक दोनों रूप से ही वजनदार तर्क है और कोई इसे नकार भी नहीं सकता | जिसे उसके निर्वाचन क्षेत्र की बहुमत जनता ने नकार दिया हो उसे जनता का प्रतिनिधित्व करने का कोई अधिकार नहीं है |
लेकिन यह कोई जादू की छड़ी भी नहीं है की सारी गड़बड़ियां  ही दूर हो जाएँगी | अंततोगत्वा हमें दो शताब्दी पूर्व के एतिहासिक अनुभवों के परे जनि की आवश्यकता है | वर्त्तमान व्यवस्था  ब्रिटिश शासन के परिणाम स्वरुप सामने आई है, इसकी जड़े वही उपनिवेशिक काल में जमी हुयी हैं| इसलिए अंतिम उपचार के लिए हमें मूल कारण तक जाना होगा और जिसके लिए हमें अपने राष्ट्र के इतिहास की और भी गहराइयो में जाना होगा |
हमारा ५००० वर्षो से भी अधिक का ज्ञात इतिहास है जिसमे प्रत्येक दूसरी शताब्दी में हमारा स्वर्णिम काल रहा है | और हमने आर्थिक सम्पन्नता, शिक्षा, विज्ञान और तकनीक, और सबसे महत्वपूर्ण शांतिपूर्ण सामाजिक-राजनैतिक तंत्र स्थापना में विश्व की अगुवाई की है | शासन तंत्र के विभिन्न प्रकारों  का हमने प्रयोग किया है|  हम भारत के विभिन्न भागो के उस विविध राजनीती तंत्र को पुनः नहीं ला सकते जो पहले हुआ करता था | हिन्दुओ का सदैव ही सामान सिद्धांत के विविध प्रगटीकरण में विश्वास रहा है और हमने राजनीती में भी इसे लागू किया था |चक्रवर्ती अपने जीते हुए राज्यों में उनके स्वयं के  लागू किये हुए शासन -व्यवस्था का सम्मान किया करते थे | इसी श्रंखला में हमारे यहाँ एक और जहाँ विविधताओं से पूर्ण राजनैतिक तंत्र वाले गणराज्य थे वाही दूसरी और मगध साम्राज्य जैसे जटिल ढांचे के  विविध रूप थे |  कुछ  व्यवस्थाये तो ऐसी थी जहाँ केवल एक महिला का ही शासन रहा | लेकिन इन सभी  का आधारभूत  सिद्धांत “धर्मं” था, उन सभी को एक सूत्र में बांधने वाला | आज वास्तव में जिस चीज की कमी है वाह है धार्मिक तंत्र |
आजके इस सामने आये तंत्र को स्वीकार्य कर हमें इसमें धार्मिक सिद्धांतो को लागू करना होगा | किसी ‘विदेशी’ को पचाने का यह हिन्दू तरीका है |  आज हमें वर्तमान समाज के अनुरूप  सनातन धर्म की व्याख्या और युगधर्म की आचार-संहिता तैयार करने के लिए एक नयी स्वच्छ स्मृति की आवश्यकता है | संविधान का यह हमारा स्वदेशी विचार है |
हमारी संसद-भवन  के  नक़्शे के पीछे की प्रेरणा मध्यप्रदेश के मितावली स्थित  चौसठ  योगिनी मंदिर का नक्शा है | वैसे ही हमारे लोकतंत्र को भी हमें अपने राष्ट्रधर्म के सिद्धांतो ठोस आधार पर आधारित करना होगा | वर्तमान लूली व्यवस्था की सम्पूर्ण शल्य-चिकित्सा बहुत जरुरी है न की केवल उपरी दिखावटी लीपापोती मात्र|

जनवरी 22, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

   

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