तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

Look beyond political controversy, Yoga is for all

Another Post as a precursor to IYD. This piece was written for bharatniti.in giving it here for the blog followers.



Yoga has been accepted universally as a discipline of moulding one’s own life to active overall well-being, accepting it as a way of life beyond faith, worship or religious dogmas. The same was evident when more than 170 countries across five continents unanimously supported the resolution for declaring June 21 as the International Day of Yoga at the General Assembly of the UNO.

IYD LogoMany of them proposed or seconded it without any voting or discussion. In fact, many of the Islamic countries too supported the resolution. Yoga is being practiced by people beyond the religious beliefs.

On this background of universal consensus, it is ironical that the decision of the central government to celebrate the International Day of Yoga all over the country is being opposed on religious grounds by some misguided elements. When the whole world is unanimous about the universal appeal of Yoga, it is a shame that this great science of living is being subjected to controversy in the land of its origin.

Social media is full of photographs of members of different communities performing Yogic exercises. The universal acceptance of Yoga is very much witnessed across different communities in India.

Controversy more of political concoction than popular

The present fabricated controversy over the celebration of the International Day of Yoga is the result of intolerant minds. Yoga is a science which demands experiments and experiences and does not ask one to believe or un-believe anything. The performance of Yoga does not affect any belief systems. If at all it will enhance ones capacity to have undeterred in one’s own beliefs. Yoga is necessarily an Bharatiya philosophy as it was first compiled in this holy land and has all the attributes of Sanatana Dharma because it was practiced, experimented and evolved into different systems by generations of Hindus. But it still is a universally applicable science of life and the art of living.

The practice of Yoga will not swerve the individual from his personal religious beliefs. It will also not make him antagonistic to his or any other religion but will, on the contrary, augment his affection for his personal deity. The practice of Yoga will not proselytize a Muslim or a Christian, but will on the contrary make him a better adherent of his faiths. Thus, no one should be afraid of Yoga as it includes all and excludes none.

So what is Yoga actually?

Yoga is beyond a mere physical exercise. In fact, Yoga is neither mere physical exercise nor is it just a therapy. As per the ancient traditions, it is a way of scientific living. A modern being may find it hard to comprehend but the mind is the prime factor of all our actions in life. And yoga is nothing but the training of the mind. Thus it (yoga) enables perfection in every action at all levels. The whole universe functions in disciplined manner. There are laws of existence which govern the natural phenomena irrespective of any subjective intervention. The only exception to this smooth governance of the universe are human beings.

The humans are endowed with the will to act and the power of imagination. The combination of these two have created all the scientific wonders. Like all kinds of powers, this also needs regulation. If uncontrolled, power becomes corrupt and boon is converted into a curse. This is true at individual as well as collective level.

Sage Patanjali, in his Yoga aphorisms, initiates with a simple statement – ath yoga anushasanam [Thus we begin the discipline of Yoga.] The aim of all the yogic practices right from Asanas, Suryanamaskara, Pranayamas up to Dhyana [meditation] and Samadhi is disciplining the mind. If the mind is concentrated, anything and everything can be accomplished.

Yoga is the way of orienting the mental powers to one’s aim. The conflicts and clashes in the world are a result of intolerance born out of lack of coordination among one’s own multiple roles. There are various schools of Yoga and they have different practices.

There are several variants of the same Yogic practice. Some well- meaning noble Acharyas even tried to standardize yogic practices. This futile effort has not succeeded as diversity is an inherent feature of existence. Everything that exists is unique in its form, function and role. Yoga not only takes into account this diverse uniqueness but also enriches the extraordinary individuality of the seeker, the performer. At the same time, yoga helps the sadhaka (practitioner, the doer) to realize the underlying oneness behind the apparent diversity.

So, whatever be the practice, if the mind is tuned properly with a synchronized awareness and relaxation, it integrates one with all. Essence is not in the action but in the intent. Yoga literally means union. Every practice that enables the mind to expand and unite the different levels of collectivity is Yoga. Yoga gives quietude, peace and harmony to the individual mind and if performed regularly by a sizable portion of the humanity, will spread this peace and harmony to the cosmic world.

One can say with full conviction that the mass performance of various Yoga practices on the historic occasion of the International Day of Yoga on June 21 will definitely lead to conflict free and harmonious world.

जून 18, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

योग विद्या है भारतीय मनोविज्ञान

omभारतीय मनिषा ने अपने शोधकार्य का बहुत बड़ा अंश मन के बारे में अनुसंधान करने में लगाया है| मन की पहेली को अत्यंत गहराई में जाकर सुलझाने में हमारे पूर्वज सफल हुए| साधना में मन के नियंत्रण के महत्त्व के कारण यह अनुसंधान का विषय बना ही, उसके साथ ही भारतीय ऋषि यह भी जानते थे कि जड़ जगत पर भी मन के द्वारा ही नियंत्रण पाया जा सकता है | अंतर्जगत व बाह्यजगत दोनों में ही ज्ञानप्राप्ति का साधन मन है | अतः, इसको समझना, समझाना और वश में करना ऋषियों के लिए महत्वपूर्ण बना | परिणामस्वरूप इस हेतु एक सम्पूर्ण शास्त्र विकसित हुआ | मन को समझने और नियंत्रित करने के शास्त्र का नाम है – ‘योग’ | हम लोग अंग्रेजी शब्दों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद करते समय अपने देशज ज्ञान परंपरा की ऐतिहासिक अनुभूतियों की ओर ध्यान दिए बिना नए शब्द गढ़ देते है | अंग्रेजी विषय Psychology का अनुवाद हमने मानसशास्त्र या मनोविज्ञान किया, जबकि, इस पूरी विद्या को अधिक प्रगल्भता से व्यक्त करनेवाला शब्द योग पहले से विद्यमान था | योग का अर्थ है – ‘जोड़ना’ | यह मन के स्वभाव और गति दोनों को समग्रता से प्रकट करता है| इस एकात्म नामावली में केवल सिद्धांत ही नहीं अपितु उसका प्रयोग भी निहित है | मन सर्वव्यापी होने के कारण चेतना के भिन्न-भिन्न स्तरों को जोड़नेवाला है | साथ ही इसके नियमन की प्रक्रिया भी जोड़ने से ही संपन्न होती है | दोनों ही अर्थों में मनोविज्ञान या मानसशास्त्र से योग यह अधिक परिपूर्ण पद है |

अंतर केवल शब्दों के अर्थ में ही नहीं है अपितु विषय की ओर देखने का दृष्टिकोण ही पूर्णतः अलग हो जाता है| पश्चिम का मनोविज्ञान जहां समस्याओं के समाधान के रूप में इस शास्त्र को देखता है वही भारतीय योगशास्त्र आनंदपूर्ण जीवन जीने की विद्या है | इसमें समस्या-समाधान की नकारात्मकता न होकर स्थायी सुख्प्राप्ति की भावात्मक दृष्टि है | यम – नियम योग के विधि निषेध नहीं है अपितु जीवन के वास्तव स्वरुप को समझाने का माध्यम है | सत्य, अहिंसा, असते अदि का पालन करना है यह तो हम बताते है पर क्यों? इस प्रश्न पर विचार नहीं करते | इस कारण यह अत्यंत कठिन काम लगता है | जबकि सत्य हमारा स्वाभाव है और हम असत्य केवल तब बोलते है जब हमें यह भ्रम होता है कि सत्य से काम नहीं चलेगा | सच बोलना सहज है स्वभावगत है | इसके उलट झूठ के लिए पूरी योजना बनानी पड़ती है | सारा क्लेश, तनाव असत्य के लिए है | सत्य तो सहज सरल होने के कारण आनंददायी है | यदि इस तथ्य का साक्षात्कार कर लिया जाये तो हम सहर्ष सत्यवादी हो जायेंगे | इस वास्तव को अनुभव करना योग है | अहिंसा अदि अन्य नियमों के बारे में भी यही सत्य है | जीवन में अधिकतम समय हम अहिंसा का ही पालन करते है | अधिकांश लोगों को यदि पूछा जय की अंतिम बार हिंसा कब की थी तो याद करना पड़ेगा | क्योंकि अहिंसा ही हमारा स्वाभाव है | अहिंसा तो भ्रम के कारन है | नियम भी इसी स्वाभाव के सामाजिक व्यवहार का नाम है | शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और इश्वर प्रणिधान हमें हमारे विस्तृत रूपों से जोड़ता है | समाज में सहज, अनुशासित और आनंदमय व्यवहार की कुंजी है नियम | योग का यह वास्तविक व्यवहारिक मानस शास्त्र है |

योग आपको कृत्रिम व्यवहार से भावनाओं के नियंत्रण को नहीं कहता अपितु सत्य के साक्षात्कार से जीवन को जानने का अवसर प्रदान करता है | इस सुदृढ़ आधार पर भावनाओं का उदात्तीकरण कर om suryaआनंदानुभुति करना जीवन का परमध्येय है | सभी प्रकार की योगविद्या व योगाभ्यास हमें चित्तशुद्धि के माध्यम से आनंद को अनुभव करने के लिए तत्पर करते है | मन ही इस अनुभूति का माध्यम है | मन से ही स्वाभाव के प्रति भ्रम है जिसने आनंद को रोक रखा है | पर मन ही आनंद की अनुभूति भी कर एकता है | अतः माण्डुक्य कारिका कहती है – मन एव मनुष्याणां कारण बंध मोक्षयो: | मन मनुष्य एके बंधन और मोक्ष दोनों का कारण बनता है | योग अनुशासन है – स्वप्रेरणा से पाला गया अनुशासन | पालन से प्राप्त होनेवाला आनंद ही अनुशासन की सच्ची प्रेरणा है | योग से प्राप्त अनुभवों से हम यह जानते है की जीवन मूल रूप से आनंदमय है और दुःख तो केवल भ्रम है| योग ज्ञानरूपी प्रकाश से इस आवरण को हटा आनंद के दर्शन कराता है | उपनिषदों में इस प्रक्रिया हेतु अत्यंत अद्भुत शब्द प्रयोग हुआ है – अपावृणु | आवरण को हटाने को अपावृणु कहते है | ऋषि प्रार्थना करता है, “सत्य का मुख स्वर्णिम पात्र से ढंका हुआ है, हे विश्व के पोषण करनेवाले सूर्य, उस आवरण को दूर कर हमें सत्यधर्म के दर्शन कराओं |”

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्याsपिहितं मुखम् |

तत्त्वं पूषण अपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ||”

मन को जानने का शास्त्र और उसका जीवन में वैज्ञानिक प्रयोग करने की कला यह दोनों विश्व में सबसे पहली बार भारत में विकसित हुए | उपनिषदों की परंपरा में इस विषय पर अनेक बातें उपलब्ध है | पूरे शास्त्र को सुव्यवस्थित रूप में सूत्रबद्ध करने का कार्य महर्षि पतंजलि ने योग सूत्रों के माध्यम से किया | योग सूत्रों में केवल मन को नियमन में लाने की विधियाँ ही नहीं है तो इसके कार्य, संरचना और स्तर का भी अनुभूत विश्लेषण है | अंतःकरण चतुष्टय – मन, बुद्धि, चित्त तथा अहम् के रूप में मन के कार्यविभाग, मन की पांच वृत्तियाँ, विविध भूमियाँ आदि विस्तार से मन का अध्ययन योग शास्त्र करता है | मन के बारे में इतना सूक्ष्म एवं अचूक ज्ञान अभी आधुनिक मनोविज्ञान को भी नहीं है |

yoga 2अतः भारत ही विश्व को सबसे गहन, गंभीर व परिपूर्ण मनोविज्ञान का मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है | वर्तमान में इस विषय में दो प्रमुख बाधाएँ है | एक तो हमारे विश्वविद्यालयों में मनोविज्ञान के रूप में योगशास्त्र का अध्ययन नहीं कराया जाता और दूसरी ओर समाज में योग का प्रचार व अध्ययन अध्यापन करनेवाले आचार्यों ने इसे केवल शारीरिक व्यायाम, श्वास का व्यायाम व रोगोपचार तक सीमित कर रखा है | कुछ गंभीर आचार्य आध्यात्मिक साधनाविधि के रूप में धारणा-ध्यान आदि का अभ्यास अवश्य कराते है किन्तु मनोविज्ञान अथवा मानसशास्त्र के रूप में योग विषय का शैक्षिक अध्ययन (academic) नहीं हो रहा है| अतः इस दिशा में शीघ्र व प्रामाणिक प्रयोग किये जाने आवश्यक है | पहला अनिवार्य कार्य तो है योग विषय में मनोविज्ञान के रूप में शोध कार्य | यह दो प्रकार से किया जाना चाहिए – एक तो प्राचीन योग साहित्य का मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अध्ययन और अनुसन्धान तथा दूसरा योग के मानस शास्त्र का वर्त्तमान में उपचारात्मक प्रयोग कर शोध | दूसरा महत्वपूर्ण कार्य है भारतीय मनोविज्ञान का पाठ्यक्रम विक्सित कर उसको विश्वविद्यालयों में लागू करना | इस पक्ष में भी दो तिन प्रकार से तयारी आवश्यक है | स्नातक स्तर पर मनोविज्ञान विषय में भारतीय ज्ञान परंपरा का समावेश करना, परास्नातक स्टार पर भी कम से कम एक प्रश्नपत्र का भारतीय मनोविज्ञान के रूप में समावेश तथा भारतीय मनोविज्ञान में दो वर्षीय परा स्नातक पाठ्यक्रम का निर्माण यह तीनों कार्य करने होंगे | समुपदेशन (काउन्सलिंग) तथा समूह उपचार (ग्रुप थेरेपी) में भारतीय योग विद्या का उपयोग यह भारतीय मानसशास्त्र की पुनःप्रतिष्ठा की दिशा में अंतिम चरण होगा |

जून 15, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , | 8 टिप्पणियाँ

I am neither a politician nor a social reformer!

CHICAGO_1893_20x30_21_RGB_FINAL_00What was the purpose of Swami Vivekananda’s life? Though it may be deemed arrogant to ask such a question, for those who want to follow his path it is very important to address this basic query in right spirit. The purpose of life is what makes the personality what it is.

Swamiji as an Avatar?

Some devotees like to believe Swamiji to be an avatar and they would simply say the purpose of avatar is to establish Dharma and that’s what Swamiji did. But the founder of Vivekananda Kendra, Ma EknathjiRanade would consider calling Swamiji an avatar as an escapists’argument. By calling him avatar we are shunning our responsibility to follow his path. On the other hand it is belittling his achievements also. ”If he was a divine incarnation, I feel, what he did was not very much. But on the other hand if I think he was as human as any one of us then I feel that he has achieved a great height. At the same time, I get the inspiration to keep a noble goal before myself and to emulate his path to greatness.” Eknathji would argue.

What were Swamiji’s thoughts on the matter? He has uttered many a things about himself. He has also written about his life’s mission in some of his letters. But never has he called himself an avatar. That should be the ultimate test. Notwithstanding the vision of ShriRamakrishnaParamahamsa reported by some devotees to back their avatar claim; we will be more honest if we use Swamiji’s method to decide the issue. Narendra was also faced with the samedilemma about his Guru. Many devotees called ShriRamakrishna an avatar. Narendra himself had many miraculous experiences with the great master. He attained NirvikalpaSamadhi, had Shaktipat(Transfer of Spiritual power by touch) and also the SakaraDarshan(Vision in Form) of Mother Kali by the grace of the great Guru. Still he could not come to a definite conclusion as to Shri Ramakrishna being a divine incarnation till the very last days of Thakur. To resolve the dilemma he decides in his mind, ”I will accept him as a divine incarnation, an avatar, only if he himself directly tells me so.” It is documented that he got the answer then and there. As if the Guru was reading the mind of the disciple, Thakur, taking Narendra’s hand proclaimed very clearly, ”One who was Rama, who was Krishna, has now born as Ramakrishna”; leaving no ambiguity whatsoever.

Hence we must apply the same test for deciding whether Swamiji was an Avatar or not. According to the documented and available information he never claimed to be one. He was not shy of speaking about himself. As early as in1891 he is known to have said, ”I will burst upon the Indian society like a bomb”. He fulfilled this self prophecy. Talking to his disciple he extolled, ”I may leave this mortal body, but I will continue to work for next 1500 years.” So he does. But there is no mention of his calling himself an Avatar. Thus till any such new discoveries are found we are bound to take Swamiji’ word for his purpose of life as a human being rather than an Avatar.

References to his mission:

He has distinctly made a few comments on his mission which was dawned upon him in the intense meditation at the ShreepadShila in Kanyakumari. He had written in one of his letters to ShashiMaharaj, Swami Ramakarishnanda, ”Sitting on the last bit of Mother Bharat, I hit upon a plan”. He has explained his plan of campaign in a lecture in Madras after his triumphant return from the west. But we are after the purpose of his life. The mission and plans are to fulfill the purpose. What was the purpose of Swamiji’slife? He himself had struggled hard within and without to find this. He was convinced that there was a noble purpose but most of the time it was elusive. On Hatharas station he told the station master SaratChandraChakroborty, who later became his first sanyasi disciple, Swami Sadananda, ”I see my purpose of life like the hill covered by the morning mist. My destiny beckons me. I have to move on.”

What others say:

Many people have given him many lofty attributes and rightly so. Some called him the patriot monk, warrior monk, the savior of Hinduism, the second Shankarcharya, a social reformer. Bhagini Nivedita says about his address in the Chicago, “Of the Swami’s address before the Parliament of Religions, it may be said that when he began to speak it was of ‘the religious ideas of the Hindus’, but when he ended, Hinduism had been created.” Thus almost announcing him the father of neo-Hinduism. He has been creditedas one of the greatest pioneers of Indian renaissance in the 19th century. His own brother BhupendranathDutt talks about his (failed) plans of organizing political revolution to free India from foreign rule. Likes of Bipin Chandra Pal and Brajendranath Seal would agree to call him a political activist. This may not be authenticated by available documents but there is no doubt that his life and message inspired generations of freedom fighters both of armed and nonviolent type.

“He was so great, so profound, so complex. A Yogi of the highest spiritual level in direct communion with the truth who had for the time being consecrated his whole life to the moral and spiritual uplift of his nation and of humanity, that is how I would describe him. If he had been alive, I would have been at his feet” Said Subhash Chandra Bose many a times. On the other hand Rajaji, Sri Chakravarthi Rajagopalachari calls him a savior of Hinduism, “Swami Vivekananda saved Hinduism and saved India. But for him, we would have lost our religion and would not have gained our freedom. We therefore owe everything to Swami Vivekananda.”BalGangadharTilak who had hosted Swamiji in Pune during his wanderings equates him with AdiShankaracharya, “It is an undisputed fact that it was Swami Vivekananda who first held aloft the banner of Hinduism as a challenge against the material science of the West. It was Swami Vivekananda who first took on his shoulders this stupendous task of establishing the glory of Hinduism in different countries across the borders. And he, with his erudition, oratorical power, enthusiasm, and inner force, laid that work upon a solid foundation. Twelve centuries ago Shankara was the only great personality who not only spoke of the purity of our religion… but also brought all this into action. Swami Vivekananda is a person of that stature.” Rabindranath Tagore when asked by the french Historian Roman Rolland, how can he understand the spirit of India? Said, “If you want to know India, study Vivekananda.”

Father of Hindu Nationalism:

The accolades he received during his lifetime and thereafter are countless and the list still continues to grow longer and longer. Even the critics of Hinduism in the modern times in search of the roots of Hindu upsurge during the Ramjanmbhumiagitation reach back to Swamiji for so called ideological foundations. They try to put the blame on Swamiji among others for the revival of Hindu Nationalistic spirit. He is considered to be father of Hindu Nationalism by those in favor as well as those against the idea.

Preacher of Vedanta:

There are many others who are fascinated by his depth of spiritual knowledge. The scientific way in which he articulated the mysteries of highest spiritual knowledge is unparallel. Hence he was called the foremost preacher of Vedanta in the west. It is also claimed by some that he conquered the west and converted many to Vedanta.

Swamiji’s personality and his message was multifaceted hence there are many ways of understanding Swami Vivekananda. Each one does it from one’s own respective point of view. This has made Swamiji the most acceptable, non controversial ideal of the modern times. People from opposing camps use his quotations to prove their side of argument and blame the other of misrepresenting him. The left ideologues who denigrate religion also accept Swamiji’s views on the regeneration of deprived masses. But in all this process, sometimes, there is a deliberate effort to dilute Swamiji’sNationalism, his in-depth understanding of the soul of Bharat. He was the first religious and spiritual leader to proclaim that the soul of Bharat was ‘Dharma’. He was the first proponent of the concept of Hindurashtra, the Hindu nation. This should not be forgotten and any effort to prove it otherwise is an attempt to twist his message to suit the present day vested political interest.

Self Prophesy:

In this cacophony of diverse and sometimes even contradictory claims about Swamiji how do we find the answer to our query? What was the purpose of Swamiji’slife? Here again we must rely on the original text rather than the interpretationswhich may be within or out of proper context. Is there any statement of the Swami about his own self? What was his view about himself and his work? There are loads of indirect references in his speeches in India. There are a few direct discussions recorded by his disciples which give us an insight in to his mind. But the most direct statement on the topic is,”I am not a politician, nor am I a social reformer. It is my job to fashion man…Man-making is my mission of life.”

To Fashion Man:

What a great statement? To Fashion man! What does it means when one uses the verb to fashion?  Rogers’s thesaurus gives us a lot of options – to design, to tailor, to style, to mould, to modify etc. When we apply it to humans what will be the most consistent meaning. To fashion man- is to transform. To use Swamiji’s own words, ‘to enable man to manifest the perfection already within.’ To fashion is to train to realize the potential divinity in practical life. To make one actualize the full potential.To make one realize the special purpose of his life and to progress on that path.

Swamiji did that all his life. He transformed the life of everyone he touched. The list is long and varied. Swamiji’s man making technology which Sister Nivedita later on qualified by adding its prime objective as ”Man Making for Nation Building” was unique for each of its beneficiary. To study this transformation brought about by Swamiji in hundreds of people is an interesting way to understand the science of human excellence and the various methods of unfolding it.

Self Transformation by Efforts:

The mission started early in his life. The first experiment of his self proclaimed job was on his own personality. It is an interesting saga of self transformation through intense enquiry, struggle within and without, experimentations and in short total and continuous efforts. The whole journey is in four distinct stages Biley to Narendra, Narendra to Sachchidananda/vividishananda (his sanyasi names during the initial wanderings), Kolkata to Kanyakumari -From Wanderer to a determined Vivekananda with a mission and finally the Missionary Vivekananda Chicago to Bellur. This is not the occasion to examine the whole journey but the methods of Fashioning involved. The prime urge was to realize, to experience. No pretence, no belief no acceptance without thorough logic and questioning. He not only questioned others, but his self questioning continued all through his life till the end. As confidant as he was of his mission and the success of it, still he kept on asking am I on the right path. His openness to discussions and acceptance to change at any stage is really inspiring. Though the process went on all his life the most important period of intense self-transformation is his encounters with Shri Ramakrishna. That fashioned the Vivekananda that we know. It was not an easy process. The struggle went on. Both of them suffered a lot. Each one sticking to ones own ways. Swamiji’s adamancy was to be tamed only by realization. He did many experiments under the guidance of his Guru. This acceptance of Thakur as Guru also came only after the mystic experience of the oneness through touch- Shaktipat. But the final surrender and giving up of the rigid ego was done by the greatest of the experiences – Vision of Kali as a Chinmayi (living, conscious mother). This was the turning point which made him realize that the divine was omnipotent, omniscient and can be realized in all forms. This made him internalize the revolutionary Gospel of ShriRamakrishna – Shiv BhaveJeevSeva. Serve the living being with the full understanding of its divinity. This becamehis life mantra, “Service to humanity as an offering to the divinity.”

The self acceptedvocation to Fashion man continued more vigorously after the Guru left the mortal form. The initial period of 3-4 years was very testing. The domestic situation was worsening. Thakur had given him the responsibility to keep the Sangh, the monastic order of young disciples together. The householder devotees had their own ideas. During this period Narendra kept all his brother disciples in constant contact and saw to it that they did not forget the call of the master as well as their inner fire of Vairagya was kept alive. It was a daunting task. The whole well meaningworld of relatives, families and even the householder followers of Thakur were against the idea. But Narendra kept it alive in the tough times and gave it a shape in VarahnagarMath.

This man-making mission continued throughout his life and even there after. We see great examples of total transformations in this journey. There are examples like Swami Ramtirh, a Professor of Mathematics in Lahore, who attended Swamiji’s lectures there on Common Bases of Hinduism and Vedanta and got so inspired that he renounced and became a great Sanyasi. But there are few example of Man-making that will give us the insight into the science of the art of Human Fashioning. We will try and study some of them in detail in the next part.


मई 5, 2014 Posted by | English Posts | , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

सूर्यनमस्कार का विज्ञान

जो सूर्यनमस्कार का प्रतिदिन अभ्यास करते हैं, उनको आयु, वीर्य, बल, प्रज्ञा तथा तेज की प्राप्ति होती है  और सामूहिक सूर्यनमस्कार के अभ्यास से समाज में राष्ट्रीय चारित्र्य का निर्माण होता है। 
snm‘भारत’ शब्द का ही अर्थ है ‘प्रकाश की उपासना करनेवाला।’ भा अर्थात ‘प्रकाश’, रत अर्थात ‘में व्यस्त’। प्रकाश की उपासना भारतीय संस्कृति का वैज्ञानिक आधार है। हमारी सारी परम्पराएं वैज्ञानिक हैं। उसका आधार प्राण विज्ञान है। मध्यकाल के संघर्ष के कारण इस प्राणविद्या का ज्ञान समाज में नहीं रहा। किन्तु हमें पता नहीं है इसका अर्थ यह नहीं कि वह विज्ञान ही लुप्त हो गया। चाहे आयुर्वेद हो, ज्योतिष विद्या अथवा वास्तुशास्त्र सबका मूल आधार प्राणविद्या ही है। प्राण के प्रवाह को ही देखकर वास्तुशास्त्र की दिशा तय होती है। प्राण प्रवाह की गणना ही ज्योतिष के मुहूर्तों का भाव तय करती है। जगत में प्राण का मूल स्रोत सूर्य है। इस कारण सूर्य की उपासना का हिन्दू जीवन में बड़ा महत्व है। सूर्य की स्तुति, उसका पूजन और जल द्वारा उसको अध्र्य प्रदान करना यह उपासना के सामान्य आधार रहे हैं। जनजातियों में भी सूर्य की उपासना का महत्व है। सूर्य की उपासना की सबसे वैज्ञानिक विधि योगविद्या द्वारा विकसित की गई ‘सूर्यनमस्कार’ है। सूर्यनमस्कार सूर्य की उपासना का सम्पूर्ण माध्यम है। साधरणत: पूजा में कुछ उपचार एवं भाव ही प्रयोग में लाए जाते हैं, सूर्यनमस्कार पूर्ण व्यक्तित्व से ही सूर्य की पूजा है। शरीर, मन, बुद्धि को लेकर प्राणशक्ति के द्वारा सूर्य के यजन की विधि है- ‘सूर्यनमस्कार’! विभिन्न आसनों के माध्यम से शरीर का पूर्ण संचालन करते हुए साष्टांग प्रणिपात किया जाता है। साथ ही मन से सूर्य का ध्यान व बुद्धि में वही प्रखर विचार। सूर्यनमस्कार की चक्रीय विधि है ही ऐसी की उस समय कोई और विचार मन में आ ही नहीं सकता। पूरा व्यक्तित्व सूर्य की ऊर्जा पर एकत्र हो जाता है। प्राण का प्रवाह पूरे शरीर में सुव्यवस्थित प्रवाहित होता है। सारी नाड़ियों में ही चालना आती है। अधिकतर विकार प्राण के कुप्रवाह, अप्रवाह या अतिप्रवाह के कारण होते हैं। आयुर्वेद इसे कुजीर्ण, अजीर्ण व अतिजीर्ण की संज्ञा देता है। सूर्यनमस्कार से प्राण का सम्यक व समुचित प्रवहण हो जाता है। इस सुजीर्ण के चलते सकारात्मक स्वास्थ्य की प्राप्ति हो जाती है। अत: सूर्यनमस्कार के नियमित अभ्यास से सभी रोगों से रक्षा हो जाती है। जीवन बलपूर्वक, प्रसन्नता से दीर्घकाल तक सार्थक चल सकता है। 
सूर्यनमस्कार व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का सहज सुलभ साधन है। अत्यंत कम समय में शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, बौद्धिक व आध्यात्मिक विकास का इससे ब‹ढकर कोई अन्य एकात्म साधन नहीं है। शरीर का स्थायी सौष्ठव सूर्यनमस्कार से ही मिलता है। अन्य व्यायाम तात्कालिक परिणाम दे सकते हैं किन्तु स्थायी परिवर्तन का माध्यम योगिक सूर्यनमस्कार ही है। श्वास पर ध्यान देकर किए गए सूर्यनमस्कार से मन को एकाग्र करने की क्षमता का अद्भुत विकास होता है। विद्यार्थियों को नियमित सूर्यनमस्कार का अभ्यास अनिवार्य रूप से करना चाहिए। इससे अध्ययन के लिए अत्यावश्यक एकाग्रता के साथ ही स्मणरशक्ति का भी चमत्कारिक विकास होता है। ऊर्जा के संतुलन के कारण भावनाएं भी संतुलित हो जाती हैं। 
सूर्यनमस्कार में प्रयुक्त मन्त्रों का भी अपना महत्व है। मन्त्र बहुआयामी प्रभाव डालते हैं। उच्च स्वर में स्पष्ट मन्त्रोच्चारण से उत्पन्न ध्वनि के shiv samarthस्पन्दन शरीर, मन, बुद्धि तीनों को ही शुद्ध करते हैं। मन्त्रों में सूर्य के जो 12 नाम लिए जाते हैं, उनमें से प्रत्येक नाम का विशिष्ट परिणाम है। व्यक्तित्व के आवश्यक अनेक गुणों का विकास इन मन्त्रों के उच्चारण से होता है। सूर्य का एक नाम सविता है। सविता बुद्धि के देवता है। सूर्यनमस्कार से भ्रम, वितर्क व विपर्याय से परे सत्य को देखने की प्रखर बुद्धि प्राप्त होती है। नियमित सूर्यनमस्कार करनेवाला छात्र संकल्पना को सुस्पष्टता से समझ लेता है। अत: उसका अध्ययन केवल परीक्षा के लिए संग्रहित जानकारी तक सीमित न होकर जीवनोपयोगी ज्ञान का साधन बन जाता है। कम समय में सदा के लिए पढ़ाई हो जाती है। बार-बार रटने की मजबुरी में समय व्यर्थ नहीं गवांना पड़ता। 
वैसे तो भारत में अनादिकाल से ही सूर्यनमस्कार प्रचलित रहे हैं। किन्तु अनेक विषयों की तरह ही संघर्षकाल में इसका समाज को विस्मरण हो गया। आधुनिक काल  में सूर्यनमस्कार को समाज में प्रचलित करने का श्रेय छत्रपति शिवाजी के गुरु समर्थ रामदासजी को जाता है। उन्होंने बलोपासना का सुगठित तन्त्र विकसित किया। गांव-गांव में मारुति (हनुमान) के मंदिर स्थापित किए। उनके सम्मुख युवाओं को एकत्रित कर सामूहिक सूर्यनमस्कार का अनुष्ठान किया। इन वीर सूर्योपासकों में से ही शिवाजी की अजेय सेना का निर्माण हुआ। हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना, मुगल शासन का अंत तथा पूरे देश में मराठों के शासन के चमत्कार का मूल समर्थ रामदास द्वारा प्रचलित सूर्यनमस्कार की संगठित ऊर्जा में ही था। 
6 वर्ष की आयु से ऊपर के सभी स्त्री-पुरुष सूर्यनमस्कार का नियमित अभ्यास कर सकते हैं। वर्तमान में भारत में सूर्यनमस्कार की 10-12 पद्धतियां प्रचलित हैं। आसनों के क्रम अंकों में कुछ थोड़े-थोड़े भेद से आचार्यों ने अपनी-अपनी पद्धतियों का विकास किया है। समर्थ रामदास द्वारा प्रचलित 10 अंकों की विधि सर्वाधिक अभ्यास में है। तोलासन से सीधे साष्टांग प्रणिपात में जाने के कारण इसमें बजरंगी दण्ड लगता है। यह बलवद्र्धन के लिए सर्वोत्तम है। बाल, किशोर व युवाओं को इस विधि से ही अधिक लाभ प्राप्त होता है। योगाभ्यासी मण्डल के जनार्दन स्वामी द्वारा प्रचारित 12 अंकों की विधि में दो बार शशांकासन किया जाता है, साष्टांग प्रणिपात से पूर्व तथा पर्वतासन के बाद। अधिक आयु के लोगों के लिए यह सुकर होने के साथ ही नाभी में प्राण को संग्रहित करने में भी सहायक है। 
वैसे तो 12 मंत्रों के साथ 12 चक्र सूर्यनमस्कार अपनेआप में पूर्ण है। सूर्य की इस उपासना को ईश्वर प्राप्ति का अधिष्ठान प्रदान करने के लिए समर्थ रामदास ने 13 मन्त्र नारायण के प्रति जोड़ दिया- ‘श्री सवितृ सूर्यनारायणाय नम:’ यह पूरी प्रक्रिया को पूजा बना देता है। इसी भाव से सूर्यनमस्कार का मन्त्र आता है – 
ध्येय: सदा सवितृ-मण्डल-मध्यवर्ती
नारायण: सरसिजासन-सन्निविष्ट:।
केयूरवान् मकर-कुण्डलवान् किरीटि
हारी हिरण्यमय वपुर्धृत शंख-चक्र:।।
सूर्य जिनके मध्य स्थान में है ऐसे स्वर्णीम कांतिवाले परमेश्वर नारायण की यह स्तुति सूर्यनमस्कार के आरम्भ में की जाती है। हमारे सूर्यनमस्कार उस परमशक्ति तक पहुंचे यह भाव है। 
प्रतिदिन नियम से प्रात: अथवा सायं सूर्यनमस्कार करने चाहिए। 13 चक्रों से प्रारम्भ कर सकते हैं किन्तु बाल, युवा, किशोर और युवा वर्ग के भाई-बहनों को धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ानी चाहिए। समर्थ रामदास स्वयं प्रतिदिन 1200 सूर्यनमस्कार करते थे। वर्तमान युग में भी यह सम्भव है। कन्याकुमारी में ली गई प्रतियोगिता में दो कार्यकर्ताओं ने 3 घण्टे में 1201 सूर्यनमस्कार किए थे। इतने तक ना भी जाए तब भी 108 सूर्यनमस्कार तो हर युवा को करने ही चाहिए। इसमें 25 से 30 मिनट का समय लगता है और पूर्ण व्यक्तित्व का व्यायाम हो जाता है। अजेय आत्मविश्वास, सुशीलवान, विनम्रता, प्रगल्भ मेधा, संवेदनशील हृदय इन सभी गुणों का एक साथ विकास होता है। 
सूर्यनमस्कार के सामूहिक अभ्यास का भी बड़ा महत्व है। अकेले किए सूर्यनमस्कार से तो अपने प्रयत्न का ही फल मिलेगा। सामूहिक अभ्यास से प्रत्येक को सभी की साधना का सुफल प्राप्त होगा। अत: जितने साधक साथ होंगे उतने गुणा सबको पुण्य प्राप्ति होगी। वर्तमान राष्ट्रीय परिस्थितियों का निदान भी सामूहिक अभ्यास में ही है। आज माँ भारती को केवल व्यक्तित्व ही नहीं अपितु राष्ट्रीय चारित्र्य के विकास की आवश्यकता है। सामूहिक सूर्यनमस्कार के अभ्यास से इस संगठित राष्ट्रीय चारित्र्य का विकास होगा। 
सूर्यनमस्कार के अंत में फलश्रुति का पाठ करते हैं- 
आदित्यस्य नमस्कारान् य कुर्वन्ति दिने दिने।
आयुप्र्रज्ञा बलं वीर्यं, तेजस् तेषां च जायते।।
जो सूर्यनमस्कार का प्रतिदिन अभ्यास करते हैं, उनको आयु, वीर्य, बल, प्रज्ञा तथा तेज की प्राप्ति होती है। आइए, हम सामूहिक अभ्यास से मां भारती को यह सब अर्पित करें ताकि वह विश्वगुरु पद की नियति को प्राप्त कर सके।

फ़रवरी 9, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , | 6 टिप्पणियाँ

सदाचार अर्थात सेवा में पहले मै और सुविधा में पहले आप!

गढ़े जीवन अपना अपना -19

राजा की सवारी निकली थी। आगे आगे सेना की एक टुकड़ी मार्ग में आनेवाले लोगों को रोककर मार्ग खाली करने के काम पर लगी थी। एक महात्मा बीच रास्ते में बैठे थे। अपनी ही मस्ती में थे। एक सैनिक उनके पास जाकर चिल्लाया, ‘‘उठो! रास्ता खाली करो!! राजा की सवारी आ रही है।’’ महात्मा हटे नहीं और उस सैनिक से पूछा, ‘‘तूम कौन हो?’’ अपना गणवेष दिखाकर बोला, ‘‘मूझे नहीं जानते? मै राजा की विशेष रक्षा वाहिनी का सिपाही हूँ। हटो!    नहीं तो. . .’’ महात्मा ने मुस्कुराकर कहा, ‘‘तभी’’। सिपाही कुछ समझा नहीं, अपने सुभेदार को ले आया। सुभेदार अकड़कर बोला, ‘‘ना जाने कहाँ कहाँ से आ जाते है भीखमंगे? अरे इतनी सी बात नहीं समझते, राजा की सवारी आ रही है। फूटों यहाँ से! दीखना मत कही आसपास भी।’’ महात्मा ने फिर पुछा, ‘‘तुम कौन?’’ सुभेदारी का परिचय पाकर फिर वही टिप्पणी की, ‘‘तभी!’’ जब महात्मा फिर ध्यानमग्न हो गये और राह से ड़िगे नहीं तो सेनापति आया। ठसन तो थी पर भाषा सभ्य थी, ‘‘महात्माजी हमारी विवशता को समझे, आप नहीं हटेंगे तो राजा की सवारी में विघ्न आयेगा। कृपया राह दें।’’ महात्मा ने फिर परिचय मांगा और परिचय पाने पर फिर वही, ‘‘तभी!’’ अब मंत्री की बारी थी मन्त्री ने प्रणाम कर बड़ी विनम्रता से राह छोड़ने की प्रार्थना की। राजा के गन्तव्य का महत्व भी बताया और राष्ट्रीय आवश्यकता की भी दूहाई दी। महात्मा ने मुस्कुराकर परिचय पूछा। पता चलने पर फिर, ‘‘तभी!’’ अब बात राजा तक पहुँची। महात्मा है कि हटता नहीं और केवल ‘तभी’ ‘तभी’ कहता है। राजा ने रथ से उतरकर साष्टांग दण्डवत किया और महात्मा का आशिर्वाद मांगा। कहा, ‘‘मै राह बदलकर चला जाउंगा पर जिस कार्य पर जा रहा हूँ उसकी सफलता का आशिष दें।’’ महात्मा केवल मुस्कुराये और परिचय पुछा। राजा ने उत्तर दिया, ‘‘महाराज प्रजा का सेवक हूँ। धर्म के अनुसार राज्यपालन का दायित्व है।’’ महात्मा मुस्कुराये और आशिर्वाद का हाथ उठाकर बोले, ‘‘तभी!’’

राजा मार्ग बदलकर आगे बढ़ा। रथ में साथ विराजमान राजगुरु से बोला, ‘‘इस ‘तभी’ का क्या रहस्य है?’’ राजगुरु ने समझाया, ‘‘अपने आप में तो ‘तभी’ कुछ नहीं कहता पर उसके पूर्व के विधान के साथ जोड़कर देखे तो पता चलेगा। सिपाही हो ‘तभी’। सुभेदार हो ‘तभी’। सबके स्तर के अनुसार उनके व्यवहार पर यह टिप्पणी थी। राजन् महात्मा ने अपने ‘तभी’ से सदाचार पर भाष्य किया है। व्यक्ति का शील ही उसका वास्तविक परिचय है। यह शील उसके व्यवहार में झलकता है। आप राजन् है, विनम्रता और सेवाभाव आपका शील है। ‘तभी’ ! इसको उलटा देखने से भी बड़ी शिक्षा मिलती है। उद्दण्ड व्यवहार है तभी केवल सिपाही हो। ठसन है तभी सुभेदार हो। विनम्रता है पर पूर्ण अधिकार नहीं तभी मंत्री हो।’’ राजा मन ही मन गुनगुनाता रहा ‘तभी’।

हमको भी अपने जीवन का ‘तभी’ समझना होगा। अपने व्यवहार का सदा अवलोकन करते रहना होगा। महात्मा जैसे स्पष्ट बोलनेवाले लोग तो मिलेंगे नहीं पर मन ही मन सभी कहेंगे ‘तभी’। और नियती तो कहेगी ही। हमारे शील से ही हमारे मार्ग प्रशस्त होंगे। हमारा आचरण ही हमारा परिचय है। शास्त्र कहते है, ‘‘आचार प्रभवो धर्मः’’। आचरण से ही धर्म जीवित रहता है। अतः हमारे शील को बनानेवाले हमारे राष्ट्रीय जीवनमूल्य हमारे व्यवहार में उतरेंगे तभी धर्म जागृत रहेगा। हम इस सदाचार के कुछ सूत्रो की चर्चा ही कर सकते है। पूरी सूचि बनाना ना तो व्यावहारिक है ओर ना ही आवश्यक। भारत में जन्मा हर व्यक्ति सुशील होने का मर्म तो जानता ही है। प्रयत्न भी करता है। संगती और तथाकथित आधुनिकता के चक्कर में भूल गया होगा तब भी कुछ संकेत मात्र संचित स्मृति को चलित कर शील को आचरण में लाने के लिये पर्याप्त होंगे।

सदाचार मनसा, वाचा, कर्मणा होता है। अपने विचार, वचन और व्यवहार तीनों में जीवनमूल्य परिलक्षित होने चाहिये। केवल दिखावे का सदाचार (Manners & Etiquette) अपेक्षित नहीं है। प्रशिक्षण से अपनाया बनावटी, दिखावे का व्यवहार तात्कालिक प्रभाव तो ड़ाल सकता है पर हृदय को जीतने की क्षमता तो अंतरमन से सुशील होने पर ही आयेगी।

मानव की एकात्मता का जीवनमूल्य सदाचार में परिलक्षित होता है बड़ों के सम्मान और आदर से, पशु-पक्षी पेड़-पौधों के प्रति अनुकम्पा से। जब हम उनमें भी अपने ही अंग होने की आत्मीयता का अनुभव करते है तब सबके साथ उसी आत्मभाव से व्यवहार भी करते है। राह चलते, बस-रेल में कहीं भी दुसरों की सुविधा का ध्यान रखनेवाला व्यवहार हो जाता है। अनावश्यक फूलों को तोड़ना, सहज ही मसल देना, राह चलते आवारा कुत्ते या बकरी को पीड़ा पहुँचाना ये सब स्वतः ही बन्द हो जाता है। पौधे के पत्ते तोड़ने के लिये बढ़ा हाथ किसी के द्वारा अपने कान उमेठने की वेदना को याद कर स्वतः ही रुक जाता है। अति की भी अपेक्षा नहीं है कि आवारा कुत्ते को ही घर ले आये और माँ को नाराज कर दिया। माँ से भी तो आत्मीयता है ना? उसके भाव को भी तो समझना है। फिर हमारे मन में उठी अनुकम्पा का क्या करें? सभी शहरों में आवारा पशुओं की देखभाल के लिये शासकीय और स्वयंसेवी दोनों प्रकार की व्यवस्था होती है। उसकी जानकारी प्राप्त करें और वहाँ तक सूचना पहुँचाये। पीछे पड़कर व्यवस्था होने तक अनुवर्तन करें। अब इतनी बात पर्याप्त है बाकि जब अपने पांव में ठोकर लगती है तो हम उपचार का मार्ग ढूँढ ही लेते है ना? तो जब यही आत्मीयता का भाव होगा तो उसे व्यवहार में उतारने के नव नवीन रास्ते स्वतः सर्जकता से खोज लेंगे।

आधुनिक जीवन में पर्यावरण से लेकर मनुष्यमात्र को जो सर्वाधिक हानी हो रही है वह ऊर्जा एवं अन्य संसाधनों के व्यर्थ जाया करने से हो रही है। हमारी पूरी जीवनशैली ही बिजली पर निर्भर हो गई है। अब हम इस जीवनचर्या को वापिस पूर्णतः प्राकृतिक मार्ग पर तो नहीं लौटा सकते। किन्तु, अस्तीत्व की एकात्मता के जीवनमूल्य को सदाचार में उतारते हुए इतना तो कर ही सकते है कि ऊर्जा की बचत के लिये हर सम्भव उपाय करें। छोटी छोटी आदतों से यह सम्भव है जैसे कमरा छोड़ते समय लाइट, पंखा बन्द करना, पानी का संयम से उपयोग करना आदि।

त्याग का जीवनमूल्य तो पग पग पर प्रगट होता है। हमने देखा था कि त्याग का कर्मरुप सेवा है। सेवा स्वतःस्फूर्त होनी चाहिये। शील प्रगट होता है पहल में। सामने कार्य देखकर स्वतः ही, बिना किसी के कहे, फुर्ति से हम उठ पड़े। आज्ञापालन तो करना ही चाहिये किन्तु घर आये अतिथि को पानी पिलाने के लिये हर बार माँ या पिताजी को आज्ञा देनी पड़े तो समझना होगा कि कुछ गड़बड़ है। ये तो सेवा के छोटे छोटे अवसर हैं इन्हें तो उत्साहपूर्वक हथियाना चाहिये। इससे पहले की अपने भाई या बहन में से कोई और काम करें, हमें कर लेना चाहिये। सच्चा सेवक तो वही होता है जो दरी बिछाने और उठाने में सहजस्फूर्त उत्साही हो। सेवामें सबसे आगे रहना तो ठीक है पर सुशील व्यक्ति सुविधा में ऐसी प्रतिस्पद्र्धा नहीं करता। वहाँ तो उसका मन्त्र होता ‘मै नहीं तू ही।’ विद्यालय में एकसाथ अवकाश होने पर पानी पीने के लिये झुम्बड़ लगती है। बस में से उतरते समय पता है सब उतरेंगे फिर भी धक्का देते है। सदाचारी छात्र तो पहले दूसरे को अवसर देंगे। स्वतः अनुशासन आ जायेगा।

सेवा में पहले मै और सुविधा में पहले आप।

नवम्बर 25, 2012 Posted by | आलेख | , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

अभ्यास भैया अभ्यास!

गढ़े जीवन अपना अपना -16
आधी रात का समय था। हस्तिनापुर के प्रासाद में सब ओर शांति थी। अर्जुन को लघुशंका के लिये जाना पड़ा। हाथ में मशाल लिये अर्जुन जब मैदान से लौट रहा था तो उसे भोजनालय में से कुछ खटपट की आवाज आई। जब जाकर के देखा तो भीम महाराज थाली में चावल का पहाड़ रचकर खा रहे थे। अर्जुन को देखकर सहम गये और अपनी सफाई देने लगे, ‘‘क्या है ना आप सब भाई थोड़ा थोड़ा खाकर अपना भोजन समाप्त कर देते हो। तो आपके साथ मुझे भी रुकना पड़ता है। पर पेट तो खाली ही रहता है। लज्जा के मारे मै भी उठ जाता हूँ। पर रात को इतनी भूख लगती है कि यहाँ आकर जो मिलता है वो खा लेता हूँ। अब माता कुंति को पता है तो वो मेरे लिये कुछ ज्यादा ही बचाकर रखती है। देखो बाकी लोगों को मत बताना। सब हसेंगे।’’ अर्जुन ने कहा, ‘‘मै आपकी समस्या समझ सकता हूँ। मै किसी को नहीं बताउंगा। पर मुझे एक प्रश्न है अंधेरे में आप खा कैसे लेते हो? हाथ सीधा मूह तक कैसे पहूँच जाता है? इधर उधर क्यों नहीं जाता?’’ भीम खिलखिलाकर हँस पड़े, ‘‘अभ्यास भैया अभ्यास! आचार्य बताते है ना सब कुशलता अभ्यास से ही आयेगी। तुम धनुर्विद्या का अभ्यास करते हो मै खादविद्या का।’’ अर्जुन को मन्त्र मिल गया – ‘अभ्यास भैया अभ्यास!’ और उसने रात को धनुर्विद्या का अभ्यास करना प्रारम्भ किया और अन्धेरे में भी निशाना लगाने में निष्णात हो गया।

केवल कुशलता ही नहीं व्यक्तित्व के सारे बाह्य आयाम बल, रुप, स्वास्थ व कौशल सभी अभ्यास के द्वारा ही विकसित किये जा सकते है। अभ्यास को योग में भी वैराग्य के साथ सबसे अधिक महत्व का साधन माना गया है। महर्षि पतंजलि अभ्यास की व्याख्या करते है ‘‘स तु दीर्घकाल नैरन्तर्य सत्कारसेवितो दृढ़भुमि।’’ हम बहुत अधिक तकनिकी चर्चा नहीं करेंगे। हमारे व्यावहारिक प्रयोग के लिये अभ्यास के तीन अंगों का समझना पर्याप्त है। अभ्यास किसका करना है – एकाग्रता का। कैसे करना है अनुशासन से करना है। और कब करना है सातत्य से करना है दीर्घकाल तक। स्वामी विवेकानन्द के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के पास असीम शक्ति है। किन्तु कौन व्यक्ति कितनी शक्ति का अपने जीवन में लक्ष्य प्राप्ति की ओर प्रयोग कर पाता है ये इस बात पर निर्भर करता है कि किसके पास कितनी एकाग्र होने की क्षमता है। एकाग्रता की क्षमता प्रत्येक में होती है। अभ्यास से उसको बढ़ाया भी जा सकता है और अधिक प्रभावी भी बनाया सकता है। मन में प्रचण्ड ताकद है पर वह बिखरी हुई होने के कारण चरित्र के विकास में साधक नहीं हो सकती। यदि हम इस मन को एकाग्र होने का प्रशिक्षण प्रदान करते है तो यह मन की शक्ति दृढ़भूमि बनकर ईच्छाशक्ति बन जाती है।

आसन, प्राणायाम या सूर्यनमस्कार योग के इन सभी अभ्यासों में मूलतः मन को एकाग्र करने का ही अभ्यास होता है। त्राटक जैसे विशेष शुद्धिक्रिया भी सीख सकते है जो सीधे मन की एकाग्रता को बढ़ाती है। इन सब को सूयोग्य प्रशिक्षित शिक्षकों के मार्गदर्शन में सीखकर बाद में ही किया जा सकता है। धारणा-ध्यान आदि आंतरिक योग के साधन एकाग्रता में प्रशिक्षित होने के बाद ही सम्भव हो पाते है। पर एकाग्रता को अपने व्यक्तित्व का अंग बनाने का सबसे सरल मार्ग है खेल। मैदानी खेलों में मन की एकाग्रता का सहज और आनन्द के साथ विकास होता है। इसलिये पढ़ाई में भी यदि सबसे आगे बढ़ना हे तो खेल का अभ्यास प्रारम्भ कर दो। हाँ नियमितता से अभ्यास।

ये नियमितता भी तो अभ्यास से ही आती है। अनुशासन के अभ्यास से। अनुशासन अर्थात स्वयं का स्वयं पर शासन। जो व्यक्ति किसी और के अधीन नहीं रहना चाहता है उसे अनुशासित होना होगा। अनुशासन स्वयं के प्रति सम्मान का प्रगटीकरण है। जो खुद से प्यार करता है वह अपने जीवन को सहज ही अनुशासित कर लेता है। अनुशासित व्यक्ति अपने आप में बड़ा ही स्वतन्त्र हो जाता है। युवाओं के मन में ये बहुत बड़ी गलतफहमी होती है कि अनुशासनहीन होने में आनन्द है। वास्तव में यदि आप समय और शरीर को अनुशासित कर सकें तो आप पायेंगे की आपके पास जो चाहे वो करने के लिये पर्याप्त समय भी होता है, सामथ्र्य भी और विकल्प चूनने की स्वतन्त्रता भी। अनुशासित छात्र पढ़ाई नियमित करता है तो बकाया (Pending) काम कुछ भी ना रहने से कम समय में ही मुक्त हो जाता है और फिर परीक्षा के मध्य भी अपनी रूचि के अनुसार खेल अथवा मनोरंजन के लिये समय निकाल लेता है।

समयपालन, आज्ञापालन और सुव्यवस्था ये अनुशासन के अभ्यास के तीन मार्ग हैं। हम स्वयं तय करके समयपालन करें यह अपने जीवन का सम्मान है। यदि हम किसी से समय तय करें तो उसका कड़ाई से पालन करें स्वयं के गठन के लिये। कहते है नेपोलियन ने महत्वपूर्ण मन्त्रणा के लिये रखे भोज में सेनापति को देरी होने पर अकेले ही भोजन कर लिया और बादमें भूखे पेट ही मन्त्रणा प्रारम्भ कर दी। किसी के यह कहने पर कि 20 सेकण्ड ही तो देरी हुई थी उत्तर दिया कि ‘‘रणभूमि में 20 सेकण्ड का अन्तर जीवन और मृत्यु के मध्य का अन्तर होगा। और इससे भी अधिक महत्व की बात है कि यह विजय और पराजय के बीच का भी अन्तर होगा।मै विजय की आदत डालना चाहता हूँ। उसका प्रारम्भ समयपालन की आदत से होता है।’’

आज्ञापालन मन को अनुशासित करता है और बल, रूप स्वास्थ्य और कुशलता में यह अनिवार्य है। आज्ञा के रुप में मन के विरूद्ध बात को भी किया जाता है तब उसे आज्ञापालन कहते है। यदि पहलवान मन की माने और शरीर को कष्ट देनेवाले व्यायाम से कतराये ते कैसे बलवान् होगा। पर यदि वह प्रशिक्षक की आज्ञा का पालन कर मन की कमजोरी को जीत ले तो अवश्य अपराजेय हो जायेगा। इसलिये जीवन में विजयी व्यक्तित्व को गढ़ना है तो मनमानी नहीं चलेगी, आज्ञामानी ही दौड़ेगी। तो हर बार कार्य करते समय स्वयं को पूछे मनमानी या आज्ञामानी?

सुन्दरता के लिये शारीरिक अनुशासन अर्थात सुव्यवस्था अत्यावश्यक है। आकर्षक चुम्बकत्व आयनों के अनुशासित होने से आता है यह हमने देखा था। इसका अभ्यास हमें अपने स्वामीत्व की हर वस्तु को सुव्यवस्थित करने से करना होगा। जिस चीज को हम अपना कह देते है उसके साथ अपने अहं के माध्यम से हम अपने चरित्र को जोड़ देते है। अर्थात हमारे कपड़े, पुस्तके, जूते-चप्पल, गाडी, खेल के उपकरण, गुड्डा-गुड्डी जिसे भी हम हमारा कहते है सब हमारे व्यक्तित्व को ना केवल दर्शाते है अपितु गढ़ते भी है। अतः शारीरिक अनुशासन का प्रारम्भ इन चीजों को व्यवस्थित करने से होता है। पुस्तके, कपड़े साफ-स्वच्छ, सुन्दर रखने में जो प्रयास लगेगा वो हमारे मन को भी सुन्दर कर देगा। अव्यवस्था से व्यवस्था और व्यवस्था से सुव्यवस्था का प्रवास जीवन को सुन्दरता और सहज निर्मलता की ओर ले जाता है।

एकाग्रता और अनुशासन के साथ ही अभ्यास का सबसे श्रेष्ठ अंग है -सातत्य। महर्षि पतंजलि ने जिसे नैरन्तर्य कहा है- निरन्तरता। इसकी चर्चा को अभी निरन्तर रखते है अगले सप्ताह के लिये। तब तक पहले दो अंगों का तो अभ्यास प्रारम्भ कर ले। भीम सा बल, अर्जुन सा रूप और दोनों का स्वास्थ्य और कौशल पाने का एक ही तो मन्त्र है ‘‘अभ्यास भैया अभ्यास!’’

मार्च 19, 2012 Posted by | आलेख | , , , , , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

प्राणवान ही पूर्ण स्वस्थ

गढ़े जीवन अपना अपना -14
आद्य क्रांतिकारी वासुदेव बलवन्त फडके को जेल में बंद रखना भी सम्भव नहीं था। जेल से भागने के लिये उन्होंने कोई बहुत बड़ी योजना नहीं बनाई। उनका अपनी शक्ति पर विश्वास था। उन्होंने अपनी कोटरी के आगे लगे सलाखों के जाल को दोनों हाथों से पकड़कर उखाड़ लिया और फिर उसे उठाकर ही दौड़ पड़े। उसी फाटक को जेल की दिवार से सटाकर खड़ा किया और उसी की सीढ़ी बनाकर दिवार फांद गये। जंगल में फिर भीलों की सेना बनाई और क्रांति का कार्य जारी रखा। कोई उन्हें कभी पकड़ ही नहीं पाता यदि वे बुखार से पीड़ित नहीं हो जाते। ज्वर ने ऐसा घेरा कि मंदिर में नींद में ही बेहोश हो गये। तब अंगरेज सेनापति सोते वासुदेव की छाती पर सवार हो गया। फिर भी होश आते ही उसे धक्का देकर गीरा दिया। पर शस्त्र निकाल लिये गये थे और कमजोरी भी इतनी थी कि भागना सम्भव नहीं था इसलिये पकड़े गये।

बाघा जतीन भी बालासोर के जंगलों में 9 सितम्बर 1915 को अंगेजों से लड़ते हुए मरणांतक घायल हुए और दूसरे दिन अस्पताल में उन्होंने अंतिम श्वास ली। उससे पहले 4 दिन से बारीश के बीच जंगल में भागते भागते उन्हें भी बुखार चढ़ गया था और इस ज्वर में लड़ने के कारण ही वे अंग्रेजों के शिकार हो गये। यदि स्वास्थ्य साथ देता तो शायद इन दोनों क्रांतिकारियों का कार्य और अधिक आगे बढ़ता। इसी महत्व को ध्यान में रखते हुए लोकमान्य बाल गंगाधर टिळक ने 11 वी कक्षा के बाद अपनी पढ़ाई में से एक वर्ष का विराम लेकर योग व्यायाम आदि के द्वारा पूर्ण स्वास्थ्य को प्राप्त किया। इसी के चलते मण्डाले में घोर शारीरिक यातनाओं के बाद भी वो पूरे बल के साथ राष्ट्र का नेतृत्व करने लौट सके।

जीवन को गढ़ने की प्रक्रिया में व्यक्तित्व विकास के बाहरी आयामों में बल और रुप के बाद तीसरा है – स्वास्थ्य। यह केवल शरीर के स्तर पर ही नहीं है। पूरे व्यक्तित्व का ही स्वस्थ होना अत्यन्त आवश्यक है। व्यक्तित्व के पांचों स्तर – शरीर, मन, भाव, बुद्धि तथा आध्यात्मिक स्तर पर स्वस्थ होना चरित्र के सम्यक विकास के लिये अनिवार्य है। सामान्यतः निरोगी होने अर्थात रोग ना होने को ही स्वास्थ्य समझा जाता है। पर वास्तव में स्वस्थ होना एक सकारात्मक विधा है। स्वामी विवेकानन्द ने लण्डन में दिये एक व्याख्यान में कहा कि ‘हम भारतीय इतने आध्यात्मिक हैं कि जब एक-दूसरे से मिलते है तब अभिवादन में भी गहरा प्रश्न पूछते है।’ उन्होंने अंग्रेजी में वह प्रश्न बताया – Are you upon yourself? अर्थात क्या आप अपने आप में स्थित है? भिन्न भिन्न भाषाओं में अभिवादनों को देखने पर इस अर्थ का कोई सीधा अभिवादन ध्यान में नहीं आता है। पर अभिवादन के साथ सामान्यतः हम स्वास्थ्य की पृच्छा करते है। ‘क्या आप स्वस्थ है?’ यदि संस्कृत में संधि तोड़कर देखे तो ‘क्या आप स्व में, -अपने आप में स्थित है?’  भारत में ‘स्व में स्थित होने’ को ही स्वस्थ होना मानते है।

स्व में स्थित होना केवल आध्यात्मिक ही नहीं व्यक्तित्व के सभी स्तरों पर होता है और इन स्तरों के आपसी संबन्ध में भी। जैसे मन और शरीर का सीधा सम्बन्ध है। मन प्रसन्न हो तो शरीर भी स्वस्थ होता है। भावों के असंतुलित होने से श्वसन, पाचन, रक्तदाब जैसी सामान्य शारीरिक प्रक्रियाएँ भी बाधित होती है। अतः पूर्ण रुप से स्वस्थ रहने के लिये इन सब स्तरों को जोड़नेवाले तत्व को समझना पड़ेगा। छान्दोग्य उपनिषद् में रेक्व महामूनि की कथा आती है। केवल 15 वर्ष की आयु में विश्व में व्याप्त शक्ति को समझने के लिये तप किया और तत्व का साक्षात्कार भी किया – ‘यथा ब्रह्माण्डे वायु तथा पिण्डे प्राणः’। जैसे सारे जगत में वायु व्याप्त है उसी प्रकार व्यक्तित्व में प्राण सर्वव्यापी है। बिना वायु के कोई स्थान नहीं रह सकता वैसे ही प्राण का भी निर्बाध प्रवाह चलना अनिवार्य है। मन और शरीर को जोड़ने वाला भी प्राण ही है। अतः स्वस्थ होने का अर्थ है प्राणवान होना। प्राण अर्थात जीवनी उर्जा। इस उर्जा की मात्रा (Quantity) तथा गुण (Quality) दोनों स्वास्थ्य के प्रमुख कारक हैं।

प्राण का एकमात्र स्रोत सूर्य है। सूर्य से ही हमें प्राणउर्जा प्राप्त होता है। भोजन में भी जो शक्ति हम पाते है वह भी सूर्य की ही उर्जा होती है। वनस्पति सूर्य की उर्जा को अन्न में परिवर्तित करती है। शाकाहारी भोजन में हमे यह प्राण सीधे प्राप्त होता है। मांसाहारी भोजन में यह परोक्ष रुप से ही प्राप्त होती है क्योंकि अधिकतर जिन प्राणियों का मांस खाया जाता है वे स्वयं शाकाहारी होते है अतः उनके द्वारा वनस्पति से प्राप्त सूर्य के प्राणों को द्वितीय चरण में मनुष्य उनके मांस से प्राप्त करते है। अतः मांसाहार में मात्रा एवं गुण दोनों स्तरों पर प्राण का ह्रास होता है। भोजन से अधिकतम प्राण की उर्जा प्राप्त करने के लिये ताजा भोजन सर्वाधिक उपयोगी होता है।

पारम्पारिक ज्ञान की दृष्टि से प्राण 3 गुणों से भावित होता है। सात्विक, राजसिक व तामसिक। किन्तु आधुनिक समय में इन सब तकनिकी बातों में उलझने के स्थान पर शुद्धि एवं ताजगी का ध्यान रखना ही पर्याप्त होगा। प्राण की पर्याप्त प्राप्ति के साथ ही उसके समुचित प्रयोग एवं अपव्यय को रोकना भी आवश्यक है। प्राण के सम्यक प्रयोग के लिये हमारी प्रणालियों, खासकर श्वसन तथा पाचन की प्रणालियों का सुदृढ़ होना जरूरी होगा। इन सब के लिये अपनी क्षमता के अनुसार नियमित व्यायाम करना चाहिये। प्राण का अपव्यय मन के स्तर पर सर्वाधिक होता है अतः अपनी आदतों को संयमित करने से ही हम अधिक प्राणवान हो सकते है। अपव्यय को रोकने का दूसरा प्रभावी माध्याम है सही विश्राम। हम सोते भले ही 8 घण्टे हो पर विश्राम पूरा नहीं पाते है। इसीलिये तो पूरे रात की नीन्द के बाद भी सुबह उठने पर ताजगी के अनुभव की जगह और कुछ समय सोने की ईच्छा बनी रहती है। सब बच्चे माँ से यही कहते है ‘पांच मिनट और . . .’ सोने से पूर्ण आराम पाने के लिये गहरी नीन्द होना आवश्यक है। इसके लिये सरल उपाय है सोने से पूर्व हाथ पांव धोना। मन को शांत करने के लिये जप, प्राणायाम अथवा किसी भावात्मक पुस्तक का स्वाध्याय। योग में प्रशिक्षित लोग शवासन तथा योगनिद्रा का भी प्रयोग समयक विश्राम द्वारा प्राण संरक्षण के लिये कर सकते है।

प्राण की प्रचुरता से ही व्यक्तित्व के सभी स्तर निरामय होते है और पूर्ण स्वास्थ्य का लाभ मिलता है। प्रतिरोधी प्रणाली के समर्थ होने के कारण रोग पास ही नही फटकेंगे अतः निरोगी होने का सह उत्पाद (By-Product) भी प्राप्त होगा। पर ये ध्यान रखना चाहिये की योग एवं अन्य साधनाओं का उद्देश्य पूर्ण स्वास्थ्यलाभ से चरित्र का विकास है ना कि रोगों से छुटकारा। अन्यथा स्थिति उस साधक की तरहा होगी जो शिवरात्रि के दिन पूरी रात जागकर चारो याम पूजन करता है। सुबह शिवजी प्रसन्न होकर दर्शन देते है और कहते है ‘मांगो जो वरदान मांगना हो।’ कुछ देर पहले ही साधक के पीठ पर एक कीड़ा काटा है और ऐसी जगह खुजली हो रही है जहाँ हाथ भी नहीं पहुँच पा रहा। तो जब शिवजी प्रगट हुए तब सबसे बड़ी समस्या पीठ की खुजली है। अतः शिवजी से वर भी मांगा तो यही कि खुजली मिटा दो। जो सर्वकल्याणकारी शंकर सबकुछ दे सकता है उनके वर को केवल खुजली मिटाने में व्यर्थ गवांने के समान ही मूर्खता है रोगमुक्ति के लिये योग करना।

याद रहे! प्राणवान होना ही पूर्ण स्वास्थ है केवल निरोगी होना नहीं।

फ़रवरी 11, 2012 Posted by | आलेख | , , , , | 4 टिप्पणियाँ

सफलता की चाह नहीं! चिरविजय का पराक्रम !!

कर्मयोग 10:
‘‘हर कोई सफल होना चाहता है। पर क्या यह सम्भव है? आपकी गीता क्या कहती है?’’ युवाओं की जिज्ञासायें विद्रोह के आवरण में ही व्यक्त होती है। पर भाईजी को तो इस प्रकार की आपत्तियों को झेलने का पुराना अभ्यास है। उन्हें पता था युवक की बात अभी पूरी नहीं हुई है अतः वे केवल हँस दिये। प्रश्नकर्ता ने कहा, ‘‘मुझे पता है आप कहेंगे सच्ची सफलता अलग होती है। सफलता का अर्थ क्या है? आदि आदि। पर जब आप कहते है कि गीता जीवन का मार्गदर्शन करती है तो फिर इस बारे में भी तो कुछ होगा ना उसमें?’’

भाईजी ने कहा गीता में सफलता के बारे में कुछ कैसे हो सकता है? गीता तो कहती है आपका कर्म पर तो पूरा अधिकार है किंतु फल पर कोई अधिकार ही नहीं है। जब फल पर अधिकार ही नहीं है तो फिर स-फल अर्थात फल पाने वाले होने का क्या अर्थ हुआ? गीता तो कहती है – न मे कर्मफले स्पृहा।। कर्मफल के प्रति कोई लिप्सा नहीं है। हमारी पारम्पारिक व्रत कथाओं में इससे अधिक गहरे पद का प्रयोग होता है। सुफल – अच्छा फल। हमारे व्रत का परिणाम अच्छे फल को देनेवाला हो ऐसी प्रार्थना है। सु-फल कौनसा होगा यह प्रत्येक की स्थिति पर निर्भर करेगा। देवताओं की स्तुति में किये जानेवाले स्तोत्रों के अंत में फलश्रृति आती है जिसमे अक्सर यह प्रार्थना होती है – विद्यार्थि लभते विद्या, धनार्थि लभते धनम्। पुत्रार्थि लभते पुत्रान् मोक्षार्थि लभते गतिम्।। जिसको जो चाह हो उसको वो मिले। संत ज्ञानेश्वर ने तो इन्हीं शब्दों में पसायदान, प्रसाद मांगा है। जो जे वांछिल तो ते लाहो। प्राणिजात। ये तो बड़ी ही बढ़िया बात हुई। जो चाहो वो मिल जाये। गीता से तो ये ही अच्छा है। पर ज्ञानेश्वरी तो गीता की ही मराठी में व्याख्या है फिर इसके अंत में मांगे पसायदान में गीता के विपरित बात कैसे हो सकती है?  यह गीता के अनुसार ही है। गीता में भगवान कह रहे है – ये यथा माम् प्रपद्यन्ते तांस तथैव भजाम्यहम्। मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वशः।। गी 4.11।। जो जैसे भाव से पूजा करेगा वैसा ही ईश्वर को प्राप्त करेगा।

यह भाव कैसे आता है? हमारी मर्जी अथवा चाह भी हमारे भाव पर ही निर्भर करेगी। हम इसी के अनुरूप कार्य करेंगे। और उसी के अनुसार फल को प्राप्त करेंगे। हमारा कर्म ही हमारी पूजा है अतः उसका फल उस पूजा का प्रसाद। मन अपनी क्षमता, स्तर व योग्यता के अनुसार ही कामना करेगा। इन तीनों के सम्मिलित प्रभाव को हम हमारी स्थिति कह सकते है। गीता में इसके लिये बड़ा ही मार्मिक शब्द प्रयोग हुआ है -उपपत्ति। क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ न एतद् त्वयि उपपद्यते। गी 2.3।। कापुरूषता को मत प्राप्त हो अर्जुन। यह तेरी उपपत्ति नहीं है। सरल भाषा में तुम्हारे स्तर के व्यक्ति को यह शोभा नहीं देता। हमारी उपपत्ति के अनुसार किया कार्य ही हमें शोभा देता है। उपपत्ति का अर्थ है अंतिम लक्ष्य के सन्दर्भ में हमारी स्थिति। कहाँ तक हम पहुँचे हैं? किस स्थान पर बैठने की हमारी योग्यता है? इसी के अनुसार हमारा मन कामना करेगा। कर्म भी इस प्रकृति के अनुसार होंगे और फलकामना भी इसी की सीमा में होगी। कई बार कर्म करते समय हम अपनी उपपत्ति को भूल जाते है फिर भी उसी के अनुरूप फल की कामना करने लगते है। तब कर्म और परिणाम की अपेक्षा में विभेद हो जाता है। कर्म पर ध्यान दिये बिना केवल परिणाम की ईच्छा करना सामान्यतः इसे ही सफलता की चाह माना जाता है। ये चाह हमेशा मर्यादित, सीमित ही होगी। अतः इसके पूर्ण हो जाने से क्षणिक आवेशयुक्त सुख का अनुभव भले ही हो, संतोष नहीं मिलेगा। क्योंकि हमे अपनी प्रकृति की सीमा से परे जोने में ही संतोष मिलता है। कर्म प्रकृति के वशी भूत होकर चलता है तो कामनापूर्ति भी सुख नहीं देती। अंग्रजी शब्द Success का भी शाब्दिक अर्थ है -‘के पार जाना’। अपने लक्ष्य को पार करना अथवा अपनी क्षमता की सीमा को पार पाना या फिर बाधाओं पर पार पाना इसे ही वास्तव में Success माना गया है। तो हिन्दी में इसका सही अनुवाद होगा विजय। प्रकृति पर विजय। अपनी स्वाभविक सीमा पर विजय। प्रकृति पर विजय उसके विपरित जाकर नहीं हो सकती। अपनी प्रकृति के अनुरूप कर्म करते हुए ही उसके पार जाया जा सकता है।

प्रकृति के दो मोटे मोटे वर्ग किये गये है- प्रवृत्तिं च निवृत्तिंच। प्रवृत्ति अर्थात कामनाओं की ओर मन की गति। निवृत्ति अर्थात कामनाओं से वैराग्य की ओर मन की स्वभावतः गति। हमे अपनी स्थिति इन दो में से किस ओर अधिक है यह देखना चाहिये ताकि इसके अनुरूप हम अपने लिये सही कर्म मार्ग चुन सकें। यदि हमारा मन अधिक बहिर्मुख है। बाहरी बातों में अधिक रमता है। ईच्छाओं में इन्द्रियों के सुख के लिये अधिक लालायित होता है तो मानना होगा कि हमारे लिये प्रवृत्ति मार्ग ठीक है। यदि किसी उदात्त ध्येय के लिये काम करते हुए इन सुखों का त्याग करने में आनन्द का अनुभव होता है। स्वयं को भूला देने वाले कार्य में मन अधिक रमता है। स्वयं से अधिक औरों के हित में विचार करने का मन है तो फिर हम कह सकते है कि हमारी गति वैराग्य की ओर है और हमारे लिये निवृत्ति मार्ग श्रेयस्कर है। ‘श्रेय’ इस शब्द का गीता में बार बार प्रयोग हुआ है। कामना, वासना या इच्छा से कर्म का निर्धारण नहीं होगा। हमारी प्रकृति के अनुरूप जो हमारे लिये श्रेय की ओर ले जानेवाला है वही हमारा कर्तव्य है।
गीता के प्रथम अध्याय में अपने मन के सम्भ्रम का वर्णन करते समय भी अर्जुन प्रारम्भ इसी से करता है।

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। न च श्रेयोनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे।। गी 1.31।।  हे केशव सारे लक्षण मुझे अपने विपरित दिखाई पड़ते है। इस युद्ध में अपने स्वजनों को मारने में मै कोई श्रेय नहीं देखता हूँ। आगे पूरा वर्णन इसी क्रम में है कि किस प्रकार यह युद्ध धर्म का नाश करेगा अतः श्रेयस्कर – श्रेय की ओर ले जाने वाला नहीं है। इसलिये मै युद्ध नहीं करूंगा। श्रेय ही अर्जुन का तर्क है। फिर भगवान द्वारा उपपत्ति का भान करा दिये जाने पर अपने भय व भ्रम का साक्षात्कार हो जाने पर जब अर्जुन शरणागति से शिष्यत्व ग्रहण करता हे तब फिर श्रेय का उल्लेख है। कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः। यत् श्रेयः स्यात् निश्चितं ब्रुहि तन्मे शिष्यस्तेSहम शाधि माम् त्वां प्रपन्नं।।गी 2.7।।  भय के कारण मेरा स्वभाव कृपणता अर्थात संकुचितता से ढ़क गया है और इसके कारण मै अपने धर्म अर्थात कर्तव्य के प्रति भ्रमित हो गया हूँ। इसलिये मेरे लिये क्या श्रेयस्कर है वह निश्चित कर आप मुझे बताओ। मै आपका शिष्य हूँ और आपकी शरण आया हूँ। मेरी रक्षा करें। भगवान भी जीवन के यथार्थ का ज्ञान बताते है और फिर कहते है – धर्म्याद्धि युद्धाद् श्रेयो अन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते।। गी 2.31।।  धर्म की स्थापना के उद्देश्य से किये गये युद्ध से क्षत्रिय के लिये और अधिक श्रेयस्कर कुछ भी नहीं है। आगे के 6 श्लोंकों में स्वधर्म से पलायन के दुष्परिणामों का वर्णन करने के बाद अपने श्रेय के लिये युद्ध का आदेश देते है। तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय।। गी 2.37।। आगे भी जहाँ जहाँ शंका आई वहाँ वहाँ अर्जुन ने अपने लिये श्रेयस्कर क्या है यही पूछा है। तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोSहमाप्नुयाम्।। गी 3.2।।  अतः एक तय करके बता दो कि मेरे लिये क्या श्रेयस्कर होगा – कर्म का मार्ग या ज्ञान का मार्ग?

गीता श्रेय का मार्ग बताती है। श्रेय अर्थात जो श्री की ओर ले जाये। श्री को प्राप्त करने का मार्ग। श्री के कई अर्थ लगाये जाते है। सबसे प्रचलित अर्थ है – लक्ष्मी। इसी से श्रीमन्त अर्थात अमीर जैसे शब्द भी प्रचलित हुए। श्री का अर्थ केवल धन से लेना अधुरा ही होगा। श्री अर्थात परिपूर्णता के साथ समृद्धि। समृद्ध का अर्थ है जिसके पास सबकुछ है। भौतिक साधनसम्पन्नता के साथ ही आत्मिक सामथ्र्य भी। जो स्वावलम्बी होने के साथ ही औरों को भी आवश्यकतानुसार सम्बल देने की क्षमता व नियत दोनों का होना वास्तविक श्रीमन्ती है।

‘श्री’ का एक और अर्थ है – विद्या। किसी विषय का पूर्ण ज्ञान, स्वामीत्व होना विद्या है। केवल सैद्धान्तिक जानकारी ही नही अपितु पूर्ण व्यावहारिक ज्ञान भी। विद्वान अर्थात जिसके पास विद्या है। तो विद्वान होने का अर्थ केवल किसी विषय की व्याख्या करने की क्षमता से नहीं है अपितु आवश्यकतानुसार उसके प्रयोग का भी पूर्ण ज्ञान आवश्यक है। वाहनशास्त्र (Automobile) का विद्वान अभियन्ता (Engineer) यदि अपना स्वयं का वाहन ठीक नहीं कर सकता हो तो वह कैसा विद्वान? उससे तो वह अनपढ़ यन्त्री (Mechanic) अच्छा जो रासायनिक व भौतिक विज्ञान के सुत्र तो नहीं जानता जिससे वाहन चलता है किन्तु बन्द पड़े वाहन की तृटी को पहचान कर उसको ठीक करने का कौशल तो उसके पास है। विद्या का अर्थ ज्ञान व कौशल दोनों का समन्वय है। अतः श्री से युक्त -श्रीयुत का अर्थ होगा जो ज्ञानी होने के साथ ही व्यावहारिक भी है। विद्या का एक और शास्त्रीय वर्गीकरण भी है। परा विद्या व अपरा विद्या। पराविद्या वह आध्यात्मिक ज्ञान व विज्ञान है जो ईश्वर से सम्बंधित है। अर्थात ईश्वरसाक्षात्कार का ज्ञान व कौशल। अपरा विद्या में अन्य सभी भौतिक जगत के विषयों का ज्ञान आता है। ‘श्री’ पद में परा व अपरा दोनों विद्याओं का समावेश होता है।

श्रेय अर्थात श्री की ओर ले जानेवाला यह कहते समय श्री का अर्थ और अधिक गहन व परिपूर्ण लिया गया है। इसमें उपरोक्त दोनों अर्थों के साथ ही और भी अधिक समृद्धि की बात अभिप्रेत है। प्रत्येक की उपपत्ति के अनुसार उसका स्वभाव होता है। इस स्वभाव के अनुरूप उसके जीवन का विशिष्ठ लक्ष्य होता है। इस लक्ष्य को पाने हेतु उसे सामर्थ्य, क्षमता व विद्या के साथ ही सम्यक व्यवहार भी करना होता है। यह श्री है जिसे पाने की ओर अग्रेसर होना श्रेय कहलायेगा। तो हमारे लिये वह श्रेयस्कर होगा जो हमें अपने स्वधर्म की ओर ले जाये। ऐसा कर्म जो हमारे स्वधर्म को साकार करने में सहायक हो वही हमारा कर्तव्य कहलायेगा। ऐसे कर्तव्य पथ पर सब अग्रेसर हो ऐसी अपेक्षा है इसिलिये नाम के साथ श्री लगाने की परम्परा है। श्रीराम अर्थात श्री से युक्त राम। हम एक दुसरे के नाम में आदरपूर्वक श्री का प्रयोग करते है तब वह योग्यता वाचक भले ही ना हो किन्तु लक्ष्य का स्मरण करानेवाला तो होता ही है कि हमे श्री की ओर ही जाना है। इस ध्येयमार्ग को ही कठोपनिषद् में ‘श्रेयो मार्ग’ कहा है। आवश्यक नहीं की श्रेयो मार्ग प्रेयो मार्ग भी हो। यमराज तो नचिकेता को दिये उपदेश में दोनों को एक दूसरे के विपरीत बताते है। उनके अनुसार प्रवृत्ति की ओर जानेवाला इन्द्रिय सुख का मार्ग प्रेयो मार्ग है और निवृत्ति की ओर ले जानेवाला श्रेयो मार्ग जिसके बारे में अन्त में वे कहते है कि यह तलवार की धार पर चलने के समान कठीन मार्ग है। शुरस्य धारा निषिदा दुरत्यया। यमराज के उपदेश का विषय आत्मज्ञान होने के कारण ऐसा कहा होगा। किन्तु कर्मयोग में श्रेयगामी मार्ग सहज, स्वभावगत होने के कारण आनन्ददायी भी होता है। सुखकर होगा ही ऐसा नहीं किन्तु कल्याणकारी कष्ट भी तो आनन्द देता है। अपनी पूरी शक्ति के साथ दौड़ लगाकर स्वर्णपदक जीतनेवाला धावक पूरी थकान के बाद भी कितने आनन्द का अनुभव करता है। विजय प्राप्ति के लिये किया गया कष्ट भी आनन्ददायी होता है। यदि लक्ष्य का भान भूल जाये तब सुख-सुविधा से सम्पन्न जीवन भी उपर से चाहे जितना प्रिय लगे अर्थहीन होने के कारण उबाउ और थका देनेवाला ही होता है। जीवन में स्वभावानुसार सही कर्म चुना हो तब श्रेय मार्ग प्रियकर भी होता है। किन्तु यदि किसी समय संयम की शिथिलता के कारण श्रेय मार्ग पे्रय ना हो तब चुनाव अप्रिय होते हुए भी श्रेयका ही करना है। सामान्य सा उदाहरण मधुमेह के रोगी को मिठाई खाने की इच्छा का है। इसमें जो प्रिय है वो श्रेय नहीं है। अतः क्षणिक सुखकर होते हुये भी दीर्घतः दुखदायी है। सर्वदा सुख व आनन्ददायी तो श्रेयो मार्ग ही है।

श्री प्राप्त करने के लिये प्रयास ही विजय का प्रयास है। अपने जीवनध्येय को पहचान उसकी पूर्णता में स्वयं को पूरा झोंक देना चिरविजय का मार्ग है। जीवन संग्राम के छोटे छोटे संघर्षों पर विजय प्राप्त करने की आपाधापी में यदि हम जीवन के परमध्येय को भूल गये तो फिर सफल भले ही हो संतुष्ट नहीं होंगे। संतुष्टि तो चिरविजय में ही है। यह चिरविजय की कामना ही हमारे जीवन को गतिमान व ध्येयगामी बनाये रखती है। भारतीय संस्कृति प्रत्येक को उदात्त ध्येय की ओर ही प्रेरित करती है। जन्म जन्मांतर की अखण्डयात्रा में इस बार का जो पाड़ाव हमने पाया है वह हमारी उपपत्ति है। यहाँ तक पहुँचे है यह तो तय है। इसे ही प्रारब्ध भी कहते है। इसे नहीं बदल सकते पर चिंता की कोई बात नहीं यह हमारी सीमा थोड़े ही है। यदि अपनी उपपत्ति के अनुरूप श्रेयो मार्ग चुन लिया तो आगे बढ़ने की कोई सीमा नहीं है। शायर कहता है – सरे अक्स सितारों से आगे जहां और भी है। बुलन्दी परों की उड़ानों से आगे आसमां और भी है।
सफलता की चाह तो केवल सीमित परिणाम की नपुंसक अपेक्षा मात्र है। अपनी प्रकृति के अनुरूप कर्म करते समय अधिक और अधिक बड़े ध्येय को प्राप्त करने का पराक्रम करते रहना ही चिरविजय की कामना है।

जनवरी 19, 2012 Posted by | योग | , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

कोई शक या सवाल?

कर्मयोग 9:
प्रश्नों का गीता में बड़ा महत्व है। अर्जुन के प्रश्नों से ही गीता का प्रवाह आगे बढ़ता है। अन्यथा तो दूसरे अध्याय में भगवान ने अपनी बात पूरी ही कर ली है। जीवन में प्रश्नों का बड़ा महत्व है। ज्ञानप्राप्ति में उचित प्रश्नों का सही आदरयुक्त सेवाभाव से पूछा जाना आवश्यक होता है। कर्मयोग के रहस्यों को समझते समय हम यह भी कला विकसित करें ये आवश्यक है। मन में उठनेवाले हर प्रश्नवाचक विचार को ज्ञानकुंजी प्रश्न नहीं कहा जा सकता। अर्जुन जैसे सटीक प्रश्न मन में पकने देने होते है। सामान्यतः विचारश्रृंखला का प्रारम्भ जिज्ञासा से होता है। जिज्ञासा में हम ज्ञानप्राप्ति का प्रयत्न प्रारम्भ करते है। द्वितीय अध्याय में अर्जुन द्वारा स्थितःप्रज्ञ के लक्षणों के बारे में पूछना जिज्ञासा कि श्रेणी में आता है। कृष्ण द्वारा दूसरे अध्याय में प्रदत्त ज्ञानयोग व कर्मयोग के सिद्धांतों के आकलन से अर्जुन विषाद की स्थिति से बाहर आ गया है व जिज्ञासा को प्रगट कर रहा है। जिज्ञासा ज्ञान को ग्रहण करने की तत्परता को दर्शाती है। बिना जिज्ञासा के कितना भी श्रेष्ठ व्याख्याकार क्यों ना हो वह अपने उपदेश से तात्कालिक बौद्धिक क्षुधा शांति तो कर सकता है किन्तु ज्ञानदान नहीं। ज्ञानदान गुरु की योग्यता से भी अधिक शिष्य की तत्परता पर निर्भर करता है। इस जिज्ञासा को जागृत करना सच्चे गुरु का प्रथम कर्तव्य है।
किन्तु प्रथम प्रयास में सुने हुए उच्च सिद्धान्त कई बार हजम नहीं होते है। पूरा समाधान नहीं होता ऐसे में मन का भ्रम से सामना होता है। दो प्रगटतः परस्पर विरोधी सिद्धांतों में अपक्व बुद्धि भी सामंजस्य बैठाने का प्रयास करती है। पर हो नहीं पाता तब भ्रम होता है। भ्रमित मन से सटीक प्रश्न नहीं पूछे जा सकते किन्तु जब भ्रम की स्थिति में हम किसी से मार्गदर्शन पाने का प्रयत्न करते है तब गुरु कितना भी ज्ञानी व सुयोग्य क्यों ना हो मन में शंका ही प्रगट होती है। तीसरे अध्याय के प्रारम्भ में अर्जुन पूछता है
जायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन
तत् किं कर्मणी घोरे माम् नियोजयसि केशव।।गी 3.1।।
जब आप स्वयं ही कह रहे हो कि ज्ञान कर्म से अधिक श्रेष्ठ है तो फिर मूझे क्यों ऐसे भयंकर कर्म में धकेल रहे हो? यह सर्वाधिक सुयोग्य गुरु द्वारा प्रदत्त सर्वोच्च ज्ञान पर की गई शंका है। अगले श्लोक में तो अर्जुन स्पष्टता से अपने सम्भ्रम को मानता है और कृष्ण पर आरोप लगाता है कि आपकी मिश्रित बातों से ये हो रहा है।
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसिव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोSहमाप्नुयाम।।गी 3.2।।
ऐसी दोगली बातों से आप मेरी बुद्धि को भ्रमित कर रहे हो। कर्म करना श्रेष्ठ है अथवा ज्ञान के लिये कर्म का त्याग? इस संभ्रम और शंका में भी उसकी श्रद्धा अड़ीग है। अतः वह इस शंका की स्थिति में भी अपने शिष्यत्व को नहीं भूला है और कृष्ण से ही कह रहा है कि आप ही ऐसे में निश्चित करके बता दो कि मेरे लिये क्या श्रेयस्कर है?
महर्षि अरविन्द कहते है श्रद्धा कभी भी अन्ध नहीं होती ना ही बिना प्रश्न के विश्वास करने को कहती है। श्रद्धा में तो प्रश्न पूछने की स्वतन्त्रता है। शिष्य के मन में कोई भय नहीं है कि मूझे गलत समझा जायेगा। या मेरे द्वारा शंका प्रगट करने पर गुरु मेरे प्रति दूर्भाव धारण करेगा। यदि ऐसी आशंका में प्रश्न पूछने का संकोच हे तो यह श्रद्धा की कमी है। श्रद्धावान के मन में ना तो कोई भय है ना ही आशंका अथवा संकोच। बालक जिस प्रकार माता से निःसंकाच अपने मन की बात कह सकता है वैसे ही शिष्य अपने गुरु के सामने अपने अंतर की जिज्ञासा, भ्रम अथवा शंका को खुलकर प्रग्ट करता है। इस विश्वास के साथ कि यहाँ से उत्तर अवश्य मिलेगा। शंका का समाधान होगा। भ्रम का निरास होगा।
अर्जुन का कृष्ण से नितान्त स्नेह का सम्बन्ध है। इतना घनीष्ठ कि कोई दुराव या संकोच नहीं है। 11 वे अध्याय में विश्वरूप दर्शन के बाद अचंभित अर्जुन अपने सखासे क्षमा मांगता है
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि।।गी 11.41।।
तुम्हारी महिमा को ना जानते हुये मैने प्रेम में आपको कई मित्रवत् संबोधनों से पुकारा है। कृपया मेरी इस धृष्टता को क्षमा कर दें। इस सख्य के होते हुए भी अर्जुन का शिष्यत्व उच्च कोटी का है। और यदि हम गीता के मर्म को जानने का यत्न कर रहे है तो हमें अर्जुन सा शिष्यत्व प्राप्त करने के लिये प्रार्थना करनी चाहिये। दूसरे अध्याय के 7 वे श्लोक में शिष्यस्तेSहम शाधि माम् त्वां प्रपन्नं।।गी 2.7।। कहकर शरणागति प्राप्त करने के बाद से ही हम अर्जुन के संवादों में विषाद के स्थान पर शिष्यत्व की प्रगल्भता का विकास देखते है। जिज्ञासा, भ्रम और शंका की सिढ़ियों का पार करते हुये अर्जुन प्रश्न और उससे भी विकसित परिप्रश्न तक पहुँचता है और भगवान से अंतिम ज्ञान प्राप्त करता है।
चौथे अध्याय में ज्ञान की महिमा बताते हुये उसके प्राप्ति का माध्यम भी बताया है।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः।।गी 4.34।।
प्रणिपात अर्थात विनम्र शरणागति, परिप्रश्न अर्थात अपने तप से तपा हुआ सटीक प्रश्न और सेवा से संतुष्ट हुए तत्वदर्शी ज्ञानीगण ज्ञान का उपदेश देते है। तीनों आवश्यक है। वर्तमान युग में शिक्षा में तर्क का आधार अधिक होने के कारण प्रश्नों का पकना सबसे कठीन है। विनम्रता व सेवा तो श्रद्धा से आ ही जायेगी किन्तु सही प्रश्न को अपने अन्दर पकाने का ध्यैर्य व सही गुरु से पूछने का विनम्र साहस आज के युग मे प्रयत्नपूर्वक विकसित करने पड़ेंगे।
गीता में अर्जुन की अनेक जिज्ञासायें हैं जैसे स्थितःप्रज्ञ के लक्षण पूछना,
स्थितःप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्।। गी 2.54।।
या फिर पापाचरण का कारण पूछना
अथ केन प्रयुक्तोSयं पापं चरति पुरूषः।
अनिच्छन्नपि वाष्र्णेय बलादिव नियोजितः।। गी 3.36।।
बिना स्वयं की इच्छा के भी बलपूर्वक किस प्रेरणा से मनुष्य पाप का आचरण करता है? ये जिज्ञासायें है – अतन्त्य निष्पाप मन से पूछी गयी जानकारीयाँ। यह ज्ञान सर्वजनहिताय है।
किन्तु तिसरे अध्याय के प्रारम्भ कर्म व ज्ञान के चयन के बारे में पूछे उपरोक्त भ्रमजनित प्रश्न अथवा चौथे अध्याय में जन्मक्रम के भ्रम के बारे में पूछना
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
कथमेतद्विजानियां त्वमादौ प्रोक्तवान् इति।। गी 4.4।।
आपका जन्म तो विवस्वान के बाद हुआ है फिर हम ये कैसे मान ले कि आपने पूर्व में ही विवस्वान को यह कर्मयोग का ज्ञान बताया था? वैसे ही फिर पाँचवे अध्याय के प्रारम्भ में
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।
यच्छ्रेयं एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितं।।गी 5.1।।
कभी कर्म के सिद्धांत की बात करते हो पुनः फिर से कर्म योग की बात करते हो। हे कृष्ण इनमें से जो एक मेरे लिये श्रेयस्कर हो वो तय कर के मुझे बता दो। ये सारी शंकायें है। कृष्ण द्वारा बतायें गये उपदेश में जो ऊपरी विरोधाभास है उससे भ्रमित होकर पूछी गई शंकायें। पर एक बात स्पष्ट है शंका प्रगट करते समय भी अर्जुन स्पष्ट हे कि उसे क्या चाहिये। उसने ये नहीं कहा कि मुझे क्या भयेगा अथवा सहज होगा? ये पूछा है कि मेरे लिये क्या श्रेयस्कर है वा बताओ। हर बार श्रेय की चिंता है।
इन सब स्तरों में से पकते पकते अर्जुन की मेधा प्रश्न पूछने के लिये तैयार हुई और फिर अनेक जिज्ञासाओं, भ्रम और शंकाओं के बाद उसका प्रश्न प्रगट हुआ,
एवमेतद्यथत्थ त्वमात्मानं परमेश्वर।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम।।गी 11.3।।
हे परमेश्वर आपका वह सर्वव्यापी रूप मै देखना चाहता हूँ। यदि सम्भव हो तो मुझे वह परम दर्शन करायें। इससे पूर्व पहले श्लोक में वह मान चुका हे कि उसका भ्रम दूर हुआ। अब मोह नहीं रहा।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेनं मोहोSयं विगतो मम।। गी 11.1।। आपके द्वारा कहे गये इन गुढ़ अध्यात्मज्ञान युक्त वचनों से मेरा मोह जाता रहा है। मोह के जाने के बाद प्रश्न प्रगट हुआ है। परमज्ञान की अनुभूति करने वाला प्रश्न। साक्षात्कार की भूमिका बना वह प्रश्न। जिस प्रश्न के उत्तर में अर्जुन को योगी, ज्ञानियों को भी दूर्लभ ऐसा विश्वरूप दर्शन हुआ वह प्रश्न। इसे ही परिप्रश्न कहते है। पूर्ण परिपक्व मेधा से उत्पन्न सटीक प्रश्न।
हम भी अपने अन्दर अर्जुन की श्रद्धा का जागरण करें। अपने मन की जिज्ञासाओं, भ्रम और शंकाओं को प्रगट करें। उसी में से प्रश्न को पूछने की परिपक्वता आयेगी। यदि मन में उठनेवाली शंकाओं को ही संकोच, भय अथवा उपहास की आशंका से दबा देंगे तो प्रश्न का पकना ही असम्भव हो जायेगा। और फिर ज्ञान की सम्भावना भी दूरस्थ होगी। सबसे बड़ी समस्या होती है कि किसे पूछे? सच्चा गुरु आज कहाँ मिलेगा?  यदि हमारा शिष्यत्व पक जाये तो गुरु को आना ही होगा। अभी तो किसी ऐसे सुहृद  से पूछना प्रारम्भ करे जिसके बारे में तीन बाते हमें निश्चित हो – 1. वह हमसे अधिक ज्ञानी वा अनुभवी है। 2. वह हमसे प्रेम करता है और हमारे ध्येय के बारे में सम्भवतः हमसे अधिक जानता है। 3. उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं है।
ऐसा मार्गदर्शक मिलना कम से कम भारत में तो आज भी कठीन नहीं है। तो आज ही शुरू हो जाये पूछना चाहे जिज्ञासा हो, भ्रम हो या शंका? जैसे सेना में अधिकारी हर बात को समझाने के बाद अवसर देते हुए पूछता है – कोई शक या सवाल?

जनवरी 10, 2012 Posted by | योग | , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

आसक्ति कैसे जा सकती है?

कर्मयोग 8:
आठवी कक्षा में पढ़ने वाली बच्ची ने पत्र में पूछा, ‘‘भैया ये आसक्ति क्या होती है?’’ सुसंस्कृत परिवार था। घर में पाठ, स्वाध्याय होता रहता था। इसलिये ऐसे शब्द सुन रखे थे। अर्थ पता नहीं था पर किसी से पूछने का साहस भी नहीं कर पायी होगी। अब विश्वास बना कि कोई बता सकता हे तो बेझिझक पूछ लिया। पर उत्तर देना इतना सहज नहीं था। वैसे भी इन सूक्ष्म संकल्पनाओं को समझना और समझाना कठीन ही होता है। यहाँ तो 12-13 साल की बच्ची वह भी बड़ी कठीन परिस्थिति का सामना कर रही है। कुछ ही दिनों में माँ की गंभीर शल्य-चिकित्सा (Surgery)  होनेवाली थी। ऐसे समय वह बालिका जानना चाह रही है कि आसक्ति क्या है?
गीता में बार बार कहा गया है -अनासक्त होकर कर्म करें। ‘‘तस्मात असक्तः सततं।। गी 3.19।।’’ सदैव आसक्ति से मुक्त रहो। ‘‘संगं त्यक्त्वा धनंजय।। गी 2.48।।’’ हे धनंजय! आसक्ति का त्याग कर। ‘‘कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगं असक्तः स विशिष्यते।।गी 2.7।।’’ कर्मेन्द्रियों में आसक्ति ना होना ही कर्म को कर्मयोग बनाता है। ‘‘मुक्तसंगः’’ आसक्ति से जो मुक्त है वह सात्विक कर्ता है। आदि अनेक स्थानों पर इस महत्वपूर्ण बात का उल्लेख मिलता है। कर्मयोग की परिभाषा का यह महत्वपूर्ण घटक है। अतः कर्मयोग के विविरण में यह बार बार आता है। किन्तु बारवे अध्याय में जहाँ भक्ति योग का विवरण है वहाँ भी भक्तों के लक्षणों में ‘‘समः संगविवर्जितः।। गी 12.18।।’’ सभी द्वन्द्वों को समान दृष्टि से देखनेवाला के साथ ही आसक्ति को जिसने छोड़ दिया है यह भी आता है। गीता का महत्वपूर्ण संदेश है आसक्ति को छोड़ो। यह ऐसा केवल इसलिये नहीं है कि अर्जुन की आसक्ति गीता का निमित्त बनीं और उसको युद्ध के लिये प्रेरित करने के लिये अनासक्त होना आवश्यक था अतः भगवान् श्रीकृष्ण बार बार आसक्ति के छोड़ने पर बल दे रहे है। यह तात्कालिक कारण कितना भी मोहक लगता हो किन्तु गीता का निमित्त भले ही तात्कालिक धर्मयुद्ध और अर्जुन का उसके प्रति विरक्त होना हो किन्तु गीता का विषय सार्वकालिक है। सनातन धर्म के शाश्वत सिद्धान्तों की गीता सार्वभौम, सार्वकालिक, व्यावहारिक व्याख्या है। कर्मकौशल का योग समझाने वाली गीता को अनासक्ति, असंग, संगरहितं, संगत्याग आदि पर बल देना अनिवार्य हो जाता है क्योंकि सब बन्धनों, दबावों तथा समस्याओं से मुक्त होकर स्वतन्त्र कर्म करने के लिये आसक्ति का हटना प्रथम आवश्यकता है। इसी कारण विनोबा भावे गीता का विषय अनासक्ति योग है ऐसा बताते है।
यह सब विशेषता तो ठीक है पर मूल प्रश्न तो वही बना रहा, ‘‘आसक्ति है क्या?’’ हमारे मन में सदा ये प्रश्न आता है। अनासक्त होना तो असम्भव है। मनुष्य है तो भावनायें भी होंगी ही। ऐसे निष्ठुर, कठोर हृदय थोड़े ही हो जायेंगे कि अपने परिवार, परिजन से कोई लगाव ही ना हो? ये कैसे सम्भव है? और सम्भव हो भी तो क्यों करना? क्या पत्थरदिल हो जाना ही जीवन है। ऐसा सब करके सफल हो भी गये तो ये सफलता किसके लिये? अपनों से आत्मीयता ही नहीं रही तो फिर जीवन ही निरर्थक हो जायेगा। ऐसी अनेक बातें हमारे विचारों में आ जाती है जब भी काई आसक्ति को छोड़ने की बात करता है। यह ठीक अर्जुन का तर्क है। पहले अध्याय में यही सारे तर्क उसने युद्धविमुख होने की अपनी कायरता को उदात्त बताने के लिये दिये है। इन शंकाओं का समाधान पाने के लिये हमें आसक्ति, प्रेम, आत्मीयता आदि में भेद को समझना होगा। वास्तव में आसक्ति या संग, प्रेम या आत्मीयता के विलोम है। एक के होने से दूसरा नहीं हो सकता। अतः जब तक आसक्ति होगी हम वास्तव में प्रेम, लगाव, आत्मीयता आदि उदात्त भावों का अनुभव ही नहीं कर पायेंगे और इन्द्रियों के स्तर पर कीचड़ में खेलने को ही आनन्द मान बैठेंगे।
गीता के दूसरे अध्याय में स्थितःप्रज्ञ लक्षणों में भगवान् अत्याधुनिक प्रबन्धकों की प्रस्तुतियों के समान ही एक प्रवाह रेखांकन (Flow Chart) दिखा रहे है। पतन का प्रवाह चित्रण है यह। कैसे थोड़ी सी असावधानी पूर्ण पतन का कारण बन सकती है इसका यह व्यावहारिक वर्णन है। इसमें ही हमें संग अथवा आसक्ति की परिभाषा व परिणाम दोनों देखने को मिलते है।
ध्यायतो विषयान् पुंसः संगस्तेषुपजायते।
संगात्संजायते कामः कामात् क्रोधोभिजायते।।गी 2.62।।
क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात्समृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।।गी 2.63।।
विषयों के बारे में सोचने से संग अर्थात इन्द्रिय विषयों के प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है। आसक्ति से वासनाओं का जन्म होता है। इच्छाओं की पूर्ति न होने से क्रोध और क्रोध से भ्रम पैदा होते है। सम्मोह का अर्थ है सही मार्ग के प्रति भ्रमित हो जाना। इस भ्रम से स्मृति विकृत हो जाती है। जो बाते जैसी है उस प्रकार याद नहीं आती। इस के कारण बुद्धि का आधार ही नष्ट हो जाता है। बुद्धि का कार्य विश्लेषण का है। नयी जानकारी का विश्लेषण स्मृति में संचित जानकारी के साथ तुलना द्वारा ही सम्भव है। जब स्मृति ही सुव्यवस्थित नहीं होगी तो बुद्धि विश्लेषण किस आधार पर करेगी? और जब बुद्धि ही नष्ट हो गयी तो बचा ही क्या यह तो पूर्ण विनाश ही है।
इस पतन के क्रम का प्रारम्भ ‘संग’ से है। उससे पहले उसका कारण है ‘विषयों का ध्यान’। यह अपने आप में प्रक्रिया है परिणाम तो है संग अर्थात आसक्ति। तो इस आधार पर इन्द्रियजन्य चिन्तन से उत्पन्न राग को, चाह को आसक्ति कहा है। सम्बन्धों को शरीर के स्तर पर देखना एक बाध्यकारी आकर्षण को जन्म देता है। यही पतन का प्रारम्भ है। जब हम जीवन का उद्देश्य भोग बना लेते है और प्रत्येक वस्तु व व्यक्ति को उसका साधन तब जीवन इस चक्र में फँस जाता है। यह लिप्सा, चिपकना जीवन की कीचड़ है। जैसे भैंस कीचड़ में और सुअर गंदी नाली में सुख का अनुभव करता है वही स्थिति आसक्ति में फँसे मनुष्य की होती है। किसी शराबी की तरहा वह बार बार अपने को रोकने का प्रयास करता है पर इन्द्रियाँ उसे बलपूर्वक पतन की ओर खींच कर ले जाती है। यह चिकनी ढ़लान पर पैर फिसलने के समान है। एक बार पैर फिसला तो बीच में रूकना असम्भव है। जो भी सावधानी बरतनी है फिसलने से पूर्व ही बरतनी है। मन को विषयों के चक्र में फँसने से पूर्व ही बचाना होगा। प्रेम, आत्मीयता यह उदात्त भाव है। उसमें चिपकना नहीं होता मुक्ति होती है। मजबुरी नहीं होती। पर हम सामान्यतः फिल्मी प्रभाव में वासना, आकर्षण जैसी आसक्तिजन्य भाव-लहरों को प्रेम मान लेते है और पतन की फिसलपट्टी पर सरपट पसर जाते है।
अब आता है व्यावहारिक प्रश्न। आसक्ति के फेरे से बचे कैसे? कई बार प्रवचन आदि सुनकर लगता है कि ये तो बड़ा ही कठीन है। पर वास्तव में इससे सरल कुछ नहीं है। मानव को मानव के रूप में रहना कैसे कठीन हो सकता है? किन्तु यदि हम पशुवत आनन्द की ओर बढ़ गये तो फिर मुश्किल होती है। इसमें अपूर्णता भी रहती है आनन्द से ज्यादा कष्ट भी होता है। सच्चा और स्थायी आनन्द तो मानवीय ही होगा ना? मानवीय आनन्द आसक्ति रहित कार्य से ही सम्भव है। प्रश्न फिर वही है आसक्ति से कैसे बचे? इसका सरल सा मार्ग है – उदात्तीकरण। शब्द बड़ा भारी भरकम लगता है पर अर्थ सरल है – उपर उठना। जमीन पर चलते समय रास्ते के गढ्ढ़े पीड़ादायक होते है और मन भी त्रस्त होता है किन्तु जब पहाड़ी की चोटी पर पहुँच जाते हे तो वहाँ से जो दृश्य दिखाई देता है उसमे उतार चढ़ाव नही होते। वैसे ही जीवन के उदात्त ध्येय को महत्व देना शुरू कर देते है तो मन फिर इन क्षुद्र चीजों में नहीं लगता। तुलसीदास जी के विवाह के बाद वे अपनी पत्नि के मोहपाश में ऐसे बन्ध गये कि जब वो मायके गई तो पीछे-पीछे पहुँच गये। मन काम में ऐसा लगा था कि कुछ भी सुध नहीं। बाढ़ के पानी में कूद पड़े, बहती लाश पर बैठकर नदी पार की। पत्नि के घर रात को पहुँचे। खिड़की से कोई रस्सी लटक रही है ऐसा समझकर सांप को पकड़ कर उपर चढ़ गये। पत्नि ने धिक्कारा ये कैसा काम? इतनी लगन राम में लगाई होती तो भगवान के दर्शन हो गये होते। इस झिड़क से इन्द्रिय भोग का नशा उतर गया। जीवन का उदात्तीकरण हो गया और अब मन राम मे रम गया। मानस में रामजी प्रगटे और स्वयं हनुमानजी ने रामकथा सुनाई। सारी दुनिया को रामचरित मानस की निधि प्राप्त हो गई। आसक्ति का बल अगाध होता है उसे उपर की ओर मोड़ देते है तो उसी गति से अनासक्त मन बड़े कार्य में लग जाता है।
जब हम किसी कार्य में पूरे रम जाते है तो स्वयं को भूल जाते है। यदि पूरा जीवन ही किसी उदात्त कार्य में रस लेने लगे तो फिर इन्द्रियों के खेल को भूलना सहज हो जाता है। साथ ही इन्द्रियों का प्रशिक्षण भी आवश्यक है जो हमने पूर्व के आलेख ‘‘भले ही कर्मकाण्डी बनों . . .’’ में देखा ही है। उदात्त ध्येयगामी कार्य और इन्द्रियनिग्रह के सतत प्रयास दोनों का निरन्तर चलना जीवन को आनन्ददायी, संगरहित, अनासक्त बना देता है। यही तो कर्मयोग का रहस्य है। सामान्य कार्य को भी सहज योग बना देना।
आठवी की बहना के पत्र के उत्तर में तो सहज लिख दिया था कि ”आसक्ति वो है जो कभी भी आ सकती है और आये तो जकड़ भी सकती है। इसलिये अपने को भगवान में ही आसक्त कर लो ताकि जकड़े तो रामजी ही जकड़े।” आज 18 वर्ष बाद उस पत्र को याद कर के ये उपाय लिखे है। पर याद रहे दोनों उपाय करने सतत होंगे। क्योंकि आसक्ति कभी भी आ सकती है। पर योगयुक्त जीवन के नियमित अभ्यास से ही जा सकती है।

दिसम्बर 8, 2011 Posted by | योग | , , , | टिप्पणी करे

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