उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

शासन-निरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था ही समस्त समस्याओं का स्थायी उपाय!


schoolभारतीय शिक्षा की परम्परा अतिप्राचीन व अत्यन्त गौरवपूर्ण है। अनादिकाल से ही भारत ने सारे विश्व को मानवता की शिक्षा दी है। केवल आध्यात्मिक शिक्षा ही नहीं, हर प्रकार की लौकिक शिक्षा भी भारत ने ही विश्व को दी। विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के हर क्षेत्र में भारत न केवल प्रगत था ही तो उनके शिक्षा की प्रगत विधि भी भारत में विकसित की गई थी। इसी कारण सारे जगत से यहाँँँ छात्र शिक्षा ग्रहण करने आते रहे है। हजारों की संख्या में आनेवाले छात्रों के लिये अनेक गुरूकुल भारत में चलते थे। इसी व्यवस्था के चलते भारत को जगतगुरू कहा जाता रहा है। 11-12 वी शताब्दी में मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों को जला दिया उसके फलस्वरूप सैंकड़ो विश्वविद्यालय बंद कर उनकी ग्रंथसंपदा को सुरक्षित रखा गया। ज्ञान की सुरक्षा भारत के लिये सबसे महत्वपूर्ण थी। इसके बाद के संघर्षकाल में भी भारत में शिक्षा का वटवृक्ष फैला हुआ था। ग्राम ग्राम में उच्च शिक्षा तक की व्यवस्था भारत में थी। मुस्लिम आक्रांताओं ने मंदिरों को तोड़कर उनके स्थान पर मस्जिदें बनवाने पर ही ध्यान दिया। देश के कोने कोने में चल रहे शिक्षा संस्थानों के भारतीय संस्कृति में योगदान के महत्व को सम्भवतः वे लोग समझ नहीं पाये।

इसी के चलते 1823 में अंग्रजों द्वारा किये गये देश के शैक्षिक सर्वेक्षण में पाया गया कि पूरे भारत में लाखों की संख्या में शिक्षा संस्थान थे। प्राथमिक शिक्षा तो लगभग सभी जनसंख्या को उपलब्ध थी। समाज के 76 प्रतिशत लोग उच्च शिक्षा विभूषित थे। प्रख्यात स्वदेशी चिंतक धर्मपाल ने 1966 में लंडन के अभिलेखों किये अनुसंधान पर आधारित पुस्तक ‘‘रमणीय ज्ञानवृक्ष’’ में इस सर्वेक्षण को समग्रता से प्रस्तुत किया है। देश का दुर्भाग्य ही है कि 40 वर्ष हो जाने के बाद भी यह क्रांतिकारी पुस्तक हमारे किसी भी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं है। सर्वेक्षण में भारतीय शिक्षा व्यवस्था के बारे में अनेक तथ्य उजागर हुए है। सभी वर्णो के बालक-बालिकाओं को विद्यालयों में प्रवेश था। पढ़ाने वालों में भी शुद्रों सहित सभी वर्णों के शिक्षक हुआ करते थे। एक और महत्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है कि प्राचीन समय के जैसे ही 19 शताब्दि तक भारतीय शिक्षा व्यवस्था पूर्णतः स्वायत्त थी। शासन का कोई भी हस्तक्षेप शिक्षा में नहीं था। आर्थिक रूप से भी शिक्षा पूर्णतः स्वयंपूर्ण थी। 1823 के शैक्षिक सर्वेक्षण की पृष्ठभूमि इस बात को स्पष्ट करती है।

1813 में कंपनी सरकार ने भूमिसुधार अधिनियम के द्वारा सभी प्रकार की सार्वजनिक भूमि को शासकीय घोषित कर दिया। इसके द्वारा मंदिर से जुड़ी जमीन, गाँव में सामूहिक स्वामीत्व की जमीन आदि के साथ ही शिक्षा संस्थानों की जमीन को भी शासन ने अपने स्वामीत्व में ले लिया। इससे शिक्षा संस्थानों को चलाना कठीन व धीरे-धीरे असंभव हो गया। अनेक विद्यालय-महाविद्यालय बंद पड़ने लगे। तब कुछ प्रतिष्ठित भारतियों ने ब्रिटिश सरकार से हस्तक्षेप के लिये आवेदन आदि किये। शासन के दबाव में इस्ट इंडिया कंपनी ने घोषणा की कि भारतीय शिक्षा संस्थानों को प्रतिवर्ष 1 लाख रूपयों का अनुदान दिया जायेगा। भारतीय इतिहास में यह पहला सरकारी शिक्षा अनुदान है। इससे पूर्व शिक्षा के सरकारीकरण का पाप द्रोणाचार्य को राज्यसेवा में रखने से हुआ था। उस महापाप का क्षालन महाभारत के नरसंहार से हुआ। गत 180 वर्ष के पाप का क्षालन ना जाने कितने रक्तप्रवाह से होगा।

इस अनुदान को बाँटने पर विधिक सलाह देने के लिये मैकाॅले नामक वकील को बुलाया गया। कितने शिक्षा संस्थान है जिन्हें अनुदान दिया जाय यह जानने के लिये पूरे भारत में शैक्षिक सर्वेक्षण किया गया था। वकील मैकाॅले ने अपनी कुटील बुद्धि से भारत की सर्वव्यापी, स्वायत्त, समाजाधारित, समृद्ध शिक्षा व्यवस्था को नष्ट कर दिया। 1835 में उसने शिक्षा का पूर्णतः सरकारीकरण कर दिया। भारतीयों को शिक्षा देने से कानुनन वंचित कर दिया। केवल कंपनी व इसाई मिशनरियों को विद्यालय चलाने की अनुमति दी गई। मैकाॅले की शिक्षा नीति ने प्रथम बार शिक्षा में जाति के आधार पर प्रतिबंध लगाये। ब्राह्मणों के सिवा सभी जातियों को शिक्षा से वंचित कर दिया। बाद में क्षत्रिय तथा वैश्यों के आवेदन करने पर इन्हें तो प्रवेश मिल गया पर असंगठित होने के कारण शुद्र शिक्षा से वंचित रह गये। कुछ ही दशकों में भारत का बहुजन समाज अशिक्षित हो गया। 1823 में जहाँ 76 प्रतिशत जनसंख्या सुशिक्षित थी आज स्वतंत्रता के 67 वर्षों के बाद भी अपना नाम लिख पाने वाले को भी साक्षर समझ लेने के बाद भी केवल 74 प्रतिशत ही साक्षरता हो पायी है। यह अंतर है शासन निरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था व सरकारी व्यवस्था का।

स्वतंत्रता के बाद यह अपेक्षा थी कि अंग्रजों की व्यवस्था को बदल कर सही अर्थ में स्व के तन्त्र को लागू किया जायेगा। पर जिन लोगों के हाथ में शासन की बागड़ौर थी वे थे तो भारतीय पर मैकाॅले की व्यवस्था में शिक्षित -‘‘दिखने में तो भारतीय पर अंदर से पूर्णतः अंगे्रज भक्त’’। इन मैकाॅले पुत्रों ने अपने कतृृत्व से अपने आप को मैकाॅले का बाप ही सिद्ध किया है। 1991 के बाद सब ओर जब नीजीकरण का बोलबाला हुआ तब शिक्षा क्षेत्र में भी नीजीकरण हुआ। किंतु यह केवल व्यापारीकरण था। सरकारी नियन्त्रण तो बढ़ता ही रहा है। स्वतंत्रता केवल लूटने की है। छात्र व शिक्षक का शोषण नीजीकरण से बढ़ा। इसके उपाय के रूप में शासन का नियन्त्रण और बढ़ाया गया। अनेक नियामक संस्थाओं का निर्माण हुआ। इनसे शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ने के स्थान पर केवल भ्रष्टाचार ही बढ़ा। शिक्षा क्षेत्र के भ्रष्टाचार ने आज सभी सीमायें लांघ दी है। सभी स्तरों पर गुणवत्ता का प्रचंड ह्रास हुआ है। यदि शीघ्र उपाय नहीं किया गया तो 10 वर्ष बाद हम पढ़े-लिखे मूर्खों का देश हो जायेंगे।

शासन निरपेक्ष शिक्षा ही वास्तव में गुणवत्तापूर्ण, सर्वव्यापी तथा शुचितापूर्ण हो सकती है। शासन निरपेक्ष का अर्थ नीजीकरण नहीं है। नीजी व्यापारियों के हाथ में शिक्षा सौंपना उपाय नहीं हो सकता। गत 25 वर्षों का अनुभव बताता हैं कि इस प्रकार के व्यापारिक नीजीकरण से लाभ से अधिक नुकसान ही होता है। दूसरी ओर शासकीय संस्थानों में कर्मसंस्कृति का पूर्ण अभाव पाया जाता है। काम करने के स्थान पर टालने के उपाय ही किये जाते है। आज हर स्तर पर पाठ्यक्रम पर पूरी तरह शासकीय नियन्त्रण हो गया है। अनेक अनुमतियों, सम्बद्धताओं और उनके वार्षिक नवीनीकरण के नाम पर भ्रष्टाचार के साथ ही प्रशासनीक नियन्त्रण बढ़ गया है। आज अनेक शिक्षाविद् कुलपति जैसे पदों पर आरूढ़ होते हुए भी शासन के शिक्षा विभाग के अधिकारियों के ही नहीं बाबुओं के सामने भी लाचार दिखाई देते है। अतार्किक नीतियों के कारण धन के होते हुए भी आवश्यक कार्यों पर उसका उपयोग नहीं हो पा रहा है। परिणामतः देश में अनुसंधान व नवोन्मेष के क्षेत्र में पूर्ण शिथिलता आ गई है। इस घोर तमस से शिक्षा व्यवस्था को उभारने के लिये केवल सरकार को ही नहीं पूरे देश को भी शिक्षा को प्रथम वरीयता की आवश्यकता मानकर उपाय करना होगा।

वास्तव में अपनी नई पीढ़ि को समय की आवश्यताओं के अनुसार जीवनोपयोगी शिक्षा देने का दायित्व समाज का है सरकार का नहीं। आज भी अनेक सामाजिक संस्थाओं द्वारा आदर्श शिक्षा संस्थाओं का संचालन किया जा रहा है। वैसे तो आर्थिक संसाधन भी समाज ही जुटा सकता है किन्तु जिस प्रकार आज शासन सर्वव्यापी हो गया है उसके चलते कम से कम कुछ दशकों तक तो आर्थिक भार शासन को ही वहन करना होगा। किन्तु नियन्त्रण, नियमन तथा संचालन में स्वायत्तता की ओर गति किये बिना कोई भी उपाय प्रभावी व परिणामकारी नहीं हो सकेंगे। स्वायत्तता का निर्णय शासन को ही करना है। शासन को ही अपने अधिकार कम करने का निर्णय लेना है अतः इसमें राजनयिक ईच्छाशक्ति की प्रचण्ड आवश्यकता होगी। ऐसी ईच्छाशक्ति या तो स्पष्ट वैचारिक प्रतिबद्धता से आती है अथवा लोकतन्त्र में जनमत के दबाव में। दोनों स्तरों पर प्रयास करने होगे।

वर्तमान परिस्थिति में शिक्षा व्यवस्था में शासन की भूमिका पर विचार करते समय शासन-निरपेक्ष शिक्षा के आदर्श को सामने रखकर उसे क्रमशः कैसे प्राप्त किया जाय इस पर विचार करना होगा। सबसे पहला कदम तो राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा को समग्रता से संचालित करने के लिये पूर्णतः स्वायत्त शिक्षा आयोग स्थापित किया जाना होगा। वर्तमान में प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च व उच्चतर ऐसे भिन्न-भिन्न स्तरों पर शिक्षा का संचालन किया जा रहा है। इसी के साथ अभियांत्रिकी, चिकित्सा, कृषि व शारीरिक शिक्षा आदि विषयों के अनुसार भी विविध नियामक है। इन सबके स्थन पर शिक्षा आयोग को पूरी शिक्षा को समग्रता से देखने का दायित्व दिया जाय। इससे समग्र व एकात्म शिक्षा नीति का विकास सम्भव होगा। इसी प्रकार के पूर्ण स्वायत्त शिक्षा आयोग राज्य तथा आगे जिला स्तर तक भी स्थापित करने होंगे। सच्चे अर्थों में स्वायत्त होने के लिये शिक्षा आयोग की संरचना पूर्णतः गैर राजनैतिक व गैर प्रशासनिक होनी होगी। शिक्षा विभाग के प्रशासनिक अधिकारी यहाँ तक की मंत्री भी इस आयोग के अधीन होने होंगे। समाज के सभी क्षेत्रों के सुयोग्य, प्रतिष्ठित व प्रामाणिक प्रतिनिधियों को ही आयोग में स्थान मिले। शिक्षा के संचालन, प्रायोजन, नियमन तथा नियन्त्रण का पूर्ण उत्तरदायित्व इस आयोग का हो।

आयोग का कार्य हो कि शिक्षा की स्वायत्तता को नीचले स्तर तक लागू किया जाय। क्रमशः पाठ्यक्रम निर्धारण, नियुक्तियाँ तथा व्यय जैसे सभी कार्यों को जितना विकेन्द्रित रूप में कर सकेंगे उतना ही समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था का विकास हो सकेगा। विभिन्न स्थानों की स्थिति के अनुसार प्रारम्भिक अथवा व्यावसायिक अथवा सामान्य शिक्षा को वरीयता दी जा सकेगी। जहाँ जैसी प्ररिस्थिति, आवश्यकता व विशेषता हो उसके अनुरूप शिक्षा का प्रावधान सम्भव होगा। नीति-निर्धारण के सभी स्तरों पर शिक्षक, अभिभावक एवं समाज के सभी क्षेत्रों का सहभाग सुनिश्चित किया जाय ताकि शिक्षा केवल सैद्धांतिक ना रहकर व्यावहारिक भी हो सकें। शासन की भुमिका प्रारम्भ में प्रेरक व पोषक की होगी। सकल उत्पाद के 10 प्रतिशत को शिक्षा हेतु आवंटित किया जाय तथा स्वायत्त शिक्षा आयोग के माध्यम से इसके सुनियोजित सम्पूर्ण उपयोग को सुनिश्चित किया जाय। शनैः शनैः समाज का आर्थिक योगदान बढ़ाया जाय व इस स्तर पर भी शिक्षा को शासन निरपेक्ष बनाया जाय। वर्तमान में सभी व्यापारिक प्रतिष्ठानों को विधिक दायित्व के रूप में अपने विशुद्ध लाभ का 2 प्रतिशत सामाजिक दायित्व (CSR) के प्रति व्यय करना होता है। इसका आधा हिस्सा शिक्षा आयोग को मिले ऐसा वैधानिक प्रावधान किया जा सकता है। अन्य कार्यों में भी समाज की भागीदारी ली जा सकती है। राजस्थान में भामाशाह योजना के माध्याम से शासकीय शालाओं में संरचना विकास में समाज की भागीदारी बड़े प्रमाण में होती रही है। पाली जिले के सभी विद्यालयों के भवन, फर्निचर व अन्य शिक्षा सामग्री इस योजना से जुटाई गई। शिक्षकों व इतर कर्मचारियों का वेतन ही केवल शासन को देना पड़ता था। यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि पूर्णतः शासन निरपेक्ष शिक्षा केवल आदर्श स्वप्न नहीं अपितु व्यावहारिक रूप से पूर्ण सम्भव है।

समाजोपयोगी, परिणामकारी, समग्र, व्यावहारिक, गुणवत्तायुक्त, सस्ती, सुलभ शिक्षा व्यवस्था के लिये शिक्षा को पूर्णतः शासन निरपेक्ष बनाना होगा। प्रारम्भ में नीति निर्धारण, पाठ्य रचना व शिक्षा पद्धति का निधारण सरकार के स्थान पर स्वायत्त आयोग को सौपना होगा। अगले चरण में शिक्षा के संचालन व प्रशासन को शासन से मुक्त करना और अन्ततः आर्थिक रूप से भी शासन पर निर्भरता को समाप्त करना होगा। तभी सच्चे अर्थों में शासन निरपेक्ष समाजाधारित शिक्षा व्यवस्था को साकार किया जा सकता है। यदि आज प्रारम्भ किया जाय तो देश के प्रगत राज्यों में एक दशक में और पूरे देश में 25 वर्षों में सबके लिये इस प्रकार की आदर्श शिक्षा को सुनिश्चित किया जा सकेगा।

सितम्बर 8, 2014 - Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , ,

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