रंगोत्सव नहीं होली है धर्मोत्सव
होलिका है धर्म रक्षा का आत्मोत्सव
वसंत के आह्लाद का आनंदोत्सव
फाग के राग का संगीतमय स्वरोत्सव
समरस समाज का एकात्म भावोत्सव
ऋतुपरिवर्तन का वैज्ञानिक प्राणोत्सव
रंगोत्सव नहीं होली है धर्मोत्सव

समग्र आनंद प्रह्लाद की भक्ति से
नरशार्दूल बन प्रगटे नारायण
भीतर-बाहर, ऊपर-नीचे, दिन-रात
संधि-समन्वय से भोग-अहं का संहार
धर्म रक्षा प्रतीक होलिका दाहोत्सव
रंगोत्सव नहीं होली है धर्मोत्सव

तृतीय नेत्र से भस्म काम हुआ अनंग
प्रकृति पुष्पों में अभिव्यक्त नाना वर्ण
उपवन वाटिका में महका मद गन्ध
ज्ञानेंद्रियों में झूमता स्वर्गीय सौंदर्य
ऋतु दिव्य कुसुमाकर का स्नेहोत्सव
रंगोत्सव नहीं होली है धर्मोत्सव

संवत्सर का समापन मासोत्तम फाग
सृष्टि के रोम रोम में गूंजता मधुराग
सुर-लय-ताल वृंद झूमते गणभाग
महुए के रस में मदमस्त हर पात
ब्रज में प्रेम भक्ति का रासोत्सव
रंगोत्सव नहीं होली है धर्मोत्सव

वसंत से ग्रीष्म का ऋतुपरिवर्तन
परंपरा से तत्परता का आचरण
प्राणविद्या के ज्ञान का सहज स्पंदन
होलिका दहन-रक्षालेपन- धूलिवंदन
तन-मन शीतलता आनंदित क्रीड़ोत्सव
रंगोत्सव नहीं होली है धर्मोत्सव

धर्म- अध्यात्म-संस्कारित समाजोत्सव सेक्युलर षडयंत्र प्रचारित मात्र रंगोत्सव
व्यापारिक चातुर्य लूट का बाजारोत्सव
विज्ञापन-प्रचार- प्रदर्शन का मदोत्सव
जागरण से पुनर्स्थापन शुद्ध राष्ट्रोत्सव
रंगोत्सव नहीं होली है धर्मोत्सव
3 टिप्पणियां »
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आदरणीय भाई साब की लेखनी को कोटि-कोटि नमन ,🙏🏻बेहद उम्दा
सुन्दर, सटीक ज्ञानवर्धन लेख
बहुत सुंदर रचना..जय हो..