उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

शिक्षा का अर्थायाम


प्रतिवर्ष शासन द्वारा अपने वार्षिक व्यय का अनुमान (Budget) प्रस्तुत करने पर शिक्षा पर किए जानेवाले व्यय की चर्चा होती है। केंद्र सरकार द्वारा शिक्षा पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद (G.D.P.) के लगभग 4% व्यय किया जाता है। विभिन्न आयोगों द्वारा समय-समय पर यह अनुशंसा की गयी है कि एक संवेदनशील राष्ट्र में शिक्षा व्यय सकल उत्पाद के कम से कम 6% होना चाहिए। भिन्न-भिन्न शैक्षिक संगठनों ने भी समय-समय पर यह मांग की है। भारतीय शिक्षण मंडल ने सकल राष्ट्रीय उत्पाद के अनुपात के स्थान पर शासकीय व्यय के 10% का प्रावधान शिक्षा क्षेत्र में करने की मांग रखी है। यह केंद्रीय व्यय का योगदान है। सभी राज्य शासन तो अपने व्यय का लगभग 20% शिक्षा पर लगाते ही है। दिल्ली, कर्नाटक, महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों का शिक्षा व्यय तो 23% से अधिक है। इस सबके बाद भी शिक्षा में मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ती भी अभी तक नहीं हो पा रही। 20-25 वर्ष पूर्व सरकार ने अपनी असमर्थता को स्वीकार कर नीजी क्षेत्र को शिक्षा में निवेश के लिए आमंत्रित किया। वैधानिक रूप से शिक्षा धर्मार्थ सेवा के रूप में ही दी जा सकती है। शैक्षिक संस्थान लाभकारी उपक्रम (Profit Making Enterprise) नहीं हो सकते। किंतु वास्तव में भारत जैसे देशों में शिक्षा एक आकर्षक उद्योग बनता जा रहा है। जमीन, वस्त्र आदि उद्योगों में चुनौतियाँ बढ़ने के बाद अनेक उद्योजकों ने अपने कारखानों तथा व्यापारी संस्थानों को अभियांत्रिकी महाविद्यालयों जैसे व्यावसायिक शिक्षा संस्थानों में परिवर्तित कर दिया। इसे शीघ्र लाभ का साधन माना जाने लगा। वैधानिक लाभप्राप्ति की व्यवस्था न होने के कारण शिक्षा के व्यापारीकरण हेतु अनेक अनैतिक कुरीतियों का जन्म हुआ।

शासन के शिक्षा व्यय का एक बहुत बड़ा हिस्सा, कुछ-कुछ राज्यों में तो 90% से अधिक हिस्सा शिक्षकों के वेतन पर लगाना पड़ता है। विभिन्न वेतन आयोगों ने सरकारी शिक्षकों की आमदनी में अच्छी वृद्धि की है। किंतु सरकारें इस बोझ के कारण शैक्षिक विकास की अन्य सभी गतिविधियों में कटौती करने पर विवश है। नए भवनों का निर्माण, ग्रंथालय, प्रयोगशाला, अत्याधुनिक शिक्षा साधन आदि के लिए अनुदान लगभग बंद हो गया है। सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत माध्यान्ह भोजन, गरीब छात्रों के लिए निःशुल्क गणवेश, पाठ्यसामग्री तथा बालिकाओं के लिए साइकिल आदि का प्रावधान किया गया। गत दो दशकों से हुए इन प्रयासों का सुखद परिणाम शालेय शिक्षा में पंजीयन बढ़ने में हुआ। सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्राथमिक शिक्षा का सकल प्रवेश अनुपात [Gross Enrollment Ratio (G.E.R.)] 95% हो गया है। कुछ राज्यों में तो यह 100% हो गया है। इसका अर्थ है कि भारत में जन्म लेनेवाले 6 वर्ष तक की आयु के 100 में से 95 बालक शाला में प्रवेश ले रहे हैं। सर्वशिक्षा अभियान की योजनाओं का 70% अनुदान केंद्र सरकार देती है। बाकि 30% की व्यवस्था राज्य शासन को करनी होती है। पूर्वोत्तर तथा जम्मू कश्मीर के अविकसित राज्यों हेतु 90% अनुदान केंद्र शासन का होता है। इन सब बातों से भी शिक्षा व्यय में वृद्धि हुई है। किंतु शिक्षा की गुणवत्ता पर इसका बहुत अधिक प्रभाव नहीं दिखाई देता है। उच्च शिक्षा में होनेवाला व्यय भी बढ़ाया गया है।

इस सबके बाद भी शालेय शिक्षा में नीजी संस्थाओं की भागीदारी बढ़ रही है। एक अनुमान के अनुसार 46% शालेय विद्यार्थी नीजी संस्थानों में अध्ययनरत है। उच्च शिक्षा में छात्र संख्या में नीजी संस्थाओं की भागीदारी 30% से कम है। किंतु महाविद्यालयों की संख्या में यह अनुपात 50% के लगभग हो गया है। नीतिनिर्धारकों एवं अधिकारियों में कुछ का मानना है कि नीजी क्षेत्र के बढ़ने से ही ‘सबको शिक्षा’ का लक्ष्य प्राप्त हो सकेगा। अतः योजनाओं में उसी प्रकार के प्रावधान गत दस वर्षों से किए जा रहे हैं। अनुभवी शिक्षाविदों एवं शिक्षा जगत में कार्यरत कार्यकर्ताओं का अनुभव है कि नीजी क्षेत्र के बढ़ने से व्यापारीकरण बढ़ेगा और समाज के बड़े वर्ग की पहुँच से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बाहर हो जाएगी।

शिक्षा के अर्थायाम पर विचार करते समय शैक्षिक दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। हम शिक्षा के उद्देश्य को किस दृष्टि से देखते हैं इस बात पर निर्भर करेगा कि शिक्षा का दायित्व किसपर है। शासकीय शिक्षा में शिक्षा के व्यय का भार शासन वहन करता है जबकि नीजी क्षेत्र में यह बोझ छात्रों अर्थात उनके अभिभावकों पर डाला जाता है। यदि शिक्षा को हम व्यक्ति के विकास के माध्यम से ही देखते हैं, और वह विकास भी केवल भौतिक स्तर पर ही समझा जाता है तब तो यह तर्क ठीक बैठता है कि सभी को अपनी-अपनी शिक्षा पर होने वाले व्यय का भार उठाना चाहिए। यदि अभिभावक सक्षम हो तो वे अपनी क्षमता के अनुसार महँगी से महँगी शिक्षा अपने बालकों को उपलब्ध कराएं। शिक्षा ऋण (Education loan) के पीछे भी यही दृष्टि है। जहाँ अभिभावक आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है वहां स्वयं छात्रों को शिक्षा ऋण उपलब्ध करा दिया जाएं ताकि वे अपने मन के अनुसार शिक्षा खरीद सकें। ऐसी शिक्षा प्राप्त कर रोजगार मिलने के बाद छात्र अपने ऋण का भुगतान करें। गत दो दशकों से यह विचार प्रभावी होता जा रहा है। विलासितापूर्ण नीजी शिक्षा संस्थानों में लाखों रुपये शुल्क का भुगतान करने के लिए तैयार अभिभावक बढ़ रहे हैं। दूसरी ओर शिक्षा ऋण की संख्या एवं राशि में भी प्रतिवर्ष कई गुना वृद्धि हो रही है। इन दोनों पद्धतियों में छात्र और अभिभावक ग्राहक अथवा उपभोगता की भूमिका में आ जाते हैं और शिक्षा संस्थान व्यापारी अथवा सेवा प्रदाता (Service Provider) बन जाते हैं। ऐसे विद्यालयों में अभिभावक शिक्षक बैठक (PTM) ग्राहक-नौकर संवाद में बदलती जा रही है। ‘जब हम इतना शुल्क दे रहे हैं तो क्या इतनी भी अपेक्षा नहीं कर सकते?’, ‘हम इतने सारे पैसे देकर बच्चों को स्कूल भेज रहे हैं, अब उन्हें पढ़ाना आपकी जिम्मेदारी है।’ जैसे वाक्य बच्चों की माताओं द्वारा शिक्षकों को कहा जाना सामान्य बात हो गयी है।

भारत में शिक्षा की यही दृष्टि नहीं है। केवल परंपरागत भारतीय शिक्षण की ही बात नहीं है अपितु भारत के संविधान में भी शिक्षा को व्यापार की वस्तु मानने का विरोध है। अनिवार्य तथा निःशुल्क मूलभूत (Elementary) शिक्षा को प्रारंभ में संविधान निर्माताओं ने राज्यों के निदेशक तत्वों में रखा और अपेक्षा की कि शीघ्रातिशीघ्र इसे वैधानिक रूप प्रदान किया जाएं। 86वे संविधान संशोधन इ. स. 2002 द्वारा शिक्षा को मौलिक अधिकार का स्थान दिया गया और तत्पश्चात इ. स. 2009 में ‘शिक्षा के अधिकार अधिनियम’ (RTE) द्वारा 6 से 14 वर्ष के प्रत्येक बालक की मूलभूत शिक्षा (8वी तक) अनिवार्य कर दी गयी। अब ये माता-पिता का विकल्प नहीं रहा कि वे बच्चों को पढ़ाएं या न पढ़ाएं। अनिवार्यता के साथ निःशुल्क शिक्षा का प्रावधान भी आवश्यक था। यदि शिक्षा व्यापारिक सेवा मानी जाये तो उसे अनिवार्य नहीं किया जा सकता। यदि शिक्षा का उद्देश व्यक्तिगत विकास एवं रोजगार तक सीमित हो और इस कारण उसे व्यक्ति अथवा परिवार की जिम्मेवारी माना जाएं तो फिर शिक्षा ग्रहण न करने का विकल्प भी खुला रखना पड़ेगा। मूलभूत शिक्षा की अनिवार्यता यह सिद्ध करती है कि भारत का संविधान शिक्षा को व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक दायित्व मानता है। विधान की विवशता है कि वह समाज को अपने दायित्व के लिए बाध्य नहीं कर सकता। अतः निःशुल्क शिक्षा का भार राज्य पर डाला गया है। भारत के संविधान में मौलिक अधिकार तो विधि द्वारा संरक्षित है। अतः राज्य का दायित्व बनता है कि इनकी रक्षा का उचित प्रबंध करें। किंतु दूसरी ओर संविधान में सूचीबद्ध किये गए मौलिक कर्तव्य निदेशक तत्वों (directive principles) के रूप में है, अतः बाध्यकारी नहीं हैं। शिक्षा के अधिकार अधिनियम ने मूलभूत शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाकर अभिभावकों को बाध्य कर दिया है और आर्थिक क्षमता के प्रश्न को निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए राज्य को बाध्य कर सुलझाया गया है।

परंपरागत रूप से भारत में शिक्षा को व्यक्तिगत अधिकार, आवश्यकता अथवा विकास का साधन नहीं माना गया। अपनी अगली पीढ़ी को स्वयं से सवाई (125% विकसित) बनाने हेतु समाज के सामूहिक दायित्व के रूप में शिक्षा को देखा गया है। समाज की आवश्यकता है कि उसका प्रत्येक घटक केवल सुशिक्षित ही नहीं अपितु सुसंस्कारित बनें। अतः यह समाज का कर्तव्य बनता है कि वह इसकी समुचित व्यवस्था करें। ज्ञात प्राचीनतम इतिहास से ही भारत में शिक्षा निःशुल्क रही है। शिक्षा को न तो व्यापार बनाया गया और न ही सरकार के अनुदान पर आश्रित रखा गया। भारत में शिक्षा सच्चे अर्थों में स्वायत्त एवं समाजपोषित रही है। आर्थिक स्वावलंबन के बिना शैक्षिक व प्रशासकीय स्वायत्तता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। अतः भारत में शिक्षा की समाजपोषित व्यवस्था प्रयत्नपूर्वक विकसित की गयी। सब कालखंडों में सर्वत्र एक सी व्यवस्था नहीं थी किंतु जो भी विविध प्रकार की व्यवस्था विकसित की गयी उसमें स्वावलंबन समाज का आधार तथा शासन एवं समाज निरपेक्षता को ध्यान में रखा गया। वैसे ही गुरुकुल शिक्षा में आवश्यकताएं कम करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। अतः गुरुकुल की अपनी आवश्यकताएं भी न्यूनतम हुआ करती थी।

साधारणतः तीन प्रकार के शिक्षा संस्थान भारत में कार्यरत रहे हैं। आवासीय गुरुकुल नगर, गांव से दूर वन में हुआ करते थे। इनमें बड़ी संख्या में छात्रों एवं आचार्यों के निवास, अन्य शैक्षिक गतिविधियों के लिए अध्ययनशाला, गोशाला, यज्ञशाला, पाकशाला, प्रयोगशालाएं भी हुआ करती थी। छात्रों के अनुपात में इन सभी छात्रावासों एवं शालाओं की भी आवश्यकता पड़ती थी। इस सबके साथ ही कृषि भूमि भी गुरुकुलों से जुड़ी हुई थी। छात्र एवं आचार्य कृषि और गोपालन का कार्य साथ मिलकर करते थे। अतः भोजनादि की व्यवस्था इन्हीं में से हो जाती थी। वस्त्र निर्माण का कार्य भी अध्ययन का अंग होता था। अतः छात्रों की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ती व्यावहारिक अध्ययन के लिए किए गए कार्यों से हो जाती थी। भूमि एवं गायें समाज से दान में प्राप्त होती थी। अधिकतर निर्माण सामग्री प्राकृतिक ही होने के कारण वन से ही उनकी आपूर्ति हो जाती थी। मध्यकाल में बड़े-बड़े भवनों का निर्माण नालंदा, तक्षशिला आदि गुरुकुलों में हुआ था। उसमें समाज के धनिक वर्ग का दान लगा हुआ होगा। राजा भी इन बड़े गुरुकुलों के निर्माण में योगदान करते थे। किंतु वह दान दक्षिणा के रूप में होता था। राज्य द्वारा थोपी गयी विविध बाध्यताओं से बंधा अनुदान गुरुकुल स्वीकार नहीं करते थे। देश के कुछ भागों में बड़े-बड़े गुरुकुलों के संचालन हेतु राजाओं द्वारा गुरुकुलों को कुछ ग्रामों के अभिलेख (पट्टे) प्रदान किए जाने के प्रमाण उपलब्ध हैं। इन गांवों से प्राप्त कर राजा के पास नहीं, गुरुकुलों के पास जमा होता था। इस व्यवस्था में भी राजा का हस्तक्षेप नहीं होता था। एक बार अभिलेख प्रदान हो जाने के बाद गांवों की पंचायत व्यवस्था का दायित्व होता था कि सुव्यवस्थित कर-संग्रहण कर गुरुकुलों को उपलब्ध कराया जाएं। इस प्रकार स्वायत्तता से गुरुकुलों की आर्थिक व्यवस्था हो जाती थी। अध्ययनकाल के कुछ निश्चित समय में भिक्षा-भोजन अथवा माधुकरी अनिवार्य थी। पाँच घरों में भिक्षा मांगने से न केवल छात्रों के अहंकार का विसर्जन होकर उनके व्यक्तित्व का विकास होता था अपितु साथ ही सारे गुरुकुल का भोजन भी समाज के आधार पर हो जाता था।

भारतीय शिक्षा व्यवस्था की आर्थिक स्वायत्तता का सबसे बड़ा माध्यम गुरुदक्षिणा थी, जो छात्र अपने गुरुओं के प्रति स्वेच्छा से अर्पण करते थे। हम पुराणों में और अन्य इतिहास ग्रंथों में विलक्षण गुरुदक्षिणा के अनेक प्रसंग पाते हैं। किंतु, यह तो अपवादात्मक घटनाएं हैं। सब गुरूदक्षिणा इस प्रकार की नहीं थी।

गुरु पूर्णिमा के दिन प्रवेश करते समय छात्र अपने हाथ में केवल समिधा लेकर – समित्पाणि हो गुरु को स्वयं अर्पित हो जाता था। हाथ में धारण की गई समिधा उसके मन का प्रतीक थी कि ‘जिस प्रकार यह समिधा यज्ञ में अर्पित होकर स्वाहा हो जाएगी, उसी प्रकार मैं आपके चरणों में न-मन करते हुए अपने मन को आप को सौंप रहा हूं। अब आप इसे जीवन योग्य बनाइए।’ न्यूनतम 12 वर्ष की शिक्षा के बाद छात्र स्नातक होता था। यह समय सबके लिए निर्धारित नहीं था किंतु सामान्यतः इतना समय लगता था। कोई अलौकिक छात्र हो तो कम समय में भी योग्य हो जाता था। जैसा कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने मात्र 2 वर्ष गुरु सांदीपनि के आश्रम में रहकर 64 कलाओं और 14 विद्याओं का अध्ययन कर लिया। दूसरी ओर उत्तंक का उदाहरण है जिन्हें आयु के 40 वर्ष तक यानी लगभग 30-32 वर्ष गुरुकुल में रहना पड़ा। यह अपवाद हैं। सामान्यतः 12 वर्ष में शिक्षा पूर्ण हो जाती थी।

इसके पश्चात छात्र समाज में अपना योगदान करने के लिए तैयार होता था और गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता था। गुरु को दी जाने वाली दक्षिणा जीवनपर्यंत देनी है क्योंकि गुरु ने जीवन की शिक्षा दी है। अतः अपनी कमाई में से दशांश गुरु को भेजने की परंपरा भारत में थी। सभी छात्र इस परंपरा का कर्तव्य मानकर पालन करते थे। चाहे राजा का पुत्र हो अथवा कोई गरीब किसान, अपनी आजीविका चलाने के लिए कष्ट से प्राप्त किए धन में से दसवां हिस्सा अपने गुरुकुल, पाठशाला अथवा गुरु को भेजता था। सभी शिष्यों से प्राप्त यह राशि गुरुकुल संचालन हेतु पर्याप्त होती थी। अतः किसी भी नए गुरुकुल को प्रथम 12 वर्ष ही अपने आर्थिक भार हेतु व्यवस्था करनी पड़ती थी। समाज में दान भिक्षा मांगनी पड़ती थी। 12 वर्ष बाद तो पूर्व छात्र ही गुरुकुल को संभाल लेते थे। यह अत्यंत स्वावलंबी व्यवस्था थी। इसके कारण आक्रमण काल में सत्ता विदेशी विधर्मियों के हाथ में चले जाने के बावजूद भारत में गुरुकुल जीवंत रहे।

आज जब हम गुरुकुल शिक्षा की पुनःप्रतिष्ठा की बात करते हैं तो केवल फिर एक बार अधिकाधिक गुरुकुलों से भारत में सभी को शिक्षा प्रदान करना इतना ही उसका अर्थ नहीं है। साथ ही वर्तमान व्यवस्था में भी गुरुकुल के कुछ तत्वों का समावेश अत्यावश्यक है। इन तत्वों में से गुरुकुल का अर्थायाम सबसे पहले लागू किया जा सकता है। यदि हमारी शिक्षा व्यवस्था से निकले हुए छात्र अपना कर्तव्य समझकर अपनी आय का कुछ निश्चित हिस्सा अपने शिक्षा संस्थानों को भेजना प्रारंभ कर दें तो सारे विद्यालय, महाविद्यालय यहां तक कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान IIT जैसे बड़े-बड़े शैक्षिक संस्थान भी स्वावलंबी बन सकते हैं। पूरी तरह से इस व्यवस्था का अभी परीक्षण किया जाना बाकी है किंतु कुछ अंशों में इसका प्रयोग सेवाभावी संस्थाओं में हो रहा है। अभी यह स्वैच्छिक है। विद्या भारती, रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन जैसे संगठनों में पढ़े हुए छात्र अपनी श्रद्धा से अपने पूर्व विद्यालय को दान देते रहते हैं। राजस्थान में भामाशाह योजना के अंतर्गत शासकीय विद्यालयों में भी समाज के योगदान को प्रारंभ किया गया। इसके चमत्कारिक परिणाम सामने आए। पाली जिले में विद्यालयों, महाविद्यालयों के भवन तक समाज ने निर्माण किए।

यदि इसे परंपरा का रूप दे दिया जाए और सभी पूर्व छात्र एक निश्चित राशि प्रतिमाह भेजने लगे तो और किसी संसाधन की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। सारी शिक्षा निःशुल्क दी जा सकेगी। जो छात्र निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करेगा वह इस कर्तव्य का पालन और अधिक श्रद्धा से करेगा। वर्तमान में चल रहे व्यापारिक शिक्षा संस्थानों से निकले हुए छात्रों में यह श्रद्धा नहीं दिखाई देती क्योंकि उनके मन में ग्राहक बोध है। उन्हें लगता है कि हमारी शिक्षा का पूरा व्यय हमारे माता-पिता ने ही वहन किया। अब हमें इसे वापस कमाना है। इस भाव के कारण वह अपने व्यवसाय में भी येन केन प्रकारेण कमाने में ही विश्वास रखता है। यदि सभी प्रकार की शिक्षा निःशुल्क हो जाए तो अपने विद्यालय, महाविद्यालय के प्रति ऋण से उऋण होने का भाव छात्रों में रहेगा। पूर्व छात्र श्रद्धा से अपने शिक्षा संस्थानों का योगक्षेम वहन करेंगे। केवल इतना ही नहीं, सेवाभाव से प्राप्त शिक्षा के कारण उनके व्यावसायिक जीवन में भी वही सेवाभाव प्रधान होगा। कहते हैं ना, जो बीज बोएंगे फसल उसी की काटी जाएगी। शिक्षा में यदि हम व्यापार का बीज बोएंगे तो हमारे छात्र बड़े होकर उसी प्रकार की व्यावसायिकता का आचरण करेंगे। यदि शिक्षा सेवाभाव से प्रदान की जाएगी तो उससे तैयार छात्र भी अपने जीवन के प्रत्येक कार्य को सेवाभाव से ही करेंगे। अतः शिक्षा का अर्थायाम केवल आर्थिक विषय ना होकर शिक्षा में नैतिकता का भी विषय बन जाता है। सरकार-निरपेक्ष और व्यापार-निरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था ही वास्तविकता में स्वावलंबी, नैतिक, धर्मानुसारी शिक्षा है।

भारत माता को पुनः एक बार विश्वगुरु के पद पर आसीन करने के लिए आइए हम इस अर्थायाम को स्वयं से प्रारंभ करें। हम चाहे जिस शिक्षा संस्थान में पढ़े हो सरकारी, निजी अथवा सेवाभावी, अपने जीवन में कमाई का निश्चित अंश देना प्रारंभ करें। यह निश्चित है कि आज की व्यवस्था में तुरंत दशांश प्रदान करना प्रारंभ नहीं होगा। किंतु 2% से प्रारंभ किया जा सकता है। धीरे धीरे बढ़ते हुए 5% तक भी ले गए तो शासन को किसी प्रकार की आर्थिक व्यवस्था नहीं करनी पड़ेगी और ना ही शिक्षा संस्थानों को व्यापार करना पड़ेगा।

‘जीवन में हमने जो पाया है उससे अधिक हम प्रदान कर सकें’ यही मनुष्य होने का लक्षण है। अतः, बिना किसी तर्क-कुतर्क हम अपने विद्यालय को, जिसके कारण आज हम बने हैं, उसे आंशिक गुरु दक्षिणा देना प्रारंभ करें। यही गुरुकुल की पुनः स्थापना का स्थायी मार्ग है।

दिसम्बर 8, 2018 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

राष्ट्रीय शिक्षा के प्रवर्तक विश्वात्मा विवेकानन्द


SVquote Bharat utho    स्वामी विवेकानन्द विश्वात्मा थे। उन्होंने सृष्टि की एकात्मता का अनुभव किया था। अमेरिका में सहस्त्रद्विपोद्यान (Thousand Island Park) में अपने अंतरंग शिष्यों कें प्रशिक्षण के मध्य एक दिन स्वामींजी अपने कक्ष मे एक कोने से दुसरे तक चक्कर लगा रहे थे। उनके शिष्यों ने लिखा है कि पिंजडे में बंद क्रुध्द सिंह के समान स्वामीजी की छटपटाहट थी। किसी की बीच में बोलने की हिम्मत नहीं थी। चलते चलते अचानक स्वामीजी रूके और अपने शिष्य कप्तान सेवियर के कंधे झकझोरते हुए बोले ‘‘ये विश्व समझता क्यों नहीं कि वह ईश्वर से व्याप्त है?’’ विश्व को उसके दिव्यत्व का परिचय कराना उनकी व्याकूलता का मर्म था। यही इनका जीवन ध्येय था।
भारत मे लौटने के बाद उन्होंने पूरे भारत के दिग्विजयी प्रवास में यही घोषणा की। विश्व मानवता को अपने दिव्यत्व का परिचय कराने के लिए इस राष्ट्र का तपःपूत अविष्कार हुआ है। जगत् का मार्गदर्शन ही भारत का जीवनोद्देश्य है। यही स्वामी विवेकानन्द की विश्वविजय की संकल्पना थी। उन्होंने कहा था, ‘उठो भारत! अपनी आध्यात्मिक शक्ति से विश्व पर विजय प्राप्त करो।’ भारत विश्व को राजनैतिक अथवा सामरिक दासता से जीतना नहीं चाहता। हमें विश्व का राज्य नही चाहिए। ना ही हम व्यापार से विश्व बाजार पर कब्जा करना चाहते है। भारत की आंतरिक अभिलाषा है जगद्गुरू बनना। यही हमारी राष्ट्रीय नियति है। स्वामीजी की भारतभक्ति मानवकल्याण का ही मार्ग थी।
इस राष्ट्रीय उद्देश्य के अनुरूप ही राष्ट्रीय शिक्षा का स्वरूप होना चाहिए। स्वामी विवेकानन्द ने ऐसे समर्थ, समृध्द व समरस भारत के निर्माण हेतु आवश्यक शिक्षा पध्दतिtatasv का प्रतिपादन किया। विज्ञान की शिक्षा को उन्होंने अत्यंत आवश्यक माना। शिकागो जाते समय मुम्बई से जापान तक जमशेदजी टाटा स्वामीजी के साथ थे। स्वामीजी ने टाटा को दो ऐतिहासिक प्रेरणायें दी। एक तो भारत में फौलाद उद्योग को पुनर्जीवित करना। 18 वी शताब्दी तक भारत की लौह भट्टियाँ विश्व का सर्वोत्तम फौलाद निर्माण करती थी। स्वामीजी ने स्वप्न देखा कि भारत पुनः लौह उद्योग का अग्रणी बन जाए। जमशेदजी टाटा को दूसरी प्रेरणा दी विज्ञान में अनुसंधान की। ‘टाटा भौतिक अनुसंधान संस्थान’ बंगलुरू की स्थापना के बाद टाटा ने स्वामीजी को पत्र लिखा जिसमें इस चर्चा का उल्लेख है। टाटा की इच्छा थी कि स्वामीजी इस संस्थान के निदेशक बने। आज भी संस्थान के स्वागत कक्ष में यह पत्र बडे अक्षरों में अंकित है।
बाद में रामकृष्ण मठ व मिशन की स्थापना के समय स्वामीजी ने सन्यासियो से कहा, ‘जाओं! गांवो को शिक्षित करों! इन्हें सच्चे धर्म की शिक्षा दो। पाखंड़ और आडम्बर से मुक्त करों। एक हाथ में पृथ्वी का गोल व दूसरे में टार्च लेकर इन्हें शिक्षा दो कि ग्रहण कैसे होता है।’
स्वामीजी चरित्र-निर्माण करनेवाली सर्वांगीण शिक्षा की बात करते थे। उनकी शिक्षा की परिभाषा थी, ‘मानव के अन्तर्निहित पूर्णत्व की अभिव्यक्ति’। बाहरी सूचनाओं को मस्तिष्क में ठूसने को वे शिक्षा नहीं मानते थे। अन्दर के ज्ञान को प्रस्फुटित करनेवाली अनुभूति मूलक प्रायोगिक शिक्षण पध्दति का उन्होंने प्रतिपादन किया। आज अनेक शैक्षिक प्रयोग इस विधि को आधुनिकतम मानकर अपना रहे है ।
स्वामीजीने शिक्षा के लोकव्यापीकरण की कल्पना की भी। उन्होंने भारत निर्माण के लिए जनसामान्य को शिक्षित करने पर बल दिया। सामान्य व्यक्ति की आर्थिक वास्तविकताओ का भान इस सन्यासी को था। दो समय की रोटी की चिंता करनेवाले श्रमिक, किसान के लिए विद्यालय तो अकल्पनीय अपव्यय था। इस बात को समझकर स्वामीजी ने कहा, ‘प्यासा कुए के पास न आ सके तो कुए को प्यासे के पास ले जाओ। शिक्षा को श्रमिक के कार्यस्थल किसान के खेत में ही उपलब्ध करा दो। गाँव की चैपाल को विद्यादान का केन्द्र बना दो।’
नारी शिक्षा की अनिवार्यता को स्वामीजी ने भलीभाँति जाना था। माँ के शिक्षित होने का अर्थ है परिवार का सुशिक्षित होना। मार्गारेट नोबल को उन्होंने भारत में स्त्रीशिक्षा की नीव रखने के लिए प्रेरित किया। पूर्ण प्रशिक्षण के बाद समर्पित शिष्या को नाम दिया भगिनी निवेदिता। भगिनी निवेदिता ने सारदा बालिका विद्यालय की स्थापना की। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा के आंदोलन का सूत्रपात किया। आगे चलकर महर्षि अरविन्द, टिळक, आगरकर व महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय शिक्षा को स्वतंत्रता आंदोलन का आधार बनाया।
स्वतंत्रता के बाद हमने शिक्षा के प्रसार पर विशेष ध्यान दिया। कुछ जनजातीय क्षेत्रों को छोड दिया जाए तो आज देश के कोने कोने में शिक्षा की व्यवस्था उपलब्ध है। पूर्ण सफलता में निश्चित ही अभी और परिश्रम आवश्यक है, किन्तु इससे अधिक अनविार्य है शिक्षा में भारतीयता की। भारत के राष्ट्रीय लक्ष्य के अनुरूप भारतहित की देशज शिक्षा पध्दति के निर्माण का चिंतन, प्रयोग व प्रसार करना स्वामी विवेकानन्द की 150 वी जयंतिपर उन्हें समुचित श्रध्दांजली होगी।

जनवरी 12, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

भारत का महान पर्व गुरु पूर्णिमा


आषाढ की पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है । इसे वेदव्यास की जयन्ती के रूप में जाना जाता है । वैसे तो व्यास अपने आप में एक दायित्व है । शास्त्रों का अध्ययन कर सामान्य जनता तक इसे सुबोध रूप में प्रचारित करने का कार्य करनेवाले व्यक्ति को ‘व्यास’ कहा जाता था । आज भी कथावाचकों को व्यास के रूप में ही जाना जाता है । शास्त्रचर्चा के मंच को भी इसी रूप में व्यासपीठ कहते हैं । हर वक्ता से व्यासपीठ की गरिमा की रक्षा की अपेक्षा की जाती है । महर्षि वेदव्यास का महत्व इस कारण है कि उन्होंने बिखरे हुए श्रृतिज्ञान को एकत्र सम्पादित कर ४ वेदों की रचना की । ऐसा भी माना जाता है कि वे एक व्यक्ति नहीं वरन् साक्षात् ज्ञान स्वरूप थे । अनेक गुरुकुलों के आचार्यों ने वेदों को संकलित व संपादित करने का कार्य अनेक सदियों तक लगातार किया, इसे भी वेदव्यास के नाम से जाना जाता है । वेद समस्त मानवीय ज्ञान की अक्षय नीधि है अत: इनका लगातार परिष्कार व सम्पादन एक स्वस्थ वैज्ञानिक परम्परा है । हर मन्वन्तर में यह कार्य होता रहा है ऐसी भारतीय मान्यता है । हम काल की चक्रीय गणना को ठीक से समझते हैं इसलिये हमारे लिये यह पुनरावृत्ति सहज है । इसी के कारण हमारी संस्कृति व धर्म दोनों जड नहीं अपितु गतिमान हैं । सतत परिष्कार से इनको युगानुकूल बनाने का कार्य आचार्यों ने निरन्तर किया है । इसलिये हम इसे ‘नित्य नूतन चिर पुरातन’ संस्कृति कहते हैं । इस निरन्तरता का उत्सव ही ‘व्यास पूर्णिमा’ है ।

गत १००० वर्ष के संघर्ष काल में यह परिष्कार व वैज्ञानिक स्पष्टिकरण थम सा गया है । स्वतन्त्रता से पूर्व परकीय सत्ता के साथ संघर्ष में तो यह स्वाभाविक ही था । जब अस्तित्व के लिये ही लड रहे थे तब नवीनीकरण के लिये समय व अवसर ही कहाँ था ? किन्तु स्वतन्त्रता के बाद जिस उत्साह व गति से यह कार्य होना चाहिये था उतना नहीं हुआ । शासन की छद्म सेक्युलर नीति को दोष देना ही होगा । पर वास्तव में यह कार्य शासन का तो नहीं था, धर्माचार्यों का था । किन्तु ज्ञान को युगानुकूल वैज्ञानिकता से समझ धर्म को प्रासंगिकता से लागू करने का व्यास कार्य उतनी गंभीरता से नहीं हुआ । वर्तमान व्यासों ने शास्त्रों को जीवित रखने का महत् कर्तव्य तो किया है किन्तु ज्ञान के परिमार्जन व युगानुकूल नवीनीकरण का तथा युगधर्म के विवेचन हेतु स्मृतिगठन का कार्य अभी भी किसी आधुनिक वेदव्यास की प्रतीक्षा में है ।

ज्यामिति गणित में भी व्यास होता है । वृत्त की चौडाई को व्यास ही नापता है । इसी के आधार पर वृत्त की परिधि भी नापी जा सकती है । इसी प्रकार जो ज्ञान की व्याप्ति को सम्पूर्णता से नापने की क्षमता रखता है उसे व्यास कहा जाता है । ऐसे परमज्ञानी को ही अधिकार है कि वह सामान्य जनों को ज्ञान के गूढ तत्वों को समझाने के लिये रूपकों तथा कथानकों को गूंथ कर पुराणों की रचना करें । १८ मुख्य पुराणों की रचना महर्षि वेदव्यास ने ही की है । जीवन के तत्वों को सरल कथाओं के माध्यम से समझाकर जीवन में उतारने का यह अत्यन्त वैज्ञानिक मार्ग है । आज सारी दुनिया के शिक्षाविद् इस बात पर सहमत हो रहे हैं कि बाल्यकाल में कथा ही शिक्षा की सबसे प्रभावी विधि है । पुराण आध्यात्मिक स्तर पर बालकों के लिये परम सत्य को समझने की सरल व प्रभावी विधि है । व्यास पूर्णिमा के अवसर पर महर्षि का स्मरण करते समय शास्त्रों के स्वाध्याय का संकल्प लेना चाहिये ।

इसी दिन को अनादिकाल से ही गुरु पूर्णिमा के नाम से भी मनाया जाता है । गुरुकुलों में विद्यारम्भ व स्नातक के रूप में विद्यासमाप्ति के बाद विदाई दोनों इसी दिन हुआ करते थे । इसी दिन ज्ञान पिपासु छात्र अपनी जिज्ञासा व उसके लिये त्याग करने की तत्परता के प्रतीक के रूप में हाथों में समिधा लिये गुरु के आश्रम में आते थे । यह समिधा यज्ञ में डालने के लिये अवश्य होती थी, किन्तु इसको अपने हाथ में धारण करने का अर्थ था – स्वयं को यज्ञ में आहुत करने की तत्परता । ज्ञान तो अग्नि के समान ही सब अशुद्धियों को जलाकर अपने अन्दर के खालीस, विमल यथार्थ को प्रगट करता है । जिसके अन्दर इस प्रकार अग्नि में प्रवेश करने की, सभी स्तरों पर तप करने की तत्परता हो वही गुरु की छत्रछाया में रहने का अधिकारी होता था । इसी को ‘छात्र’ कहा जाता था । गुरु इस समित्पाणि, हाथ में समिधा लिये छात्र को स्वीकार कर उसका उपनयन करते थे । उसे ज्ञान के लिये दृष्टि प्रदान करते थे । मूल जिज्ञासा मैं कौन हूँ ? मेरे जीवन का लक्ष्य क्या है ?… के प्रति जागृति से ही छात्र जीवन का प्रारम्भ होता था । आज सर्वोच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद भी व्यक्ति इस मौलिक जिज्ञासा से अनभिज्ञ ही रह जाता है । उपनयन में दूसरा नयन अर्थात जीवन के प्रति जिज्ञासा की दृष्टि उत्पन्न होने के बाद उस छात्र को द्विज कहते थे, अर्थात जिसका दूसरा जन्म हुआ है ।

छात्र जीवन में उसे अपने इन्द्रियों का निग्रह करने का प्रशिक्षण दिया जाता था । समस्त ऊर्जा को ज्ञान प्राप्ति के लक्ष्य पर केन्द्रित करने ब्रह्मचर्य के पालन का वैज्ञानिक प्रशिक्षण शिक्षा का प्रथम चरण हुआ करता था । इस भाँति अपनी पूर्ण ऊर्जा को एकाग्र करने में प्रवीण छात्र जीवन के सभी अंगों का परिपूर्ण ज्ञान प्राप्त करते थे । सभी को जीवन की समस्त विधाओं का ज्ञान प्रदान किया जाता था । इसलिये इस काल में छात्र उबटन आदि प्रसाधनों का प्रयोग नहीं करते थे । सुगंधित द्रव्यों से स्नान भी वर्जित था । जब अपने अन्दर की विशिष्टता को पूर्णता से प्रगट करने का सैद्धांतिक व व्यावहारिक ज्ञान छात्र पा लेता था तब गुरु उसे समाज में योगदान करने में सक्षम मान गृहस्थदीक्षा प्रदान करते थे । दीक्षांत से पूर्व परीक्षा होती थी । गुरु अपने शिष्यों को आश्रम के सबसे ऊंचे स्थान पर ले जाते थे और चारों ओर दृष्टि डालकर पूछते थे जो भी दिख रहा है क्या उसके बारे में समस्त ज्ञान तुमने प्राप्त कर लिया है ? इस एक प्रश्न का ही प्रश्नपत्र होता था । गुरु जानते ही थे कि छात्र तैयार हो गया है । किन्तु फिर भी इस समय भी कोई शंका हो तो शिष्य पूछ सकता था और या तो गुरु उसे स्मरण करा देता अथवा आवश्यकता पडने पर एक और वर्ष छात्र जीवन में बिताने का आदेश देता था । समाज में अपनी भूमिका निभाने में पूर्ण सक्षम छात्र ही स्नातक होता था । गुरु पूर्णिमा के दिन ही दीक्षान्त हुआ करता था । अब छात्र को जीवन जीने की समझ मिल गई है और इस कारण अब वह प्रसाधनों का प्रयोग कर सकता है । उबटन आदि सुगंधित तेलों का प्रयोग कर स्नान कर सकता है । अब उसे इन्द्रियों के प्रयोग का सामर्थ्य प्राप्त हो गया है । इसलिये इस दिन वह पूर्ण स्नान कर गुरु का आशीर्वाद लेकर समाज में अपना योगदान देने की यात्रा पर चल पडता है । यह है स्नातक होने का अर्थ ।

गुरुपूर्णिमा के दिन शिक्षा की इस अद्भुत विधि का स्मरण कर वर्तमान युग में उसको अपनाने का संकल्प लेना होगा । आज के युगानुकूल उसके नवीनीकरण पर विचार करने का अवसर है यह उत्सव । गुरुत्व इस भूमि में परम्परा के रूप में संजोया गया है । अत: यहाँ सम्प्रदायों में गुरु परम्परा का विकास हुआ । गुरु की गद्दी सदियों से सुयोग्य प्रतिनिधि को सौंप कर इस परम्परा की रक्षा की गई । हज़ारों वर्ष की अखण्ड गुरुपरम्परा वाले अनेक मठ आज भी देश में विद्यमान है । अत्यन्त सूक्ष्मता से अधिकारी का चयन किया जाता था । बडी कठोरता के साथ प्रशिक्षण दिया जाता था । इसके उपरान्त भी गुरु स्थान पर विराजमान व्यक्ति को भान होता था कि यह उसका व्यक्तिगत आदर नहीं अपितु परम्परा का सम्मान है । आज भी जब शिष्य गुरु के चरणस्पर्श कर आशीर्वाद लेता है तो गुरु अपने स्मरण हेतु निम्न श्लोक का पाठ करते हैं –

ईश्वरोगुरुरात्मेति मूर्तिभेदविभागिणे ।

व्योमवत् व्याप्त देहाय दक्षिणामूर्तये नम: ।।

आदि शंकराचार्य ने इस परम्परा का प्रारम्भ किया । गुरु को स्मरण रहे कि देहबुद्धि से जिस अहंकार को ‘मैं’ माना जाता है वह गुरु नहीं है । वास्तव में गुरु व ईश्वर एक ही हैं । अत: वह व्योमव्यापी आदिगुरु दक्षिणामूर्ति को स्मरण कर उसके प्रतिनिधि के रूप में प्रणाम को स्वीकार करता है और उसी गुरु तत्व की ओर से आशीर्वाद प्रदान करता है ।

वर्तमान युग में विखण्डित परम्परा व सर्वत्र व्याप्त अशुद्धि के चलते अहंकार का पूर्ण विगलन कठिनतम होता जा रहा है । इसी को ध्यान में रखते हुये वेदान्त की परम्परा में से निर्वैयक्तिक गुरु का पुनरूज्जीवन आवश्यक हो गया था । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के समय इसके संस्थापक आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिरामपंत हेडगेवार ने ज्ञान, त्याग व यज्ञ की संस्कृति की विजय पताका परमपूज्य भगवे ध्वज को गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया । विश्व के सबसे बडे अनुशासित स्वयंसेवी संगठन के रूप में संघ के विकास का एक प्रमुख कारक यह निर्वैयक्तिक गुरु ही है । प्रतिदिन शाखा में इसी गुरु की छत्रछाया में एकत्रित हो भारतमाता को परमवैभव पर ले जाने की साधना करोडों स्वयंसेवक विश्वभर में करते हैं । विवेकानन्द केन्द्र की स्थापना के समय माननीय एकनाथ जी रानडे ने ईश्वर के वाचक प्रणवमन्त्र ओंकार को गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया । आज भी ५ वर्ष के प्रशिक्षण के पश्चात जीवनव्रती कार्यकर्ता प्रणवमन्त्र से ही दीक्षा प्राप्त करते हैं ।

गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिये अत्यन्त महत्वपूर्ण पर्व है । यदि इस अवसर पर हमने इसके सभी पहलुओं को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया तथा ज्ञानसाधना के संकल्प को पुनर्नवा किया तो भारतमाता को विश्व में अपने गुरुपद पर आसीन करने का कार्य सम्पन्न हो सकेगा । आइये, इस ज्ञानभूमि को पुनर्जाग्रत करने का संकल्प लें ।

जून 29, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

   

%d bloggers like this: