उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

Call for Rebooting Education System


TNIEThe New Indian Express deserves congratulations for publishing the series ‘Think Edu Conclave’. The articles by Amita Sharma in the 4th March issue [page 9], and that of  Dr. S. Vaidhyasubramaniam  in the issue of 11th March [page 7] both are really commendable.

Amita Sharma has given very comprehensive overview of the work going on in various IIT’s in the field of research in ancient Bhartiya knowledge system. Her approach towards this subject is very logical and scientific. Without unduly glorifying the traditional achievements of Bharatiya scientists from time immemorial, she emphasises the need of indepth study of their works. Her concluding point appeals to the intellectual mind to come out of dogmatic thinking in terms of binaries such as traditional and modern,  eastern and western and to integrate whole knowledge system for the betterment of humanity.

It has been understood in Bharat that knowledge has no boundaries. “आ नो भद्र: क्रतवो यन्तु विश्वत:” Bharat has been traditionally an open society where knowldge and wisdom are welcomed from all the frontiers. The only purpose of knowledge as per Bharatiya tradition has been the search of inherent oneness- truth and it’s applications for the good of whole humanity. Hence, as beautifully elaborated by Dr. S. Vaidhyasubramaniam in his piece, the traditional knowledge system in Bharat had been widespread and well evolved even in the first decades of 19th century.  

dharmapalDr. S. Vaidhyasubramaniam has extensively quoted from the seminal work of Shri Dharmpal. The data given in Dharmpal’s ‘One Beautiful Tree’ from the primary sources of British surveys is an eyey opener for all of us. It is indeed tragic that this great knowledge has not been made part of formal curriculum even after being in public domain for more than five decades now. read dharmapal here – http://www.samanvaya.com/dharampal/

Both the accomplished authors lament the fact that Bharatiya traditional knowledge system has been neglected completely by the formal education system in independent India. It is indeed hightime that we in Bharat take the revolutionary step of integrating our own indegeneous knowledge system in the main stream education policy. Whole world is facing similar problems in the field of education. Right kind of methodolgy for elementary education is an area of concern for both developed and developing countries. We have the advantage of having a deep rooted cultural background in evolving decentralised, need based, socially self-sufficient education system. We have done so for centuries together. With this genetic advantage we can provide a panacea to the universal problems of complementry education system; with the use of modern technology blended with traditional methodology. This is the paradigm shift called for by both the learned authors.

There is a hope that the atmosphere for complete change in the country auguers well to this much needed systemic change in the field of education right from primary to higher education.

See the original article in TNIE here

http://www.newindianexpress.com/opinion/Designing-Integrated-Knowledge-Systems/2014/03/04/article2088788.ece

 

http://www.newindianexpress.com/nation/Reboot-Indian-Primary-Education/2014/03/11/article2101794.ece

Both of them were speaker at the event 

http://www.newindianexpress.com/nation/Indian-Educators-Ignorant-of-Countrys-Academic-Contributions-to-West/2014/01/30/article2028717.ece

मार्च 14, 2014 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , , , , , , , | टिप्पणी करे

स्वावलम्बी युवा! समर्थ भारत!!


sawarkarस्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर को किसी युवा ने पूछा कि आप युवा किस कहते है? भाषा शुद्धिकरण के आन्दोलन को चलाते हुए भारतीय भाषाओं को अनेक नवरचित शब्दों का योगदान देनेवाले महान भाषाशास्त्री सावरकर ने उत्तर दिया, “पद को उलटा करके देखो तो उसका अर्थ स्पष्ट हो जाता है। युवा का प्रतिशब्द है – ‘वायु’। जैसे अनुशासनहीन वायु प्रभंजन के रुप में जीवन का नाश करता है किन्तु जब प्राणायाम से अनुशासित हो जाता है तब वही वायु प्राणदाता बन जाता है। वैसे ही युवा हैं। अनुशासित हो तो राष्ट्र का प्राण और अनुशासनहीन होकर किसी भी व्यवस्था के लिए असाध्य चुनौती।”

आज भारत की 62% जनसंख्या युवा है। जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 13 से 45 के मध्य आयुवाले युवाओें की संख्या कुल 125 करोड की आबादी के 62% अर्थात 75 करोड से ऊपर है। किसी भी राष्ट्र के लिए यह अत्यंत गर्व के साथ ही आर्थिक विकास के प्रचंड अवसरों का विषय है। साथ ही चुनौती भी कि इस असाधारण शक्ति का समुचित सदुपयोग हो। अन्यथा अनियंत्रित होने से यही ऊर्जा राष्ट्र विघातक विस्फोटक का कार्य भी कर सकती है। ऊर्जा को बलपूर्वक नियंत्रित नहीं किया जा सकता। जबरदस्ती अथवा दबाव से तो वह और अधिक विध्वंसक बन जाती है जैसे डटे हुए सेफ्टी वाल्व वाले प्रेशर कुकर में भांफ। ऊर्जा के अनुशासित नियोजन का सर्वोत्तम तरीका है उसका सुव्यवस्थित परिचालन। ऊर्जा को सही दिशा में किसी ध्येय की ओर कार्य में लगा देना ही उसका सदुपयोग है। वर्तमान समय में भारतीय समाज के पास अपनी युवाशक्ति को सम्यक ध्येय के साथ सही दिशा की ओर कार्यरत करने की महती चुनौती हैं।

स्वंतत्रता के बाद सबसे बडी विकृती सारे समाज मे व्याप्त हुयी है वह है – शासनावलम्बिता। हम छोटे से छोटे कार्य के लिए भी सरकार का मुँह ताकते हैं। घर में सफाई करने के बाद सरकारी सडक पर सरेआम कचरा फेंकने वाले सभ्य नागरिक स्थानीय शासन से अपेक्षा करते हैं कि नगर में सफाई एवं सौन्दर्य का ध्यान रखें। इसी परावलंबी मानसिकता के कारण ‘युवा भारत‘ के सुनियोजन का दायित्व भी हम लोग सरकार को ही दे बैठे हैं। शासन का नीति निर्धारण इस दिशा में हो इस दृष्टि से आवश्यक मंथन व चिंतन समाज के प्रबुद्ध वर्ग मे होता दिखाई नही देता है। समाज द्वारा वैचारिक अधिष्ठान प्रदान किए बिना शासन की कोई भी नीति कारगर सिद्ध नही होती। अतः युवाओं के ऊर्जा प्रबंधन का दायित्व युवा वर्ग ही सामुहिक रुप से संगठित हो उठायें तो वह प्रभावी एवं परिणामकारी होगा। राष्ट्रनिर्माण का दायित्व शासन का नहीं, समाज का है। समाज जब इस उत्तरदायित्व का निर्वाह करने लगता है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही नहीं राजतंत्र में भी शासन ऐसे प्रबुद्ध समाज का अनुगामी बनने लिए बाध्य हो जाता है।

स्वानुशासन से ऊर्जा का सुनियोजन करने हेतु युवाओं में संकल्प का जागरण करना आवश्यक है। वर्तमान शिक्षाप्रणाली के चलते पनपी मानसिक दासता के कारण आज का युवा स्वावलंबन के स्वप्न भी नही देखता। देश की सर्वोच्च प्रतिभा के अत्युच्च स्वप्न किसी सरकारी, निजी अथवा बहुराष्ट्रीय ऊपक्रम में नौकरी पाना हो गये हैं। प्रतिवर्ष लाखों युवा कुछ हजार सरकारी नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा परीक्षा में अपनी ऊर्जा को व्यय करते हैं। सबसे प्रतिष्ठित प्रशासकीय नौकरी भारतीय प्रशासनिक सेवा की प्रथम परीक्षा में बैठने हेतु साढे पाँच लाख से अधिक युवा पंजीयन कराते हैं किन्तु उसमे से आधे ही परीक्षा मे बैठते हैं। इनमे सें 13,14 हजार ही मुख्य परीक्षा के लिए पात्र हो पाते और इनमें अंतिम सफलता 800 से 900 परीक्षार्थिओं को ही मिलती है। अर्थात प्रतिवर्ष बडी मात्रा में असफल युवाओं के झुंड़ का निर्माण यह प्रतियोगी परीक्षा करती है। इन असफल युवाओं के साथ ही अन्य नौकरियों के आकांक्षियों को मिलाकर लगभग 90 लाख परीक्षार्थी बैंक, रेल्वे, बीमा आदि अर्द्ध सरकारी नौकरियों के लिए ली जानेवाली प्रतियोगिता परीक्षाओं में बैठते हैं। इनमें से कुछ हजार नौकरी पा भी जाते हैं। उपलब्ध रिक्त स्थान व उसके लिए प्रयत्नरत परीक्षार्थिओं के मध्य यह अत्यंत विसंगत अनुपात समाज की दासता का घोतक है। पूरा समाज ही गुलामी के लिए उत्सुक है। इसका मुख्य कारण यह है कि समाज मे सरकारी नौकरी को गैर अनुपातिक प्रतिष्ठा प्राप्त है। ज्ञान, योग्यता और परिश्रम वा परिणाम में प्रशासनिक सेवा के अधिकारी समाज में बिलकुल भी अग्रणी नहीं हैं किन्तु सम्मान मे इनका स्थान लगभग सर्वोच्च हैं। इस दिखावे की प्रतिष्ठाा के लिये ही इतने युवा असफलता की आशंका के होते हुए भी नौकरी के लिये प्रयासरत रहते है।

नौकरियों के इस परिदृश्य का अत्यंत विद्रुप पहलू यह भी है कि सेना की तीनों शाखाओं मे लगभग 15000 अफसरों के स्थान इस कारण से रिक्त है क्योंकि सुयोग्य युवा उस ओर आकर्षित नही हो रहें। सामान्य सिपाही की भरती के लिए हजारों की भीड़ लग जाती है किन्तु सें संकल्पित अधिकारियों के स्थान योग्य युवाओं की तलाश मे रिक्त रह जाते हैं। किसी भी राष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था के यह प्रेरणाहीन परिदृष्य चिन्ता का विषय होना चाहिए। इस महान गौरवशाली राष्ट्र की युवा शक्ति को राष्ट्र निर्माण करने हेतु आत्मनिर्भर बनना होगा। अपने स्वभाव के अनुरुप परिश्रम के द्वारा उद्योग के नवनिर्माण का आत्मविश्वास जब युवाओं मे जग जाता है तब वह रोजगार के लिए दूसरों की ओर नही ताकता।

ऊर्जा प्रबंधन में विकेन्द्रित स्वप्रबंधन ही सर्वोत्तम मार्ग है उसी प्रकार युवा शक्ति के प्रबन्धन हेतु स्थान स्थान पर युवाओं की टोलियाँ संगठित होकर अपने youthपरिश्रम से सृजन के स्वप्न साकार करने लगे। यही 75 करोड युवाओं के सदुपयोग का एकमात्र सुनिश्चित मार्ग है। स्व-रोजगार से ही युवा शक्ति का सम्यक, स्वाभिमानी, उत्पादक प्रयोग हो सकता हैं। कितनी भी सरकारी अथवा निजी नौकरियों का निर्माण करने का उद्यम शासन के केन्द्रीकृत प्रयासों द्वारा किया जाए तब भी यह व्यावहारिक रुप से संभव ही नही है कि किसी देश की 62% जनसंख्या नौकरी करें। हर 100 मे से कम से कम एक युवा नौकरी करने की बजाय नौकरी देने का विचार करने लगे तो यह स्वप्रेरित रोजगार निर्माण ही राष्ट्रनिर्माण का माध्यम बन सकता है।

इस हेतु शिक्षा के साथ ही समाज में पोषक वातावरण का निर्माण भी आवश्यक हैं। उद्यमियो का सम्मान सुप्रतिष्ठित करना होगा। भारतीय संस्कृति में उत्पादक कार्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती थी। उत्पादित सामग्री के वितरण, विपणन एवं व्यापार को दुय्यम स्थान था। इस सब आर्थिक व्यवहार के लिए पूरक सेवाओं अर्थात नौकरी को सबसे निकृष्ट माना जाता था। सबसे प्राथमिक उत्पादन तो कृषि में होता है। किसान ही मूल वित्त का निर्माता है। अन्य उद्योग कृषि उत्पाद को रुपांतरित कर सामग्री का निर्माण करते हैं। कृषि के समान ही खनन भी मूल कच्चे माल का उत्पादन करता है किंतु यह कृषि से निम्न हैं क्योंकि खनिजों का भंडार सीमित है एवं पुनर्निर्माण संभव नहीं। कृषि उत्पादन जैविक होने के कारण यदि प्रकृति के समन्वय से कृषि कार्य को किया जाए तो अनंत काल तक असीम उपज संभव हैं। इसीलिए भारत मे कहा गया ‘उत्तम कृषि, मध्यम व्यापार और अधम नौकरी’। इस शुद्ध अर्थशास्त्रीय तत्व की समाज में पुनःप्रतिष्ठा मानवता के अस्तीत्व के लिए अनिवार्य है। आज नौकरी सर्वाधिक प्रतिष्ठित एवं कृषि सर्वाधिक उपेक्षित आर्थिक कार्य हो गया है। प्रतिष्ठा व उत्पादन का यह विपरित संबंध समाज के साथ ही पर्यावरण के भी विघटन एवं विनाश का कारण बन गया है।

youth worldबाह्य रुप से परस्पर विरोधी लगने वाली यह परिस्थिति चुनौती के साथ ही युवा शक्ति को एक अवसर भी प्रदान कर रही है। बडी मात्रा में युवाबल का होना यह सकारात्मक पहलू व परावलंबी नीतियों लगातार चलने के कारण शासनवलंबी विकास के प्रादर्श को अपनाने के कारण आत्मबलहीनता यह दो परस्पर विरोधी तत्व समाज में काम कर रहे हैं। शारीरिक आयु के अनुसार युवा हैं किन्तु युवा का स्वाभाविक उत्साह, आत्मविश्वास व उत्पादक उत्सुकता शासनाभिमुख मानसिकता के कारण सुप्त अथवा मरी हुयी है। शासन में इस युवा शक्ति के सम्यक सदुपयोग की ना तो कोई दृष्टि है न ही व्यावहारिक नीति अतः युवा शक्ति के राजनैतिक दुरूपयोग की संभावना भी क्षीण है। शासन की उदासीनता ने युवा वर्ग को एक प्रकार से स्वनिर्णय व स्वनियोजन की स्वतंत्रता प्रदान कर दी है। आवश्यकता केवल स्वप्रेरणा से उद्यम की है। इसके लिये कुछ व्यावहारिक ठोस उपाय किये जा सकते है।

1. उच्च शिक्षा में पढ रहे युवाओं के मध्य युवाओं के द्वारा ही एक सकारात्मक वैचारिक आंदोलन प्रारंम्भ हो चुका है – Don’t be a job seekar be a job giver  रोजगार माँगो मत रोजगार देनेवाले बनो। सामाजिक प्रसार माध्यम फेसबुक पर इस आंदोलन का जालपृष्ठ Webpage भी है। आवश्यकता है, इस आंदोलन का सब दूर प्रसार कर अधिक से अधिक युवा इसमें जुडे़ं।

2. युवा ही एकत्रित आकर उद्यमिता विकास के प्रकल्प प्रारंभ करें। अनेक सरकारी योजनाओं का लाभ संगठित होकर लिया जा सकता है। कौशल विकास youth logo(Skill development) के माध्यम से स्वरोजगार के अनेक क्षेत्र खुले हैं। निजी सुरक्षा (Private sequrity), खरखाव (House keeping),  पर्यटन (Tourism), घरेलू सेवायें जैसे नल कार्य (Plumbing), बढई (Carpentery), सिलाई (Tailoring), बिजली कार्य (Electrician) आदि के लिए संगठित होकर प्रशिक्षण, प्रचार, विपणन व क्रियान्वयन किया जा सकता है। इन सबके लिए अलग-अलग प्रतिष्ठानों, भागीदारी व्यवसाय (Partenership) अथवा कंपनी का भी गठन किया जा सकता हैं। डा रघुनाथ माशेलकर की अध्यक्षता में कार्य कर रहा राष्ट्रीय कौशल विकास प्राधिकरणNational Skill Development Corporation (NSDC) भी इस कार्य हेतु सहायता प्रदान करता है।

3. सहकारिता के द्वारा युवाओं के नवनवीन उद्यम खोले जा सकते हैं। (National youth co-operative society (NYCS)  इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल है।

4. युवाओं के उद्योग को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए युवा अधिकोष (Youth bank) जैसे प्रकल्पों का प्रारंभ किया जा सकता हैं।youth

5. शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण अवसर हैं जिसमें युवा स्वावलंबी व्यवसाय प्रारंभ कर सकते हैं। प्राथमिक विद्यालयों से लेकर निजी मार्गदर्शन (Private coching) और निजी महाविद्यालय तक सभी प्रकार के प्रयास किये जा सकते हैं। कुछ युवाओं को एकत्रित आकर इस दिशा में पहल करनी चाहिये।

6. उत्पादन के क्षेत्र में भी संगठित युवा पहल की आवश्यकता है। जैविक खेती, गो-पालन, मत्स्यपालन, मधुमक्खीपालन, अन्य पशुपालन के क्षेत्र में अवसर उपलब्ध है। आधुनिक प्रसार माध्यमों व तकनीकों का प्रयोग कर इन पारंपारिक व्यवसायों में क्रांति की जा सकती है।

revolution7. समाज सेवाके क्षेत्र में भी युवाओं को समर्पित संगठित प्रयास करने की आवश्यकता है। शिक्षा, चिकित्सा व स्वावलंबन इन तीनों प्रकार के सेवा प्रकल्पों में युवाओं की अत्यधिक आवश्यकता है।

8. ध्येयवादी राष्ट्रीय राजनीति में भी शुद्ध चरित्र के संकल्पबद्ध युवाओं को आगे बढने की आवश्यकता है। राजनीति का अर्थ केवल मंचीय नेतृत्व नहीं है। वास्तव में नेताओं को नीतिओं के बारें में अनुसंधान, अध्ययन कर परामर्श देने वाली टोली की अनिवार्य आवश्यकता है। यह कार्य सुशिक्षित, आधुनिक तकनीक मे तज्ञ युवा ही कर सकते हैं। नीतिगत अनुसंधान, सर्वेक्षण तथा प्रसार यह भी राजनीति का एक अनुंषागिक कार्य है। जिसमें आज बहुत कम लोग लगे हुए हैं। दल-निरपेक्ष राजनीतिक अनुसंधान राष्ट्र के लिये अत्यंत आवश्यक कार्य है। 

भारत एक अतिप्राचीन चिरयुवा राष्ट्र है। समय के प्रवाह के पढकर उसके साथ गतिमान सांस्कृतिक परिवर्तन की लचीली क्षमता ने इस राष्ट्र को कठिन से कठिनतम चुनौतियों के मध्य न केवल जीवित अपितु विजयी बनाये रखा है। काल के प्रवाह में अवसर के कुछ गवाक्ष समय समय पर खुलते हैं। ऐसा ही एक युग परिवर्तन का दौर आज चल रहा है। विश्व भारत से मार्गदर्शन की प्रतीक्षा में है। आइये! ‘युवा भारत’ को उत्पाकद उत्साह से भर दें और यह राष्ट्र अपने चिरयौवन से जगत का जागरण करने के वैश्विक कर्तव्य को पूर्ण करें इस महायज्ञ मे हम अपने जीवन की आहुती प्रदार करें।

दिसम्बर 22, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

चुनावी रणभूमी मे राष्ट्रवाद का शंखनाद


Republic day2चुनाव लोकतंत्र का महोत्सव है। वर्तमान में चुनाव आयोग द्वारा डाले गये कठोर निर्बंधों के कारण इस महोत्सव का उत्साह कुछ धीमा पड गया दिखता है। जमीनी गतिविधियों का स्थान अब प्रसार माध्यमों के अंदर होनेवाली प्रचार उथल-पुथल ने ले लिया है फिर भी चुनाव का समय सबके लिए ही अतिविशिष्ट सक्रियता का समय होता है। सभी प्रकार के कार्यकर्ता सक्रिय हो जाते हैं। सामाजिक कार्यों मे लगे, सामन्यतः गैर राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय कार्यकर्ताओं के लिए यह चिरंतन संभ्रम बना रहता है कि इस सक्रियता में योगदान करें अथवा नहीं और करें तो किस प्रकार से करें? भारत के वर्तमान परिदृश्य में सरकारी व्यवस्था से अछूता रहना लगभग असंभव है। जीवन के हर क्षेत्र में शासन का हस्तक्षेप है। माना कि ये स्थिति आदर्श नहीं है और विदेशी दासता के अवांछनीय अवशेष के रुप मे विद्यमान है किंतु यह भी नकारा नही जा सकता कि यह वास्तविकता है।

स्वतंत्रता पश्चात् हमने लोकतंत्र को राजनैतीक व्यवस्था के रुप मे स्वीकार किया। भारत के संविधान ने जनता को सर्वोपरि सार्वभौम सत्ता के केन्द्र के रुप के प्रतिष्ठित किया। अपेक्षा थी कि लोकतांत्रिक व्यवस्था इस धारणा को सृदृढ कर प्रत्यक्ष मे उतारती किन्तु प्रतिनिधिक लोकतंत्र के जिस स्वरुप को हमने भारत में अपनाया उसने समाज को जोडने के स्थान पर विघटित करने का ही काम किया। सर्वाधिक मत पाने वाले प्रत्याशी के विजय की व्यवस्था के कारण सबसे बडे गुट का प्रतिनिधि ही जनप्रतिनिधि कहलाया जाता है। बहुदलीय व्यवस्था के अंतर्गत चुनाव क्षेत्र मे अनेक प्रत्याशी होते हैं। जिसको सर्वाधिक मत प्राप्त होते हैं उसे विजयी घोषित कर दिया जाता है। इस व्यवस्था ने ऐसी हास्यास्पद विडम्बना की स्थिति उत्पन्न कर दी है कि कई स्थानो पर 15% से कम मत प्राप्त करने वाले प्रत्याशी भी जनप्रतिनिधि के रुप मे चुने जाते हैं। वास्तव मे देखा जाए तो डाले गए मतों मे से 85% से अधिक मतदाताओं ने इस नेता को प्रतिनिधि के रुप मे नकार दिया फिर भी सबसे बडे गुट का नेता होने के कारण वह उन 85% लोगो का भी प्रतिनिधि कहलाया जाता हैं। यह स्वाभाविक ही था कि राजनीतिक दलों ने अपने निहित स्वार्थ के लिए व्यवस्था की इस कमजोरी का उपयोग किया।

EVMजाति, वर्ग, भाषा आदि जो भी समाज को तोडने के माध्यम मिले उनके द्वारा अपने गुट को सबसे बडा सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाने लगा। क्षेत्रीय दलों के उभार ने रणनीति को और आगे बढ़ाकर अपने सीमित समर्थन को बड़ा बनाने के लिए बाकी बचे समाज को छोटे छोटे टुकड़ों में खंडित करने का काम किया। यदि किसी नेता या दल के पास जाति अथवा ऐसे ही किसी आधार पर 100 मे से 20 मतदाताओं का समर्थन है तो उसने भिन्न-भिन्न तरीकों से समाज के बाकी बचे 80 मतदाताओं को इतने टुकडों मे बाँटने का काम किया कि कोई गुट उसके गुट से बड़ा न हो जाए। विभाजनकारी राजनीति ने स्वतंत्रता के 66 वर्षों के पश्चात भी भारत की सुप्त क्षमता को प्रकट नहीं होने दिया है। आज विश्व मे चहुँ ओर सभी देश भारत के सामथ्र्य की सराहना करते हैं। जिनके मन मे मित्रता नही है वे भारत के उभरने की संभावना से आशंकित रहते हैं। किंतु इस राष्ट्र के सामथ्र्य-सूर्य को विघटनकारी राजनीति का ग्रहण लगा है। भारत में राष्ट्र पुनर्निर्माण के कार्य को यदि पूर्ण गति प्रदान करनी है व व्यवस्थागत प्रतिष्ठा दिलानी है तो उसके लिए राजनीति के विभाजक तंत्र को बदलना आवश्यक है। इसके बिना बाकी सारे प्रयास छलनी मे पानी भरने के समान निष्प्रभावी हो जाते हैं।

व्यवस्था  परिवर्तन इसका स्थायी समाधान है।First past the post ’सर्वाधिक मत पानेवाला विजयी’ इस व्यवस्था के स्थान पर प्रत्यक्ष एवं पूर्ण लोकतंत्रकारी ECव्यवस्था ‘बहुसंख्य का समर्थन’ ‘Mojority representation’ की व्यवस्था को लागू करना होगा। इसके अंतर्गत किसी भी चुनाव में जीतने के लिए डाले गए कुल मतों में से 50 प्रतिशत से कम से कम एक मत अधिक पानेवाला व्यक्ति ही विजयी घोषित होगा। ऐसी स्थिति में समर्थन करने वाले मतदाताओं की संख्या नकारने वाले मतदाताओं से निश्चित ही अधिक होगी। तब चुना हुआ नेता सच्चे अर्थ में क्षेत्र का प्रतिनिधि होगा। इस व्यवस्था को लागू करने मे अनेक आक्षेप व कठिनाइयाँ गिनाई जाती है किन्तु राजनीति को राष्ट्रीय एकात्मता के लिए बाध्य करने के लिए यही चिरस्थायी उपाय है। विश्व के अनेक देशों में इसी व्यवस्था के अंतर्गत चुनाव होते है। भारत से भी भौगोलिक रुप से विस्तृत व आबादी में भी लगभग बराबरी के रशिया में भी सभी आम चुनाव इसी विधि से होते हैं। यदि किसी चुनाव क्षेत्र में प्रथम चरण के मतदान में किसी को भी 50% से अधिक मत नही प्राप्त होते हैं तो प्रथम व द्वितीय स्थान पर रहने वाले प्रत्याशियों के मध्य दूसरे दिन पुनः मतदान कराया जाता है। अपने आप किसी न किसी को 50% से अधिक मत मिलेंगे ही। प्रायः ऐसा देखा गया है दूसरे चरण के मतदान की आवश्यकता ही नही पड़ती। इस व्यवस्था में स्वाभाविक रुप से ही प्रत्येक दल ऐसे प्रत्याशी का चयन करता है जिसे समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों का समर्थन मिल सके। गुटीय हितों के स्थान पर सामूहिक हित चुनावी मुद्दे बन जाते हैं। क्षेत्रीयता, साम्प्रदायिकता, जातीयता आदि चुनाव जिताने के लिए सक्षम नही होते। अतः राष्ट्रीयता, एकात्मता, एकता, समरसता यह विषय अधिक प्रभावी होते हैं।

मन में यह प्रश्न आना स्वाभाविक है कि जब तक यह व्यवस्था परिवर्तन नही हो जाता तब तक राष्ट्रवाद का चुनावी राजनीति में कोई स्थान ही नहीं? वास्तव में बात बिल्कुल इसके विपरीत है जब तक संपूर्ण एवं प्रभावी लोकतंत्र के रुप मे बहुसंख्या का प्रतिनिधित्व यह नियम लागू नही होता तब तक राजनीति के द्वारा समाज के विभाजन को रोकने का एकमात्र उपाय है ’राष्ट्रवादी राजनीति’। जातीयता, साम्प्रदायिक तुष्टीकरण, वर्गवाद, धनबल तथा बाहुबल आदि लोकतंत्र के असाध्य विकारों को ठीक करने का एकमात्र उपाय है – ’चुनावी रणभूमी मे राष्ट्रवाद का शंखनाद’। राष्ट्र का हित, राष्ट्र की संस्कृती, राष्ट्रीय परंपरायें, राष्ट्रीय जीवनध्येय इन पर आधारित नीतियों को महत्व देनेवाले दल एवं नेता का जब समाज स्वयंस्फूर्त समर्थन करने लगेगा तब अन्य सभी संकुचित स्वार्थों पर आधारित विघटनकारी मुद्दे गौण हो जायेंगे। समाज में काम कर रहे प्रत्येक सामाजिक कार्यकर्ता का यह कर्तव्य बन जाता है कि ऐसे राष्ट्रवादी वातावरण का जागरण करें।

bharatmataलोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ प्रसार माध्यमों का भी कर्तव्य बन जाता है कि विघटनकारी मुद्दों को महत्व देने के स्थान पर जोडनेवाले एकात्मता को बढावा देने वालें विषयों, नेताओं तथा दलों का अधिक प्रचार दें। धन के द्वारा क्रय की हुयी प्रसिद्धी के आधार पर समाज को तोडनेवाले नेताओं व दलों को सबक सिखाने का काम राष्ट्रकार्य के रुप में प्रसार माध्यमों को भी करना होगा। पेड न्यूज के द्वारा माध्यमों का धनबल के आगे समर्पण लोकतंत्र के विनाश का कारण बन रहा है। भारत एक निर्णायक दौर से गुजर रहा है। वैश्विक परिदृश्य में अवसर की जो एक छोटी सी खिडकी खुली है उसका यदि निर्णायक उपयोग करना है तो आज राष्ट्र को सुदृढ, सक्षम व निःस्वार्थ नेतृत्व की आवश्यकता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही ऐसे नेतृत्व को जन्म एवं पोषण दे सकता है। पश्चिम में राष्ट्रवाद की अवधारणा राजैनतिक व आर्थिक है। इस कारण से वह राष्ट्रों के मध्य प्रतिस्पर्धा को जन्म देती है। इस प्रतिस्पर्धा का रुपांतरण बाजारी शोषण, शस्त्र स्पर्धा व अंततः युद्धों में भी होता है। द्वितीय महायुद्ध में सारे विश्व पर युद्ध की विभीषिका थोपने वाल हिटलर ने भी जर्मन राष्ट्रवाद के नारे का ही तात्विक आधार लिया था। उसके बाद से अंतरराष्ट्रीय विमर्श में राष्ट्रवाद एक घृणित एवं निन्दनीय पद बन गया है। भारत में भी साम्यवादी व समाजवादी विचार को पोषित करनेवाले विचारकों ने इसी पश्चिमी दृष्टि से प्रभावित होकर राष्ट्रवाद की घोर आलोचना की है। इसे संकुचित, तानाशाही व फासिस्ट जैसे संबोधनों से पुकारा है। इस कारण सामान्य बुद्धिजीवी भी राष्ट्रवाद के प्रति सकारात्मक विचार नही रखते किन्तु भारत में राष्ट्रवाद की संकल्पना कतई आर्थिक अथवा राजनैतिक नहीं है। भारत में यह मूलतः आध्यात्मिक व व्यवहार में सांस्कृतिक विचार है। आर्थिक व राजनैति राष्ट्रवाद जहाँ भौगोलिक सीमाओं और बाजारी प्रतिस्पर्धाओं के कारण विभाजनकारी बन जाता है वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद व्यक्ति से परिवार, समाज से आगे राष्ट्र तक मन के विस्तार का माध्यम होने के कारण एकात्मदृष्टि का विकास करता है। स्वाभाविक ही यह राष्ट्रवाद विस्तार की अगली सीढ़ी के रुप में मानवता को देखता हैं। अतः इस राष्ट्रवाद में राष्ट्रहित के साथ ही विश्वहित व उससे भी परे सृष्टि का हित भी निहित है। यह राष्ट्रवाद तोडता नही जोड़ता है।

जाति, पंथ, सम्प्रदाय, वर्ग, भाषा, क्षेत्र आदि के द्वारा विभिन्न वादों का निर्माण कर चल रहे समाज विघटन के तांडव को यदि रोकना है तो सभी को मिलकर एक ही उद्घोष करना होगा कि ‘राष्ट्र सर्वोपरि है’। मेरे व्यक्तिगत, पारिवारिक, क्षे़त्रीय, सामाजिक, पांथिक, साम्प्रदायिक अथवा प्रांतीय हितों से अधिक महत्वपूर्ण राष्ट्रहित हैं। इस विचार को अपने हर कार्य मे अभिव्यक्त करना होगा। चुनाव में आग्रह पूर्वक सहभागी होना, मतदाताओं का पंजीयन करना अधिक से अधिक लोगों को सकारात्मक मतदान के लिए प्रेरित करना, दलों व नेताओं को राष्ट्रहित के मुद्दों पर विचार एवं बात करने के लिए विवश करना यह हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है। आइए! लोकतंत्र के महोत्सव में राष्ट्रवाद के उजास को प्रकाशित करने का संकल्प लें।

नवम्बर 29, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

Do not be a Job-seeker Be a Job-giver


This is published in Organiser April 14 issue.

http://www.organiser.org/Encyc/2013/4/6/Be-the-Change.aspx?NB=&lang=4&m1=&m2=&p1=&p2=&p3=&p4=&PageType=N

youthTHE crime rate in the cities is on the rise. They blame it on unemployment. Unemployed youth is the devils workshop as he does not have anything productive to be engaged in. On the other hand they have dreams of earning fast money. In search of short cuts to hard cash they inevitably land in some kind of crime racket. This is revealed in the interrogation of suspects of numerous crimes ranging from petty thefts to murder. One of the astonishing facts is that most of these young first time criminals are either well educated or students. So it is not lack of education that is the cause of this perversion of mind. It is much deeper.

The aim of education in modern Bharat has become employment. It is official now. Job-oriented education has been the goal of our national educational policy for more than three decades. It is debatable whether we have achieved any tangible success in employment generation through continuously increasing spread of education. But we have definitely succeeded in making employment a national goal of our young generation.
Everybody is in search of a job. While choosing the course of study only consideration is the employability of the graduates of that course. The higher the job guarantee higher the demand for admission in the course. Packages offered and placements achieved are the prime factors in the propaganda material of the so-called professional educational institutes. It seems the whole country is striving to become an employee. There is no urge on the part of students and encouragement on the part of family, society or government to be entrepreneurs.

Starting any business is considered risky. Those trained to be engineers are not confident enough to start a small manufacturing unit. This lack of risk, hard work and productivity is the cause of moral degradation of the young generation. Jobs are considered safer; government service is the safest bet hence we see a beeline of aspirants for these vacancies. When a requirement for peon is advertised, thousands of youth apply. Most of them are over qualified. Even for the civil service exams the aspirants are out of proportion to the number of vacancies. More than a hundred thousand appear for the six hundred odd seats in the civil services examination. What is more baffling is the number of professional graduates appearing in competitive exams.  We find qualified medical doctors aspiring to become civil servants. One trained in the noblest of the professions lining up to be a government servant shows the pathology of the social psyche. When the brightest minds of the country aspire to become honorable slaves how can we expect the country to achieve real independence? Political freedom was gained in 1947 but real independence is yet to be achieved by Bharat. There is a need to start a nationwide movement for real independence. It has to be a multipronged effort. But most important basic ingredient will be independence of mind.

It is said that ‘Real education is one that liberates. (sa vidya yaa vimuktaye). This changes the revolutionwhole paradigm.  The aim of education does not remain bread earning but it becomes much higher. Education should be able to create confident, qualified, developed personality. For such a well-accomplished person earning livelihood will be the easiest thing. Then he will not be compelled to choose most available source of employment but would create opportunities of his own liking. He will aspire to achieve rather than just earn. He/ she will choose the path according to their own inner core and work hard to realize their dreams.
It is estimated that Bharat will have largest population of employable youth in imminent future. The greatest challenge for the policy-makers is to take full advantage of this demographic dividend. If not, this will become an unbearable burden for the country. The ancient nation with the youngest population needs a fundamental shift in approach towards economics, development and most crucially towards education. No nation can productively use youth to the tune of 65 crore if it encourages them to be employees only. If large number of these youth are going to depend on private or government jobs for their survival we are looking at a disaster in waiting. A more pragmatic approach suitable to conditions of the country will be to promote our younger generation to become employers rather than employees. ‘Don’t be Job seeker be a Job giver’ should be the motto of higher education in Bharat.

Self-employment in all sectors needs to be given highest incentive. ‘Small is beautiful’ should be the theme. Small should become more profitable. Decentralized economic vibrancy can be achieved if the youth are motivated to think creatively and be productive. They should be equipped by education to be economically independent. Rather than focusing of urbanization of the rural population we must create economic opportunities in the remote areas. Agriculture in Bharat has been traditionally the largest bread earner. More than 60% of our agricultural land holdings are small and medium farmers. We must strengthen these. Farming must be made a profitable economic activity. Many well educated youth are doing experiments in organic farming. These experiments need to be encouraged and replicated all over the country.
This does not need government patronage.  A social movement is what is necessary. Let the society take lead. A self employed person needs to be given more respect. Social mindset has to be groomed. We have to create icons out of youth engaged in productive activity on their own. A petty hawker selling vegetables earns to the tune of 1000 to 2000 Rs. per day in the metros. He needs to be given more respect than a government employee earning 20000 Rs. per month. These self employed youth should be felicitated by the society. They should be presented before the youth in the colleges as icons.

National skill development corporation was formed with the aim to promote, train and recognize skills for encouraging self-employment. It has remained another government initiative. Tens of thousands of crore rupees in the budget of NSDC lapsed  for the lack of projects. To make skill development successful it must become a social movement. Youth aspiring to be self employed should be backed by society. Capital generation through micro investment and co-operative movement is another step which will complement the young entrepreneurship movement.
There are many more steps that are needed to be taken. But the most urgent is the change of attitude. Education is the tool for attitudinal correction. The aim of education should be gain knowledge to be able to stand on our own feet. Educated youth should have self esteem.  They must be able to apply their knowledge with pride in their own field of interest. Earning then becomes but a by-product in the creative life of contribution. Let us build a society based on these values. A self reliant society is the pre-requisite for a really sovereign, independent and prosperous nation.
Let as all proclaim to our youth. ‘Do not be a Job-seeker Be a Job-giver’ – Be the change that you want to bring.

अप्रैल 8, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

Bharat’s National Mission


Republic day2‘Each nation has a destiny to fulfill, a message to deliver and a Mission to accomplish.’ Swami Vivekananda proclaimed at Madurai after his triumphant return from the west. This was a revolutionary application of Vedantic principle that human beings have distinguished individuality. Similarly, the organic collectivity expressed in form of nationality has unique characteristics. These are evolved through collective historical and cultural experiences of the people. The society and people at large act in the normal times, react to the external stimulus and respond to the challenges according to their national character. Swami Vivekananda further elaborates – the national character of Briton is politics and that of America is commerce and of France is aesthetics. When four Americans come together they discuss profit and will soon launch a company. This is their nature. So what is the national character of Bharat? Swami Vivekananda says it is Dharma. Dharma is the soul of Bharat. As way of illustration, he explained, though at that time India was ruled by the British; hardly anyone knew who their queen was. But on the other hand even a peasant in the remotest part of Bharat knew that some Hindu Monk had gone abroad and had conquered the world parliament of religions. They may not know the name of the monk or the venue of the event but they knew about the conquest.

CHICAGO_1893_20x30_21_RGB_FINAL_00            This is evident from the memoirs of a British soldier who witnessed the majestic welcome accorded to Swamiji on his return from the west. One Subhedar Suraj Rao who was on leave then, was present at the public welcome in Madurai. He was overwhelmed by Swamiji’s clarion call and wanted to meet him again. He was instrumental in stopping Swamiji’s train at his village station. The villagers inspired by Suraj Rao blocked the railway line when the station Master refused to halt the train at this unscheduled stop. The train had to be eventually halted at that small station. Swamiji came to the compartment door and blessed the villagers. The train was headed to Chennai. Suraj Rao was not satisfied with this brief meeting. He decided to walk along the western coast to Chennai to join Swamiji. On way to Chennai he came across a small hamlet of fishermen in the evening. There was festive mood with songs, dance and lamps everywhere. When Suraj Rao enquired as to the occasion for such celebrations; the villagers asked back, “Don’t you know one of our Hindu Monk has just returned from foreign lands after conquering them with his knowledge and spiritual power?”

This is real Bharat. Swami Vivekananda realized the soul and the spirit of Bharat in its entirety. This is what he represented at Chicago. His well applauded opening address ‘Sisters and brother of America’ was expression of the Integral philosophy of oneness practiced from time immemorial in this divine land. Swamiji had internalized this ‘way of life’ through his national devotion (Bharat Bhakti). He not only understood the intellectual sublimity of this eternal (Sanatana) thought but realized it through his experience of the daily life of the common masses across the length and breadth of the country. This was message of practical Vedanta that he carried with him to the west. He preached the time-tested principles of Hindutva aptly termed Sanatana Dharma, the eternal law to America, the land of bounty, pleasure and vanity. He proclaimed that Vedanta was the future religion of the whole humanity. The idea of Universal Religion mooted by Swamiji in the west was the poetic expression of the inherent eternal spirit of Bharat.

The fact that Dharma is the life blood of this land is evident even today. If one travels in the general bogie of Indian Railways and listens to the general discussion; one will understand the undercurrent of Bharat’s national life. The discussion may start from any mundane topic like politics, corruption or inflation but would soon steer towards Dharma. The author has timed it many times and the longest was 12 minutes within which the discussion turned Dharmic. There will be quotes from scriptures. People will fluently quote from Ramcharitmanas and Kabir in the north, from Thirukurral in the south, from Narasi Mehta in Gujarat and Shrimat Shankardeva in Assam. This is what real Bharat cares for and not the worthless discussions on the so called national media.

The tragedy of the time is that this spirit of Bharat as enunciated by the masses in their daily life finds no expression in the established system of Governance. May it be legislative, administrative or judicial system; nothing is rooted in the cultural and historical experience of Bharat. Even after independence we have continued with these alien systems. It’s no wonder that the nation has yet to rise to the expectations of its own people and yet to live up to the potential often recognized by the world community.

The process of decolonization initiated by seers like Swami Vivekananda in the beginning of last century evolved into the national renaissance and freedom struggle. Nationalistic spirit was expressed in all the walks of life. Nationalist educational institutions came into existence. This led to the inevitable outcome- independence of Bharat. But it seems the process is reversed since independence. We seem to be more colonized mentally now and more importantly there is no urge and effort to overthrow these shackles mental slavery.

hindi logo150th anniversary of the patriot prophet is the right occasion on which we must once again kick-start the process of decolonization as an urgent and mighty national movement. The protesters taking to the streets on various issues represent this national urge To Change. They may not be eloquent in their demands and they may not know that the remedy of all the illness is in creating a system based on indigenous thought and experience. It’s not their fault as they are not trained in the Dharma of the land. But it is very clear that Bharat wants the prevailing system to be scrapped. The energy of the youth needs to be channelized into a positive thought movement.

Swami Vivekananda will show the constructive, creative way. We need to formulate political, economic, judicial and most of all educational system based on the eternal principles of the land. We need to prepare a Smriti for the present time. The soul of Nation, Dharma, needs to be expressed in the contemporary terminology. This will serve as the Real Constitution of the people of Bharat. Keeping this as the ultimate goal, the nation needs to work out a plan of action for reforms in all the sectors. This alone is the kind of movement that will succeed in Bharat.

Let us remember what Swamiji told us very clearly – Dharma is the Soul of Bharat. Spirituality is the message it has to deliver to the whole world. Guiding the mankind to lead a purposeful, happy, holistic and sustainable life of eternal bliss is the mission of Bharat and to be the World-Teacher (Jagad Guru) is the destiny of Bharat which it has to attain.

Let us resolve to put our lives to work for this national mission.

Bharatiya Shikshan Mandal

Sheshadri Sadan, Tulasibag Road,

Mahal, Nagpur- 440032

madhyanchal@gmail.com

Cell:  9405774820

जनवरी 25, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , | 1 टिप्पणी

क्रांतिकारी कृष्ण


इस वर्ष जन्माष्टमी का पर्व अगस्त क्रांति के दिनांक पर आ रहा है। 9 अगस्त को सच्चे अर्थ में क्रांति दिवस मनाया जाना चाहिये अथवा नहीं इस पर विवाद हो सकता है किन्तु इस बात पर कोई दुमत नहीं हो सकता कि कृष्ण का तो पूरा जीवन ही क्रांतिकारी है। उन्होंने प्रस्थापित को पूरी तरह से बदल डाला। यह परिवर्तन अपनी किसी अलौकिक दैवी शक्ति का प्रयोग कर चमत्कार के द्वारा नही किया अपितु समाज के जागरण के द्वारा सामूहिक शक्ति के सुनियोजित प्रयोग के माध्यम से यह परिवर्तन घटित किया गया। इसलिये वे सामाजिक क्रांतिकारियों के आदर्श कहे जा सकते है। उनके जीवन से हम सफल सामाजिक क्रांति के लिये आवश्यक तत्वों को समझ सकते हैं।

श्रीकृष्ण के जीवन के तीन स्पष्ट भाग हैं। नंदग्राम की लीलाओं से लेकर कंसवध तक का प्रथम भाग मूलतः असुरों के दमन का है। पुतना से प्रारम्भ कर कालिया मर्दन सहित अनेक राक्षसों के निःपात के बाद चाणूर तक पूरा बाल्यकाल इस संघर्ष का साक्षी है। जरासंध के मथुरापर सतत आक्रमण के बाद रणछोड़दास का दोष लेते हुए द्वारिका गमन तथा वहाँ पर शून्य से प्रारम्भ कर स्वयं हल चलाकर स्वर्णीम राज्य का निर्माण यह रचनात्मक सृजन का कालखण्ड। तीसरा कालखण्ड है महाभारत का – पूर्ण व्यवस्था का परिवर्तन। गीता का सिद्धान्त इस धर्मराज्य की स्थापना का आधार है।

वर्तमान समय मे भी यह तीनों कार्य सफल क्रांति तथा पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के लिये आवश्यक है। भ्रष्टाचारियों के विरूद्ध लड़ाई असुर निर्दालन के समान ही है। आज के कंस-चाणूरों का मर्दन भी आवश्यक है। पुतना बनकर आये सम्बंधियों को भी सबक सिखाना होगा और धरति के संसाधनों में विष फैलाते कालिया की फन पर नृत्य भी करना होगा। कंस के गुण्डों के पोषण हेतु मथुरा जा रहे दूध-दही की मटकियों को फोड़ अपने गोपबालों का पोषण करने की सहज बाललीला भी आज अनिवार्य है। काले धन के प्रवाह को रोकना तथा इसे पुनः देश में लाकर स्वदेशी संसाधनों के स्वदेश विकास में प्रयोग की क्रांति ही कान्हा की दहीहांडी का संदेश है। द्वारिका की रचना पूरे समाज को सुखी करनेवाले विकास की व्यवस्था का एक छोटे स्तर पर प्रयोग है। आज अनेक संगठन अपने अपने स्तर पर ऐसे प्रयोग कर रहे है। राजकीय स्तर पर गुजरात में विकसित विकास के प्रादर्श को भी इसी रूप में देखा जा सकता है। पाण्डवों को स्थापित करने महाभारत के युद्ध का सारथी बन निर्देशन तथा उसके तात्विक आधार को स्पष्ट करता गीता का आख्यान आज की आवश्यकता है। यह निर्णायक धर्मयुद्ध धर्माधारित राज्य की स्थापना के लिये अनिवार्य है। पर युद्ध से पूर्व आज के समय के अनुसार क्रांतिगीता की रचना भी आवश्यक है। वर्तमान व्यवस्था परिवर्तन में रत क्रांतिकारी इस मुख्य चरण की ओर ध्यान नहीं दे रहे इसी कारण सारे प्रयास अधुरे ही सिद्ध हो रहे हैं। वर्तमान समय के अनुरूप सनातन सिद्धान्तों की व्याख्या कर युगानुकुल गीता की रचना के द्वारा ही व्यवस्था परिवर्तन का संघर्ष अपने अंतिम युद्ध में सफल हो सकता है।

क्रांति पथ के इस अनुपम मार्गदर्शन के साथ ही क्रांति की कार्यपद्धति के बारे में भी संकेत भगवान कृष्ण के जीवन से हमें प्राप्त होते हैं। सभी संघर्षों में उनकी भौतिक शक्ति विरोधी के सामने कम ही थी। चाणूर मुष्टिक के सामने कान्हा-दाउ तो सुकुमार बालक ही थे। जरासंध से संरक्षित कंस के सम्मूख विस्थापित कृष्ण और उसकी गोपसेना का बल था ही क्या? महाभारत में भी कौरवों की 11 अक्षोहिणी सेना का सामना पाण्डवों की सात अक्षोहिणी सेना को करना था। महारथियों की सुचि भी ऐसीही विषम थी। सारे जीवन श्रीकृष्ण ने संख्या व संसाधनों में कमजोर होते हुए भी अपने से कई गुना बलशाली शत्रु का निर्दालन किया। केवल सत्य व धर्म के अपने पक्ष में होने के आदर्शवाद के सहारे ही नहीं अपितु व्यावहारिक चतुराई के द्वारा यह विजय सम्भव हुई। अतः क्रांति का पहला पाठ जो कृष्ण के जीवन से हम पढ़ सकते है वह है – युक्ति से शक्ति का सामना। कालयवन का मारना उनके बस में नही था तो भाग कर चतुराई से उसे उस गुफा में ले गये जहाँ मुचकुन्द तपस्या कर रहे थे। कालयवन द्वारा तपस्या भंग किये जाने पर मुचकुन्द के तपोबल से वह भस्म हुआ। मुचकुन्द ने कृष्ण को श्राप दिया कि उसे रणछोड़ का लांछन प्राप्त होगा। धर्म व समाज के भले के लिये कन्हाई ने इस लांछन को भी गर्व से धारण किया। महाभारत में तो पार्थसारथी की युक्तियों के बिना धर्म की विजय सम्भव ही नहीं होती। जयद्रथ, द्रोण, भीष्म, कर्ण, घटोत्कच के वध तथा अंत में दुर्योधन की जंघा का मर्दन होने तक सब प्रसंगों में कृष्ण की व्यावहारिक नीतियों ने पाण्डवों की सुनिश्चित हार को विजय में परिवर्तित किया। कृष्णनीति में साध्य की शुद्धता को अधिक महत्व दिया गया। यदि साध्य धर्म के अनुसार है तो उसकी प्राप्ति में लगनेवाले साधन की शुद्धता पर अति मीन मेख करना कृष्णनीति का अंग नहीं है। द्रोण को शोकाकुल करने ‘अश्वत्थामा हतः’ का अर्धसत्य बोलने के लिये धर्मराज को तत्पर करना अथवा दलदल में फँसे रथचक्र में उलझे कर्ण पर बाण चलाने के लिये अर्जुन को प्रेरित करने में पार्थसारथी ने दिखा दिया कि खोखली नैतिकता से स्वयं के हाथ बांधकर दमनकारी राक्षसों नहीं लड़ा जा सकता। इस व्यावहारिकता के साथ क्रांति की रचना करना आज अत्यावश्यक है। सभी अधर्मी षड़यन्त्रों से राज्य कर रहे दुष्टों का सामना केवल आदर्शवाद के सहारे करना असम्भव ही लगता है।
क्रांतिकारी कृष्ण के आंदोलन का दूसरा महत्वपूर्ण पाठ है — सामान्य जन के आत्मबल को जागृत कर पूरे समाज को क्रांति में सम्मिलित करना। नंदग्राम में सामान्य गोपबालों को उनके अन्दर के असीम बल के प्रति जागृत कर कंस के शोषण से मुक्ति दिलाने का कार्य कान्हा ने किया। गोवर्धन पूजा के समय इन्द्र के प्रकोप से रक्षा अपनी कनिष्ठिका के बल पर करने का सामाथ्र्य रखने वाले गिरीधारी ने उंगली लगाने से पूर्व सारे गोप-गोपियों को अपनी लाठी का आधार देने के लिये प्रवृत्त किया। सबके सहभाग से ही क्रांति की सफलता सम्भव है। द्वारिका के निर्माण में भी बहुजन समाज के सहभाग से ही रचनात्मक आंदोलन खड़ा किया गया। कृष्ण चरित्र के इस भाग के विस्तार से अध्ययन की आवश्यक है। द्वारिका के वैज्ञानिक निर्माण में वहाँ के स्थानिय समाज का सहभाग भी उतना ही महतवपूर्ण था। अतः सामान्यजन के आत्मबल को जगाना कृष्ण की क्रांति का महत्वपूर्ण घटक है। वर्तमान समय में इस सामूहिक आत्मविश्वास के जागरण की अत्यन्त आवश्यकता है। केवल संख्या जुटाने से जगनेवाले उत्साह को आत्मबल मान लेना ठीक नहीं है। जबतक क्रांति में जुटनेवाला प्रत्येक व्यक्ति निस्वार्थ भाव से अपने अन्दर की शक्ति को जानकर संघर्ष में नहीं जुट जाता क्रांति का समग्र परिणाम सम्भव नहीं है। महाभारत का विनाशकारी युद्ध भी केवल सत्ता परिवर्तन मात्र ही रह जाता यदि गीता के द्वारा धर्म की क्रांतिकारी व्याख्या का प्रतिपादन भगवान् कृष्ण ने नहीं किया होता। गीता जनप्रबोधन का गीत है। जनजागरण के तीन स्तरों को कृष्ण के जीवन से हम सीख सकते है। नन्दलाला के वेणुद्वारा किया गया भावात्मक जागरण, द्वारिका में बलराम के हल के साथ जुट़े समाज के हाथों से क्रियात्मक जागरण व धर्मक्षेत्र कुरूक्षेत्र की रणभूमि में गाये गीता के विशुद्ध तत्वज्ञान द्वारा वैचारिक जागरण। तीनों में से केवल किसी एक के होने से ही क्रांति नहीं हो जाती। मन की संवेदना, बुद्धि की योजना व हाथों के कर्म से ही रचनात्मक क्रांति सुफल होती है।

कृष्ण की क्रांति का तिसरा तत्व है – सकारात्मकता। क्रांति मूल रूप से प्रस्थापित के परिवर्तन के लिये होती है अतः सामान्यतः ऐसे आंदोलनों में प्रतिक्रियावाद का हावी होना स्वाभाविक होता है। किसी के विरोध में लोगों का समर्थन जुटाना भी सहज होता है। शत्रु प्रत्यक्ष होने से संघर्ष भी स्पष्ट होता है। किन्तु प्रतिक्रिया के नकारात्मक विचार की नीव पर खड़ी क्रांति का भवन अधिक समय तक स्थिर नहीं हो सकता। अभावात्मक अथवा नाकारा विचार के लिये किया गया शुभ कर्म भी समग्र तथा स्थायी परिणाम नहीं दे सकता। द्वारिका में पहुँचना भले ही जरासंध के मथुरा पर 17 बार किये आक्रमणों की प्रतिक्रिया थी किन्तु उसके पीछे का भाव मथुरा की जनता की रक्षा ही था। स्वयं पर पलायन का लांछन भले ही लगे किन्तु अपने वैमनस्य के कारण जनता का नुकसान ना हो इस सद्भावना पर आधारित होने के कारण ही यादव राज्य के निर्माण का रचनात्मक आंदोलन सफल रहा। उससे पहले भी नन्दग्राम में किये समरसता के सामाजिक आंदोलन की नीव भी सबके अन्दर विद्यमान देवत्व के जागरण की एकात्मता ही थी। इसीलिये गोवर्द्धन पूजा की पर्यावरण क्रांति के समय भी इन्द्र के साम्राज्यवादी पुंजीवाद का प्रत्यक्ष विरोध ना करते हुए सकारात्मक विकल्प प्रदान कर परिवर्तन किया गया। इसी कारण गोपबालों के आत्मजागरण की क्रांति सफल हो सकी और कंस के वध के बाद भी जनता के कोप का सामना नहीं करना पड़ा। क्रांति का लक्ष्य, वैचारिक आधार व मार्ग तीनों का सकारात्मक होना आवश्यक है। वर्तमान में अधिकतर आंदोलन इस प्रकार का सकारात्मक लक्ष्य ना रख पाने के कारण ही सीमित व अस्थायी सिद्ध हो रहे है। यह कृष्ण की ही विशेषता है कि महाभारत का युद्ध पाण्डवों का प्रतिशोध मात्र होने के स्थान पर धर्मयु़द्ध का सकारात्मक रूप ले सका। भले ही उसके लिये उन्हें स्वय कौरव राजसभा में पाण्डवों के दूत के रूप में पैरवी कर अपमान सहना पड़ा।

क्रांतिकारी कृष्ण की कार्यपद्धति का सबसे महत्वपूर्ण चैथा आयाम है उनका स्वयंका पूर्णतः सत्ता निरपेक्ष होना। कंस के वध के बाद यदि कृष्ण स्वयं राजा बन जाते तो जनता तो उनका स्वागत ही करती किन्तु कृष्ण का जीवन इससे कई गुना उदात्त है। इसी कारण वे कंस के जन्मदाता उग्रसेन को बंदिगृह से मुक्त कर उनका राज्याभिषेक मथुरा के राजा के रूप में करते है। कृष्ण को तो सारी जनता के हृदय पर राज करना है। द्वारिका में भी राज्यस्थापना के बाद वे स्वयं कोई पद ग्रहण नहीं करते है। अपने पिता वसुदेव को यादवराज्य के राजा के रूप में प्रतिष्ठित करते है। महाभारत युद्ध से पूर्व भी बिना किसी पक्षपात के कौरव पाण्डवों दोनों को सहयोग प्रदान करते है। यह निरपेक्षता ही कृष्ण की नैतिक शक्ति है जिसके कारण वे पूरे विश्व के हृदय पर शासन करते है और सही शासक को सत्ता प्रदान कर बाहर से नीतिगत मार्गदर्शन कर सकते है। वर्तमान में भी इसी प्रकार के राजनैतिक आकांक्षाओं से पूर्णतः अलिप्त निःस्वार्थ नैतिक नेतृत्व की क्रांति को प्रतिक्षा है।

आज की जन्माष्टमी हमारे लिये आत्मावलोकन का समुचित अवसर प्रदान करती है। आज जब दैवी असंतोष से पीड़ित जनता भारत में आमूलचूल परिवर्तन के लिये समग्र स्थायी क्रांति के लिये उद्यत है तब हम अपने अन्दर के कन्हाई को जगाये। युक्ति की शक्ति, सर्वसामान्य जन का भावात्मक, क्रियात्मक व वैचारिक जनजागरण, सकारात्मक लक्ष्य तथा सत्ता निरपेक्ष निःस्वार्थ नेतृत्व के चिरंतन तत्वों को आचरण में उतारकर सच्ची क्रांति का निर्धार करे। क्रांतिकारी कृष्ण हमारा नेतृत्व अवश्य करेंगे, पार्थसारथी की गीता हमारा सारथ्य करेगी और कंस चाणूर का मर्दन करनेवाले विश्ववन्द्य जगत्गुरू माँ भारती को पुनःप्रतिष्ठित करने में हमारे साथी बनेंगे।

अगस्त 9, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , | 5 टिप्पणियाँ

स्मृति स्वाधीनता संग्राम की . . .


10 मई 1857, अंग्रेजी सत्ता के विरूद्ध प्रथम स्वाधीनता संग्राम का शुभारम्भ। 1908 में स्वातन्त्र्यवीर सावरकर ने लंदन में 10 मई को क्रांति दिवस के रूप में मनाया था। उन्होंने हुतात्माओं की शपथ ली थी कि जब तक देश स्वतन्त्र नहीं हो जाता क्रांति की अग्निशिखा को प्रज्वलित रखेंगे। सावरकर ने ही ‘प्रथम स्वातन्त्र्य समर‘ नाम से पुस्तक लिख कर इसके वास्तविक राष्ट्रीय स्वरूप का परिचय भारतीयों को करवाया था। यह विश्व की एकमात्र ऐसी पुस्तक है जिसे छपने पूर्व ही प्रतिबंधित कर दिया गया तथा मूल पुस्तक के प्रकाशन से पूर्व ही इसका फ्रेंच अनुवाद प्रकाशित हुआ।

सावरकर ने उस समय की परिस्थिति के अनुसार इसे केवल प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम कहा है किन्तु आज हमें यह स्पष्ट करना चाहिये कि यह अंग्रेजों के विरूद्ध प्रथम आंदोलन था। केवल प्रथम कहना तो पूर्ण सत्य नहीं होगा। शिवाजी, राणाप्रताप के संग्राम भी स्वाधीनता के ही संग्राम थे। शिवाजी से प्रेरणा प्राप्त कर छत्रसाल जैसे अनेक वीरों ने मुगलों के परकीय शासन को उखाड़ स्वकीयों के शासन को प्रस्थापित किया था। उससे भी अनेक शताब्दियों पहले सिकन्दर की सेना को भगाने का कार्य चाणक्य के शिष्यों ने किया था। अतः स्वाधीनता का संग्राम तो भारत में सतत चलता रहा है। गत 2000 वर्षों में कोई भी 25-50 वर्ष का भी कालखण्ड ऐसा ना बीता हो जब देश के किसी ना किसी कोने में स्वतन्त्रता का आंदोलन ना हुआ हो। हमने कभी भी विदेशी, विधर्मी सत्ता को पूर्णतः स्वीकार नही किया। इतना ही नहीं इस कालखण्ड के बहुत बड़े हिस्सें में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से हमारा अपना स्वदेशी शासन चलता रहा है। विदेशी इतिहासकारों के प्रभाव में आज भी हम इसे मराठा, राजपूत, सिख शासन इस प्रकार बाँटकर देखते है। जब कि ये सब स्वकीय शासन थे। इतिहास को पश्चिमी दृष्टि के स्थान पर भारतीय राष्ट्रीय दृष्टिकोण से देखने पर हमको इस कालखण्ड को दासता अथवा गुलामी का काल कहने के स्थान पर संग्राम युग कहना होगा।

प्लासी में द्रोहियों के कारण हुए पराभव के बाद पराधीन हुए भारत का अंग्रजों की सत्ता के विरूद्ध पहला संगठित संग्राम 1857 का है। इस संग्राम की अनेक विशेषतायें हैं। सामान्यतः जिसे केवल सिपाही विद्रोह कहा जाता रहा है तथा दुर्भाग्य से आज भी अनेक भारतीय विश्वविद्यायलों के पाठ्यक्रम में इसी रूप में पढ़ाया भी जाता है वह जन सामान्य का संग्राम था। अंग्रेजी फौज में सम्मिलित भारतीय सैनिक भी जनविद्रोह का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थे। दूसरा भ्रम यह फैलाया जाता है कि यह केवल राजे रजवाड़ों तथा नबाबों का अपने अपने संस्थानों के लिये किया युद्ध था। राष्ट्रीय स्वतन्त्रता का भाव इसमेे निहित नहीं था। यह भी जानबुझकर फैलाया भ्रम है। उस समय के अंग्रजों के दस्तावेज प्रमाण है कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई तथा उनके सेनापति तात्या टोपे के अद्भूत नियोजन से पूरे देश में ही इस संग्राम का जाल बिछाया गया था। ब्रिटिश सेना की छावनियों में फैला असंतोष भी कोई संयोग मात्र नहीं था। रानी के प्रभावी गुप्तचर विभाग का वह सफलतम छù युद्ध था। रानी ने सामान्य वेश्याओं को अपनी कला के माध्यम से राष्ट्र कार्य के लिये प्ररित किया। स्वर्गीय पति की नाट्यशाला की नटियाँ गुप्तचर बनीं और सैनिक शिविरों में नांच गाने के माध्यम से प्रथम असंतोष फैलाने का व बाद में संदेश पहुँचाने का कार्य इन वीरांगनाओं ने किया था।

पूरे देश में ही रोटी व कमल के निशान के द्वारा क्रांति का संदेश प्रवाहित हुआ था। जो इतिहासकार अज्ञान अथवा कपट के कारण इसे केवल उत्तरी भारत में सीमित बताते है वे भी सत्य से परें है। मैसूर तथा त्रावणकोर तक इस क्रांति की ज्वाला लगी थी। पूर्वनिर्धारित तिथि 31 मई को दोनों ही राज्यों ने अंग्रेजों के शासन को नकारा तथा युद्ध की घोषणा की। कंपनी के प्रतिनिधियों को निष्कासित कर दिया। मैसूर जैसे राज्यों में जहाँ कंपनी की टुकड़ियों ने विरोध किया वहाँ सभी अंग्रेजों को बंदी बना लिया गया। एक ही दिन में भारत के एक बड़े हिस्से ने स्वयं को कंपनी की सत्ता से मुक्त घोषित कर दिया। इतिहास की कठोर वास्तविकताओं में ‘‘यदि’’ की कल्पनाओं को कोई स्थान नहीं होता। फिर भी यह तो कहना ही होगा कि यदि 10 मई को मंगल पाण्डें संयम नहीं खोता और पूर्वनिर्धारित योजना के अनुसार 31 मई को क्रांति की चिंगारी एकसाथ पूरे देश में प्रगट होती तो अंग्रेजों के लिये इसे नियंत्रित करना निश्चित ही असम्भव हो जाता। अतः 10 मई के क्रांति दिवस का एक संदेश यह भी है कि जोश, उत्साह, उमंग, उत्सर्ग व समर्पण के साथ ही देशसेवा में धैर्य तथा संयम का भी बड़ा स्थान है। कई बार परिवर्तन के आंदोलन की अनिवार्यता व आग्रह के चलते हम प्रतिक्षा को असहनीय मान बैठते है किन्तु बृहत् योजना में इसका भी महत्वपूर्ण स्थान है।

अंग्रेजों को समूल भारत से बाहर करने के जिस उद्देश्य से इस महाक्रांति का आज ही के दिन सूत्रपात हुआ था क्या वह लक्ष्य पूर्ण हुआ है? आज के दिन हमें यह सोचने पर विवश होना पड़ता है कि क्या देश मानसिक दासता से स्वाधीन हुआ है? का हम वास्तव में स्वतन्त्र हुए है? क्या यह जो तन्त्र, व्यवस्था हमने अपनायी है वह स्व की है? स्वदेशी है? इस देश के ऐतिहासिक अनुभव व संस्कारों में से पनपी है? यदि इन सारे प्रश्नों के उत्तर नहीं में दिये जा रहे है तो फिर आज पुनः क्राति की ज्वाला प्रज्वलित करनी होगी। सच्ची स्वाधीनता के लक्ष्य को प्राप्त करने तक यह क्रांति जीवित रहेगी। यही संकल्प 1857 के वीरों की स्मृति में हर देशभक्त को लेना होगा।

सावरकर का उद्बोधन १० मई १९०८ अवश्य देखें

http://www.youtube.com/watch?v=nCMk3HcXr-8&feature=youtu.be

मई 10, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

   

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