उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

चुनावी रणभूमी मे राष्ट्रवाद का शंखनाद


Republic day2चुनाव लोकतंत्र का महोत्सव है। वर्तमान में चुनाव आयोग द्वारा डाले गये कठोर निर्बंधों के कारण इस महोत्सव का उत्साह कुछ धीमा पड गया दिखता है। जमीनी गतिविधियों का स्थान अब प्रसार माध्यमों के अंदर होनेवाली प्रचार उथल-पुथल ने ले लिया है फिर भी चुनाव का समय सबके लिए ही अतिविशिष्ट सक्रियता का समय होता है। सभी प्रकार के कार्यकर्ता सक्रिय हो जाते हैं। सामाजिक कार्यों मे लगे, सामन्यतः गैर राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय कार्यकर्ताओं के लिए यह चिरंतन संभ्रम बना रहता है कि इस सक्रियता में योगदान करें अथवा नहीं और करें तो किस प्रकार से करें? भारत के वर्तमान परिदृश्य में सरकारी व्यवस्था से अछूता रहना लगभग असंभव है। जीवन के हर क्षेत्र में शासन का हस्तक्षेप है। माना कि ये स्थिति आदर्श नहीं है और विदेशी दासता के अवांछनीय अवशेष के रुप मे विद्यमान है किंतु यह भी नकारा नही जा सकता कि यह वास्तविकता है।

स्वतंत्रता पश्चात् हमने लोकतंत्र को राजनैतीक व्यवस्था के रुप मे स्वीकार किया। भारत के संविधान ने जनता को सर्वोपरि सार्वभौम सत्ता के केन्द्र के रुप के प्रतिष्ठित किया। अपेक्षा थी कि लोकतांत्रिक व्यवस्था इस धारणा को सृदृढ कर प्रत्यक्ष मे उतारती किन्तु प्रतिनिधिक लोकतंत्र के जिस स्वरुप को हमने भारत में अपनाया उसने समाज को जोडने के स्थान पर विघटित करने का ही काम किया। सर्वाधिक मत पाने वाले प्रत्याशी के विजय की व्यवस्था के कारण सबसे बडे गुट का प्रतिनिधि ही जनप्रतिनिधि कहलाया जाता है। बहुदलीय व्यवस्था के अंतर्गत चुनाव क्षेत्र मे अनेक प्रत्याशी होते हैं। जिसको सर्वाधिक मत प्राप्त होते हैं उसे विजयी घोषित कर दिया जाता है। इस व्यवस्था ने ऐसी हास्यास्पद विडम्बना की स्थिति उत्पन्न कर दी है कि कई स्थानो पर 15% से कम मत प्राप्त करने वाले प्रत्याशी भी जनप्रतिनिधि के रुप मे चुने जाते हैं। वास्तव मे देखा जाए तो डाले गए मतों मे से 85% से अधिक मतदाताओं ने इस नेता को प्रतिनिधि के रुप मे नकार दिया फिर भी सबसे बडे गुट का नेता होने के कारण वह उन 85% लोगो का भी प्रतिनिधि कहलाया जाता हैं। यह स्वाभाविक ही था कि राजनीतिक दलों ने अपने निहित स्वार्थ के लिए व्यवस्था की इस कमजोरी का उपयोग किया।

EVMजाति, वर्ग, भाषा आदि जो भी समाज को तोडने के माध्यम मिले उनके द्वारा अपने गुट को सबसे बडा सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाने लगा। क्षेत्रीय दलों के उभार ने रणनीति को और आगे बढ़ाकर अपने सीमित समर्थन को बड़ा बनाने के लिए बाकी बचे समाज को छोटे छोटे टुकड़ों में खंडित करने का काम किया। यदि किसी नेता या दल के पास जाति अथवा ऐसे ही किसी आधार पर 100 मे से 20 मतदाताओं का समर्थन है तो उसने भिन्न-भिन्न तरीकों से समाज के बाकी बचे 80 मतदाताओं को इतने टुकडों मे बाँटने का काम किया कि कोई गुट उसके गुट से बड़ा न हो जाए। विभाजनकारी राजनीति ने स्वतंत्रता के 66 वर्षों के पश्चात भी भारत की सुप्त क्षमता को प्रकट नहीं होने दिया है। आज विश्व मे चहुँ ओर सभी देश भारत के सामथ्र्य की सराहना करते हैं। जिनके मन मे मित्रता नही है वे भारत के उभरने की संभावना से आशंकित रहते हैं। किंतु इस राष्ट्र के सामथ्र्य-सूर्य को विघटनकारी राजनीति का ग्रहण लगा है। भारत में राष्ट्र पुनर्निर्माण के कार्य को यदि पूर्ण गति प्रदान करनी है व व्यवस्थागत प्रतिष्ठा दिलानी है तो उसके लिए राजनीति के विभाजक तंत्र को बदलना आवश्यक है। इसके बिना बाकी सारे प्रयास छलनी मे पानी भरने के समान निष्प्रभावी हो जाते हैं।

व्यवस्था  परिवर्तन इसका स्थायी समाधान है।First past the post ’सर्वाधिक मत पानेवाला विजयी’ इस व्यवस्था के स्थान पर प्रत्यक्ष एवं पूर्ण लोकतंत्रकारी ECव्यवस्था ‘बहुसंख्य का समर्थन’ ‘Mojority representation’ की व्यवस्था को लागू करना होगा। इसके अंतर्गत किसी भी चुनाव में जीतने के लिए डाले गए कुल मतों में से 50 प्रतिशत से कम से कम एक मत अधिक पानेवाला व्यक्ति ही विजयी घोषित होगा। ऐसी स्थिति में समर्थन करने वाले मतदाताओं की संख्या नकारने वाले मतदाताओं से निश्चित ही अधिक होगी। तब चुना हुआ नेता सच्चे अर्थ में क्षेत्र का प्रतिनिधि होगा। इस व्यवस्था को लागू करने मे अनेक आक्षेप व कठिनाइयाँ गिनाई जाती है किन्तु राजनीति को राष्ट्रीय एकात्मता के लिए बाध्य करने के लिए यही चिरस्थायी उपाय है। विश्व के अनेक देशों में इसी व्यवस्था के अंतर्गत चुनाव होते है। भारत से भी भौगोलिक रुप से विस्तृत व आबादी में भी लगभग बराबरी के रशिया में भी सभी आम चुनाव इसी विधि से होते हैं। यदि किसी चुनाव क्षेत्र में प्रथम चरण के मतदान में किसी को भी 50% से अधिक मत नही प्राप्त होते हैं तो प्रथम व द्वितीय स्थान पर रहने वाले प्रत्याशियों के मध्य दूसरे दिन पुनः मतदान कराया जाता है। अपने आप किसी न किसी को 50% से अधिक मत मिलेंगे ही। प्रायः ऐसा देखा गया है दूसरे चरण के मतदान की आवश्यकता ही नही पड़ती। इस व्यवस्था में स्वाभाविक रुप से ही प्रत्येक दल ऐसे प्रत्याशी का चयन करता है जिसे समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों का समर्थन मिल सके। गुटीय हितों के स्थान पर सामूहिक हित चुनावी मुद्दे बन जाते हैं। क्षेत्रीयता, साम्प्रदायिकता, जातीयता आदि चुनाव जिताने के लिए सक्षम नही होते। अतः राष्ट्रीयता, एकात्मता, एकता, समरसता यह विषय अधिक प्रभावी होते हैं।

मन में यह प्रश्न आना स्वाभाविक है कि जब तक यह व्यवस्था परिवर्तन नही हो जाता तब तक राष्ट्रवाद का चुनावी राजनीति में कोई स्थान ही नहीं? वास्तव में बात बिल्कुल इसके विपरीत है जब तक संपूर्ण एवं प्रभावी लोकतंत्र के रुप मे बहुसंख्या का प्रतिनिधित्व यह नियम लागू नही होता तब तक राजनीति के द्वारा समाज के विभाजन को रोकने का एकमात्र उपाय है ’राष्ट्रवादी राजनीति’। जातीयता, साम्प्रदायिक तुष्टीकरण, वर्गवाद, धनबल तथा बाहुबल आदि लोकतंत्र के असाध्य विकारों को ठीक करने का एकमात्र उपाय है – ’चुनावी रणभूमी मे राष्ट्रवाद का शंखनाद’। राष्ट्र का हित, राष्ट्र की संस्कृती, राष्ट्रीय परंपरायें, राष्ट्रीय जीवनध्येय इन पर आधारित नीतियों को महत्व देनेवाले दल एवं नेता का जब समाज स्वयंस्फूर्त समर्थन करने लगेगा तब अन्य सभी संकुचित स्वार्थों पर आधारित विघटनकारी मुद्दे गौण हो जायेंगे। समाज में काम कर रहे प्रत्येक सामाजिक कार्यकर्ता का यह कर्तव्य बन जाता है कि ऐसे राष्ट्रवादी वातावरण का जागरण करें।

bharatmataलोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ प्रसार माध्यमों का भी कर्तव्य बन जाता है कि विघटनकारी मुद्दों को महत्व देने के स्थान पर जोडनेवाले एकात्मता को बढावा देने वालें विषयों, नेताओं तथा दलों का अधिक प्रचार दें। धन के द्वारा क्रय की हुयी प्रसिद्धी के आधार पर समाज को तोडनेवाले नेताओं व दलों को सबक सिखाने का काम राष्ट्रकार्य के रुप में प्रसार माध्यमों को भी करना होगा। पेड न्यूज के द्वारा माध्यमों का धनबल के आगे समर्पण लोकतंत्र के विनाश का कारण बन रहा है। भारत एक निर्णायक दौर से गुजर रहा है। वैश्विक परिदृश्य में अवसर की जो एक छोटी सी खिडकी खुली है उसका यदि निर्णायक उपयोग करना है तो आज राष्ट्र को सुदृढ, सक्षम व निःस्वार्थ नेतृत्व की आवश्यकता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही ऐसे नेतृत्व को जन्म एवं पोषण दे सकता है। पश्चिम में राष्ट्रवाद की अवधारणा राजैनतिक व आर्थिक है। इस कारण से वह राष्ट्रों के मध्य प्रतिस्पर्धा को जन्म देती है। इस प्रतिस्पर्धा का रुपांतरण बाजारी शोषण, शस्त्र स्पर्धा व अंततः युद्धों में भी होता है। द्वितीय महायुद्ध में सारे विश्व पर युद्ध की विभीषिका थोपने वाल हिटलर ने भी जर्मन राष्ट्रवाद के नारे का ही तात्विक आधार लिया था। उसके बाद से अंतरराष्ट्रीय विमर्श में राष्ट्रवाद एक घृणित एवं निन्दनीय पद बन गया है। भारत में भी साम्यवादी व समाजवादी विचार को पोषित करनेवाले विचारकों ने इसी पश्चिमी दृष्टि से प्रभावित होकर राष्ट्रवाद की घोर आलोचना की है। इसे संकुचित, तानाशाही व फासिस्ट जैसे संबोधनों से पुकारा है। इस कारण सामान्य बुद्धिजीवी भी राष्ट्रवाद के प्रति सकारात्मक विचार नही रखते किन्तु भारत में राष्ट्रवाद की संकल्पना कतई आर्थिक अथवा राजनैतिक नहीं है। भारत में यह मूलतः आध्यात्मिक व व्यवहार में सांस्कृतिक विचार है। आर्थिक व राजनैति राष्ट्रवाद जहाँ भौगोलिक सीमाओं और बाजारी प्रतिस्पर्धाओं के कारण विभाजनकारी बन जाता है वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद व्यक्ति से परिवार, समाज से आगे राष्ट्र तक मन के विस्तार का माध्यम होने के कारण एकात्मदृष्टि का विकास करता है। स्वाभाविक ही यह राष्ट्रवाद विस्तार की अगली सीढ़ी के रुप में मानवता को देखता हैं। अतः इस राष्ट्रवाद में राष्ट्रहित के साथ ही विश्वहित व उससे भी परे सृष्टि का हित भी निहित है। यह राष्ट्रवाद तोडता नही जोड़ता है।

जाति, पंथ, सम्प्रदाय, वर्ग, भाषा, क्षेत्र आदि के द्वारा विभिन्न वादों का निर्माण कर चल रहे समाज विघटन के तांडव को यदि रोकना है तो सभी को मिलकर एक ही उद्घोष करना होगा कि ‘राष्ट्र सर्वोपरि है’। मेरे व्यक्तिगत, पारिवारिक, क्षे़त्रीय, सामाजिक, पांथिक, साम्प्रदायिक अथवा प्रांतीय हितों से अधिक महत्वपूर्ण राष्ट्रहित हैं। इस विचार को अपने हर कार्य मे अभिव्यक्त करना होगा। चुनाव में आग्रह पूर्वक सहभागी होना, मतदाताओं का पंजीयन करना अधिक से अधिक लोगों को सकारात्मक मतदान के लिए प्रेरित करना, दलों व नेताओं को राष्ट्रहित के मुद्दों पर विचार एवं बात करने के लिए विवश करना यह हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है। आइए! लोकतंत्र के महोत्सव में राष्ट्रवाद के उजास को प्रकाशित करने का संकल्प लें।

नवम्बर 29, 2013 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

परिवर्तन का मत


बहुप्रतिक्षित चुनाव परिणाम आ गये। कहीं भी कोई आश्चर्य नहीं रहा। 24 घण्टें कुछ ना कुछ परोसने की मजबुरी में समाचार माध्यम कुछ ना कुछ विश्लेषण करेंगे ही। संविधान की भावना व भाषा के विपरित पंथ व जाति की चर्चा तथाकथित विशेषज्ञ बड़ी निर्लज्जता से करते है। राजनेताओं को जनता में गुट बनाबनाकर उनके मत पाने है अतः वे पंथ, जाति आदि आधार पर घोषणायें कर प्रचार करते है यह तो समझा जा सकता है किन्तु समाचार वाहिनियों के सुत्रधारों, अंग्रेजी में तो इन्हें लंगर कहते है, तथा उनके साथ चर्चा करने के लिये एकत्रित ‘विशेषज्ञों’ की क्या अनिवार्यता हे जो वे इन विभाजनकारी तत्वों के आधार पर चुनाव का विश्लेषण करते है? उत्तर प्रदेश में स्पष्ट बहुमत पानेवाली स पा के युवा नेता अखिलेश यादव ने बड़ी प्रगल्भता के साथ पहली पत्रकार परिषद में जनता का आभार मानते हुए स्पष्ट किया कि ‘‘हमें जनता ने जाति, पंथ (भैयाजी ने तो धर्म ही कहा था) से उपर उठकर समर्थन दिया है।’’ पर तथाकथित विशेषज्ञ कहाँ मानने वाले? वे तो अभी तक रट लगा रहे है कि साम्प्रदायित मतों के ध्रुवीकरण के कारण ही उ प्र में स पा को विजय प्राप्त हुई। आशा है कि अखिलेश यादव अपने पिता के विपरित, साम्प्रदायिकता व आपराधिक बाहुबल के स्थान पर विकासोन्मुखी राजनीति करेंगे।

समाचार माध्यमों की रट ने काँग्रेस को भी अपनी हार के लिये कारण मिल गया। जिन वाहिनियों ने प्रतिदिन काँग्रेस के बाबा को अवास्तव महत्व दिया था वे काँग्रेस की करारी हार को नहीं पचा पा रहे थे। वे और काँग्रेस के अंतहीन नेता हार के लिये अपने युवराज के बचपने को छोड़ कर और सभी कारण ढ़ुंढ़ने में लगे है। इसमे फिर साम्प्रदायिक विलेषण से उनके लिये अच्छा अवसर मिल गया। सलमान खुर्शीद जिनकी पत्नि ना केवल चुनाव हारी अपितु तीसरे क्रमांक पर रही, बिना किसी लाग लपेट के कॅमेरा के सामने कह रहे थे कि ‘‘मुस्लिम आरक्षण की हमारी रणनीति बिल्कुल ठीक थी। स पा को भी विजय इन्हीं के भरोसे मिली है।’’ चुनावों को साम्प्रदायिक बनाने के बावजूद पूर्णतः सपाट हो जाने के बाद भी इस प्रकार की विघटनकारी वृत्ति राष्ट्रद्रोह ही कही जा सकती है।

यदि सभी राज्यों के परिणामों को एकसाथ देखा जाये तो देश के मूड़ का भान हो सकता है। देश परिवर्तन चाहता है। अधुरे परिवर्तन से समाज को संतुष्टि नहीं है। आज जनता परिणामकारी परिवर्तन चाहती है। अतः जहाँ विकल्प स्पष्ट था वहाँ जनता ने पूर्ण परिवर्तन कर दिखाया। भ्रष्ट सरकारों को जनता सबक सीखाना चाहती है। सब जगह इसी इच्छा से सभी राज्यों में मतदान का प्रतिशत भी अधिक रहा है। भले ही चुनाव विधानसभा के हो, लोगों का केन्द्र सरकार के प्रति आक्रोश मतदान में व्यक्त हुआ है। पंजाब व उत्तराखण्ड में राज्य सरकारों के विरूद्ध परिवर्तन की हवा को केन्द्र सरकार के प्रति आक्रोश ने काटा। जिसके कारण आसन्न दलों को पूर्णतः हटाया नहीं जा सका। उत्तर प्रदेश के समान गैर काँग्रेसी विकल्प होता तो पंजाब व उत्तराखण्ड में भी उ प्र व गोवा के समान ही परिवर्तन दिख सकता था।

जनता की इस परिवर्तन की मनिषा को समझे बिना किसी भी दल के लिये आगामी राज्य चुनावों अथवा कभी भी सम्भव लोकसभा चुनावों के लिये प्रभावी रणनीति बनाना सम्भव नहीं है। जनता भ्रष्ट, निकृष्ट शासन से उब चुकी है। व्यवस्था की शिथिलता, अप्रामाणिकता तथा प्रभावहीनता ने देश की समस्त क्षमताओं को ग्रहण लगा रखा है। इन बातों से देश का युवा त्रस्त है। अतः वह उस दल को चुनना चाहता है जिसमें उसे परिवर्तन की सम्भावना दिखाई देती है। गत वर्ष तामिलनाडु व पश्चिम बंगाल में भी यही भाव जनता ने व्यक्त किया। अतः जो व्यवस्था परिवर्तन के पक्ष में समाज का अभिमत बना है उसे चुनावी मतदान में रूपांतरित करना हो तो केवल जाति पाति के गणित बिठाकर काम नहीं चलेगा। अपनी भावी नीति को ठीक से रेखांकित करना होगा। केवल सत्तासीन पक्ष की आलोचना से काम नहीं चलेगा अपितु व्यवस्था के परिक्षालन की, पूर्ण परिवर्तन की अपनी योजना भी समाज के सम्मूख रखनी होगी। वर्तमान केन्द्र सरकार ने अक्षमता, भ्रष्टाचार व अनिर्णय के समस्त कीर्तिमान तोड़ दिये है। किन्तु केवल उसकी नीतियों की आलोचना भर करने से काम नहीं चलेगा।

काँग्रेस नीत सं प्र ग के विरूद्ध जनता की हवा तो इस बात से ही स्पष्ट है कि शासनविरोधी लहर तथा एकमात्र विकल्प होने के बावजूद पंजाब व उत्तराखण्ड में वह पूर्ण बहूमत नहीं पा सकी है। आगामी विधानसभा चुनावों में अधिकतर राज्य भाजपा शासित हैं। शासन के विरूद्ध जो अभिमत होगा उसका लाभ उठाने में काँग्रेस तभी सफल हो पायेगी जब वो केन्द्र में भ्रष्टाचार व महंगाई जैसे जनता से जुड़े मुद्दों पर कुछ कारवाई करती हुई दिखाई दें। अन्यथा धीरे धीरे इन राज्यों में भी क्षेत्रीय दलों की शक्ति उभर सकती है। वैश्विक स्तर पर भारत की सम्भावनाओं को देखते हुए राष्ट्रहित में केन्द्र में सशक्त सरकार की अनिवार्यता है। यदि अनेक क्षेत्रीय दलों पर निर्भर गठबन्धन पुनः केन्द्र में शासन में आता है तो ऐसी स्थिति में आगामी 5 वर्ष बड़े ही कठीन होंगे। भारत के सम्मूख विश्वमंच पर प्रभावी भूमिका के लिये खुल रहे अवसर के द्वार अधिक समय तक खुले रहेंगे ऐसा नहीं है। यदि समर्थ सरकार की अनुपस्थिति के कारण भारत यह अवसर खो देता है तो ऐसे में फिर ऐसी अनुकूल स्थितियाँ बनने में दशकों का समय लग जायेगा। अतः 2013 या 2014 जब भी अगले साधारण चुनाव हो भारत को एक दल के सशक्त शासन के लिये प्रयासरत होना चाहिये।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भा ज  पा व काँग्रेस ही ऐसे विकल्प है जो एकदलीय स्थिर सरकार दे सकने की स्थिति में है। काँग्रेस की नीतियों की विफलता के कारण उसके विरूद्ध जनमत को देखते हुए यह दायित्व भा ज पा पर अधिक है। गठबन्धन की राजनीति के साथ ही स्वयं के बूते पर 250 सांसद चुनने का लक्ष्य लेकर काम करने की आवश्यकता है। अभी तो इस दल के संसद के दोनों सदनों के नेता भी मिड़िया में खुली चर्चा में 160-170 के आंकड़े गिनाते दिखाई देते है। जबकि अब तक 302 ऐसे निर्वाचन क्षेत्र है जहाँ कभी ना कभी भा ज पा के सांसद चुनाव जीत चूके हैं। ऐसे में परिवर्तन की हवा में सही प्रकार से प्रयास करने पर 250 स्थानों पर विजय प्राप्त करना बहुत असम्भव स्वप्न नहीं है। किन्तु वर्तमान चुनाव परिणामों से सही सबक सीख कर इस ओर तेयारी करने के लिये बहुत अधिक समय नहीं बचा है। साम्प्रदायिकता के आधार पर चुनाव जीतने की तकनिक गत 3-4 चुनावों से स्वयं को सेक्यूलर कहलाने वाले दलों ने विकसित की है। यह देशविघातक तकनिक तभी कारगर होती है जब बाकि मतों का जाति आधारित विभाजन होता है। यदि भा ज पा अपनी मूल राष्ट्रवादी विचारधारा पर बनीं रहती है तब ही जाति से उपर उठकर मतों को पाने की सम्भावना हो सकती है। प्रचार माध्यमों द्वारा हिन्दुत्व, भगवा आदि संकीर्ण नामों से सम्बोधित कर कुख्यात किये जाने के भय से अपनी मूल विचारधारा को छोड़ने का ही परिणाम है कि उ प्र में परिवर्तन के मत को भा ज पा अपने पक्ष में नहीं कर सकी। मिड़िया के कहने से अपने प्रचारक तय करने की भूल अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की साम्प्रदायिकता को अवसर प्रदान करती है। यदि जाति, पंथ के उपर उठकर देशहित का आहवान करना है तो राष्ट्रहित की बात करने में आक्रमक आग्रह आवश्यक होगा।

इसके साथ ही केवल आलोचना के स्थान पर पर्यायी व्यवस्था का खाका प्रस्तुत करने की क्षमता भी इस राष्ट्रवादी विचारधारा में है। स्वतन्त्रता से लेकर अब तक हमने विदेशी विचार पर आधारित व्यवस्था को ही अपनाया है। नीतिनिर्धारण में 1991 से पूर्व रूस प्रेरित समाजवाद तथा 1991 के भूमण्डलीकरण के दौर से पश्चिम का अन्धानुकरण हमारी सरकारों ने किया है। भारत की विशिष्ठ आवश्यकताओं के अनुरूप भारत की अपनी व्यवस्था निर्माण का प्रयास किया ही नहीं गया। वैचारिक स्तर पर भी इस प्रकार के मौलिक चिंतन का अभाव रहा है। गांधी व पं दीनदयाल उपाध्याय ने क्रमशः सर्वोदय व अन्त्योदय के लक्ष्य को सामने रखते हुए लोकहितकारी शासन तथा राजव्यवस्था की शुद्ध भारतीय वैचारिक पृष्ठभूमि दी थी। आज इन दोनों की ही थाती भा ज पा की पैतृक विचारधारा ने ही जीवित रखी है। राज्यों में इस विचारधारा पर आधरित विकास व सुशासन के प्रादर्श माॅड़ेल खड़े करने का दावा करने के साथ ही पूरे देश के लिये एक देशज, प्रभावी व्यवस्था का खाका प्रस्तुत कर चुनाव लड़ने से ही आगामी समय में समाज का समर्थन मिल सकेगा।

भारत में चुनाव जीतने के लिये भाव जागरण तो आवश्यक ही है साथ ही प्रत्यक्ष धरातल पर परिणामकारी व्यवस्था की खातरी ;ळनंतंदजममद्ध भी। देश को सांस्कृतिक आधार पर एकत्र करनेवाले आह्वान का भावजागरण व भावी सुशासन की योजना इन दो ध्रुवों पर ही परिवर्तन का मत अपने पक्ष में किया जा सकेगा। जो भी दल इस प्रकार का विश्वास देनें में सक्षम होगा वहीं देश को अत्यावश्यक समर्थ, सक्षम व स्थिर शासन प्रदान कर सकेगा। अन्यथा जनता में परिवर्तन प्रज्वलित आकांक्षा क्षेत्रशः भिन्न भिन्न आधार पाकर प्रगट होगी व विपरित विचार व विरोधी हितों से परिचालित दलों के गुटबंदी में देश का भावी पुनः भटक जायेगा।

मार्च 9, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

केवल पर्दा उठने की ही देरी है


गत सप्ताह भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने दो ऐतिहासिक निर्णय दिये। किसी भी लोकसेवक के विरूद्ध अभियोजन के लिये सरकार की अनुमति का प्रावधान ब्रिटिश राज की व्यवस्था की अनेक देनों में से एक है। जिस अधिकारी पर भ्रष्टाचार का आरोप है उसके विरुद्ध कारवाई करने हेतु अनुमति उसी के वरिष्ठ अधिकारी अथवा मन्त्री से प्राप्त करनी पड़ती है। इसके पीछे का तर्क यह था कि अनावश्यक रुप से शासकीय अधिकारियों को कानूनी झंझटों में घसीटे जाने से बचाया जाय ताकि वे अपने कर्तव्य को निर्भय होकर निभा सके। वर्तमान सड़ी व्यवस्था में भ्रष्ट अधिकारियों को दण्डात्मक कारवाई से बचाने के लिये इस प्रावधान का दुरुपयोग हो रहा है। अनेक बार जिस मंत्री के आदेश पर भ्रष्ट अधिकारी कार्य कर रहा होता है वही अनुमति देनेवाला होता है। ऐसे में निर्णय को लटकाये रखने का चलन सामने आया है। सर्वोच्च न्यायालय ने अब इसपर 4 माह की समयसीमा लगा दी है। आदेश का सर्वोत्तम पहलू यह है कि इसने सरकार को निर्णय लेने पर बाध्य किया है। अपराधियों को बचाने के लिये निर्णयों को लम्बित रखने की बाबूगिरी अब नहीं चलेगी। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि चार माह में निर्णय ना किये जाने पर अनुमति मान ली जायेगी।

इस प्रावधान का सबसे बड़ा व तात्कालिक असर सुब्रह्मणियम स्वामी द्वारा प्रधानमंत्री से सोनिया गांधी के विरूद्ध अभियोजन के लिये मांगी अनुमति पर होगा। यदि शासन समय सीमा में निर्णय नहीं लेता है तो वह परोक्ष अनुमति ही हो जायेगी। यदि समय सीमा में प्रधानमंत्री तथ्यों को जानकर भी अनुमति नकारते है तब वे भी भ्रष्टाचार के सहयोगी हो जायेंगे। वर्तमान अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री अंग्रेजी शासन की कुख्यात देन प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे हैं अतः निर्णयों को लम्बित रखने को उन्होंने एक कला का रुप दे दिया है। प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव अत्यन्त संवेदनशील मुद्दोंपर चुप्पी साधने के विशेषज्ञ थे। उन्होंने कहा था कि ‘‘कारवाई ना करना भी अपने काप में एक कारवाई है।’’ मनमोहनसिंहजी ने उनके पदचिह्नों पर चलने के नये आयाम स्थापित किये है। अब सर्वोच्च न्यायालय के क्रांतिकारी निर्णय से उनको इस उंघाउ नींद से जागना होगा। वैसे भी युवराज का अभिषेक करने को लालायित काँग्रेस कभी भी इस सर्कस के सिंह को सेवानिवृत्ति का आदेश दे सकती है। हे वीर खालसा सरदारों को दशमेश की दी पगड़ी जीवनभर धारनेवाले सिंह अपने सिंहत्व को एक बार तो दिखा दो और जाने से पूर्व सोनिया के विरूद्ध अभियोजन की अनुमति दे ही दो। सारा देश आपके सब अपराधों को भूल आपको सर आँखों पर रख लेगा।

दूसरा निर्णय भ्रष्ट वाणिज्यिक संस्थानों पर कड़ा प्रहार था। जितना राजनैतिक तन्त्र भ्रष्ट है उससे कई गुना अधिक कलुषित कार्पोरेट जगत है। दोनों के गठजोड़ ने पूरे देश को गिरवी रख दिया है। प्राकृतिक संसाधनों की अंधाधुंद लूट मची है। 2जी मामले में 122 लाइसेन्स रद्द करने का निर्णय इस दिशा में अत्यन्त सार्थक कदम है। न्यायालय ने दिखा दिया है कि जो भी अपराध में लिप्त है उसे उसकी कीमत चुकानी ही होगी। राजनेताओं को भ्रष्ट कर अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाले व्यावसायिकों के लिये यह चेतावनी की घण्टी है। केवल स्वार्थ व लालच के लिये ही धंधा करनेवाले लोगों से हम जगने की अपेक्षा तो नहीं कर सकते किन्तु पीढ़ियों से नैतिक व्यवसाय के लिये जाने जा रहे टाटा व बिड़ला जैसे समूह तो आगे से भ्रष्ट नीतियों द्वारा अनुचित लाभ के प्रयत्नों को विराम देंगे ऐसी अपेक्षा की जा सकती है।

उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण चुनावों से पूर्व इन न्यायालयीन निर्णयों तथा सरकार को दी गई स्पष्ट फटकारों से यु पी ए शासन की पूर्व से ही कलंकित साख और अधिक गर्त में गिर गई है। अपने गृहमंत्री के कुछ समय के लिये बच जाने से सरकार राहत की सांस भले ही ले ले किन्तु विशेष सी बी आय सत्र न्यायाधीश के निर्णय की भाषा उच्च न्यायालय में कुछ विपरित निर्णय आने की आस लगाती है। ऐसा यदा कदा ही होता है कि न्यायाधीश तथ्यों की तो पुष्टि कर दे किन्तु उनके अपर्याप्त होने का कारण देकर याचिका को बरखास्त कर दे। न्यायालय ने माना है कि संचार मंत्री के निर्णयों को बदलने का अधिकार होते हुए भी तत्कालीन वित्त मंत्री ने उन निर्णयों से सहमति दिखाई। इस तथ्य को मानने के बाद न्यायाधीश महोदय इसे आपराधिक षड़यन्त्र मानने के लिये अपर्याप्त मानते है। इस भाषा में इस बात के लिये जगह बन जाती है कि अधिक पूछताछ व छानबीन से कुछ और तथ्य सामने आ सकते है जो अपराधिक नियत को स्पष्ट करें। ऐसे में आश्चर्य नहीं होना चाहिये कि सर्वोच्च न्यायालय सी बी आय को जाँच के आदेश दे।

इसी सप्ताह कनाड़ा के एक अदालती मामाले में तत्कालीन उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल को रिश्वत दिये जाने का मामला सामने आया है। अब प्रश्न केवल यही बचा है कि इस सरकार में कोई एक भी इमानदार मंत्री बचा है क्या? या केवल पर्दा उठने की ही देरी है। यह तो निश्चित है कि कलंक से घिरी यह सरकार देश पर शासन करने का नैतिक अधिकार खो चुकी है। विपक्ष, सामान्य जनता व सबसे महत्वपूर्ण देश के प्रबुद्ध नागरिक इस सरकार को बिना विलम्ब पदच्युत करने के लिये आंदोलन प्रारम्भ करें।

सिंहासन खाली करों कि जनता आती है।

फ़रवरी 8, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

System Works


Today I am sharing one rare experience with all of you. It is a very pleasing experience for a change. With a simple combination of technology and human efficiency we can have a functioning system even in a government enterprise. It was very urgent to book Tickets for Ma Parameswaranji using Tatkal facility. The irctc somehow gets jammed up at 8 am. Hence decided to go personally to the railway station for reservations. It was after many years that this opportunity had presented itself. Ready to push the way in when the door open at 8 AM I reached the reservation complex in Thiruvananthpuram Central Railway Station at about 7:45 AM. A pleasant surprise was in waiting. The main gates were open and after climbing the stair I found that around 100 persons were already waiting in the waiting hall. But there was no mayhem usually scene. No need to scout for the smallest queue. All were very calmly seating in chairs and waiting for the counters to start the business of the day. After few enquiries I was directed to the waiting Token machine. Pressing a red button I received a token numbered 103. It had the date and time. The token issuing had started at 7:30.  Looking at the token number I felt the cause was lost and I may not get the desired lower birth when my turn came.

The system was simple. 10 counters had small monitors for display of token no. But you need not be worried where your no will come. There was a big screen in the centre of the hall displaying a chart showing the table of counter numbers with the token number being attended to. The next three numbers were also alerted. The system was efficient and working. When the counters started working the clerks were also as efficient as the machines. The main factor being there was no queue in front of them, no quarrels, and no bickering only one customer to attend to. They were smiling and attending very efficiently and the whole service was fast.

I was totally awestruck and mesmerized by the whole working and more so when within 10 minutes my number was on the screen and the mission was accomplished within few seconds. It was a day full of pleasant surprises I got the lower birth ticket for Parameswaranji even being 103 in the waiting list.

On the whole the experience was an eye-opener. Yes with just a little systematic management of technology and human efficiency can do wonder. Yes this can happen in Bharat. Even the government systems can work. They are working at least here in the reservation centre at Thiruvananthapuram Central.

नवम्बर 8, 2011 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , | 3 टिप्पणियाँ

नाभि का संधान !!


एकादशी की सुबह
दशहरा मैदान में
जले रावण की राख समेटते
बूढ़ा वाल्मीकी पोते से बोला
सदियों से हर बार रावण जलता है
और अगले साल फिर
पहले से विशाल चुनौती बन
राम के धर्म के लिए..
इतनी बार जलने के बाद
बचा कहाँ से है रावण आज भी???

आज के रावण अपने अहंकार से
नहीं ललकारते शिव के कैलास को
ना ही है इतना तप
कि अपने हृत्तंत्री  की वीणा से
जटाकटाह  का करे गान
पर हाँ
अपने ऋषितुल्य पिता को
कैद कर वृद्धाश्रम की सलाखों में
जकड़ते अवश्य है!!

भ्रष्ट लूट की नीव पर
सोने की अट्टालिकाओं को
भी उभारते है|
स्वर्ग  तक सीढ़ी लगाने
का स्वप्न भी संजोते है|

आज के रावण
हर सीता की ओर
दुष्ट वासना से देखते हैं
छद्म वेश धारण कर अपहरण के बाद
मंदोदरी के अभाव में
ना जाने आज की अशोक वाटिका
में सत्व और शील की कैसे हो रक्षा??

हर बार जलने के बाद
और अधिक विशाल बन कैसे
आ जाते है फिर
रावण
अपने फैलते साम्राज्य
के दसों मुखों के साथ
आलसी कुम्भकर्ण और
मदमस्त इन्द्रजीत के साथ

राम कहाँ हो??
वानरों की आबादी तो
हर गणना में कोटि कोटि बढ़ती
पर
कौन इन्हें सेना में बाँधेगा?
अनुशासन और संगठन का पाठ
पढ़ायेगा??
यहाँ तो जाम्बवान प्रेरणा के स्थान
पर स्वयं ही सदा
रथ पर सवार

मस्तक तो कई बार गिरे
रावण के
पर फिर वही उन्मत्त अट्टाहास
राम फिर हताश!

भरत पादुका लिए
युग युग से राम के राज्य
की स्थापना कर
कर रहा प्रतीक्षा
रावण है कि हर विजया पर
जलकर भी मरता ही नहीं
दिवाली की जगमग युद्धमय
अ- योध्या चिर प्रतीक्षा में ..

हुश्श
भर एक हताश उछ्श्वास
बोला वाल्मिकी
हे बिभीषण ! कहते है
तुम तो हो चिरंजीव
फिर आओ!
मातली के रथ पर चढ़ जाओ
कहो राम से

राम !! काम नहीं सर काटते
चंद्रमुखी बाणों का
सीधे  साधे  नुकीले
लक्ष्यवेधी शर का करो संधान
प्राणों का केंद्र जहाँ
राक्षस के
उस नाभि को छेदों!

छोटे बड़े कानूनों से नहीं होगा पार
सीधे संविधान पर ही करो अब वार

हे राम!
अब के नाभि का ही हो संधान !!

अक्टूबर 8, 2011 Posted by | कविता, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , | 1 टिप्पणी

अन्नागिरी कही फिर गांधीगिरी ही न बन जाये??


अन्ना के अनशन का ८ व दिन है| सरकार कि संवेदनहीनता और मीडिया के जोरदार प्रसारण ने आन्दोलन को जबरदस्त प्रतिसाद मिल रहा है| इससे अधिक बड़े आन्दोलन तो केवल रामजन्मभूमि और जे पि की समग्र क्रांति ही थे| उनमे इससे अधिक लोग सड़कों पर उतारे थे| पर एक अंतर है वो दोनों आन्दोलन संगठित प्रयास का परिणाम थे| आज के आन्दोलन में लोगों का गुस्सा फुट रहा है| ये अधिक स्वयं स्फूर्त है| इसी कारण मीडिया भी TRP की दौड़ में लग गया है| पर जागरण जोरदार हुआ है| यह बड़ा ही महत्वपूर्ण पहलू है| जो सबसे ऊपर है| इसका श्री जितना अन्ना को है उतना ही सरकार की मुर्खता को भी है|
अनेक साथी प्रश्न पूछ रहे है | सोचा की एकसाथ उत्तर देकर लिख दिया जाये|
आन्दोलन के तप्त वातावरण में भी वैचारिक चिंतन जरुरी है क्योंकि राष्ट्रहित सर्वोपरि है|
१)कांग्रेस आखिर जन लोकप्र बिल पास से क्यों दर रही है???
जन लोकपाल बिल तो कोई पार्टी जैसे के तैसे पास नहीं करेगी| अन्ना जैसे चाहते है वैसा लोकपाल बन जाये तो सारा काम ही ठप्प हो जायेगा| केवल भ्रष्टाचार ही नहीं सारा सरकारी काम ही ठप्प होगा| कोई भी अधिकारी कुछ भी नहीं करेगा | काम भी नहीं भ्रष्टाचार भी नहीं| अन्ना का आन्दोलन वाकई बढ़िया है| उसका कोई विरोध नहीं है| पर
उनकी मांग थोड़ी अधिक कठोर है| पर ये आन्दोलन की जरुरत है| एक तो ठोस मांग होना आवश्यक है| यहीं बाबा की गफलत हो गयी थी| दूसरा मांग कठोर होंगी तो बातचीत में कुछ ठीक ठाक बात पर सफलता मिल जाएगी| अतः उनके स्तर पर ये ठीक है पर जो लोग पूछते है की कांग्रेस नहीं तो BJP ही इस बिल को support कर दे वो इसकी बारीकी को नहीं समझते| अभी वर्त्तमान में भी जो इमानदार लोग है वो आरोपों के दर से काम नहीं कर रहे| सोचते मेरे retire होने तक टांग देता हूँ इस file को | इस रवैये के कारण सेना को आवश्यक हथियार नहीं मिल पा रहे| और जिसमे भ्रष्ट लोगों का हित जुड़ा है ऐसे निर्णय हो रहे है| सबसे महंगे इटालियन हलिकोप्टर हमने इसी साल ख़रीदे| सही परिवार को हिस्सा मिल गया निर्णय हो गया| अन्ना के लोकपाल के बाद तो और स्थानों पर भी इमानदार लोग निर्णय लेने से डरेंगे|
वैसे भी कानून से तो भ्रष्टाचार बढ़ता है| कानून घटाने से भ्रष्टाचार घटेगा| डिमांड क़ानूनी हस्तक्षेप कम करने की होनी चाहिए| एक और नया कानून ये समाधान नहीं है| CVC के समय यही तर्क दिए थे कि ७०% भ्रष्टाचार कम होगा| क्या हुआ?? RTI के समय के अन्ना के विडियो दिखाए जा सकते है| उनके अनुसार इस कानून से पूरी पारदर्शिता आ जाएगी| क्या हुआ? आज इस का सबसे ज्यादा दुरूपयोग अधिकारी एक दुसरे से बदला लेने में और उद्योगपति अधिकारीयों को ब्लैक मेल करने के लिए कर रहे है| लोकपाल का भी ऐसे हो सकता है| दहेज़ और हरिजन कानून का भी यही हाल है|
२) कोई राजनीतिक पार्टी अपनी छबि स्वयं ख़राब करेगी ???
उनको लग रहा है की उनके साथ BJP की भी छवि ख़राब हो रही है तो फिर कोई ज्यादा नुकसान नहीं| भ्रष्टाचार चुनावी मुद्दा नहीं है|
३) क्या कांग्रेस की छबि (सोनिया सहित सभी मंत्रियों की )ख़राब नहीं हुई ??
यदि अन्ना के सामने झुक जायेंगे तो रही सही भी ख़राब हो जाएगी| इसलिए तो राहुल कार्ड खेला है| राहुल की छवि चमकने के लिए ही सही मान जाये कोंग्रेस! पर ये देश के लिए ठीक नहीं होगा|
४) क्या राहुल गाँधी की इस आन्दोलन से साख कमनही हुई??
उसकी कोई साख नहीं है| सब विज्ञापन जैसे बने है तो वो तो अं चुनाव के वक्त पर फिर बना लेंगे Media manage करके|
५)क्या आम जनता मै भ्रस्टाचार के खिलाफ जागरूकता पैदा नहीं हुई ???
ये ही एकमात्र फायदा इस आन्दोलन से हुआ है| १ जनता जागरूक हुई और सडकों पर आई| और २. उसमे विश्वास पैदा हुआ कि भ्रष्टाचार दूर हो सकता है| अन्ना और बाबा कि ये बहुत बड़ी सफलता है| अब राजनैतिक पार्टियों को एक ठोस agenda प्रस्तुत करना चाहिए भ्रष्टाचार के खात्मे का|
६) क्या अन्ना की तुलना किसी भ्रस्टाचारी से करना सही है ??
बिलकुल गलत है| अन्ना बाकि कुछ भी हो सकते है पर भ्रष्टाचारी नहीं है| वो एक इमानदार व्यक्ति है| कुछ गलत लोगों से घिरे है| समझौता कर लेते है| जैसे भारतमाता, स्वामी विवेकानंद, सुभाष और भगतसिंह के फोटो हटाकर केवल गांधीजी का रखना| ये समझौता है| फिर बुखारी पर टीका करने कि जगह उसको समझाने अपने लोगों को भेजना | ये वही गलतियाँ है जो गाँधी बाबा ने भी कि थी|

आज देश जग गया है किन्तु आन्दोलन ही समाधान नहीं हो सकता| यदि बातचीत होकर कुछ बाते मन ले सरकार तो क्या उससे व्यवस्था परिवर्तन आ जायेगा? आखिर इन राजनैतिक प्रश्नों का राजनैतिक हल जरुरी है| केवल एक कानून से बात नहीं बनेगी| पुरे संविधानिक ढांचे पर ही चर्चा करनी होगी| एक नै स्कृति के लिखने का समय आ गया है| क्या अन्ना या बाबा चाणक्य बन सूत्र लिखने को तत्पर है? नहीं तो फिर किसी न किसी को तो इस भूमिका में आना होगा| गाँधी बाबा भी यही रुक गए अंग्रेजों को तो भगा दिया पर अपने संविधान “हिंद स्वराज” को लागु नहीं करवा पाए| पटेल के स्थान पर नेहरु को देश पर थोप दिया अपनी जिद से और देश में अपना स्व नहीं आ पाया तंत्र में?? अग्निवेश और भूषण को साथ लेकर अन्ना फिर वही गलती तो नहीं दोहरा रहे| अब तो विनायक सेन और मेधा पाटकर जैसे बचे खुचे भी आ गए| बस अरुंधती ही विरोध में है| भगवन ने कृपा की| नहीं तो गिलानी भी रामलीला में नमाज पढ़ते दिखता|

अन्ना आप पर जनता को विश्वास है भारत माता को विश्वास है| कह तो रहे है आप आज़ादी की नै लड़ाई बना भी देना और पुरानी भूलों से बचके रहना… नहीं तो ये सारी शक्ति भी गांधीगिरी ही बनी रह जाएगी!!


अगस्त 23, 2011 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

प्रेरणा परशुराम की


भारत का आर्थिक महाशक्ति के रुप में विश्व में दबदबा बढ़ ही रहा है। एक तो स्वयं भारत की सामाजिक ताकद अपने आप को आर्थिक सुदृढ़ता के रुप में अभिव्यक्ति कर रही है साथ ही योरोप व अमेरिका वैश्विक मंदी तथा जापान में सुनामी के प्रभावों को झेल कर पूर्णतः कमजोर हो रहे है। गत माह ही अमेरिका का ऋण $14.7 ट्रीलियन डालर्स तक पहुँच गया है जो उसके सकल घरेलु उत्पाद GDP $13.6 ट्रीलियन डालर्स से भी अधिक है। यह एक अत्यन्त गंभीर आंताराष्ट्रीय घटना है जो भारत में भ्रष्टाचार के आन्दोलनों के मध्य समाचारों में दबकर रह गयी है। वास्तव में ये गंभीर वैश्विक स्थिति भारत को कालेधन और भ्रष्टाचार के भयावह परिणाम को अधोरेखित करने के लिये सबक सिखाती है। आज तो हमारे मध्यमवर्ग की उद्यमिता एवं बचत की आदत के भरोसे भारत महंगाई, बेरोजगारी व अव्यवस्था जैसी व्याधियों के बावजूद भी दृढ़ता से विकास पथपर अग्रेसर है। किन्तु इन बिमारियों के मूल में छिपे विकार का यदि निदान व उपचार नहीं किया गया तो फिर ये सुखकर स्थिति बहुत अधिक दिनों तक नहीं चल सकती। यह जीवन शैली का विकार है। जिस जीवन शैली के कारण युनान से प्रारम्भ कर अमेरिका तक सारी विकसित अर्थव्यवस्थायें चरमरा रही है उसीका अनुसरण हम भारत में तेजी से करते जा रहे है। समाज में पाश्चात्य जीवनमूल्य प्रचण्ड गति से प्रतिष्ठा पा रहे है। फिर भी जैसे भारत की सनातन संस्कृति की मौलिक विशेषता है इस बाह्य परिवर्तन में भी हमारा समाज अपने मूल तत्व को संजोये रखने का सफल प्रयास कर रहा है। किन्तु राज्यव्यवस्था में हिन्दु तत्वों का आविर्भाव ना होने के कारण हम वैश्विक दबावों में अपनी व्यवस्था को भी उन्हीं आत्मघाती प्रभावों की ओर जाने से नहीं रोक पा रहे है।

सत्ता जब सार्वजनीन जनहित के स्थान पर स्वयं को ही बनाये रखने में व्यस्त हो जाती है तब प्रजातन्त्र के होते हुये भी विरोध असह्य हो जाता है और दमन अवश्यम्भावी। वैसे तो भारतीय संस्कृति में राजतन्त्र में भी क्षत्रीय का धर्म प्रजापालन ही होने के कारण राजा का प्रजा के प्रति उत्तरदायित्व सर्वोपरि था। जब राजा का राज्याभिषेक होता था तो एक रिवाज में राजा कहता था ‘अदण्डोस्मि’ अब मै सार्वभौम हो गया हूँ और मुझे कोई दण्ड नहीं दे सकता। तब राजगुरू उसके मस्तक पर धर्मदण्ड का स्पर्श कराकर कहते थे ‘धर्मदण्डोसि’। तुम धर्म के अधीन हो और यदि धर्म के विपरित कार्य करोगे तो धर्म तुम्हें दण्डित करेगा। आज तो प्रजातन्त्र के शीर्षस्थ सत्ताधीश स्वयं को लोकपाल की पूछताछ के अधीन करने से भी कतरा रहे है। व्यवस्था में हिन्दु जीवनमूल्यों अर्थात धर्म के ना होने का ही यह परिणाम है।
धर्मदण्ड को ना माननेवाली सत्ता को सबक सीखाने का सामथ्र्य भी धर्मरक्षक धर्मात्माओं के पास था। जब क्षत्रीय अपने धर्म से च्युत हो गये तो भगवान् परशुराम ने 21 बार पूरी पृथ्वि को निःक्षत्रीय कर दिया। यह सत्ता पर धर्मको प्रस्थापित करने का कार्य था। परशुराम का चरित्र आज के समय में बड़ा ही मार्गदर्शक है। बचपन में पिता जमदग्नि की आज्ञा का पालन करते हुए माता रेणुका का शिरच्छेद करने का साहस और प्रसन्न पितासे माता के जीवन का वरदान मांगने की संवेदनशीलता; सत्ता के मद को धर्म का पाठ पढ़ाने का प्रयास करते जनआन्दोलनों में अनुशासन, आज्ञापालन व संवेदनशीलता का यह समन्वय वर्तमान समय की मांग है। परशुराम को हमारे शास्त्रों में विष्णु का अवतार माना गया है। भगवद्गीता के अनुसार अवतार का कार्य साधु अर्थात सज्जनों की रक्षा तथा दूष्टशक्ति अर्थात दूर्जनों के विनाश के द्वारा धर्मसंस्थापना का है। भगवान् परशुराम में हम देखते है कि जब दूर्जनशक्ति सत्ता में केन्द्रित हो जाये तो अपने पराक्रम के द्वारा उसको भी सही स्थान दिखाया जा सकता है।

भगवान परशुराम सात चिरंजीवों में आते है अर्थात यह तत्व सार्वकालीक है। सदा ही रहनेवाला है। किन्तु सदा रहने से भी अपनी बदलती भुमिका के प्रति वे सजग है। अतः रामायण में हम पाते है कि भगवान् राम के प्राकट्य के बाद मिथिला में शिवधनुष्य पर श्रीराम के प्रभुत्व का समाचार पाते ही परशुराम ने परीक्षा कर कोदण्ड के साथ ही अवतार का दायित्व रामजी को सौंप दिया। महाभारत में तो हम परशुराम जी की भुमिका और भी हाशियेपर देखते है। केवल कर्ण को ब्र्रह्मास्त्र का प्रशिक्षण तथा बादमें श्रापद्वारा विस्मरण में ही उनकी सक्रीय भूमिका दिखाई देती है। परशुराम के समान विराट व्यक्तित्व का समयानुकुल भूमिकाओं में समेटना भी वर्तमान समय में अनुकरणीय है।

आज पुनः जन जन में परशुराम का सत्व जागृत होने की महती आवश्यकता है। प्रजातन्त्र में सैद्धांतिक रूप से तो जन ही सार्वभौम है किन्तु व्यवहार में जब प्रशासन में सत्ता केन्द्रित हो जाये तब परशुराम को पुनः धर्मदण्ड धारण करना पड़ेगा।  व्यवस्था में सनातन तत्वों को सम्मिलित करने में हममें से प्रत्येक सहभागी हो सकता है। सरकार अपने नीति निर्धारण में जनता को योगदान करने का अवसर प्रदान करती है। प्रत्येक नये विधेयक के अनुलेखन में समाज को प्रतिक्रिया देने का अवसर दिया जाता है। केन्द्र भारती के जागरूक नागरिकों का कर्तव्य है कि ऐसे अवसरों का समुचित उपयोग करें। अभी काले धन पर जनता की राय जानने के लिये अणुडाक की घोषणा की गई है – bm-feedback@nic.in आज के परशुराम का परशु हमारी लेखनी, संगणक और वाणी ही है। इन उपकरणों के विवेकपूण प्रयोग से हम सत्ता को सन्मार्ग पर लाने का कर्तव्य निर्वाह कर सकें यह समय की मांग है|

जून 28, 2011 Posted by | चरित्र, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

बाबा और अण्णा के आंदोलन से उपजे प्रश्न?


देश परिवर्तन चाहता है। चाहे अण्णा का आंदोलन हो या बाबा का जिस उत्साह से लाखों भारतीय इस आन्दोलन में कूद पड़े वो इस बात का द्योतक है कि इस अन्यायकारी व्यवस्था से देश के युवा का मोहभंग हुआ है। भ्रष्टाचार या काले धन को तो मिटाना ही है पर देश पूरा परिवर्तन चाहता है। यह जागरण सर्वत्र है। जहां अण्णा के ओदोलन में शहरी लोग अधिक संख्या में उत्साह से सहभागी हुए वही बाबा के आंदोलन में दूर दूर के गांव कस्बे के लोगों की भी सहभागिता हुई। सत्ता का केन्द्र इस परिवर्तन के आंदोलन से उद्वेलित हो गया है। स्वाभाविक ही है जो चल रहा है उसका दायित्व भी उनका ही है और इस सड़ी गली व्यवस्था से वे ही सर्वाधिक लाभान्वित हो रहे है।
भारत की वर्तमान स्थिति के बारे में तीन बातें स्पष्ट है। पहली बात तो ये कि आज हमारे देश के युवा में एक आशावाद जन्मा है। स्वप्न जगे हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को अधिक सुखद बनाना चाहता है। गरीब से गरीब व्यक्ति अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा देना चाहता है। सबको लगता है कि उसके लिये अवसर भी है और नहीं है तो होने चाहिये। इस आशावाद से अपेक्षायें बढ़ी है। शासन से भी अपेक्षयें बढ़ी है।
दूसरी बात ये है कि सरकार और देश की राजनीति सम्भवतः इस परिवर्तन के साथ अपने रवैये को नहीं बदल पा रही है। उनकी संवेदनहीनता का परिणाम ये हे कि देश में प्रचण्ड क्रोध है। हर स्तर पर महंगाई, भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता से पूरे देश में हर स्तर का व्यक्ति त्रस्त है और गुस्से में है।
तिसरी बात ये है कि मिडिया के माध्यम से घोटालों के बाद घोटालों के बाहर आने के बाद जो जनता में घृणा और गुस्से का वातावरण जगा उसको कोई राजनितिक उपकरण नहीं मिला। विपक्षी दलों की विश्वसनीयता पर भी मिडिया ने प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया। इस आस्थाहीनता ने लोगों में निराशा छा गयी।
इन तीन बातों का परिणाम हुआ कि जब बाबा रामदेव ने देशभर में पदयात्रा के माध्यम से भ्रष्टाचार के विरूद्ध जनजागरण प्रारम्भ किया तो पूरा देश इसमें जुड़ गया। अण्णा हजारे के आन्दोलन को मिले मिड़िया कवरेज ने देश के शहरी युवा को इस मुद्देपर आवाज़ उठाने का अवसर प्रदान किया। इसी के चलते अण्णा के आन्दोलन को उत्सफूर्त प्रतिसाद प्राप्त हुआ।
बाबा रामदेव का आन्दोलन अधिक सुनियोजित था। सारे देश से लोग रामलीला मैदान में एकत्रित हुए थे। दिन में तो संख्या एक लाख के पार हो गई थी। रात को भी 50000 से अधिक लोग अनशन में सहभागी हो रहे थे। इस जनसहभाग ने सरकार की नीन्द उडा दी। मुद्दों से ध्यान हटाने के लिये साम्प्रदायिकता का विषय उठाने का प्रयत्न हुआ। पर बाबा के आन्दोलन को सभी सम्प्रदायों का समर्थन था। देवबन्द के मौलाना मदनी ने मंच से घोषणा की कि रविवार को हजारों मुसलमान इस संघर्ष में सम्मिलित होंगे। पता नहीं किस कारण से पर शासन के नियोजक बौखला गये।
बौखलाहट इतनी कि आधी रात के अंधेरे में शांत प्रार्थना करनेवाले साधकों पर निर्मम अत्याचार किये गये। लोगों की चोटें हमने अपनी आंखों से देखी है। अस्पतालों में कराहते लोगों की आंखों में भी संकल्प का ज्वार मन को आश्वस्त कर देता है। देश में सैकड़ों लोग अपने घरों के सुरक्षित वातावरण में समाचार वाहिनियों वा भ्रमित करती चर्चाओं को सुनकर भलेही ये सोचते रहे कि कुछ नहीं बदलेगा, पर रविवार की सुबह सड़कों पर, गुरूद्वारा बंगलासाहिब में, आर्यसमाज मंदिरों में एकत्रित आंदोलनकारियों के संकल्प को जिसने देखा है वो ही जान सकता है कि परिवर्तन का शंखनाद हो चुका है। सत्तालोलुप दुष्ट इस आग को अब अधिक देर नहीं दबा पायेंगे।
सरकार कुछ नहीं करना चाहती ये तो दमन से ही स्पष्ट है। बाबा के अनश्न को तोड़ने के लिये कोई ठोस प्रयत्न ना करना शासन के अंहकार को ही दर्शाता है। मूल मूद्दों को छोडकर साम्प्रदायिकता की बाते करना, व्यक्तिगत आक्षेप लगाना ये दर्शाता है कि सरकार बूरी तरहा से ड़र गयी है। सत्ता का दंभ सोचता है कि चरित्र हनन, सौदेबाजी अथवा दमन से आन्दोलन के नेतृत्व को दबा देने से परिवर्तन टल जायेगा। इसी के अन्तर्गत पतंजली योग पीठ पर कारवाई की जारही है। पर इस आंदोलन की सर्वव्यापकता ने अनेक युवाओं को नेतृत्व का प्रशिक्षण दे दिया है। गांव गांव में समर्पित युवा संकल्प के साथ कटिबद्ध हो गये है। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन व 1974 के जे पी आन्दोलन के समान ही इस काले धन विरोधाीआन्दोलन ने युवा नेतृत्व को जन्म दिया है। आक्रोश और क्रोध सुलग रहा है। इसे दबाया नहीं जा सकता।
रविवार रात की घटना के बाद सोमवार की सुबह दिल्ली का एक आॅटो वाला कहता है कल रात केवल बाबा का अपमान नहीं हुआ हम सब का अपमान हुआ है सारी जनता का अपमान हुआ है। इसका परिणाम चुनाव में दिखेगा। जब उसे बताया कि चुनाव अभी दूर है तो वो बोला अगले साल दिल्ली के तो है ना? हम दिखा देंगे। नया भारत जाग गया है। इस वर्ष के विधानसभा चुनावों में हमने देखा कि बड़ी संख्या में लोग मतदान के लिये आगे आये। 80-85 प्रतिशत मतदान सब जगहा हुआ। लोकतन्त्र के उपकरणों पर आज भी भारत का धार्मिक समाज विश्वास रखता है। और उसी के माध्यम से देश के भवितव्य को बदलने की मंशा रखता है।
भारत में अचानक क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं होतें हमने हर बार व्यवस्था को व्यवस्था के उपकरणों का प्रयोग करके ही बदला है। यहां तक की स्वतन्त्रता का आंदोलन भी औपनैवेशिक संविधान के अन्तर्गत ही हमने किया। आज उसी को बदनले का यह प्रसव पीड़न चल रहा है। व्यवस्था बदलेगी चुनाव के प्रस्थापित तन्त्र के द्वारा। पर क्या हमारा राजनैतिक नेतृत्व इस प्रसव को धारण कर नवीन को जन्म देने के लिये तैयार है। जनता के आक्रोश से हुआ सत्ता परिवर्तन क्या व्यवस्था परिवर्तन बनेगा? क्या विपक्ष व्यवस्था का विकल्प समाज के सामने रख पायेगा? क्या भारत के हजारों वर्षों के ऐतिहासिक अनुभव पर आधारित सच्ची स्वदेशी व्यवस्था का जन्म हो पायेगा?
बाबा और अण्णा के आंदोलन देश की संवेदनशील मेधा के सम्मूख ये प्रश्न छोड़ गये है। राजनीति तो परिवर्तन का माध्यम बनती है पर उससे पूर्व विचारकों के स्तर पर पूर्ण मंथन होना आवश्यक है। इस मंथन में देश के प्रबुद्ध वर्ग को सक्रीय होना होगा। भारत के महाशक्ति बनने में सबसे बड़ी बाधा यह विदेशी, कालातीत, भ्रष्ट व्यवस्था है। समर्थ भारत विश्व का नेतृत्व करने के लिये सन्नध हो रहा है उसी का अंग यह व्यवस्था परिवर्तन है। संवेदनशील, इमानदार व सर्वस्पर्शी विकास को धारण करने वाली व्यवस्था को भारत को लाना ही होगा।

जून 13, 2011 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , | टिप्पणी करे

   

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